मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२१६- राजकर्मचारियोंके धर्मका वर्णन
८५६ | * मत्स्यपुराण *
दो सौ चौदहवाँ अध्याय
सत्यवान्को जीवनलाभ तथा पत्नीसहित राजाको नेत्रज्योति एवं राज्यकी प्राप्ति
| मत्स्य उवाच | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**तदनन्तर पतिव्रता सुन्दरी सावित्री वहाँसे जिस मार्गसे गयी थी, उसी मार्गसे लौटकर उस स्थानपर आयी, जहाँ सत्यवान्का मृत शरीर पड़ा हुआ था। तब कृशाङ्गी सावित्री पतिके निकट जाकर उसके सिरको अपनी गोदमें रखकर पूर्ववत् बैठ गयी। उस समय भगवान् भास्कर अस्ताचलको जा रहे थे। नरेश्वर! धर्मराजसे मुक्त हुए सत्यवान्ने भी धीरे-धीरे आँखें खोली और अँगड़ाई ली। तत्पश्चात् प्राणोंके लौट आनेपर उसने अपनी स्त्री सावित्रीसे इस प्रकार कहा—'वह पुरुष कहाँ चला गया, जो मुझे खींचकर लिये जा रहा था। सुन्दरि! मैं नहीं जानता कि वह पुरुष कौन था! सर्वाङ्गसुन्दरि! इस वनमें सोते हुए मेरा पूरा दिन बीत गया और शुभे! तुम भी उपवाससे परिश्रान्त एवं दुःखी हुई तथा मुझ-जैसे दुष्टसे आज माता-पिताको भी दुःख भोगना पड़ा। सुन्दर भौंहोंवाली! मैं उन्हें देखना चाहता हूँ, चलो, जल्दी चलो'॥ १—६॥ |
| सावित्री तु ततः साध्वी जगाम् वरवर्णिनी।<br>पथा यथागतेनैव यत्रासीत् सत्यवान् मृतः॥ १<br>सा समासाद्य भर्तारं तस्योत्सङ्गतं शिरः।<br>कृत्वा विवेश तन्वङ्गी लम्बमाने दिवाकरे॥ २<br>सत्यवानपि निर्मुक्तो धर्मराजाच्छनैः शनैः।<br>उन्मीलयत नेत्राभ्यां प्रास्फुरच्च नराधिप॥ ३<br>ततः प्रत्यागतप्राणः प्रियां वचनमब्रवीत्।<br>क्वासौ प्रयातः पुरुषो यो मामप्यपकर्षति॥ ४<br>न जानामि वरारोहे कश्चासौ पुरुषः शुभे।<br>वनेऽस्मिंश्चारुसर्वाङ्गि सुप्तस्य च दिनं गतम्॥ ५<br>उपवासपरिश्रान्ता दुःखिता भवती मया।<br>अस्मद्धृतेनाद्य पितरौ दुःखितौ तथा।<br>द्रष्टुमिच्छाम्यहं सुभ्रु गमने त्वरिता भव॥ ६ | |
| सावित्र्युवाच | **सावित्री बोली—**प्रभो! सूर्य तो अस्त हो गये। पर यदि आपको पसंद हो तो हमलोग आश्रमको लौट चलें; क्योंकि मेरे सास-श्वशुर अंधे हैं। मैं वहीं आश्रममें यह सब घटित हुआ वृत्तान्त आपको बतलाऊँगी। सावित्री उस समय पतिसे ऐसा कहकर पतिके साथ ही चल पड़ी और वह राजकुमारी पतिके साथ आश्रमपर आ पहुँची। भार्गव! इसी समय पत्नीसहित द्युमत्सेनको नेत्र-ज्योति प्राप्त हो गयी। वे अपने प्रिय पुत्र और दुबली-पतली पुत्रवधूको न देखकर दुःखी हो रहे थे। उस समय तपस्वी ऋषि राजाको सान्त्वना दे रहे थे। इतनेमें ही उन्होंने पुत्रवधूके साथ पुत्रको वनसे आते हुए देखा। उस समय सुन्दरी सावित्रीने सत्यवान्के साथ सपत्नीक क्षत्रियश्रेष्ठ राजा द्युमत्सेनको प्रणाम किया। पिताने राजकुमार सत्यवान्को गले लगाया। तब सभी धर्मोंको जाननेवाले सत्यवान्ने उस वनमें निवास करनेवाले तपस्वियोंको अभिवादनकर रातमें ऋषियोंके साथ वहीं निवास किया। उस समय अनिन्दितचरित्रा सावित्रीने जैसी घटना घटित हुई थी, |
