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Read in context| * अध्याय २५७ * | १८७ |
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| कपिले मूषकन् विद्यात्खड्गाभे जलमादिशेत्।<br>एवंविधं सगर्भं तु वर्जयेद् वास्तुकर्मणि॥ १४<br><br>पूर्वच्छिन्नं तु गृह्णीयान्निमित्तशकुनैः शुभैः।<br>व्यासेन गुणिते दैर्घ्ये अष्टाभिर्वै हृते तथा॥ १५<br><br>यच्छेषमायतं विद्यादष्टभेदं वदामि वः।<br>ध्वजो धूम्रश्च सिंहश्च खरः श्वावृष एव च॥ १६<br><br>हस्ती ध्वाङ्क्षश्च पूर्वाद्याः करशेषा भवन्त्यमी।<br>ध्वजः सर्वमुखो धन्यः प्रत्यग्द्वारो विशेषतः॥ १७<br><br>उदङ्मुखो भवेत् सिंहः प्राङ्मुखो वृषभो भवेत्।<br>दक्षिणाभिमुखो हस्ती सप्तभिः समुदाहृतः॥ १८<br><br>एकेन ध्वज उद्दिष्टस्त्रिभिः सिंहः प्रकीर्त्तितः।<br>पञ्चभिर्वृषभः प्रोक्तो विकोणस्थांश्च वर्जयेत्॥ १९<br><br>तमेवाष्टगुणं कृत्वा करराशिं विचक्षणः।<br>सप्तविंशाहते भागे ऋक्षं विद्याद् विचक्षणः॥ २०<br><br>अष्टभिर्भाजिते ऋक्षे यः शेषः स व्ययो मतः।<br>व्यायाधिकं न कुर्वीत यतो दोषकरं भवेत्।<br>आयाधिके भवेच्छान्तिरित्याह भगवान् हरिः॥ २१<br><br>कृत्वाग्रतो द्विजवरानथ पूर्णकुम्भं<br>दध्यक्षताग्रदलपुष्पफलोपशोभम्।<br>दत्त्वा हिरण्यवसनानि तदा द्विजेभ्यो<br>माङ्गल्यशान्तिनिलयाय गृहं विशेत्तु॥ २२<br><br>गृह्योक्तहोमविधिना बलिकर्म कुर्यात्<br>प्रासादवास्तुशमने च विधिर्य उक्तः।<br>संतर्पयेद् विजवरानथ भक्ष्यभोज्यैः<br>शुक्लाम्बरःस्वभवनं प्रविशेत् सधूपम्॥ २३ | रंगसे गिरगिटका, मोतीके समान श्वेत चिह्नसे शुकका, कपिल वर्णसे चूहेका और तलवारकी भाँति चिह्न मिलनेपर जलका भय जानना चाहिये। इस प्रकारके गर्भवाले वृक्षको वास्तुकर्ममें त्याग देना चाहिये। पहलेसे कटे हुए वृक्षको शुभदायी निमित्त शकुनोंके साथ ग्रहण किया जा सकता है। घरके व्याससे लम्बाईके मानमें गुणाकर आठका भाग दे, जो शेष बचे उसे आयत जानना चाहिये। अब मैं आपलोगोंको आठका भेद बतला रहा हूँ। उन करशेषोंकी क्रमशः ध्वज, धूम, सिंह, खर, श्वान, वृषभ, हस्ती और काक संज्ञा होती है। चारों ओर मुखवाला तथा विशेषतया पश्चिम द्वारवाला ध्वज शुभकारी होता है। सिंहका उत्तर, वृषभका पूर्व, हाथीका दक्षिण मुख दुःखदायी होता है। सात विभागोंद्वारा इसे कहा जा चुका है। एक हाथसे ध्वजको, तीन हाथसे सिंहको और पाँच हाथसे वृषभको तो कहा गया। इनके अतिरिक्त जो त्रिकोणस्थ हों उन्हें व्यवहारमें नहीं लाना चाहिये। विचक्षण पुरुष उक्त करराशिके अंकको आठसे गुणाकर सत्ताईसका भाग देनेपर शेषको नक्षत्र माने। पुनः उस नक्षत्रमें आठका भाग देनेसे जो शेष बचता है, वह व्यय माना गया है। जिसमें व्यय अधिक निकले, उसे नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह दोषकारक होता है। आय अधिक होनेपर शान्ति होती है, ऐसा भगवान् हरिने कहा है। गृह पूर्ण हो जानेपर उसमें माङ्गलिक शान्तिकी स्थितिके लिये श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको आगे कर दही, अक्षत, आमके पल्लव, पुष्प तथा फलादिसे सुशोभित जलपूर्ण कलशको देकर तथा अन्य ब्राह्मणोंको सुवर्ण और वस्त्र देकर उस भवनमें गृहपतिको प्रवेश करना चाहिये। उस समय गृह्यसूत्रोंमें प्रासाद एवं वास्तुकी शान्तिके लिये जो विधि कही गयी है, उसके अनुसार हवन एवं बलि-कर्म करे। फिर भक्ष्य एवं भोज्य पदार्थोंद्वारा ब्राह्मणोंको सन्तुष्ट करे। तत्पश्चात् श्वेत वस्त्र धारणकर धूपादि द्रव्योंके साथ भवनमें प्रवेश करना चाहिये॥ १२-२३॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वास्तुविद्यानुकीर्तनं नाम सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २५७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वास्तुविद्यानुकीर्तन नामक दो सौ सत्तावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २५७॥