मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१०१- साठ व्रतोंका विधान और माहात्म्य
| ३३६ | * मत्स्यपुराण * |
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| सम्पूज्य रक्ताम्बरमाल्यधूपै-<br>र्द्विजं च रक्तैरथ हेमशृङ्गैः।<br>संकल्पयित्वा पुरुषं सपद्मं<br>दद्यादनेकव्रतदानकाय ।<br>अव्यङ्गरूपाय जितेन्द्रियाय<br>कुटुम्बिने देयमनुद्धताय ॥ १५<br><br>नमो नमः पापविनाशनाय<br>विश्वात्मने सप्ततुरंगमाय।<br>सामर्ग्यजुर्धामनिधे विधात्रे<br>भवाब्धिपोताय जगत्सवित्रे ॥ १६<br><br>इत्यनेन विधिना समाचरे-<br>दब्दमेकमिह यस्तु मानवः।<br>सोऽधिरोहति विनष्टकल्मषः<br>सूर्यधाम धुतचामरावलिः ॥ १७<br><br>धर्मसंक्षयमवाप्य भूपतिः<br>शोकदुःखभयरोगवर्जितः ।<br>द्वीपसप्तकपतिः पुनः पुन-<br>र्धर्ममूर्तिरमितौजसा युतः ॥ १८<br><br>या च भर्तृगुरुदेवतत्परा<br>वेदमूर्तिदिननक्तमाचरेत् ।<br>सापि लोकममरेशवन्दिता<br>याति नारद रवेर्न संशयः ॥ १९<br><br>यः पठेद्रपि शृणोति मानवः<br>पठ्यमानमथ वानुमोदते।<br>सोऽपि शक्रभुवनस्थितोऽमरैः<br>पूज्यते वसति चाक्षयं दिवि ॥ २० | तत्पश्चात् लाल रंगके स्वर्णनिर्मित सिंघा बाजाके साथ लाल वस्त्र, पुष्पमाला और धूपसे ब्राह्मणकी पूजा करके संकल्पपूर्वक गौ एवं कमलसहित उस पुरुष-मूर्तिको ऐसे ब्राह्मणको दान कर दे, जो अनेकों श्रेष्ठ व्रतोंमें दान लेनेका अधिकारी, सुडौल रूपसे सम्पन्न, जितेन्द्रिय, शान्त-स्वभाव और विशाल कुटुम्बवाला हो। (उस समय ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये—) 'जो पापके विनाशक, विश्वके आत्मस्वरूप, सात घोड़ोंसे जुते रथपर आरूढ़ होनेवाले, ऋक्, यजुः, साम—तीनों वेदोंके तेजकी निधि, विधाता, भवसागरके लिये नौकास्वरूप और जगत्स्रष्टा हैं, उन सूर्यदेवको बारंबार नमस्कार है।' जो मानव इस लोकमें उपर्युक्त विधिके अनुसार एक वर्षतक इस व्रतका अनुष्ठान करता है, वह पापरहित होकर सूर्यलोकको चला जाता है। उस समय उसके ऊपर चँवर डुलाये जाते हैं। पुण्य क्षीण होनेपर वह इस लोकमें शोक, दुःख, भय और रोगसे रहित होकर बारंबार अमित ओजस्वी एवं धर्मात्मा भूपाल होता है, उस समय सातों द्वीप उसके अधिकारमें रहते हैं। नारदजी! पति, गुरुजन और देवताओंकी शुश्रूषामें तत्पर रहनेवाली जो नारी रविवारको इस नक्तव्रतका अनुष्ठान करती है, वह भी इन्द्रद्वारा पूजित होकर निस्संदेह सूर्यलोकको चली जाती है। जो मानव इस व्रतको पढ़ता या सुनता है अथवा पढ़नेवालेका अनुमोदन करता है, वह भी इन्द्रलोकमें स्थित होकर देवताओंद्वारा पूजित होता है और अक्षय कालतक स्वर्गलोकमें निवास करता है॥ १३—२०॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे आदित्यवारकल्पो नाम सप्तनवतितमोऽध्यायः॥ ९७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें आदित्यवार-कल्प नामक सत्तानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९७॥
- अध्याय ९८ * | ३३७
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अट्ठानबेवाँ अध्याय
संक्रान्ति-व्रतके उद्यापनकी विधि
