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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1001 of 1098

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Page 1001
* अध्याय २५८ *९९१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हन्वग्रमङ्गुलं तद्वद् विस्तारो द्व्यङ्गुलो भवेत्।<br>अर्धाङ्गुला भ्रुवो राजी प्रणालसदृशी समा॥ ३७<br>अर्धाङ्गुलसमस्तद्वदुत्तरोष्ठस्तु विस्तरे।<br>निष्पावसदृशं तद्वन्नासापुटदलं भवेत्॥ ३८<br>सृक्किणी ज्योतिस्तुल्ये तु कर्णमूलात् षडङ्गुले।<br>कर्णौ तु भूसमौ ज्ञेयौ ऊर्ध्वं तु चतुरङ्गुलौ॥ ३९<br>द्व्यङ्गुलौ कर्णपाश्र्वौ तु मात्रामेकां तु विस्तृतौ।<br>कर्णयोरुपरिष्टाच्च मस्तकं द्वादशाङ्गुलम्॥ ४०ठुड्डीका अग्रभाग एक अंगुलमें तथा विस्तार दो अंगुलमें होना चाहिये। आधे अंगुलमें भौंहोंकी रेखा होनी चाहिये, जो प्रणालीके समान हो। नीचे तथा ऊपरके ओठ आधे-आधे अंगुलके हों। उसी प्रकार नासिकाके दोनों पुट निष्पाव (सेमके बीज)-के तुल्य मापके बनाये जायँ। ओठके बगलमें मुखका कोना और नेत्र ज्योति दोनों समान आकारका हों और कानके मूलसे छः अंगुल दूरपर बनावे। दोनों कानोंकी बनावट भौंहोंके समान हो और उनकी ऊँचाई चार अंगुलकी हो। कानोंके पार्श्वभाग दो अंगुलके हों और उनका विस्तार एक अंगुल मात्रका हो। दोनों कानोंके ऊपर मस्तकका विस्तार बारह अंगुलका होना चाहिये॥ ३१—४०॥
ललाटात् पृष्ठतोऽर्धेन प्रोक्तमष्टादशाङ्गुलम्।<br>षट्त्रिंशदङ्गुलश्चास्य परिणाहः शिरोगतः॥ ४१<br>सकेशनिचयो यस्य द्विचत्वारिंशदङ्गुलः।<br>केशान्ताद्धनुका तद्वदङ्गुलानि तु षोडश॥ ४२<br>ग्रीवामध्यपरीणाहश्चतुर्विंशतिकाङ्गुलः।<br>अष्टाङ्गुला भवेद् ग्रीवा पृथुत्वेन प्रशस्यते॥ ४३ललाटके पीछेका आधा भाग अठारह अंगुलका कहा गया है और इसके मस्तकतकका विस्तार छत्तीस अंगुल होता है। केश-समूहका विस्तार बयालीस अंगुलका होता है। केशोंके अन्तर्भागसे दाढ़ीहतकका विस्तार सोलह अंगुलका होता है। दोनों कंधोंका विस्तार चौबीस अंगुलका हो। ग्रीवाकी मोटाई आठ अंगुलकी उत्तम मानी गयी है।
स्तनग्रीवान्तरं प्रोक्तमेकताल स्वयम्भुवा।<br>स्तनयोरन्तरं तद्वद् द्वादशाङ्गुलमिष्यते॥ ४४ब्रह्माने स्तन और ग्रीवाका मध्यभाग एक तालके बराबर बताया है। दोनों स्तनोंमें बारह अंगुलका अन्तर माना जाता है।
स्तनयोर्मण्डलं तद्वद् द्व्यङ्गुलं परिकीर्तितम्।<br>चूचुकौ मण्डलस्यान्तर्यवमात्रावुभौ स्मृतौ॥ ४५<br>द्वितालं चापि विस्ताराद् वक्षःस्थलमुदाहृतम्।<br>कक्षे षडङ्गुले प्रोक्ते बाहुमूलस्तनान्तरे॥ ४६स्तनोंके मण्डल दो अंगुल कहे गये हैं। दोनों चूचुक उस मण्डलके भीतर यवके बराबर बताये जाते हैं। वक्षःस्थलकी चौड़ाई दो ताल कही गयी है। दोनों कक्ष बाहु (भुजा) और स्तनके मध्यमें छः अंगुलके होने चाहिये।
चतुर्दशाङ्गुलौ पादावङ्गुष्ठौ तु त्रिरङ्गुलौ।<br>पञ्चाङ्गुलपरीणाहमङ्गुष्ठाग्रं तथोन्नतम्॥ ४७<br>अङ्गुष्ठकसमा तद्वदायामा स्यात् प्रदेशिनी।<br>तस्याः षोडशभागेन हीयते मध्यमाङ्गुली॥ ४८दोनों पैर चौदह अंगुल तथा उनके अँगूठे तीन अँगल हों। अँगूठेका अग्रभाग उन्नत होना चाहिये और उसका विस्तार पाँच अंगुलका हो। उसी प्रकार अँगूठेके समान ही प्रदेशिनी अंगुलीको भी लम्बी बनाना चाहिये। उससे सोलहवें अंशसे अधिक मध्यमा अंगुली हो,
अनामिकाष्टभागेन कनिष्ठा चापि हीयते।<br>पर्वत्रयेण चाङ्गुल्यौ गुल्फौ द्व्यङ्गुलकौ मतौ॥ ४९अनामिका मध्यमा अंगुलीकी अपेक्षा आठवाँ भाग न्यून हो और अनामिकासे आठवें भागमें न्यून कनिष्ठिका हो। इन दोनों अंगुलियोंमें तीन पर्व बनाने चाहिये। पैरोंकी गाँठ दो अंगुलकी मानी गयी है।
पाष्णिद्व्यङ्गुलमात्रस्तु कलयोच्चैः प्रकीर्तितः।<br>द्विपर्वाङ्गुष्ठकः प्रोक्तः परीणाहश्च द्व्यङ्गुलः॥ ५०दोनों एड़ियाँ दो-दो अंगुलमें रहनी चाहिये, किंतु गाँठकी अपेक्षा इसमें एक कला अधिक रहे। अँगूठेमें दो पोर बनने चाहिये, उसका विस्तार दो अंगुलका हो।
प्रदेशिनीपरीणाहस्त्र्यङ्गुलः समुदाहृतः।<br>कनिष्ठिकाष्टभागेन हीयते क्रमशो द्विजाः॥ ५१प्रदेशिनीका विस्तार तीन अंगुलका बताया गया है। द्विजगण! कनिष्ठिका क्रमशः आठवें भागसे कम रहे।