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मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
१०३- युधिष्ठिरकी चिन्ता, उनकी महर्षि मार्कण्डेयसे भेंट और महर्षिद्वारा प्रयाग-माहात्म्यका उपक्रम
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३४६ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| लक्ष्मीमभ्यर्च्य पञ्चम्यामुपवासी भवेन्नरः।<br>समान्ते हेमकमलं दद्याद् धेनुसमन्वितम्॥ १९<br>स वैष्णवं पदं याति लक्ष्मीवान् जन्मजन्मनि।<br>एतत् सम्पद्व्रतं नाम दुःखशोकविनाशनम्॥ २०<br>कृत्वोपलेपनं शम्भोरग्रतः केशवस्य च।<br>यावदब्दं पुनर्दद्याद् धेनुं जलघटान्विताम्॥ २१<br>जन्मायुतं स राजा स्यात् ततः शिवपुरं व्रजेत्।<br>एतदाययुर्व्रतं नाम सर्वकामप्रदायकम्॥ २२<br>अश्वत्थं भास्करं गङ्गां प्रणम्यैकत्र वाग्यतः।<br>एकभक्तं नरः कुर्यादब्दमेकं विमत्सरः॥ २३<br>व्रतान्ते विप्रमिथुनं पूज्यं धेनुत्रयान्वितम्।<br>वृक्षं हिरण्मयं दद्यात् सोऽश्वमेधफलं लभेत्।<br>एतत् कीर्तिव्रतं नाम भूतिकीर्तिफलप्रदम्॥ २४<br>घृतेन स्नपनं कुर्याच्छम्भोर्वा केशवस्य च।<br>अक्षताभिः सपुष्पाभिः कृत्वा गोमयमण्डलम्॥ २५<br>तिलधेनुसमोपेतं समान्ते हेमपङ्कजम्।<br>शुद्धमष्टाङ्गुलं दद्याच्छिवलोके महीयते।<br>सामगाय ततश्चैतत् सामव्रतमिहोच्यते॥ २६ | 'सारस्वत' नामक व्रत है ॥ ९—१८ ॥<br><br>जो मनुष्य पञ्चमी तिथिको निराहार रहकर लक्ष्मीकी पूजा करता है और वर्षकी समाप्तिके दिन गौके साथ स्वर्ण-निर्मित कमलका दान करता है, वह विष्णुलोकको जाता है और प्रत्येक जन्ममें लक्ष्मीसे सम्पन्न रहता है। यह 'सम्पद्व्रत' है, जो दुःख और शोकका विनाश करनेवाला है। जो मनुष्य एक वर्षतक भगवान् शिव और केशवकी मूर्तिके सामनेकी भूमिको लीपकर वहाँ जलपूर्ण घटसहित गौका दान करता है, वह दस हजार वर्षोतक राजा होता है और मरणोपरान्त शिवलोकमें जाता है। यह 'आयुव्रत' है, जो सभी मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है। जो मनुष्य एक वर्षतक मत्सररहित हो दिनमें एक बार भोजन कर मौन-धारणपूर्वक एक ही स्थानपर पीपल, सूर्य और गङ्गाको प्रणाम करता है तथा व्रतकी समाप्तिमें पूजनीय ब्राह्मण-दम्पतिको तीन गौओंके साथ स्वर्णनिर्मित वृक्षका दान करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। यह 'कीर्तिव्रत' है, जो वैभव और कीर्तिरूपी फलका प्रदाता है। जो मनुष्य एक वर्षतक गोबरसे मण्डल बनाकर वहाँ भगवान् शिव अथवा केशवको घीसे स्नान कराकर पुष्प, अक्षत आदिसे पूजा करता है और वर्षान्तमें तिल-धेनुसहित आठ अङ्गुल लम्बा शुद्ध स्वर्णनिर्मित कमल सामवेदी ब्राह्मणको दान करता है, वह शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसे इस लोकमें 'सामव्रत' कहा जाता है ॥ १९—२६ ॥ |
| नवम्यामेकभक्तं तु कृत्वा कन्याश्च शक्तितः।<br>भोजयित्वाऽऽसनं दद्याद्धेमकञ्चुकवाससी॥ २७<br>हैमं सिंहं च विप्राय दत्त्वा शिवपदं व्रजेत्।<br>जन्मार्बुदं सुरूपः स्याच्छत्रुभिश्चापराजितः।<br>एतद् वीरव्रतं नाम नारीणां च सुखप्रदम्॥ २८ | जो मनुष्य नवमी तिथिको दिनमें एक बार भोजन करके अपनी शक्तिके अनुसार कन्याओंको भोजन कराकर उन्हें आसन और सोनेके तारोंसे खचित चोली एवं साड़ी तथा ब्राह्मणको स्वर्णनिर्मित सिंह दान करता है, वह शिवलोकमें जाता है और एक अरब जन्मोंतक सौन्दर्यसम्पन्न एवं शत्रुओंके लिये अजेय हो जाता है। यह 'वीरव्रत' है, जो नारियोंके लिये सुखदायक है। |