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नन्दिकेश्वर उवाच<br><br>अथान्यदपि वक्ष्यामि संक्रान्त्युद्यापने फलम्।<br>यदक्षयं परे लोके सर्वकामफलप्रदम्॥ १<br><br>अयने विषुवे वापि संक्रान्तिव्रतमाचरेत्।<br>पूर्वेद्युरेकभक्तेन दन्तधावनपूर्वकम्।<br>संक्रान्तिवासरे प्रातस्तिलैः स्नानं विधीयते॥ २<br><br>रविसंक्रमणे भूमौ चन्दनेनाष्टपत्रकम्।<br>पद्मं सकर्णिकं कुर्यात् तस्मिन्नावाहयेद् रविम्॥ ३<br><br>कणिकायां न्यसेत् सूर्यमादित्यं पूर्वतस्ततः।<br>नम उष्णार् चिषे याम्ये नमो ऋङ्मण्डलाय च॥ ४<br><br>नमः सवित्रे नैर्ऋत्ये वारुणे तपनं पुनः।<br>वायव्ये तु भगं न्यस्य पुनः पुनरर्थार्चयेत्॥ ५<br><br>मार्तण्डमुत्तरे विष्णुमीशाने विन्यसेत् सदा।<br>गन्धमाल्यफलैर्भक्ष्यैः स्थण्डिले पूजयेत् ततः॥ ६<br><br>द्विजाय सोदकुम्भं च घृतपात्रं हिरण्मयम्।<br>कमलं च यथाशक्त्या कारयित्वा निवेदयेत्॥ ७<br><br>चन्दनोदकपुष्पैश्च देवायार्घ्यं न्यसेद् भुवि।<br>विश्वाय विश्वरूपाय विश्वधाम्ने स्वयम्भुवे।<br>नमोऽनन्त नमो धात्रे ऋक्सामयजुषाम्पते॥ ८<br><br>अनेन विधिना सर्वं मासि मासि समाचरेत्।<br>वत्सरान्तेऽथवा कुर्यात् सर्वं द्वादशधा नरः॥ ९ | नन्दिकेश्वर बोले— नारदजी! अब मैं संक्रान्तिके समय किये जानेवाले उद्यापन-रूप अन्य व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जो इस लोकमें समस्त कामनाओंके फलका प्रदाता और परलोकमें अक्षय फलदायक है। सूर्यके उत्तरायण या दक्षिणायनके दिन अथवा विषुवयोगमें इस संक्रान्तिव्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। इस व्रतमें संक्रान्तिके पहले दिन एक बार भोजन करके (रात्रिमें शयन करे।) संक्रान्तिके दिन प्रातःकाल दाँतुन करनेके पश्चात् तिलमिश्रित जलसे स्नान करनेका विधान है। सूर्य-संक्रान्तिके दिन भूमिपर चन्दनसे कर्णिकासहित अष्टदल कमलकी रचना करे और उसपर सूर्यका आवाहन करे। कर्णिकामें 'सूर्याय नमः', पूर्वदलपर 'आदित्याय नमः', अग्निकोणस्थित दलपर 'उष्णार् चिषे नमः', दक्षिणदलपर 'ऋङ्मण्डलाय नमः', नैर्ऋत्यकोणवाले दलपर 'सवित्रे नमः', पश्चिमदलपर 'तपनाय नमः', वायव्यकोणस्थित दलपर 'भग्याय नमः', उत्तरदलपर 'मार्तण्डाय नमः' और ईशानकोणवाले दलपर 'विष्णवे नमः' से सूर्यदेवको स्थापित कर उनकी बारंबार अर्चना करे। तत्पश्चात् वेदीपर भी चन्दन, पुष्पमाला, फल और खाद्य पदार्थोंसे उनकी पूजा करनी चाहिये। पुनः अपनी शक्तिके अनुसार सोनेका कमल बनवाकर उसे घृतपूर्ण पात्र और कलशके साथ ब्राह्मणको दान कर दे। तत्पश्चात् चन्दन और पुष्पयुक्त जलसे भूमिपर सूर्यदेवको अर्घ्य प्रदान करे। (अर्घ्यका मन्त्रार्थ इस प्रकार है—) 'अनन्त! आप ही विश्व हैं, विश्व आपका स्वरूप है, आप विश्वमें सर्वाधिक तेजस्वी, स्वयं उत्पन्न होनेवाले, धाता और ऋग्वेद, सामवेद एवं यजुर्वेदके स्वामी हैं, आपको बारंबार नमस्कार है।' इसी विधिसे मनुष्यको प्रत्येक मासमें सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिये अथवा (यदि ऐसा करनेमें असमर्थ हो तो) वर्षकी समाप्तिके दिन यह सारा कार्य बारह बार करे (दोनोंका फल समान ही है)॥ १—९॥ |
