मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१२५- सूर्यकी गति और उनके रथका वर्णन
४२८ * मत्स्यपुराण *
मत्स्यावतार-कथा-प्रसंग
श्रुतिनि हित हरि मच्छ रूप धार्यौ। सदा ही भक्त-संकट निवार्यौ॥
चतुरमुख कह्यौ, सँख असुर श्रुति लै गयो, सत्यब्रत कह्यौ परलय दिखायौ।
भक्त-बत्सल, कृपाकरन, असरन-सरन, मत्स्यकौ रूप तब धारि आयौ॥
स्नान करि अंजली जल जबै नृप लियौ, मत्स्य जौ देखि कह्यो डारि दीजै।
मत्स्य कह्यौ, मैं गही आइ तुम्हरी सरन, करि कृपा मोहिं अब राखि लीजै॥
नृप सुनत बचन, चकित प्रथम है रह्यौ, कह्यौ, मछ बचन किहिं भाँति भाष्यौ।
पुनि कमंडल धर्यौ, तहाँ सो बढ़ि गयौ, कुंभ धरि बहुरि पुनि माट राख्यौ॥
पुनि धर्यौ खाड़, तालाब मैं पुनि धर्यौ, नदी मैं बहुरि पुनि डारि दीन्हौ।
बहुरि जब बढ़ि गयौ, सिंधु तब लै गयौ, तहाँ हरि-रूप नृप चीन्हि लीन्हौ॥
कह्यौ करि बिनय तुम ब्रह्म जो अनंत हौ, मत्स्यकौ रूप किहिं काज कीन्हौ!
बेद-बिधि चहत, तुम प्रलय देखन कहत, तुम दुहुँनि हेत अवतार लीन्हौ॥
कबहुँ बाराह, नरसिंह कबहुँ भयौ, कबहुँ मैं कच्छकौ रूप लीन्हौ।
कबहुँ भयौ राम, बसुदेव-सुत कबहुँ भयौ, और बहु रूप हित-भक्त कीन्हौ॥
सातवें दिवस दिखराइहौं प्रलय तोहिं सप्त-रिषि नाव मैं बैठि आवैं।
तोहिं बैठारिहौं नावमैं हाथ गहि, बहुरि हम ज्ञान तोहिं कहि सुनावैं॥
सर्प इक आइहै बहुरि तुम्हरे निकट, ताहि सों नाव मम सृंग बाँधौ।
यहै कहि भए अँतरधान तब मत्स्य प्रभु, बहुरि नृप आपनौ कर्म साधौ॥
सातवैं दिवस आयौ निकट जलधि जब, नृप कह्यौ अब कहाँ नाव पावैं।
आइ गइ नाव, तब रिषिन तासों कह्यौ, आउ हम नृपति तुमकौं बचावैं॥
पुनि कह्यौ, मत्स्य हरि अब कहाँ पाइय, रिषिन कह्यौ, ध्यान चित माहिं धारौ।
मत्स्य अरु सर्पु तिहिं ठौर परगट भए, बाँधि नृप नाव यौं कहि उचारौ॥
ज्यौं महाराज या जलधितैं पार कियौ, भव-जलधि पार त्यों करो स्वामी।
अहं-ममता हमैं सदा लागी रहै, मोह-मद-क्रोध-जुत मंद कामी॥
कर्म सुख-हित करत, होत तहँ दुःख नित, तऊ नर मूढ नाहीं सँभारत।
करन-कारन महराज हैं आप हो, ध्यान प्रभुकौ न मन माहिं धारत॥
बिन तुम्हारी कृपा गति नहीं नरनिकी, जानि मोहिं आपनौ कृपा कीजै।
जनम अरु मरनमैं सदा दुःखित देहु मोहिं ज्ञान जिहिं सदा जीजै॥
मत्स्य भगवान कह्यौ ज्ञान पुनि नृपति सों, भयो सो पुरान सब जगत जान्यौ।
लह्यो नृप ज्ञान, कह्यौ आँखि अब मीचि तू, मत्स्य कह्यौ सो नृपति मान्यौ॥
