मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१६१- हिरण्यकशिपुकी तपस्या, ब्रह्माद्वारा उसे वरप्राप्ति, हिरण्यकशिपुका अत्याचार, विष्णुद्वारा देवताओंको अभयदान, भगवान् विष्णुका नृसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुकी विचित्र सभामें प्रवेश
६६० * मत्स्यपुराण *
| प्रशममेहि ममात्मजवत्सले <br> तव नमोऽस्तु जगत् त्रयसंश्रये। <br> त्वयि ममास्तु मतिः सततं शिवे <br> शरणगोऽस्मि नतोऽस्मि नमोऽस्तु ते॥ २० | पुत्रवत्सले! मेरे लिये पूर्णरूपसे शान्त हो जाइये। त्रिलोकीकी आश्रयभूता देवि! आपको नमस्कार है। शिवे! मेरी बुद्धि निरन्तर आपके चिन्तनमें ही लगी रहे। मैं आपके शरणागत हूँ और चरणोंमें पड़ा हूँ। आपको नमस्कार है॥१६-२०॥ |
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| सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! वीरकके इस प्रकार संस्तवन करनेपर पार्वतीदेवी प्रसन्न हो गयीं, तब वे अपने पति शिवजीके सुन्दर भवनमें प्रविष्ट हुईं। इधर द्वारपाल वीरकने शिवजीके दर्शनकी अभिलाषासे आये हुए देवोंको आदरपूर्वक ऐसा कहकर अपने-अपने घरोंको लौटा दिया कि ‘देवगण! इस समय मिलनेका अवसर नहीं है; क्योंकि भगवान् शंकर एकान्तमें पार्वतीदेवीके साथ क्रीडा कर रहे हैं।’ ऐसा कहे जानेपर वे जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये। इस प्रकार एक हजार वर्ष व्यतीत हो जानेपर देवताओंके मनमें उतावली उत्पन्न हो गयी, तब उन्होंने शंकरजीकी चेष्टाका पता लगानेके लिये अग्निको भेजा। वहाँ जाकर अग्निदेवने शुकका रूप धारण किया और गवाक्षमार्गसे भीतर प्रवेश करके देखा कि शंकरजी गिरिजाके साथ शय्यापर विराजमान हैं। उधर देवेश्वर शंकरजीकी दृष्टि शुकरूपी अग्निपर पड़ गयी, तब महादेव कुछ क्रुद्ध-से होकर अग्निसे बोले। |
| प्रसन्ना तु ततो देवी वीरकस्येति संस्तुता। <br> प्रविवेश शुभं भर्तुर्भवनं भूधरात्मजा॥ २१ <br> द्वारस्थो वीरको देवान् हरदर्शनकाङ्क्षिणः। <br> व्यसर्जयत् स्वकान्येव गृहाण्यादरपूर्वकम्॥ २२ <br> नास्त्यत्रावसरो देवा देव्या सह वृषाकपिः। <br> निभृतः क्रीडतीत्युक्ता ययुस्ते च यथागतम्॥ २३ <br> गते वर्षसहस्रे तु देवास्त्वरितमानसाः। <br> ज्वलनं चोदयामासुर्ज्ञातुं शङ्करचेष्टितम्॥ २४ <br> प्रविश्य जालरन्ध्रेण शुकरूपी हुताशनः। <br> ददृशे शयने शर्वं रतं गिरिजया सह॥ २५ <br> ददृशे तं च देवेशो हुताशं शुकरूपिणम्। <br> तमुवाच महादेवः किञ्चित्कोपसमन्वितः॥ २६ | |