| संवत्सरान्ते घृतपायसेन<br>संतर्प्य वह्निं द्विजपुङ्गवांश्च।<br>कुम्भान् पुनर्द्वादशधेनुयुक्तान्<br>सरत्नहैरण्मयपद्मयुक्तान् ॥ १० | एक वर्ष व्यतीत होनेपर घृतमिश्रित खीरसे अग्नि और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भलीभाँति संतुष्ट करे और बारह गौ एवं रत्नसहित स्वर्णमय कमलके साथ कलशोंको दान कर दे। |
३३८
- मत्स्यपुराण *
पयस्विनीः शीलवतीश्च दद्या-
हैमैः शृङ्गै रौप्यखुरैश्च युक्ताः।
गावोऽष्ट वा सप्त सकांश्यदोहा
माल्याम्बरा वा चतुरोऽप्यशक्तः।
दौर्गत्ययुक्तः कपिलामथैकां
निवेदयेद् ब्राह्मणपुङ्गवाय ॥११
हैमीं च दद्यात् पृथिवीं सशेषा-
माकार्यरूप्यामथ वा च ताम्रीम्।
पेष्टीमशक्तः प्रतिमां विधाय
सौवर्णसूर्येण समं प्रदद्यात्।
न वित्तशाठ्यं पुरुषोऽत्र कुर्यात्
कुर्वन्नधो याति न संशयोऽत्र ॥ १२
यावन्महेन्द्रप्रमुखैर्नगेन्द्रैः
पृथ्वी च सप्ताब्धियुतेह तिष्ठेत्।
तावत् स गन्धर्वगणैरशेषैः
सम्पूज्यते नारद नाकपृष्ठे ॥ १३
ततस्तु कर्मक्षयमाप्य सप्त-
द्वीपाधिपः स्यात् कुलशीलयुक्तः।
सृष्टेर्मुखेऽव्यङ्गवपुः सभार्यः
प्रभूतपुत्रान्वयवन्दिताङ्घ्रिः ॥ १४
इति पठति शृणोति वाथ भक्त्या
विधिमखिलं रविसंक्रमस्य पुण्यम्।
मतिमपि च ददाति सोऽपि देवै-
रमरपतेर्भवने प्रपूज्यते च ॥ १५
वे गौएँ दूध देनेवाली, सीधी-सादी एवं पुष्प-माला और
वस्त्रसे सुसज्जित हों, उनके सींग सोनेसे और खुर
चाँदीसे मढ़े गये हों तथा उनके साथ काँसेकी दोहनी
भी हो। जो इस प्रकारकी बारह गौओंका दान करनेमें
असमर्थ हो, उसके लिये आठ, सात अथवा चार ही
गौ दान करनेका विधान है। जो दुर्गतिमें पड़ा हुआ
निर्धन हो, वह किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणको एक ही कपिला
गौका दान कर सकता है। इसी प्रकार सोने, चाँदी
अथवा ताँबेकी शेषनागसहित पृथ्वीकी प्रतिमा बनवाकर
दान करना चाहिये। जो ऐसा करनेमें असमर्थ हो, वह
आटेकी शेषसहित पृथ्वीकी प्रतिमा बनाकर स्वर्णनिर्मित
सूर्यके साथ दान कर सकता है। पुरुषको इस दानमें
कंजूसी नहीं करनी चाहिये। यदि करता है तो उसका
अधःपतन हो जाता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।
नारदजी! जबतक इस मृत्युलोकमें महेन्द्र आदि देवगणों,
हिमालय आदि पर्वतों और सातों समुद्रोंसे युक्त पृथ्वीका
अस्तित्व है, तबतक स्वर्गलोकमें अखिल गन्धर्वसमूह उस
व्रतीकी भलीभाँति पूजा करते हैं। पुण्य क्षीण होनेपर वह
सृष्टिके आदिमें उत्तम कुल और शीलसे सम्पन्न होकर भूतलपर
सातों द्वीपोंका अधीश्वर होता है। वह सुन्दर रूप और सुन्दरी
पत्नीसे युक्त होता है, बहुत-से पुत्र और भाई-बन्धु उसके चरणोंकी
वन्दना करते हैं। इस प्रकार जो मनुष्य सूर्य-संक्रान्तिकी इस
पुण्यमयी अखिल विधिको भक्तिपूर्वक पढ़ता या श्रवण
करता है अथवा इसे करनेकी सम्मति देता है, वह भी
इन्द्रलोकमें देवताओंद्वारा पूजित होता है॥ १०-१५॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे संक्रान्त्युद्यापनविधिर्नामाष्टनवतिमतोऽध्यायः ॥ ९८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें संक्रान्त्युद्यापनविधि नामक अट्ठानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ९८ ॥