आँखिकौं खोलि जब नृपति देख्यौ बहुरि, कह्यौ, हरि प्रलय-माया दिखाई।
कह्यौ जो ज्ञान भगवान, सो आनि उर, नृपति निज आपु इहिं बिधि बिताई॥
बहुरि सँखासुरहि मारि, बेद आनि दिए, चतुरमुख बिबिध अस्तुति सुनाई।
सूरके प्रभूकी नित्य लीला नई, सकै कहि कौन, यह कछुक गाई॥
('सूरदास' १६। ४४३)
* अध्याय १२४ * | ४२९
एक सौ चौबीसवाँ अध्याय
सूर्य और चन्द्रमाकी गतिका वर्णन
| सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इसके बाद अब मैं सूर्य और चन्द्रमाकी गतिका वर्णन कर रहा हूँ। ये सूर्य और चन्द्रमा सातों द्वीपों एवं सातों समुद्रोंके विस्तारको तथा समग्र भूतलके अर्धभागको और उसके बाहरके अन्य प्रदेशोंको ये अपने प्रकाशसे उद्भासित करते हैं। ये विश्वकी अन्तिम सीमातक प्रकाश फैलाते हैं। तुलना परिभ्रमणके प्रमाणको लेकर ही विद्वान् लोग आकाशकी करते हैं। सूर्य सामान्यतः तीनों लोकोंमें शीघ्रतापूर्वक भ्रमण करते हैं। 'अव' धातु रक्षण और प्रकाशार्थक है। प्रकाश फैलाने तथा प्राणियोंकी रक्षा करनेके कारण सूर्यको 'रवि' कहा जाता है। पुनः सूर्य और चन्द्रमाका प्रमाण बतला रहा हूँ। महनीय होनेके कारण पृथ्वीके लिये 'मही' शब्दका प्रयोग किया जाता है। अब भारतवर्षका तथा सूर्य-मण्डलके व्यासका परिमाण योजनोंमें बतला रहा हूँ, उसे सुनिये। सूर्य-मण्डलका परिमाण नौ हजार योजन है। इस मण्डलमें परिणाह (घेरा) विस्तारसे तिगुना अर्थात् सत्ताईस हजार योजन है। व्यास और मण्डलकी दृष्टिसे भी सूर्यसे चन्द्रमा बहुत छोटे हैं। पुनः सातों द्वीपों और समुद्रोंसहित पृथ्वीमण्डलके विस्तारका प्रमाण, जिन्हें विद्वानोंने पुराणोंमें बतलाया है, (योजनोंकी संख्यामें) बतला रहा हूँ॥१—९॥ <br><br> पूर्वकालमें जो पुराणोंके ज्ञाता हो चुके हैं, वे भी आजकलके पुराणोंके तुल्य ही थे। पूर्वकालके विद्वान् एवं आधुनिक विद्वान्—दोनोंके मत इस विषयमें समान हैं। अतः वर्तमानकालिक विद्वानोंके अनुसार भूतलका परिमाण बतला रहा हूँ। आधुनिक विद्वानोंने दिव्यलोककी स्थितिको भी पृथ्वीमण्डलके बराबर ही माना है। समूची पृथिवी पचास करोड़ योजनोंमें विस्तृत मानी गयी है। |
| अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि सूर्याचन्द्रमसोर्गतिम्।<br>सूर्याचन्द्रमसावेतौ भ्रमन्तौ यावदेव तु॥१¹<br>सप्तद्वीपसमुद्राणां द्वीपानां भाति विस्तरः।<br>विस्तरार्थं पृथिव्यास्तु भवेदन्ध्रत्र बाह्यतः॥२<br>पर्याप्तपरिमाणं च चन्द्रादित्यौ प्रकाशतः।<br>पर्याप्तपारिमाण्यात्तु भूमेस्तुल्यं दिवः स्मृतम्॥३<br>भवति त्रीणि माँल्लोकान् सूर्यो यस्मात् परिभ्रमन्।<br>अव धातुः प्रकाशाख्यो अवनात्तु रविः स्मृतः॥४<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रमाणं चन्द्रसूर्ययोः।<br>महित्वान्महीशब्दो ह्यस्मिन्नर्थे निगद्यते॥५<br>अस्य भारतवर्षस्य विष्कम्भं तु सुविस्तरम्।<br>मण्डलं भास्करस्याथ योजनैस्तन्निबोधत॥६<br>नवयोजनसाहस्रो विस्तारो भास्करस्य तु।<br>विस्तारात् त्रिगुणश्चापि परिणाहोऽत्र मण्डले॥७<br>विष्कम्भान्मण्डलाच्चैव भास्कराद् द्विगुणः शशी।<br>अतः पृथिव्या वक्ष्यामि प्रमाणं योजनैः पुनः॥८<br>सप्तद्वीपसमुद्राया विस्तारो मण्डलस्य तु।<br>इत्येतदिह संख्यातं पुराणे परिमाणतः॥९<br>तद्वक्ष्यामि प्रसंख्याय साम्प्रतं चाभिमानिभिः।<br>अभिमानिनो ह्यतीता ये तुल्यास्ते साम्प्रतैस्त्विह॥१०<br>देवा ये वै ह्यतीतास्तु रूपैर्नामभिरेव च।<br>तस्माद्वै साम्प्रतैर्देवैर्वक्ष्यामि² वसुधातलम्॥११<br>दिव्यस्य संनिवेशो वै साम्प्रतैरेव कृत्स्नशः।<br>शतार्धकोटिविस्तारा पृथिवी कृत्स्नशः स्मृता॥१२ | |
१. इस अध्यायके सभी श्लोक वायुपु० ५०।५६—१६९ (किसी प्रतिमें ५१।१—११३) तथा ब्रह्माण्डपुराणसे सर्वांशमें मिल जाते हैं। उनके श्लोक विशेष शुद्ध हैं।
२. यहाँ 'विद्वांसो ह वै देवाः' के अनुसार विद्वान् ही देवता हैं।
४३० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्याश्चार्धप्रमाणं च मेरोर्वै चतुरन्तरम्।<br>मेरोर्मध्यात् प्रतिदिशं कोटिरेका तु सा स्मृता॥ १३<br>तथा शतसहस्राणामेकोननवतिं पुनः।<br>पञ्चाशच्च सहस्राणि पृथिव्याः स तु विस्तरः॥ १४<br>पृथिव्या विस्तरं कृत्स्नं योजनैस्तन्निबोधत।<br>तिस्रः कोट्यस्तु विस्तारात्संख्यातास्तु चतुर्दिशम्॥ १५<br>विस्तारं त्रिगुणं चैव पृथिव्यन्तरमण्डलम्।<br>गणितं योजनानां तु कोट्यस्त्वेकादश स्मृताः॥ १६<br>तथा शतसहस्राणां सप्तत्रिंशाधिकास्तु ताः।<br>इत्येतद्वै प्रसंख्यातं पृथिव्यन्तरमण्डलम्॥ १७<br>तारकासंनिवेशस्य दिवि यावत्तु मण्डलम्।<br>पर्यांसः संनिवेशस्य भूमेस्तावत्तु मण्डलम्॥ १८<br>पर्यांसपरिमाणं च भूमेस्तुल्यं दिवः स्मृतम्।<br>समानापि लोकानामेतन्मानं प्रकीर्तितम्॥ १९<br>ज्योतिर्गणप्रचारस्य प्रमाणं परिवक्ष्यते।<br>मेरोः प्राच्यां दिशायां तु मानसोत्तरमूर्धनि॥ २०<br>वस्वौकसारा माहेन्द्री पुण्या हेमपरिष्कृता।