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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 996 of 1098

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Page 996

९८६ | * मत्स्यपुराण *


दो सौ सत्तावनवाँ अध्याय

गृहनिर्माण ( वास्तुकार्य )-में ग्राह्य काष्ठ

सूत उवाच
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि दार्व्वाहणमुत्तमम्।<br>धनिष्ठापञ्चकं मुक्त्वा त्विष्ट्यादिकमतः परम्॥ १<br>ततः सांवत्सरादिष्टे दिने यायाद् वनं बुधः।<br>प्रथमं बलिपूजां च कुर्याद् वृक्षस्य सर्वदा॥ २<br>पूर्वोत्तरेण पतितं गृहदारु प्रशस्यते।<br>अन्यथा न शुभं विन्द्याद् याम्योपरि निपातनम्॥ ३<br>क्षीरवृक्षोद्भवं दारु न गृहे विनिवेशयेत्।<br>कृताधिवासं विहगैरनिलानलपीडितम्॥ ४<br>गजावरुग्णं च तथा विद्युन्निर्घातपीडितम्।<br>अर्धशुष्कं तथा दारु भग्नशुष्कं तथैव च॥ ५<br>चैत्यदेवालयोत्पन्नं नदीसङ्गमजं तथा।<br>श्मशानकूपनिलं तडागादिसमुद्भवम्॥ ६<br>वर्जयेत् सर्वथा दारु यदिच्छेद विपुलां श्रियम्।<br>तथा कण्टकिनो वृक्षान् नीपनिम्बविभीतकान्॥ ७<br>श्लेष्मातकानाप्रतरून्वर्जयेद्गृहकर्मणि ।<br>आसनाशोकमधुकसर्जशालाः शुभावहाः॥ ८<br>चन्दनं पनस्रं धन्यं सुरदारु हरिद्रवः।<br>द्वाभ्यामेकेन वा कुर्यात् त्रिभिर्वा भवनं शुभम्॥ ९<br>बहुभिः कारितं यस्मादनेकभयदं भवेत्।<br>एकैकशिंशपा धन्या श्रीपर्णी तिन्दुको तथा॥ १०<br>एता नान्यसमायुक्ताः कदाचिच्छुभकारकाः।<br>स्यन्दनः पनसस्तद्वत् सरलार्जुनपद्मकाः॥ ११<br>एते नान्यसमायुक्ता वास्तुकार्यफलप्रदाः।**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! अब मैं उत्तम काष्ठ लानेकी विधि बतलाता हूँ। धनिष्ठा आदि पाँच नक्षत्रों और इसके बाद भद्रा आदिको छोड़कर ज्योतिषीद्वारा बताये गये शुभ दिनमें बुद्धिमान् पुरुष काष्ठ लानेके लिये वनको प्रस्थान करे। सर्वप्रथम ग्रहण किये जानेवाले वृक्षकी बलिपूजा करनी चाहिये। पूर्व तथा उत्तर दिशाकी ओर गिरनेवाले वृक्षका काष्ठ गृहनिर्माणमें मङ्गलकारी होता है तथा दक्षिणकी ओर गिरा हुआ अशुभ होता है। दूधवाले वृक्षोंका काष्ठ घरमें नहीं लगाना चाहिये। जो वृक्ष पक्षियोंद्वारा अधिष्ठित तथा वायु और अग्निसे पीड़ित हो, हाथीसे तोड़ा हुआ हो, बिजली गिरनेसे जल गया हो, जिसका आधा भाग सूख गया हो या कुछ अंश टूट-फूट गया हो, अश्वत्थवृक्ष समाधि या देवमन्दिरसे निकले वृक्ष, नदीके संगमपर स्थित वृक्षोंको अथवा जो श्मशानभूमि तालाब आदि जलाशयोंपर उगा हुआ हो, ऐसे वृक्षोंको विपुल लक्ष्मीकी इच्छा करनेवाले व्यक्तिको छोड़ देना चाहिये। इसी प्रकार काँटेदार वृक्ष, कदम्ब, निम्ब, बहेड़ा, ढेरा और आमके वृक्षोंको भी गृहकर्ममें नहीं लेना चाहिये। असना, अशोक, महुआ, सर्ज और साखूके काष्ठ मङ्गलप्रद हैं। चन्दन, कटहल, देवदारु तथा दारुल्दीके काष्ठ धनप्रद कहे गये हैं। एक, दो या तीन प्रकारके काष्ठोंद्वारा बनाया गया भवन शुभ होता है; क्योंकि अनेक प्रकारके काष्ठोंसे बनाया हुआ भवन अनेकों भय देनेवाला होता है। धनदायक शीशम, श्रीपर्णी तथा तिन्दुकोके काष्ठको अकेले ही लगाना चाहिये; क्योंकि ये अन्य किसी काष्ठके साथ सम्मिलित कर देनेसे कभी मङ्गलकारी नहीं होते। इसी प्रकार धव, कटहल, चीड़, अर्जुन और पद्म वृक्ष भी अन्य काष्ठोंके साथ सम्मिलित होनेपर गृहकार्यके लिये शुभदायक नहीं होते॥ १—११ १/२॥
तरुच्छेदे महापीते गोधा विन्द्याद्विचक्षणः॥ १२<br><br>माञ्जिष्ठवर्णे भेकः स्यान्नीले सर्पादि निर्दिशेत्।<br>अरुणे सरटं विद्यान्मुक्ताभे शुकमादिशेत्॥ १३वृक्ष काटते समय विचक्षण पुरुषको यदि पीले वर्णका चिह्न मिले तो भावी गृहमें गोहका, मंजीठ रंगका मिलनेपर मेढकका, नीला रंग मिलनेपर सर्पका, अरुण