निन्यानबेवाँ अध्याय
विभूतिद्वादशी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
नन्दिकेश्वर उवाच
शृणु नारद वक्ष्यामि विष्णोर्व्रतमनुत्तमम्।
विभूतिद्वादशीनाम सर्वदेवनमस्कृतम् ॥ १
नन्दिकेश्वर बोले- नारदजी ! सुनिये, अब मैं भगवान्
विष्णुके विभूतिद्वादशी नामक सर्वोत्तम व्रतका वर्णन
कर रहा हूँ, जो सम्पूर्ण देवगणोंद्वारा अभिवन्दित है।
* अध्याय ९९ * ३३९
| कार्तिके चैत्रवैशाखे मार्गशीर्षे च फाल्गुने।<br>आषाढे वा दशम्यां तु शुक्लायां लघुभुङ्नरः।<br>कृत्वा सायन्तनीं संध्यां गृह्णीयान्नियमं बुधः ॥ २<br>एकादश्यां निराहारः समभ्यर्च्य जनार्दनम्।<br>द्वादश्यां द्विजसंयुक्तः करिष्ये भोजनं विभो ॥ ३<br>तदविघ्नेन मे यातु सफलं स्याच्च केशव।<br>नमो नारायणायेति वाच्यं च स्वपता निशि ॥ ४<br>ततः प्रभात उत्थाय कृतस्नानजपः शुचिः।<br>पूजयेत् पुण्डरीकाक्षं शुक्लमाल्यानुलेपनैः ॥ ५<br>विभूतये नमः पादावशोकय च जानुनी।<br>नमः शिवायेट्यूरू च विश्वमूर्ते नमः कटिम् ॥ ६<br>कंदर्पाय नमो मेढ्रमादित्याय नमः करौ।<br>दामोदरायेत्युदरं वासुदेवाय च स्तनौ ॥ ७<br>माधवायेत्युरो विष्णोः कण्ठमुत्कण्ठिने नमः।<br>श्रीधराय मुखं केशान् केशवायेति नारद ॥ ८<br>पृष्ठं शार्ङ्गधरायेति श्रवणौ वरदाय वै।<br>स्वनाम्ना शङ्खचक्रासिगदाजलजपाणये।<br>शिरः सर्वात्मने ब्रह्मन् नम इत्यभिपूजयेत् ॥ ९<br>मत्स्यमुत्पलसंयुक्तं हैमं कृत्वा तु शक्तितः।<br>उदकुम्भसमायुक्तमग्रतः स्थापयेद् बुधः ॥ १०<br>गुडपात्रं तिलैर्युक्तं सितवस्त्राभिवेष्टितम्।<br>रात्रौ जागरणं कुर्यादितिहासकथादिना ॥ ११ | बुद्धिमान् मनुष्य कार्तिक, चैत्र, वैशाख, मार्गशीर्ष, फाल्गुन अथवा आषाढमासमें शुक्लपक्षकी दशमी तिथिको स्वल्पाहार कर सायंकालिक संध्योपासनासे निवृत्त होकर इस प्रकारका नियम ग्रहण करे—‘प्रभो! मैं एकादशीको निराहार रहकर भगवान् जनार्दनकी भलीभाँति अर्चना करूँगा और द्वादशीके दिन ब्राह्मणके साथ बैठकर भोजन करूँगा। केशव! मेरा यह नियम निर्विघ्नतापूर्वक निभ जाय और फलदायक हो।' फिर रातमें 'ॐ नमो नारायणाय' मन्त्रका जप करते हुए सो जाय। प्रातःकाल उठकर स्नान-जप आदि करके पवित्र हो जाय और श्वेत पुष्पोंकी माला एवं चन्दन आदिसे भगवान् पुण्डरीकाक्षका पूजन करे। (पूजनके मन्त्र इस प्रकार हैं—) 'विभूतये नमः' से दोनों चरणोंकी, 'अशोकाय नमः' से जानुओंकी, 'शिवाय नमः' से ऊरुओंकी, 'विश्वमूर्ते नमः' से कटिकी, 'कंदर्पाय नमः' से जननेन्द्रियकी, 'आदित्याय नमः' से हाथोंकी, 'दामोदराय नमः' से उदरकी, 'वासुदेवाय नमः' से दोनों स्तनोंकी, 'माधवाय नमः' से विष्णुके वक्षःस्थलकी, 'उत्कण्ठिने नमः' से कण्ठकी, 'श्रीधराय नमः' से मुखकी, 'केशवाय नमः' से केशोंकी, 'शार्ङ्गधराय नमः' से पीठकी, 'वरदाय नमः' से दोनों कानोंकी और 'सर्वात्मने नमः' से सिरकी पूजा करनी चाहिये। ब्राह्मण देवता नारदजी! तत्पश्चात् 'शङ्खचक्रासिगदाजलजपाणये नमः' कहकर अपने नामका उच्चारण करते हुए चरणोंमें प्रणिपात करे। तदुपरान्त बुद्धिमान् व्रती मूर्तिके अग्रभागमें एक जलपूर्ण कलश स्थापित करे। उसपर तिलसे युक्त गुड़से भरा हुआ पात्र, जो श्वेत वस्त्रसे परिवेष्टित हो, रख दे। उसके ऊपर अपनी शक्तिके अनुसार सोनेका कमलसहित मत्स्य बनवाकर स्थापित करे और रात्रिमें इतिहास-पुराण आदिकी कथाओंको सुनते हुए जागरण करे ॥ १—११॥ |