| शर्व उवाच | **शिवजीने कहा—**अग्ने! चूँकि तुमने ही यह विघ्न उपस्थित किया है, इसलिये इसका फल भी तुम्हें भोगना पड़ेगा। ऐसा कहे जानेपर अग्नि हाथ जोड़कर शंकरजीद्वारा आधान किये गये वीर्यको पी गये और उसे सभी देवताओंके शरीरमें विभक्त करके उन्हें पूर्ण कर दिया। तदनन्तर शंकरजीका वह तपाये हुए स्वर्णके समान कान्तिमान् वीर्य देवताओंका उदर फाड़कर बाहर निकल आया और शंकरजीके उस विस्तृत आश्रममें अनेकों योजनोंमें विस्तृत एवं निर्मल जलसे पूर्ण महान् सरोवरके रूपमें परिणत हो गया। उसमें स्वर्णकी-सी कान्तिवाले कमल खिले हुए थे और नाना प्रकारके पक्षी चहचहा रहे थे। तत्पश्चात् स्वर्णमय वृक्ष एवं अगाध जलसे सम्पन्न उस सरोवरके विषयमें सुनकर कुतूहलसे भरी हुई पार्वतीदेवी उस स्वर्णमय कमलसे भरे हुए सरोवरके तटपर गयीं और उसके कमलको सिरपर धारण करके जलक्रीडा करने लगीं। तत्पश्चात् पार्वतीदेवी सखीके साथ उस सरोवरके तटपर बैठ गयीं और उस सरोवरके कमलकी गन्धसे सुवासित स्वच्छ स्वादिष्ट जलको पीनेकी इच्छा करने लगीं। |
| यस्मात्तु त्वत्कृतो विघ्नस्तस्मात्त्वय्युपपद्यते। <br> इत्युक्तः प्राञ्जलिर्वह्निरपिबद् वीर्यमाहितम्॥ २७ <br> तेनापूर्यंत तान् देवांस्तत्तत्कायविभेदतः। <br> विपाट्य जठरं तेषां वीर्यं माहेश्वरं ततः॥ २८ <br> निष्क्रान्तं तप्तहेमाभं वितते शङ्कराश्रमे। <br> तस्मिन् सरो महज्जातं विमलं बहुयोजनम्॥ २९ <br> प्रोत्फुल्लहेमकमलं नानाविहगनादितम्। <br> तच्छ्रुत्वा तु ततो देवी हेमद्रुममहाजलम्॥ ३० <br> जगाम कौतुकाविष्टा तत्सरः कनकाम्बुजम्। <br> तत्र कृत्वा जलक्रीडां तदब्जकृतशेखरा॥ ३१ <br> उपविष्टा ततस्तस्य तीरे देवी सखीयूता। <br> पातुकामा च तत्तोयं स्वादु निर्मलपङ्कजम्॥ ३२ |
| * अध्याय १५८ * | ६६१ |
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| अपश्यत् कृत्तिकाः स्नाताः षडर्कद्युतिसन्निभाः ।<br>पद्मपत्रे तु तद्वारि गृहीत्वोपस्थिता गृहम् ॥ ३३<br><br>हर्षादुवाच पश्यामि पद्मपत्रे स्थितं पयः ।<br>ततस्ता ऊचुरखिलं कृत्तिका हिमशैलजाम् ॥ ३४<br><br>कृत्तिका ऊचुः<br>दास्यामो यदि ते गर्भः सम्भूतो यो भविष्यति ।<br>सोऽस्माकमपि पुत्रः स्यादस्मन्नाम्ना च वर्तताम् ।<br>भवेल्लोकेषु विख्यातः सर्वेष्वपि शुभानने ॥ ३५<br><br>इत्युक्तोवाच गिरिजा कथं मद्गात्रसम्भवः ।<br>सर्वैरवयवैर्युक्तो भवतीभ्यः सुतो भवेत् ॥ ३६<br><br>ततस्तां कृत्तिका ऊचुर्विधास्यामोऽस्य वै वयम् ।<br>उत्तमान्युत्तमाङ्गानि यद्येवं तु भविष्यति ॥ ३७<br><br>उक्ता वै शैलजा प्राह भवत्वेवमनिन्दिताः ।<br>ततस्ता हर्षसम्पूर्णाः पद्मपत्रस्थितं पयः ॥ ३८<br><br>तस्यै ददुस्तया चापि तत्पीतं क्रमशो जलम् ।<br>पीते तु सलिले तस्मिंस्ततस्तस्मिन् सरोवरे ॥ ३९<br><br>विपाट्य देव्याश्च ततो दक्षिणां कुक्षिमुद्गतः ।<br>निष्चक्रामाद्भुतो बालः सर्वलोकविभासकः ॥ ४०<br><br>प्रभाकरप्रभाकारः प्रकाशकनकप्रभः ।<br>गृहीतनिर्मलोदग्रशक्तिशूलः षडाननः ॥ ४१<br><br>दीप्तो मारयितुं दैत्यान् कुत्सितान् कनकच्छविः ।