| यावत्समा भवेद् यस्तु पञ्चदश्यां पयोव्रतः।<br>समान्ते श्राद्धकृद् दद्यात् पञ्च गास्तु पयस्विनीः॥ २९<br>वासांसि च पिशङ्गानि जलकुम्भयुतानि च।<br>स याति वैष्णवं लोकं पितॄणां तारयेच्छतम्।<br>कल्पान्ते राजराजः स्यात् पितृव्रतमिदं स्मृतम्॥ ३० | जो मनुष्य एक वर्षतक पूर्णिमा तिथिको केवल दूध पीकर व्रत करता है और वर्षकी समाप्तिके दिन श्राद्ध करके लालिमायुक्त भूरे रंगके वस्त्र और जलपूर्ण घटोंके साथ पाँच दुधारू गायें दान करता है, वह विष्णुलोकको जाता है और अपने सौ पीढ़ीतकके पितरोंको तार देता है। पुनः एक कल्प व्यतीत होनेपर वह भूतलपर राजराजेश्वर होता है। यह 'पितृव्रत' कहलाता है। |
| चैत्रादिचतुरो मासान् जलं दद्यादयाचितम्।<br>व्रतान्ते माणिकं दद्यादन्नवस्त्रसमन्वितम्॥ ३१ | जो मनुष्य चैत्रसे आरम्भ कर चार मासतक बिना याचना किये जलका दान देता है अर्थात् पौसला चलाता है तथा व्रतके अन्तमें अन्न एवं |
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| * अध्याय १०१ * | ३४७ |
|---|---|
| तिलपात्रं हिरण्यं च ब्रह्मलोके महीयते।<br>कल्पान्ते भूपतिर्नूनमानन्दव्रतमुच्यते॥ ३२ | वस्त्रसे युक्त मिट्टीका घड़ा, तिलसे भरा पात्र और सुवर्णका दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। एक कल्पके व्यतीत होनेपर वह निश्चय ही भूपाल होता है। यह 'आनन्दव्रत' कहा जाता है॥ २७—३२॥ |
| पञ्चामृतेन स्नपनं कृत्वा संवत्सरं विभोः।<br>वत्सरान्ते पुनर्दद्याद् धेनुं पञ्चामृतेन हि॥ ३३<br>विप्राय दद्याच्छङ्खं च स पदं याति शाङ्करम्।<br>राजा भवति कल्पान्ते धृतिव्रतमिदं स्मृतम्॥ ३४ | जो एक वर्षतक पञ्चामृत (दूध, दही, घी, मधु, शक्कर)-से भगवान्की मूर्तिको स्नान कराता है, पुनः वर्षान्तमें पञ्चामृतसहित गौ और शङ्ख ब्राह्मणको दान करता है, वह शिवलोकमें जाता है और एक कल्पके बाद भूतलपर राजा होता है। यह 'धृतिव्रत' कहा जाता है। |
| वर्जयित्वा पुमान् मांसमब्दान्ते गोप्रदो भवेत्।<br>तद्वद्धेममृगं दद्यात् सोऽश्वमेधफलं लभेत्।<br>अहिंसाव्रतमित्युक्तं कल्पान्ते भूपतिर्भवेत्॥ ३५ | जो मनुष्य एक वर्षतक मांस खाना छोड़कर वर्षान्तमें गौ दान करता है तथा उसके साथ स्वर्णनिर्मित मृग भी देता है, वह अश्वमेधयज्ञके फलका भागी होता है और कल्पान्तमें राजा होता है। यह 'अहिंसाव्रत' कहलाता है। |
| माघमास्युषसि स्नानं कृत्वा दाम्पत्यमर्चयेत्।<br>भोजयित्वा यथाशक्त्या माल्यवस्त्रविभूषणैः।<br>सूर्यलोके वसेत् कल्पं सूर्यव्रतमिदं स्मृतम्॥ ३६ | जो मनुष्य माघमासमें ब्राह्मवेलामें स्नान कर अपनी शक्तिके अनुसार एक द्विज-दम्पतिको भोजन कराकर पुष्पमाला, वस्त्र और आभूषण आदिसे उनकी पूजा करता है, वह एक कल्पतक सूर्यलोकमें निवास करता है। यह 'सूर्यव्रत' कहा जाता है। |