| प्रभातायां तु शर्वर्यां ब्राह्मणाय कुटुम्बिने।<br>सकाञ्चनोत्पलं देवं सोदकुम्भं निवेदयेत् ॥ १२<br>यथा न मुच्यसे देव सदा सर्वविभूतिभिः।<br>तथा मामुद्धराशेषदुःखसंसारकर्दमात् ॥ १३<br>दशावताररूपाणि प्रतिमासं क्रमान्मुने।<br>दत्तात्रेयं तथा व्यासमुत्पलेन समन्वितम्।<br>दद्याद्देवं समा यावत् पाषण्डानभिवर्जयेत् ॥ १४ | रात्रि व्यतीत होनेपर प्रातःकाल स्वर्णमय कमल और कलशके साथ वह देव-मूर्ति कुटुम्बी ब्राह्मणको दान कर देनी चाहिये। (उस समय ऐसी प्रार्थना करे—) 'देव! जिस प्रकार आप सदा सम्पूर्ण विभूतियोंसे वियुक्त नहीं होते, उसी प्रकार इस निखिल कष्टोंसे परिपूर्ण संसाररूपी कीचड़से मेरा उद्धार कीजिये।' मुने! इस प्रकार एक वर्षतक प्रतिमास क्रमशः भगवान्के दस अवतारों तथा दत्तात्रेय और व्यासकी स्वर्णमयी प्रतिमा स्वर्णनिर्मित कमलके साथ दान करनी चाहिये। उस समय छल, कपट, पाखण्ड आदिसे दूर रहना चाहिये। |
३४० * मत्स्यपुराण *
| समाप्यैवं यथाशक्त्या द्वादश द्वादशीः पुनः।<br>संवत्सरान्ते लवणपर्वतेन समन्वितम्।<br>शय्यां दद्यान्मुनिश्रेष्ठ गुरवे धेनुसंयुताम्॥ १५<br><br>ग्रामं च शक्तिमान् दद्यात् क्षेत्रं वा भवनान्वितम्।<br>गुरुं सम्पूज्य विधिवद् वस्त्रालङ्कारभूषणैः॥ १६<br><br>अन्यान्पि यथाशक्त्या भोजयित्वा द्विजोत्तमान्।<br>तर्पयेद् वस्त्रगोदानै रत्नौघधनसंचयैः।<br>अल्पवित्तो यथाशक्त्या स्तोकं स्तोकं समाचरेत्॥ १७<br><br>यश्चाप्यतीव निःस्वः स्याद् भक्तिमान्माधवं प्रति।<br>पुष्पार्चनविधानेन स कुर्याद् वत्सरद्वयम्॥ १८<br><br>अनेन विधिना यस्तु विभूतिद्वादशीव्रतम्।<br>कुर्यात् पापविनिर्मुक्तः पितॄणां तारयेच्छतम्॥ १९<br><br>जन्मनां शतसाहस्रं न शोकफलभाग् भवेत्।<br>न च व्याधिर्भवेत् तस्य न दारिद्र्यं न बन्धनम्।<br>वैष्णवो वाथ शैवो वा भजेज्जन्मनि जन्मनि॥ २०<br><br>यावद् युगसहस्राणां शतमष्टोत्तरं भवेत्।<br>तावत् स्वर्गे वसेद् ब्रह्मन् भूपतिश्च पुनर्हवेत्॥ २१ | मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार यथाशक्ति बारह द्वादशी-व्रतोंको समाप्त कर वर्षके अन्तमें गुरुको लवणपर्वतके साथ-साथ गौसहित शय्या दान करनी चाहिये। व्रती यदि सम्पत्तिशाली हो तो उसे वस्त्र, शृङ्गार-सामग्री और आभूषण आदिसे गुरुकी विधिपूर्वक पूजा कर ग्राम अथवा गृहके साथ-साथ खेतका दान करना चाहिये। साथ ही अपनी शक्तिके अनुसार अन्यान्य ब्राह्मणोंको भी भोजन कराकर उन्हें वस्त्र, गोदान, रत्नसमूह और धनराशियोंद्वारा संतुष्ट करनेका विधान है। स्वल्प धनवाला व्रती अपनी सामर्थ्यके अनुकूल थोड़ा-थोड़ा ही दान कर सकता है तथा जो व्रती परम निर्धन हो, किंतु भगवान् माधवके प्रति उसकी प्रगाढ़ निष्ठा हो तो उसे दो वर्षतक पुष्पार्चनकी विधिसे इस व्रतका पालन करना चाहिये। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे विभूतिद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करता है, वह स्वयं पापसे मुक्त होकर अपने सौ पीढ़ियोंतकके पितरोंको तार देता है। उसे एक लाख जन्मोंतक न तो शोकरूप फलका भागी होना पड़ता है, न व्याधि और दरिद्रता ही घेरती है तथा न बन्धनमें ही पड़ना पड़ता है। वह प्रत्येक जन्ममें विष्णु अथवा शिवका भक्त होता है। ब्रह्मन्! जबतक एक सौ आठ सहस्र युग नहीं बीत जाते, तबतक वह स्वर्गलोकमें निवास करता है और पुण्य क्षीण होनेपर पुनः भूतलपर राजा होता है॥ १२—२१॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे विष्णुव्रतं नाम नवनवतितमोऽध्यायः॥ ९९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें विभूतिद्वादशी-सम्बन्धी विष्णु-व्रत नामक निन्यानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९९॥
सौवाँ अध्याय
विभूतिद्वादशी* के प्रसङ्गमें राजा पुष्पवाहनका वृत्तान्त
| नन्दिकेश्वर उवाच<br><br>पुरा रथन्तरे कल्पे राजाऽऽसीत् पुष्पवाहनः।<br>नाम्ना लोकेषु विख्यातस्तेजसा सूर्यसंनिभः॥ १<br><br>तपसा तस्य तुष्टेन चतुर्वक्त्रेण नारद।<br>कमलं काञ्चनं दत्तं यथाकामगमं मुने॥ २ | नन्दिकेश्वर बोले— नारदजी! बहुत पहले रथन्तरकल्पमें पुष्पवाहन नामका एक राजा हुआ था जो सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात तथा तेजमें सूर्यके समान था। मुने! उसकी तपस्यासे संतुष्ट होकर ब्रह्माने उसे एक सोनेका कमल (रूप विमान) प्रदान किया था, जो इच्छानुसार जहाँ-कहीं भी आ-जा सकता था। |
* इस व्रतका वर्णन पद्म० सृष्टि० २०१।—४२, भविष्योत्तर, व्रतरत्न, व्रतराज, व्रतकल्पद्रुम आदिमें भी यों ही प्राप्त होता है। पाद्मीय कथामें तीर्थगुरु पुष्करक्षेत्रका भी सम्बन्ध प्रदृष्ट है।
| * अध्याय १०० * | ३४१ |
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| लोकैः समस्तैर्नगरवासिभिः सहितो नृपः।<br>द्वीपानि सुरलोकं च यथेष्टं व्यचरत् तदा॥ ३<br>कल्पादौ सप्तमं द्वीपं तस्य पुष्करवासिनः।<br>लोकेन पूजितं यस्मात् पुष्करद्वीपमुच्यते॥ ४<br>देवेन ब्रह्मणा दत्तं यानमस्य यतोऽम्बुजम्।<br>पुष्पवाहनमित्याहुस्तस्मात् तं देवदानवाः॥ ५<br>नागम्यमस्यास्ति जगतत्रयेऽपि<br>ब्रह्माम्बुजस्थस्य तपोऽनुभावात्।<br>पत्नी च तस्याप्रतिमा मुनीन्द्र<br>नारीसहस्रैरभितोऽभिनन्द्या।<br>नाम्ना च लावण्यवती बभूव<br>सा पार्वतीवेष्टतमा भवस्य॥ ६<br>तस्यात्मजानामयुतं बभूव<br>धर्मात्मनामग्र्यधनुर्धराणाम्।<br>तदात्मनः सर्वमवेक्ष्य राजा<br>मुहुर्मुहुर्विस्मयमाससाद।<br>सोऽभ्यागतं वीक्ष्य मुनिप्रवीरं<br>प्राचेतसं वाक्यमिदं बभाषे॥ ७ | उसे पाकर उस समय राजा पुष्पवाहन अपने नगर एवं जनपदवासियोंके साथ उसपर आरूढ़ होकर स्वेच्छानुसार देवलोकों तथा सातों द्वीपोंमें विचरण किया करता था। कल्पके आदिमें पुष्करनिवासी उस पुष्पवाहनका सातवें द्वीपपर अधिकार था, इसीलिये लोकमें उसकी प्रतिष्ठा थी और आगे चलकर वह द्वीप पुष्करद्वीप नामसे कहा जाने लगा। चूँकि देवेश्वर ब्रह्माने इसे कमलरूप विमान प्रदान किया था, इसलिये देवता एवं दानव उसे पुष्पवाहन