<br>एतस्मात् कारणाद् देवः कुमारश्चापि सोऽभवत् ॥ ४२ | इतनेमें ही उनकी दृष्टि उस सरोवरमें स्नान कर निकली हुई छहों कृत्तिकाओंपर पड़ी जो सूर्यकी कान्तिके समान उद्भासित हो रही थीं तथा कमलके पत्तेके दोनेमें उस सरोवरके जलको लेकर घरकी ओर जानेके लिये उद्यत थीं। तब पार्वतींने उनसे हर्षपूर्वक कहा—'मैं कमलके पत्तेमें रखे हुए जलको देख रही हूँ।' यह सुनकर उन कृत्तिकाओंने पार्वतीसे सारा वृत्तान्त कह सुनाया॥ २७-३४॥<br><br>कृत्तिकाओंने कहा—शुभानने! यह जल हमलोग आपको दे देंगी, किंतु यदि आप यह प्रतिज्ञा करें कि इस जलके पान करनेसे जो गर्भ स्थित होगा, उससे उत्पन्न हुआ बालक हमलोगोंका भी पुत्र कहलाये और हमलोगोंके नामपर उसका नामकरण किया जाय। वह बालक सभी लोकोंमें विख्यात होगा। इस प्रकार कही जानेपर पार्वतींने कहा—'भला जो मेरे समान सभी अङ्गोंसे युक्त होकर मेरे शरीरसे उत्पन्न होगा, वह आप लोगोंका पुत्र कैसे हो सकेगा?' तब कृत्तिकाओंने पार्वतीसे कहा—'यदि हमलोग इस बालकके उत्तम मस्तकोंकी रचना करेंगी तो यह वैसा हो सकता है।' उनके ऐसा कहनेपर पार्वतींने कहा—'अनिन्द्य सुन्दरियो! ऐसा ही हो।' तब हर्षसे भरी हुई कृत्तिकाओंने कमलके पत्तेमें रखे हुए उस जलको पार्वतीको समर्पित कर दिया और पार्वतींने भी उस सारे जलको क्रमशः पी लिया। उस जलके पी लेनेपर उसी सरोवरके तटपर पार्वतीदेवीकी दाहिनी कोखको फाड़कर एक अद्भुत बालक निकल पड़ा जो समस्त लोकोंको उद्भासित कर रहा था। उसकी शरीरकान्ति सूर्यके समान थी। वह स्वर्ण-सदृश प्रकाशमान तथा हाथोंमें निर्मल एवं भयावनी शक्ति और शूल धारण किये हुए था। उसके छः मुख थे। वह सुवर्णकी-सी छविसे युक्त हो उद्दीप्त हो रहा था और पापाचारी दैत्योंको मारनेके लिये उद्यत-सा दीख रहा था। इसी कारण वे देव 'कुमार' नामसे भी प्रसिद्ध हुए॥ ३५-४२॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तारकोपाख्याने कुमारसम्भवो नामाष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकोपाख्यानमें कुमारसम्भव नामक एक सौ अट्ठावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १५८ ॥
६६२ * मत्स्यपुराण *
एक सौ उनसठवाँ अध्याय
स्कन्दकी उत्पत्ति, उनका नामकरण, उनसे देवताओंकी प्रार्थना और उनके द्वारा देवताओंको आश्वासन, तारकके पास देवदूतद्वारा संदेश भेजा जाना और सिद्धोंद्वारा कुमारकी स्तुति
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! पुनः पार्वती देवीकी |
