Skip to content
SarvaKosh
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1002 of 1098

Read in context
Page 1002
९९२* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अङ्गुलेनोच्छ्रयः कार्यों ह्यङ्गुष्ठस्य विशेषतः।<br>तदर्धेन तु शेषाणामङ्गुलीनां तथोच्छ्रयः॥ ५२विशेषतया अँगूठेकी मोटाई एक अंगुलकी हो। शेष अंगुलियोंकी मोटाई उसके आधे भागके तुल्य रखनी चाहिये॥ ४१—५२॥
जङ्घाग्रे परिणाहस्तु अङ्गुलानि चतुर्दश।<br>जङ्घामध्ये परीणाहस्तथैवाष्टादशाङ्गुलः॥ ५३<br>जानुमध्ये परीणाह एकविंशतिरङ्गुलः।<br>जानूच्छ्रयोऽङ्गुलः प्रोक्तो मण्डलं तु त्रिरङ्गुलम्॥ ५४<br>ऊरुमध्ये परीणाहो ह्यष्टाविंशतिकाङ्गुलः।<br>एकत्रिंशोपरिष्टाच्च वृषणौ तु त्रिरङ्गुलौ॥ ५५<br>द्व्यङ्गुलं च तथा मेढ्रं परीणाहः षडङ्गुलः।<br>मणिबन्धादधो विद्यात् केशरेखास्तथैव च॥ ५६<br>मणिकोषपरीणाहश्चतुरङ्गुल इष्यते।<br>विस्तरेण भवेत् तद्वत् कटिरष्टादशाङ्गुला॥ ५७<br>द्वाविंशति तथा स्त्रीणां स्तनौ च द्वादशाङ्गुलौ।<br>नाभिमध्यपरीणाहो द्विचत्वारिंशदङ्गुलः॥ ५८<br>पुरुषे पञ्चपञ्चाशत् कट्यां चैव तु वेष्टनम्।<br>कक्षयोरुपरिष्टात् तु स्कन्धौ प्रोक्तौ षडङ्गुलौ॥ ५९<br>अष्टाङ्गुलां तु विस्तारे ग्रीवां चैव विनिर्दिशेत्।<br>परीणाहे तथा ग्रीवां कला द्वादश निर्दिशेत्॥ ६०जाँघके आगेके भाग चौदह अंगुल और मध्यभाग अठारह अंगुल रहे। घुटनेका मध्यभाग इक्कीस अंगुलका हो। घुटनेकी ऊँचाई एक अंगुल तथा मण्डल तीन अंगुल विस्तृत हो। ऊरुओंका मध्यभाग अट्ठाईस अंगुल हो। इसके एकतीस अंगुल ऊपर अण्डकोश तीन अंगुल और लिंग दो अंगुल हो तथा उसका विस्तार छः अंगुल हो। मणिबन्धसे नीचे केशोंकी रेखा रखनी चाहिये। मणिकोषका विस्तार चार अंगुलका हो। कटिप्रदेशका विस्तार अठारह अंगुल हो। स्त्रियोंकी मूर्तिमें कटिका विस्तार बाईस अंगुलका तथा स्तनोंका बारह अंगुल होना चाहिये। नाभिका मध्यभाग बयालीस अंगुलका होना चाहिये। पुरुषके कटिप्रदेश पचपन अंगुल तथा दोनों कक्षोंके ऊपर छः अंगुलके स्कन्धोंके बनानेकी विधि है। आठ अंगुलके विस्तारमें ग्रीवाका निर्माण कहा गया है और इसकी लम्बाई बारह कलाकी होनी चाहिये॥ ५३—६०॥
आयामो भुजयोस्तद्वद् द्विचत्वारिंशदङ्गुलः।<br>कार्यं तु बाहुशिखरं प्रमाणे षोडशाङ्गुलम्॥ ६१<br>ऊर्ध्वं यद्बाहुपर्यन्तं विद्यादष्टादशाङ्गुलम्।<br>तथैकाङ्गुलहीनं तु द्वितीयं पर्व उच्यते॥ ६२<br>बाहुमध्ये परीणाहो भवेदष्टादशाङ्गुलः।<br>षोडशोक्तः प्रबाहुस्तु षट्कलोऽग्रकरो मतः॥ ६३<br>सप्ताङ्गुलं करतलं पञ्च मध्याङ्गुली मता।<br>अनामिका मध्यमायाः सप्तभागेन हीयते॥ ६४<br>तस्यास्तु पञ्चभागेन कनिष्ठा परिहीयते।<br>मध्यमायास्तु हीना वै पञ्चभागेन तर्जनी॥ ६५<br>अङ्गुष्ठस्तर्जनीमूलादधः प्रोक्तस्तु तत्समः।<br>अङ्गुष्ठपरिणाहस्तु विज्ञेयश्चतुरङ्गुलः॥ ६६<br>शेषाणामङ्गुलीनां तु भागो भागेन हीयते।<br>मध्यमापर्वमध्यं तु अङ्गुलद्वयमायतम्॥ ६७दोनों भुजाओंकी लम्बाई बयालीस अंगुल हो। बाहुके मूलभाग सोलह अंगुलके होने चाहिये। बाहुके ऊपरी अंशतक अठारह अंगुल होना चाहिये। दूसरा पर्व (पोर) इसकी अपेक्षा एक अंगुल कम कहा गया है। बाहुके मध्यभागका विस्तार अठारह अंगुल तथा नीचेका हाथ (करतलके पूर्वतक) सोलह अंगुलका कहा गया है। हाथके अग्रभागका मान छः कलाका माना गया है। हथेलीका विस्तार सात अंगुल हो और उसमें पाँच अंगुलियाँ बनी हों। अनामिका अंगुली मध्यमाकी अपेक्षा सप्तमांश कम रहती है। कनिष्ठा उससे भी पञ्चमांश न्यून तथा मध्यमाके पाँचवें भागसे न्यून तर्जनी होनी चाहिये। अँगूठा तर्जनीके उद्गमसे नीचा होना चाहिये, किंतु लम्बाईमें उतना ही होना चाहिये। अँगूठेका विस्तार चार अंगुलका जानना चाहिये। शेष अंगुलियोंके विस्तार क्रमशः एक-एक भागसे न्यून होते हैं। मध्यमा अंगुलीके पोरोंके