कहा करते थे। तपस्याके प्रभावसे ब्रह्माद्वारा प्रदत्त कमलरूप विमानपर आरूढ़ होनेपर उसके लिये त्रिलोकीमें भी कोई स्थान अगम्य न था। मुनीन्द्र! उसकी पत्नीका नाम लावण्यवती था। वह अनुपम सुन्दरी थी तथा हजारों नारियोंद्वारा चारों ओरसे समादृत होती रहती थी। वह राजाको उसी प्रकार अत्यन्त प्यारी थी, जैसे शंकरजीको पार्वती परम प्रिय हैं। उसके दस हजार पुत्र थे, जो परम धार्मिक और धनुर्धारियोंमें अग्रगण्य थे। अपनी इन सारी विभूतियोंपर बारम्बार विचारकर राजा पुष्पवाहन विस्मयविमुग्ध हो जाता था। एक बार (प्रचेताके पुत्र) मुनिवर वाल्मीकि* राजाके यहाँ पधारे। उन्हें आया देख राजाने उनसे इस प्रकार प्रश्न किया॥ १–७॥ |
| राजोवाच<br>कस्माद् विभूतिरमलामरमर्त्यपूज्या<br>जाता च सर्वविजितामरसुन्दरीणाम्।<br>भार्या ममाल्पतपसा परितोषितेन<br>दत्तं ममाम्बुजगृहं च मुनीन्द्र धात्रा॥ ८<br>यस्मिन् प्रविष्टमपि कोटिशतं नृपाणां<br>सामात्यकुञ्जररथौघजनावृतानाम्।<br>नो लभ्यते क्व गतमम्बरगामिभिश्च<br>तारागणेन्दुरविरश्मिभिरप्यगम्यम्॥ ९<br>तस्मात् किमन्यजननीजठरोद्भवैन<br>धर्मादिकं कृतमशेषफलासिहेतुः।<br>भगवन् मयाथ तनयैरथवान्यापि<br>भद्रं यदेतदखिलं कथय प्रचेतः॥ १० | राजाने पूछा— मुनीन्द्र! किस कारणसे मुझे यह देवों तथा मानवोंद्वारा पूजनीय निर्मल विभूति तथा अपने सौन्दर्यसे समस्त देवाङ्गनाओंको पराजित कर देनेवाली सुन्दरी भार्या प्राप्त हुई है? मेरे थोड़े-से तपसे संतुष्ट होकर ब्रह्माने मुझे ऐसा कमल-गृह क्यों प्रदान किया, जिसमें अमात्य, हाथी, रथसमूह और जनपदवासियोंसहित यदि सौ करोड़ राजा बैठ जायँ तो वे जान नहीं पड़ते कि कहाँ चले गये। वह विमान भी आकाशगामी देवताओंद्वारा केवल चमकीले ताराओंसे घिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति दीख पड़ता है। इसलिये इस सम्पूर्ण फलकी प्राप्तिके लिये अन्य माताके उदरसे उत्पन्न होकर अर्थात् पूर्वजन्ममें मैंने अथवा मेरे पुत्रोंने या मेरी इस पत्नीने कौन-सा ऐसा शुभ धर्म आदि कार्य किया है? प्रचेतः! यह सारा-का-सारा विषय मुझे बतलाइये॥ ८–१०॥ |
* वाल्मीकिरामायण, उत्तरकाण्ड ९३। १७, ९६। १९ तथा अध्यात्मरामायण ७। ७। ३१, बालरामायण, उत्तर-रामचरित आदिके अनुसार 'प्राचेतस' शब्द महर्षि वाल्मीकिका ही वाचक है।
३४२ * मत्स्यपुराण *
| मुनिरभ्यधादथ भवान्तरितं समीक्ष्य <br> पृथवीपतेः प्रसभमद्भुतहेतुवृत्तम्। <br> जन्माभवत् तव तु लुब्धकुलेऽतिघोरे <br> जातस्त्वमप्यनुदिनं किल पापकारी॥ ११ <br> वपुरप्यभूत् तव पुनः परुषाङ्गसंधि- <br> दुर्गन्धसत्त्वकुनखाभरणं समन्तात्। <br> न च ते सुहृन्न सुतबन्धुजनो न तात- <br> स्वादृक् स्वसा न जननी च तदाभिशस्ता॥ १२ <br> अतिसम्मता परमभीष्टमताभिमुखी <br> जाता महीश तव योषिदिदं सुरूपा। <br> अभूदनावृष्टिरतीव रौद्रा <br> कदाचिदाहारनिमित्तमस्मिन्। <br> क्षुत्पीडितेनाथ तदा न किञ्चि- <br> दासादितं वन्यफलादि खाद्यम्॥ १३ <br> अथाभिदृष्टं महदम्बुजाढ्यं <br> सरोवरं पङ्कजषण्डमण्डितम्। <br> पद्मान्यथादाय ततो बहूनि <br> गतः पुरं वैदिशनामधेयम्॥ १४ <br> तन्मूल्यलाभाय पुरं समस्तं <br> भ्रान्तं त्वयाशेषमहस्तदासीत्। <br> क्रेता न कश्चित् कमलेषु जातः <br> क्लान्तो भृशं क्षुत्परिपीडितश्च॥ १५ <br> उपविष्टस्त्वमेकस्मिन् सभार्यो भवनाङ्गणे। <br> अथ मङ्गलशब्दश्च त्वया रात्रौ महाञ्श्रुतः॥ १६ <br> सभार्यस्तत्र गतवान् यत्रासौ मङ्गलध्वनिः। <br> तत्र मण्डपमध्यस्था विष्णोरर्चा विलोकिता॥ १७ <br> वेश्यानङ्गवती नाम विभूतिद्वादशीव्रतम्। <br> समाप्तौ माघमासस्य लवणाचलमुत्तमम्॥ १८ <br> निवेदयन्ती गुरवे शय्यां चोपस्करान्विताम्। <br> अलङ्कृत्य हृषीकेशं सौवर्णामरपादपम्॥ १९ <br> तां तु दृष्ट्वा ततस्ताभ्यामिदं च परिचिन्तितम्। <br> किमेभिः कमलैः कार्यं वरं विष्णुरलङ्कृतः॥ २० | तदनन्तर महर्षि वाल्मीकि राजाके इस आकस्मिक एवं अद्भुत प्रभावपूर्ण वृत्तान्तको जन्मान्तरसे सम्बन्धित जानकर इस प्रकार कहने लगे—राजन्! तुम्हारा पूर्वजन्म अत्यन्त भीषण व्याधके कुलमें हुआ था। एक तो तुम उस कुलमें पैदा हुए, फिर दिन-रात पापकर्ममें भी निरत रहते थे। तुम्हारा शरीर भी कठोर अङ्गसंधियुक्त तथा बेडौल था। तुम्हारी त्वचा दुर्गन्धयुक्त और नख बहुत बढ़े हुए थे। उससे दुर्गन्ध निकलती थी और वह बड़ा कुरूप था। उस जन्ममें न तो तुम्हारा कोई हितैषी मित्र था, न पुत्र और भाई-बन्धु ही थे, न पिता-माता और बहन ही थी। भूपाल! केवल तुम्हारी यह परम प्रियतमा पत्नी ही तुम्हारी अभीष्ट परमानुकूल संगिनी थी। एक बार कभी बड़ी भयंकर अनावृष्टि हुई, जिसके कारण अकाल पड़ गया। उस समय भूखसे पीड़ित होकर तुम आहारकी खोजमें निकले, परंतु तुम्हें कोई जंगली (कन्दमूल) फल आदि कुछ भी खाद्य वस्तु प्राप्त न हुई। इतनेमें ही तुम्हारी दृष्टि एक सरोवरपर पड़ी, जो कमलसमूहसे मण्डित था। उसमें बड़े-बड़े कमल खिले हुए थे। तब तुम उसमें प्रविष्ट होकर बहुसंख्यक कमल-पुष्पोंको लेकर वैदिश* नामक नगर (विदिशा नगरी)-में चले गये॥११—१४॥ <br><br> वहाँ तुमने उन कमल-पुष्पोंको बेचकर मूल्य-प्राप्तिके हेतु पूरे नगरमें चक्कर लगाया। सारा दिन बीत गया, पर उन कमल-पुष्पोंका कोई खरीद्दार न मिला। उस समय तुम भूखसे अत्यन्त व्याकुल और थकावटसे अतिशय क्लान्त चूर होकर पत्नीसहित एक महलके प्राङ्गणमें बैठ गये। वहाँ रात्रिमें तुम्हें महान् मङ्गल शब्द सुनायी पड़ा। उसे सुनकर तुम पत्नीसहित उस स्थानपर गये, जहाँ वह मङ्गल शब्द हो रहा था। वहाँ मण्डपके मध्यभागमें भगवान् विष्णुकी पूजा हो रही थी। तुमने उसका अवलोकन किया। वहाँ अनङ्गवती नामकी वेश्या माघमासकी विभूतिद्वादशी-व्रतकी समाप्ति कर अपने गुरुको भगवान् हृषीकेशका विधिवत् श्रृङ्गार कर स्वर्णमय कल्पवृक्ष, श्रेष्ठ लवणाचल और समस्त उपकरणोंसहित शय्याका दान कर रही थी। इस प्रकार पूजा करती हुई अनङ्गवतीको देखकर तुम दोनोंके मनमें यह विचार जाग्रत् हुआ कि इन कमलपुष्पोंसे क्या लेना है। अच्छा तो यह होता कि इनसे भगवान् विष्णुका श्रृङ्गार किया जाता। |
* यह इतिहास-पुराणादिमें अति प्रसिद्ध विदिशा नामकी नदीके तटपर बसा मध्यप्रदेशके मध्यकालीन इतिहासका बेसनगर, आजकलका भेलसा नगर है। इसपर कनिंघमका (Bhelsa-Topes) ग्रन्थ प्रसिद्ध है।