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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1007 of 1098

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Page 1007

* अध्याय २६० * । १९७

| सुप्रतिष्ठं सुवेषं च तथार्धेन्दुकृताननम्।<br>वामे तु संस्थिता देवी तस्योरौ बाहुगूहिता॥ १४<br><br>शिरोभूषणसंयुक्तैरलकैर्ललितानना ।<br>सबालिका कर्णवती ललाटतिलकोज्ज्वला॥ १५<br><br>मणिकुण्डलसंयुक्ता कर्णिकाभरणा क्वचित्।<br>हारकेयूरबहुला हरवक्त्रावलोकिनी॥ १६<br><br>वामांसं देवदेवस्य स्पृशन्ती लीलया ततः।<br>दक्षिणं तु बहिः कृत्वा बाहुं दक्षिणतस्तथा॥ १७<br><br>स्कन्धे वा दक्षिणे कुक्षौ स्पृशन्त्यङ्गुलिजैः क्वचित्।<br>वामे तु दर्पणं दद्यादुत्पलं वा सुशोभनम्॥ १८<br><br>कटिसूत्रत्रयं चैव नितम्बे स्यात् प्रलम्बकम्।<br>जया च विजया चैव कार्तिकेयविनायकौ॥ १९<br><br>पार्श्वयोर्दर्शयेत् तत्र तोरणे गणगुह्यकान्।<br>माला विद्याधरांस्तद्वद्वीणावानप्सरोगणः॥ २०<br><br>एतद् रूपमुमेशस्य कर्तव्यं भूतिमिच्छता। | सुन्दर वेषोंसे सुसज्जित, मुखमण्डलको अर्धचन्द्रमासे विभूषित तथा उचित रूपसे प्रतिष्ठित करना चाहिये। उसके बायें भागमें देवीकी मूर्ति होगी, जिसके दोनों ऊरुभाग बाहुओंसे छिपे रहेंगे। सिरके आभूषणों तथा अलकावलियोंद्वारा मुखभाग ललित हो और बालियोंसे कान तथा तिलकसे ललाट शोभायमान हो रहा हो। कहीं-कहीं कानोंको अलंकृत करनेके लिये मणिर्निमित कुण्डल पहनाये जाते हैं। उसे हार और केयूरसे सुसज्जित कर शिवजीके मुखका अवलोकन करनेवाली बनावे। वे लीलापूर्वक देवदेव शंकरके बायें कंधेका स्पर्श कर रही हों तथा उनका दाहिना हाथ दाहिने भागसे बाहरकी ओर बना हो। या किसी-किसी प्रतिमामें दाहिने कंधे अथवा कुक्षिभागमें नखोंसे स्पर्श कर रही हों, बायें हाथमें दर्पण अथवा सुन्दर कमल रहना चाहिये। नितम्बभागपर तीन लड़ियोंवाला कटिसूत्र लटकता रहना चाहिये। पार्वतीके दोनों ओर जया, विजया, स्वामिकार्तिकेय और गणेशको तथा तोरणद्वारपर गुह्यक गणोंको प्रदर्शित करना चाहिये। उसी प्रकार वहाँ माला, विद्याधर और वीणासे सुशोभित अप्सराओंको बनाना चाहिये। समृद्धिकामीको उमापति शिवकी प्रतिमा इस प्रकारकी बनवानी चाहिये॥ ११–२०½॥ |
| शिवनारायणं वक्ष्ये सर्वपापप्रणाशनम्॥ २१<br><br>वामार्धे माधवं विद्याद् दक्षिणे शूलपाणिनम्।<br>बाहुद्वयं च कृष्णस्य मणिकेयूरभूषितम्॥ २२<br><br>शङ्खचक्रधरं शान्तमारक्ताङ्गुलिविभ्रमम्।<br>चक्रस्थाने गदां वापि पाणौ दद्यादधस्तले॥ २३<br><br>शङ्खं चैवोत्तरे दद्यात् कट्यर्थं भूषणोज्ज्वलम्।<br>पीतवस्त्रपरीधानं चरणं मणिभूषणम्॥ २४<br><br>दक्षिणार्धं जटाभारमर्धेन्दुकृतभूषणम्।<br>भुजङ्गहारवलयं वरदं दक्षिणं करम्॥ २५<br><br>द्वितीयं चापि कुर्वीत त्रिशूलवरधारिणम्।<br>व्यालोपवीतसंयुक्तं कट्यर्थं कृत्तिवाससम्॥ २६<br><br>मणिरत्नैश्च संयुक्तं पादं नागविभूषितम्।<br>शिवनारायणस्यैवं कल्पयेद् रूपमुत्तमम्॥ २७ | अब मैं सभी पापोंके विनाशक शिवनारायणकी प्रतिमाकी विधि बता रहा हूँ। इस प्रतिमाकी बायीं ओर आधे भागमें भगवान् विष्णु तथा दाहिनी ओर आधे भागमें शूलपाणि शिवको बनाना चाहिये। कृष्णकी दोनों भुजाएँ मणिनिर्मित केयूरसे विभूषित होनी चाहिये। दोनों भुजाओंमें शङ्ख और चक्र धारण किये हों, शान्तरूप हों तथा मनोहर अंगुलियाँ लाल वर्णकी हों। हाथके निचले भागमें चक्रके स्थानमें गदा भी देनी चाहिये। ऊपरी भागमें शङ्ख, कटिभागमें उज्ज्वल आभूषण और पीताम्बर धारण किये हुए हों तथा चरण मणिनिर्मित नूपुरोंसे विभूषित हों। इसका दाहिना आधा भाग जटाभार तथा अर्धचन्द्रसे विभूषित होना चाहिये। दाहिने हाथको वरद-मुद्रासे युक्त तथा सर्पोंके हार और कङ्कणसे सुशोभित तथा दूसरे हाथको त्रिशूलसे विभूषित बनाना चाहिये। उसे सर्पके यज्ञोपवीतसे युक्त और उसके कटिप्रदेशको गजचर्मसे आच्छादित कर दे। चरण मणि और रत्नोंसे अलंकृत तथा नागसे विभूषित हों। इस प्रकार शिवनारायणके |