<br>दक्षिणेन पुनर्मेरोर्मानसस्य तु पृष्ठतः॥ २१<br>वैवस्वतो निवसति यमः संयमने पुरे।<br>प्रतीच्यां तु पुनर्मेरोर्मानसस्य तु मूर्धनि॥ २२<br>सुखा नाम पुरी रम्या वरुणस्यापि धीमतः।<br>दिश्युत्तरस्यां मेरोस्तु मानसस्यैव मूर्धनि॥ २३<br>तुल्या महेन्द्रपुर्यापि सोमस्यापि विभावरी।<br>मानसोत्तरपृष्ठे तु लोकपालाश्चतुर्दिशम्॥ २४<br>स्थिता धर्मव्यवस्थार्थं लोकसंरक्षणाय च।<br>लोकपालोपरिष्टात् तु सर्वतो दक्षिणायने॥ २५<br>काष्ठागतस्य सूर्यस्य गतिस्तत्र निबोधत।<br>दक्षिणोपक्रमे सूर्यः क्षिप्तेषुरिव सर्पति॥ २६ | उसका आधा भाग मेरु पर्वतके उत्तरोत्तर फैला हुआ है और मेरु पर्वतके मध्यभागमें वह चारों ओर एक करोड़ योजन विस्तारवाली कही जाती है। इसी तरह पृथ्वीके अर्धभागका विस्तार नवासी लाख, पचास हजार योजन बतलाया जाता है। अब योजनके परिमाणसे पृथ्वीके समूचे विस्तारको सुनिये। इसका विस्तार चारों दिशाओंमें तीन करोड़ योजन माना गया है। यही सातों द्वीपों और समुद्रोंसे घिरी हुई पृथ्वीका विस्तार है। पृथ्वीका आन्तरिक मण्डल बाह्य मण्डलसे तिगुना अधिक है। इस प्रकार उसका परिमाण ग्यारह करोड़ सैंतीस लाख योजन माना गया है। यही पृथ्वीके आन्तरिक मण्डलकी गणना की गयी है। आकाश-मण्डलमें जितने तारागणोंकी स्थिति है, उतना ही समग्र पृथ्वीमण्डलका विस्तार माना गया है। इस प्रकार पृथ्वीमण्डलके परिमाणके बराबर आकाशमण्डल भी है। अब ज्योतिर्गणके प्रचारकी बात सुनिये। मेरु पर्वतकी पूर्व दिशामें मानसोत्तर पर्वतके शिखरपर वस्वौकसारा नामकी महेन्द्रकी पुण्यमयी नगरी है, जो सुवर्णसे सुसज्जित है। पुनः मेरुकी दक्षिण दिशामें मानसपर्वतके पृष्ठभागपर संयमनी पुरी है, जिसमें सूर्यके पुत्र यमराज निवास करते हैं। पुनः मेरुकी पश्चिम दिशामें मानसपर्वतके शिखरपर बुद्धिमान् वरुणकी सुखा नामकी रमणीय पुरी है। मेरुकी उत्तर दिशामें मानसपर्वतके शिखरपर महेन्द्रपुरीके समान चन्द्रदेवकी विभावरी पुरी है। उसी मानसोत्तर पर्वतके पृष्ठभागकी चारों दिशाओंमें लोकपालगण धर्मकी व्यवस्था और लोकोंकी रक्षा करनेके लिये स्थित हैं। दक्षिणायनके समय सूर्य उन लोकपालोंसे ऊपर होकर भ्रमण करते हैं॥ १०—२५॥<br><br>दक्षिण दिशाका आश्रय लेनेपर सूर्यकी जैसी गति होती है, उसे सुनिये। दक्षिणायनकालमें सूर्य छोड़े गये बाणकी तरह शीघ्रगतिसे चलते हैं। वे ज्योतिष्चक्रको सदा साथ लिये रहते हैं। (इस प्रकार भ्रमण करते हुए) |