| आषाढादि चतुर्मासं प्रातःस्नायी भवेन्नरः।<br>विप्रेभ्यो भोजनं दद्यात् कार्तिक्त्यां गोप्रदो भवेत्।<br>स वैष्णवं पदं याति विष्णुव्रतमिदं शुभम्॥ ३७ | जो मनुष्य आषाढ़से आरम्भकर चार महीनेतक नित्य प्रातःकाल स्नान करता है और ब्राह्मणोंको भोजन देता है तथा कार्तिकी पूर्णिमाको गो-दान करता है, वह विष्णुलोकको जाता है। यह मङ्गलमय 'विष्णुव्रत' है। |
| अयनादयनं यावद् वर्जयेत् पुष्पसर्पिषी।<br>तदन्ते पुष्पदामानि घृतधेन्वा सहैव तु॥ ३८<br>दत्त्वा शिवपदं गच्छेद्विप्राय घृतपायसम्।<br>एतच्छीलव्रतं नाम शीलारोग्यफलप्रदम्॥ ३९ | जो मनुष्य एक अयनसे दूसरे अयनतक (उत्तरायणसे दक्षिणायन अथवा दक्षिणायनसे उत्तरायणतक) पुष्प और घीका त्याग कर देता है और व्रतान्तके दिन घृत, धेनुसहित पुष्पोंकी मालाएँ एवं घी और दूधसे बने हुए खाद्य पदार्थ ब्राह्मणको दान करता है, वह शिवलोकको जाता है। यह 'शीलव्रत' है, जो सुशीलता एवं नीरोगतारूप फल प्रदान करता है। |
| संध्यादीपप्रदो यस्तु घृतं तैलं विवर्जयेत्।<br>समान्ते दीपिकां दद्याच्चक्रशूले च काञ्चने॥ ४०<br>वस्त्रयुग्मं च विप्राय तेजस्वी स भवेदिह।<br>रुद्रलोकमवाप्नोति दीप्तिव्रतमिदं स्मृतम्॥ ४१ | जो एक वर्षतक नित्य सायंकाल दीप-दान करता है और तेल-घी खाना छोड़ देता है, पुनः वर्षान्तमें ब्राह्मणको स्वर्णनिर्मित चक्र, त्रिशूल और दो वस्त्रके साथ दीपकका दान देता है, वह इस लोकमें तेजस्वी होता है और मरणोपरान्त रुद्रलोकको प्राप्त होता है। यह 'दीप्तिव्रत' कहलाता है॥ ३३—४१॥ |
| कार्तिक्यादितृतीयायां प्राश्य गोमूत्रयावकम्।<br>नक्तं चरेदब्दमेकमब्दान्ते गोप्रदो भवेत्॥ ४२<br>गौरीलोके वसेत् कल्पं ततो राजा भवेदिह।<br>एतद् रुद्रव्रतं नाम सदा कल्याणकारकम्॥ ४३ | जो एक वर्षतक कार्तिकमाससे प्रारम्भ कर तृतीया तिथिको गोमूत्र एवं जौसे बने हुए खाद्य पदार्थोंको खाकर नक्तव्रतका पालन करता है और वर्षान्तमें गोदान करता है, वह एक कल्पतक गौरीलोकमें निवास करता है और (पुण्य क्षीण होनेपर) भूतलपर राजा होता है। यह 'रुद्रव्रत' है जो सदाके लिये कल्याणकारी है। |
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३४८ | * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वर्जयेच्चैत्रमासे च यश्च गन्धानुलेपनम्।<br>शुक्तिं गन्धभृतां दत्त्वा विप्राय सितवाससी।<br>वारुणं पदमाप्नोति दृढव्रतमिदं स्मृतम्॥ ४४ | जो चैत्रमासमें सुगन्धित वस्तुओंका अनुलेपन छोड़ देता है अर्थात् शरीरमें सुगन्धित पदार्थ नहीं लगाता और व्रतान्तमें ब्राह्मणको दो श्वेत वस्त्रोंके साथ गन्धधारियोंकी शुक्ति (गन्धद्रव्यविशेष)-का दान करता है वह वरुणलोकको प्राप्त होता है। यह 'दृढव्रत' कहलाता है। |
| वैशाखे पुष्पलवणं वर्जयित्वाथ गोप्रदः।<br>भूत्वा विष्णुपदे कल्पं स्थित्वा राजा भवेदिह।<br>एतत् कान्तिव्रतं नाम कान्तिकीर्तिफलप्रदम्॥ ४५ | जो वैशाख-मासमें पुष्प और नमकका परित्याग कर व्रतान्तमें गोदान करता है वह एक कल्पतक विष्णुलोकमें निवास करके (पुण्य क्षीण होनेपर) इस लोकमें राजा होता है। यह 'कान्तिव्रत' है, जो कान्ति और कीर्तिरूपी फलका प्रदाता है। |