| आदित्योऽस्तमनुप्राप्तो यदि ते रुचितं प्रभो।<br>आश्रमं तु प्रयास्यावः श्वशुरौ हीनचक्षुषौ॥ ७<br>यथावृत्तं च तत्रैव तव वक्ष्ये यथाश्रमे।<br>एतावदुक्त्वा भर्तारं सह भर्त्रा तदा ययौ॥ ८<br>आससादाश्रमं चैव सह भर्त्रा नृपात्मजा।<br>एतस्मिन्नेव काले तु लब्धचक्षुर्महीपतिः॥ ९<br>द्युमत्सेनः सभार्यस्तु पर्यतप्यत भार्गव।<br>प्रियं पुत्रमपश्यन् वै स्नुषां चैवाथ कर्शिताम्॥ १०<br>आश्वास्यमानस्तु तथा स तु राजा तपोधनैः।<br>ददर्श पुत्रमायान्तं स्नुषया सह काननात्॥ ११<br>सावित्री तु वरारोहा सह सत्यवता तदा।<br>ववन्दे तत्र राजानं सभार्यं क्षत्रपुङ्गवम्॥ १२<br>परिष्वक्तस्तदा पित्रा सत्यवान् राजनन्दनः।<br>अभिवाद्य ततः सर्वान् वने तस्मिंस्तपोधनान्॥ १३<br>उवास तत्र तां रात्रिमृषिभिः सर्वधर्मवित्।<br>सावित्र्यपि जगादाथ यथावृत्तमनिन्दिता॥ १४ | |
| * अध्याय २१५ * | ८५७ |
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| व्रतं समापयामास तस्यामेव तदा निशि।<br>ततस्तूर्यैस्त्रियामान्ते ससैन्यस्तस्य भूपतेः॥ १५<br>आजगाम जनः सर्वो राज्यार्थाय निमन्त्रणे।<br>विज्ञापयामास तदा तत्र प्रकृतिशासनम्॥ १६<br>विचक्षुषस्ते नृपते येन राज्यं पुरा हृतम्।<br>अमात्यैः स हतो राजा भवांस्तस्मिन् पुरे नृपः॥ १७<br>एतच्छ्रुत्वा ययौ राजा बलेन चतुरङ्गिणा।<br>लेभे च सकलं राज्यं धर्मराजान्महात्मनः॥ १८<br>भ्रातृणां तु शतं लेभे सावित्र्यपि वराङ्गना।<br>एवं पतिव्रता साध्वी पितृपक्षं नृपात्मजा॥ १९<br>उज्जहार वरारोहा भर्तृपक्षं तथैव च।<br>मोक्षयामास भर्तारं मृत्युपाशवशं गतम्॥ २०<br>तस्मात् साध्व्यः स्त्रियः पूज्याः सततं देववन्नरैः।<br>तासां राजन् प्रसादेन धार्यते वै जगत्त्रयम्॥ २१<br>तासां तु वाक्यं भवतीह मिथ्या<br> न जातु लोकेषु चराचरेषु।<br>तस्मात् सदा ताः परिपूजनीयाः<br> कामान् समग्रानभिकामयानैः॥ २२<br>यश्चेदं शृणुयान्नित्यं सावित्र्याख्यानमुत्तमम्।<br>स सुखी सर्वसिद्धार्थो न दुःखं प्राप्नुयान्नरः॥ २३ | उसका वर्णन किया और उसी रातमें अपने व्रतको भी समाप्त किया। तदनन्तर तीन पहर बीत चुकनेपर राजाकी सारी प्रजा सेनासहित तुरही आदि बाजोंको बजाते हुए राजाको पुनः राज्य करनेके लिये निमन्त्रण देने आयी और यह सूचना दी कि राज्यमें आपका शासन अब पूर्ववत् हो। राजन्! नेत्रहीन होनेके कारण जिस राजाने आपके राज्यको छीन लिया था, वह राजा मन्त्रियोंद्वारा मार डाला गया। अब उस नगरमें आप ही राजा हैं। यह सुनकर राजा चतुरंगिणी सेनाके साथ वहाँ गये और महात्मा धर्मराजकी कृपासे पुनः अपने सम्पूर्ण राज्यको प्राप्त किये। सुन्दरी सावित्रीने भी सौ भाइयोंको प्राप्त किया। इस प्रकार साध्वी पतिव्रता सुन्दरी राजकुमारी सावित्रीने अपने पितृपक्ष तथा पतिपक्ष—दोनोंका उद्धार किया और मृत्युके पाशमें बँधे हुए अपने पतिको मुक्त किया॥ ७—२०॥<br><br>राजन्! इसलिये मनुष्योंको सदा साध्वी स्त्रियोंकी देवताओंके समान पूजा करनी चाहिये; क्योंकि उनकी कृपासे ये तीनों लोक स्थित हैं। उन पतिव्रता स्त्रियोंके वाक्य इस चराचर जगत्में कभी भी मिथ्या नहीं होते, इसलिये सभी मनोरथोंकी कामना करनेवालोंको सर्वदा इनकी पूजा करनी चाहिये। जो मनुष्य सावित्रीके इस सर्वोत्तम आख्यानको नित्य सुनता है, वह सभी प्रयोजनोंमें सफलता प्राप्तकर सुखका अनुभव करता है और कभी भी दुःखका भागी नहीं होता॥ २१—२३॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्यानसमाप्तिर्नाम चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सावित्री-उपाख्यान-समाप्ति नामक दो सौ चौदहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१४॥
दो सौ पंद्रहवाँ अध्याय *
राजाका कर्तव्य, राजकर्मचारियोंके लक्षण तथा राजधर्मका निरूपण
| मनुरुवाच<br>राज्ञोऽभिषिक्तमात्रस्य किं नु कृत्यतमं भवेत्।<br>एतन्मे सर्वमाचक्ष्व सम्यग्वेत्ति यतो भवान्॥ १<br>मत्स्य उवाच<br>अभिषेकार्द्रशिरसा राज्ञा राज्यावलोकिना।<br>सहायवरणं कार्यं तत्र राज्यं प्रतिष्ठितम्॥ २ | मनुने पूछा— भगवन्! अभिषेक होनेके बाद राजाको तुरंत कौन-सा कर्म करना आवश्यक है? वह सब मुझे बताइये; क्योंकि आप इसे अच्छी तरह जानते हैं॥ १॥<br>मत्स्यभगवान्ने कहा— राजन्! राज्यकी रक्षा करनेवाले राजाको चाहिये कि वह अभिषेकके जलसे सिरके भीगते ही सहायकों (मन्त्रियों)-की नियुक्ति करे; क्योंकि राज्य उन्हींपर प्रतिष्ठित रहता है। |
* चण्डेश्वरादिके 'राजनीतिरत्नाकर' आदि संग्रह बड़े श्रेष्ठ हैं। वे रामायण, महाभारत तथा पुराणादिसे ही संगृहीत हैं। उनमें भी मत्स्यपुराणोक्त इस राजनीतिप्रकरणका स्थान श्रेष्ठतर है, अतः यह अंश आजके राजनेताओंके लिये विशेष मननीय है।
८५८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यदप्यल्पतरं कर्म तदप्येकेन दुष्करम्।<br>पुरुषेणासहायेन किमु राज्यं महोदयम्॥ ३<br>तस्मात् सहायान् वरयेत् कुलीनान् नृपतिः स्वयं।<br>शूरान् कुलीनजातीयान् बलयुक्ताञ्छ्रियान्वितान्॥ ४<br>रूपसत्त्वगुणोपेतान् सजनान् क्षमयान्वितान्।<br>क्लेशक्षमान् महोत्साहान् धर्मज्ञांश्च प्रियंवदान्॥ ५<br>हितोपदेशकालज्ञान् स्वामिभक्तान् यशोऽर्थिनः।<br>एवंविधान् सहायांश्च शुभकर्मसु योजयेत्॥ ६<br>गुणहीनानपि तथा विज्ञाय नृपतिः स्वयं।<br>कर्मस्वेव नियुञ्जीत यथायोग्येषु भागशः॥ ७<br>कुलीनः शीलसम्पन्नो धनुर्वेदविशारदः।<br>हस्तिशिक्षाश्वशिक्षासु कुशलः श्लक्ष्णभाषितः॥ ८<br>निमित्ते शकुनज्ञाने वेत्ता चैव चिकित्सिते।<br>कृतज्ञः कर्मणां शूरस्तथा क्लेशसहस्त्वृजुः॥ ९<br>व्यूहतत्त्वविधानज्ञः फल्गुसारविशेषवित्।<br>राज्ञा सेनापतिः कार्यो ब्राह्मणः क्षत्रियोऽथवा॥ १० | जो छोटे-से-छोटा भी कार्य होता है, वह भी सहायकरहित अकेले व्यक्तिके लिये दुष्कर होता है, फिर राज्य-जैसे महान् उत्तरदायित्वपूर्ण कार्यके लिये तो कहना ही क्या है? इसलिये राजाको चाहिये कि जो उत्तम कुलमें उत्पन्न, शूर, उच्च जातिमें उत्पन्न, बलवान्, श्रीसम्पन्न, रूपवान्, सत्त्वगुणसे युक्त, सज्जन, क्षमाशील, कष्टसहिष्णु, महोत्साही, धर्मज्ञ, प्रियभाषी, हितोपदेशके कालका ज्ञाता, स्वामिभक्त तथा यशके अभिलाषी हों, ऐसे सहायकोंका स्वयं वरण करके उन्हें माङ्गलिक कर्मोंमें नियुक्त करे। उसी प्रकार स्वयं राजाको कुछ गुणहीन सहायकोंको भी जान-बूझकर उन्हें यथायोग्य कार्योंमें विभागपूर्वक नियुक्त करना चाहिये। राजाको उत्तम कुलोत्पन्न, शीलवान्, धनुर्वेदमें प्रवीण, हाथी और अश्वकी शिक्षामें कुशल, मृदुभाषी, शकुन और अन्यान्य शुभाशुभ कारणों तथा ओषधियोंको जाननेवाला, कृतज्ञ, शूरतामें प्रवीण, कष्टसहिष्णु, सरल, व्यूह-रचनाके विधानको जाननेवाला, निस्तत्त्व एवं सारतत्त्वका विशेषज्ञ, ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय पुरुषको सेनापति-पदपर नियुक्त करना चाहिये॥ २-१०॥ |
| प्रांशुः सुरूपो दक्षश्च प्रियवादी न चोद्धतः।<br>चित्तग्राहश्च सर्वेषां प्रतीहारो विधीयते॥ ११ | ऊँचे कदवाला, सौन्दर्यशाली, कार्यकुशल, प्रियवक्ता, गम्भीर तथा सबके चित्तको आकर्षित करनेवालेको प्रतिहारी बनानेका विधान है। |
| यथोक्तवादी दूतः स्याद् देशभाषाविशारदः।<br>शक्तः क्लेशसहो वाग्मी देशकालविभागवित्॥ १२<br>विज्ञातदेशकालश्च दूतः स स्यान्महीक्षितः।<br>वक्ता नयस्य यः काले स दूतो नृपतेर्भवेत्॥ १३ | जो सत्यवादी, देशी भाषामें प्रवीण, सामर्थ्यशाली, सहिष्णु, वक्ता, देश-कालके विभागको जाननेवाला, देश-कालका जानकार तथा मौकेपर नीतिकी बातें कहनेवाला हो, वह राजाका दूत हो सकता है। |
| प्रांशवो व्यायताः शूरा दृढभक्ता निराकुलाः।<br>राज्ञा तु रक्षिणः कार्याः सदा क्लेशसहा हिताः॥ १४ | जो लम्बे कदवाले, कम सोनेवाले, शूर, दृढ़ भक्ति रखनेवाले, धैर्यवान्, कष्टसहिष्णु और हितैषी हों, ऐसे पुरुषोंको राजाद्वारा अङ्गरक्षकके कार्यमें नियुक्त किया जाना चाहिये। |
| अनाहार्योऽनृशंसश्च दृढभक्तिश्च पार्थिवे।<br>ताम्बूलधारी भवति नारी वाप्यथ तद्गुणा॥ १५ | जो दूसरोंद्वारा बहकाया न जा सके, दुष्ट स्वभावका न हो, राजामें अगाध भक्ति रखता हो—ऐसा पुरुष ताम्बूलधारी हो सकता है, अथवा ऐसे गुणवाली स्त्री भी नियुक्त की जा सकती है। |
| षाड्गुण्यविधितत्त्वज्ञो देशभाषाविशारदः।<br>सांधिविग्रहिकः कार्यो राज्ञा नयविशारदः॥ १६ | राजाको नीति शास्त्रके छः गुणोंके तत्त्वोंको जाननेवाले, देशी भाषामें प्रवीण एवं नीतिनिपुणको सन्धि-विग्राहिक बनाना चाहिये। |
| कृताकृतज्ञो भृत्यानां ज्ञेयः स्याद् देशरक्षिता।<br>आयव्ययज्ञो लोकज्ञो देशोत्पत्तिविशारदः॥ १७ | भृत्योंके कृत-अकृत कार्योंको जाननेवाले, आय-व्ययके ज्ञाता, लोकका जानकार और देशोत्पत्तिमें निपुण पुरुषको देशरक्षक बनाना चाहिये। |