| ज्योतिषां चक्रमादाय सततं परिगच्छति।<br>मध्यगश्चामरावत्यां यदा भवति भास्करः॥ २७ | जिस समय सूर्य अमरावती पुरीमें पहुँचते हैं, उस समय वे गगनमण्डलके मध्यभागमें रहते हैं अर्थात् मध्याह्न होता है। उसी समय वे यमराजकी संयमनीपुरीमें |
| वैवस्वते संयमने उद्यन् सूर्यः प्रदृश्यते।<br>सुखायामर्धरात्रस्तु विभावर्यास्तमेति च॥ २८ | उदित होते हुए और विभावरी नगरीमें अस्त होते हुए दीखते हैं तथा सुखा नगरीमें आधी रात होती है। |
| * अध्याय १२४ * | ४३१ |
|---|---|
| वैवस्वते संयमने मध्याह्ने तु रविर्यदा।<br>सुखायामथ वारुण्यामुत्तिष्ठन् स तु दृश्यते॥ २९<br>विभावर्यामर्धरात्रं माहेन्द्रयामस्तमेव च।<br>सुखायामथ वारुण्यां मध्याह्ने तु रविर्यदा॥ ३०<br>विभावर्यां सोमपुर्यामुत्तिष्ठति विभावसुः।<br>महेन्द्रस्यामरावत्यामुद्गच्छति दिवाकरः॥ ३१<br>सुखायामथ वारुण्यां मध्याह्ने तु रविर्यदा।<br>स शीघ्रमेव पर्येति भानुरालातचक्रवत्॥ ३२ | इसी प्रकार जब सूर्य मध्याह्नकालमें यमराजकी संयमनी-पुरीमें पहुँचते हैं, तब वरुणकी सुखानगरीमें उगते हुए और महेन्द्रकी वस्वौकसारा (अमरावती) पुरीमें अस्त होते हुए दीखते हैं तथा विभावरी पुरीमें आधी रात होती है। जब दोपहरके समय सूर्य वरुणकी सुखानगरीमें पहुँचते हैं, तब चन्द्रदेवकी पुरी विभावरीमें उदय होते हैं। जब सूर्य महेन्द्रकी अमरावतीपुरीमें उदय होते हैं, तब वरुणकी सुखानगरीमें अस्त होते (दीखते) हैं और संयमनीपुरीमें आधी रात होती है। इस प्रकार सूर्य अलातचक्र (जलती बनेठी)-की भाँति बड़ी शीघ्रतासे चक्कर लगाते हैं॥ २६-३२॥ |
| भ्रमन् वै भ्रममाणानि ऋक्षाणि चरते रविः।<br>एवं चतुर्षु पार्श्वेषु दक्षिणान्तेषु सर्पति॥ ३३<br>उदयास्तमये वासावुत्तिष्ठति पुनः पुनः।<br>पूर्वाह्ने चापराह्ने च द्वौ द्वौ देवालयौ तु सः॥ ३४<br>पतत्येकं तु मध्याह्ने भाभिरेव च रश्मिभिः।<br>उदितो वर्धमानाभिर्मध्याह्ने तपसे रविः॥ ३५<br>अतः परं ह्सन्तीभिर्गोभिरस्तं स गच्छति।<br>उदयास्तमयाभ्यां च स्मृते पूर्वापरे तु वै॥ ३६<br>यादृक्पुरस्तात्तपति तादृक्पृष्ठे तु पार्श्वयोः।<br>यत्रोदयस्तु दृश्येत तेषां स उदयः स्मृतः॥ ३७<br>प्रणाशं गच्छते यत्र तेषामस्तः स उच्यते।<br>सर्वेषामुत्तरे मेरुर्लोकालोकस्तु दक्षिणे॥ ३८<br>विदूरभावादर्कस्य भूमेर्लेखावृतस्य च।<br>ह्रियन्ते रश्मयो यस्मात्तेन रात्रौ न दृश्यते॥ ३९<br>ऊर्ध्वं शतसहस्त्रांशुः स्थितस्तत्र प्रदृश्यते।<br>एवं पुष्करमध्ये तु यदा भवति भास्करः॥ ४०<br>त्रिंशद्भागं च मेदिन्या मुहूर्तेन स गच्छति।<br>योजनानां सहस्त्रस्य इमां संख्यां निबोधत॥ ४१<br>पूर्णं शतसहस्त्राणामेकत्रिंशच्च सा स्मृता।<br>पञ्चाशच्च सहस्त्राणि तथान्यान्यधिकानि च॥ ४२<br>मौहूर्तिकी गतिर्ह्यैषा सूर्यस्य तु विधीयते। | इस प्रकार स्वयं भ्रमण करते हुए सूर्य नक्षत्रोंको भी भ्रमण कराते हैं। वे चारों दक्षिणान्त पार्श्व भागोंमें चलते रहते हैं। उदय और अस्तके समय वे पुनः-पुनः उदय और अस्त होते रहते हैं और पूर्वाह्न एवं अपराह्नमें दो-दो देवपुरियोंमें तथा मध्याह्नके समय एक पुरीमें पहुँचते हैं। इस प्रकार सूर्य उदय होकर अपनी बढ़ती हुई तेजस्विनी किरणोंसे दोपहरके समय तपते हैं और उसके बाद धीरे-धीरे ह्रासको प्राप्त होती हुई उन्हीं किरणोंके साथ अस्त हो जाते हैं। सूर्यके इसी उदय और अस्तसे पूर्व और पश्चिम दिशाका ज्ञान होता है। यों तो सूर्य जैसे पूर्व दिशामें तपते हैं, उसी तरह पश्चिम तथा पार्श्वभाग (उत्तर और दक्षिण)-में भी प्रकाश फैलाते हैं, परंतु उन दिशाओंमें जहाँ सूर्यका उदय दीखता है, वही उदय-स्थान कहलाता है तथा जिस दिशामें सूर्य अदृश्य हो जाते हैं, उसे अस्त-स्थान कहते हैं। मेरुपर्वत सभी पर्वतोंसे उत्तर तथा लोकालोक पर्वत दक्षिण दिशामें स्थित है, इसलिये सूर्यके बहुत दूर हो जाने तथा पृथिवीकी छायासे आवृत होनेके कारण उनकी किरणें अवरुद्ध हो जाती हैं, इसी कारण सूर्य रातमें नहीं दीख पड़ते। इस प्रकार एक लाख किरणोंसे सुशोभित सूर्य जब पुष्करद्वीपके मध्यभागमें पहुँचते हैं, तब वहाँ ऊँचाईपर स्थित होनेके कारण दीख पड़ते हैं। सूर्य एक मुहूर्त (दो घड़ी)-में पृथिवीके तीसवें भागतक पहुँच जाते हैं। उनकी गतिका प्रमाण योजनोंके हजारोंकी गणनामें सुनिये। सूर्यकी एक मुहूर्तकी गतिका परिमाण इकतीस लाख पचास हजार योजनसे भी अधिक बतलाया जाता है॥ ३३-४२ १/२॥ |
| एतेन क्रमयोगेन यदा काष्ठां तु दक्षिणाम्॥ ४३<br>परिगच्छति सूर्योऽसौ मासं काष्ठामुदग्दिनात्।<br>मध्येन पुष्करस्याथ भ्रमते दक्षिणायने॥ ४४ | इसी क्रमसे जब सूर्य दक्षिण दिशामें जाते हैं, तब (वहाँ छह महीनेतक भ्रमण करनेके पश्चात् पुनः) सातवें मासमें उत्तर दिशाकी ओर लौटते हैं। दक्षिणायनके समय सूर्य पुष्करद्वीपके मध्यमें भ्रमण करते हैं। |