| ब्रह्माण्डं काञ्चनं कृत्वा तिलराशिसमन्वितम्।<br>त्र्यहं तिलप्रदो भूत्वा वह्निं संतर्प्य सद्धिजम्॥ ४६<br>सम्पूज्य विप्रदाम्पत्यं माल्यवस्त्रविभूषणैः।<br>शक्तितस्त्रिपलादूर्ध्वं विश्वात्मा प्रीयतामिति॥ ४७<br>पुण्येऽह्नि दद्यात् स परं ब्रह्म यात्यपुनर्भवम्।<br>एतद् ब्रह्मव्रतं नाम निर्वाणपददायकम्॥ ४८ | जो किसी पुण्यप्रद दिनमें अपनी शक्तिके अनुसार तीन पलसे अधिक सोनेका ब्रह्माण्ड बनवाकर तिलकी राशिपर स्थापित कर देता है और तीन दिनतक ब्राह्मणसहित अग्निको संतुष्ट करके तिलका दान देता रहता है, पुनः चौथे दिन एक विप्र-दम्पतिकी पुष्पमाला, वस्त्र और आभूषण आदिसे विधिपूर्वक पूजा करके 'विश्वात्मा मुझपर प्रसन्न हों'—इस भावनासे वह ब्रह्माण्ड दान कर देता है, वह पुनर्जन्मरहित परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। यह 'ब्रह्मव्रत' है, जो मोक्षपदका दाता है। |
| यश्चोभयमुखीं दद्यात् प्रभूतकनकान्विताम्।<br>दिनं पयोव्रतस्तिष्ठेत् स याति परमं पदम्।<br>एतद् धेनुव्रतं नाम पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ ४९ | जो दिनभर पयोव्रतका पालन (दूधका आहार) करके अधिक-से-अधिक सोनेकी बनी हुई उभयमुखी (दो मुखवाली अथवा सवत्सा) गौका दान करता है, वह पुनरागमनरहित परमपदको प्राप्त हो जाता है। यह 'धेनुव्रत' है। |
| त्र्यहं पयोव्रते स्थित्वा काञ्चनं कल्पपादपम्।<br>पलादूर्ध्वं यथाशक्त्या तण्डुलैस्तूपसंयुतम्।<br>दत्त्वा ब्रह्मपदं याति कल्पव्रतमिदं स्मृतम्॥ ५० | जो तीन दिनतक पयोव्रतका पालन करके अपनी शक्तिके अनुसार एक पलसे अधिक सोनेका कल्पवृक्ष बनवाकर उसे चावलकी राशिपर स्थापित करके दान कर देता है वह ब्रह्मपदको प्राप्त हो जाता है। इसे 'कल्पव्रत' कहा जाता है। |
| मासोपवासी यो दद्याद् धेनुं विप्राय शोभनाम्।<br>स वैष्णवं पदं याति भीमव्रतमिदं स्मृतम्॥ ५१ | जो एक मासतक निराहार रहकर ब्राह्मणको सुन्दर गौका दान करता है वह विष्णुलोकको जाता है। यह 'भीमव्रत' कहलाता है॥ ४२—५१॥ |
| दद्याद् विंशत्पलादूर्ध्वं महीं कृत्वा तु काञ्चनीम्।<br>दिनं पयोव्रतस्तिष्ठेद् रुद्रलोके महीयते।<br>धराव्रतमिदं प्रोक्तं सप्तकल्पशतानुगम्॥ ५२ | जो दिनभर पयोव्रतका पालन कर बीस पलसे अधिक सोनेसे पृथ्वीकी मूर्ति बनवाकर दान करता है, वह रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसे 'धराव्रत' कहते हैं, जो सात सौ कल्पोंतक दाताका अनुगमन करता रहता है। |
| माघे मासेऽथवा चैत्रे गुडधेनुप्रदो भवेत्।<br>गुडव्रतस्तृतीयायां गौरीलोके महीयते।<br>महाव्रतमिदं नाम परमानन्दकारकम्॥ ५३ | जो माघ अथवा चैत्रमासमें तृतीया तिथिको गुडव्रतका पालन कर गुडधेनुका दान करता है वह गौरीलोकमें प्रतिष्ठित होता है। यह परमानन्द प्रदान करनेवाला 'महाव्रत' है। |
| पक्षोपवासी यो दद्याद् विप्राय कपिलाद्वयम्।<br>ब्रह्मलोकमवाप्नोति देवासुरसुपूजितम्।<br>कल्पान्ते राजराजः स्यात् प्रभाव्रतमिदं स्मृतम्॥ ५४ | जो एक पक्षतक निराहार रहकर ब्राह्मणको दो कपिला गौका दान करता है वह देवताओं एवं असुरोंद्वारा सुपूजित ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है और एक कल्प बीतनेपर भूतलपर राजाधिराज होता है। इसे 'प्रभाव्रत' कहते हैं। |