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| वामं विदार्य निष्क्रान्तः सुतो देव्याः पुनः शिशुः।<br>स्कन्दाच्च वदने वह्नेः शुकात् सुवदनोऽरिहा॥ १<br>कृत्तिकामेलनादेव शाखाभिः सविशेषतः।<br>शाखाभिधाः समाख्याताः षट्सु वक्त्रेषु विस्तृताः॥ २<br>यतस्ततो विशाखोऽसौ ख्यातो लोकेषु षण्मुखः।<br>स्कन्दो विशाखः षड्वक्त्रः कार्तिकेयश्च विश्रुतः॥ ३<br>चैत्रस्य बहुले पक्षे पञ्चदश्यां महाबलौ।<br>सम्भूतावर्कसदृशौ विशाले शरकानने॥ ४<br>चैत्रस्यैव सिते पक्षे पञ्चम्यां पाकशासनः।<br>बालकाभ्यां चकारैकं मत्वा चामरभूतये॥ ५<br>तस्यामेव ततः षष्ठ्यामभिषिक्तो गुहः प्रभुः।<br>सर्वैरमरसंघातैर्ब्रह्मेन्द्रोपेन्द्रभास्करैः॥ ६<br>गन्धमाल्यैः शुभैर्धूपैस्तथा क्रीडनकैरपि।<br>छत्रैश्चामरजालैश्च भूषणैश्च विलेपनैः॥ ७<br>अभिषिक्तो विधानेन यथावत् षण्मुखः प्रभुः।<br>सुतामस्मै ददौ शक्रो देवसेनेति विश्रुताम्॥ ८<br>पत्यर्थं देवदेवस्य ददौ विष्णुस्तदायुधान्।<br>यक्षाणां दशलक्षाणि ददावस्मै धनाधिपः॥ ९<br>ददौ हुताशनस्तेजो ददौ वायुश्च वाहनम्।<br>ददौ क्रीडनकं त्वष्टा कुक्कुटं कामरूपिणम्।<br>एवं सुरास्तु ते सर्वे परिवारमनुत्तमम्॥ १०<br>ददुर्मुदितचेतस्काः स्कन्दायादित्यवर्चसे॥ ११<br>जानुभ्यामवनीं स्थित्वा सुरसंघास्तमस्तुवन्।<br>स्तोत्रेणानेन वरदं षण्मुखं मुख्यशः सुराः॥ १२ | बायीं कोखको फाड़कर दूसरा शिशु पुत्ररूपमें बाहर निकला। सर्वप्रथम अग्निके मुखमें वीर्यका क्षरण होनेके कारण वह बालक सुन्दर मुखवाला और शत्रुओंका विनाशक हुआ। उसके छः मुख हुए। चूँकि छहों मुखोंमें विस्तृत शाखा नामसे प्रसिद्ध कृतिकाओंकी शाखाओंका विशेषरूपसे मेल हुआ था, इसलिये वह बालक लोकोंमें 'विशाख' नामसे विख्यात हुआ। इस प्रकार वह स्कन्द, विशाख, षड्वक्त्र और कार्तिकेयके नामसे प्रख्यात हुआ। चैत्रमासके कृष्णपक्षकी पंद्रहवीं तिथि (अमावास्या)-को विशाल सरपतके वनमें सूर्यके समान तेजस्वी एवं महाबली ये दोनों शिशु उत्पन्न हुए थे। पुनः चैत्रमासके शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथिको पाकशासन इन्द्रने देवताओंके लिये कल्याणकारी मानकर दोनों बालकोंको सम्मिलित करके एकीभूत कर दिया। उसी मासकी षष्ठी तिथिको ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, सूर्य आदि सभी देवसमूहोंद्वारा सामर्थ्यशाली गुह (देव-सेनापतिके पदपर) अभिषिक्त किये गये। उस समय चन्दन, पुष्पमाला, माङ्गलिक धूप, खिलौना, छत्र, चँवरसमूह, आभूषण और अङ्गरागद्वारा भगवान् षण्मुखका विधिपूर्वक यथावत् अभिषेक किया गया था। इन्द्रने 'देवसेना' नामसे विख्यात कन्याको उन्हें पत्नीरूपमें प्रदान किया। भगवान् विष्णुने देवाधिदेव गुहको अनेकों आयुध समर्पित किया। कुबेर उन्हें दस लाख यक्ष प्रदान किये। अग्निने तेज दिया। वायुने वाहन समर्पित किया। त्वष्टाने खिलौना तथा स्वेच्छानुसार रूप धारण करनेवाला एक मुर्गा प्रदान किया। इस प्रकार उन सभी देवताओंने प्रसन्न मनसे सूर्यके समान तेजस्वी स्कन्दको सर्वश्रेष्ठ परिवार प्रदान किया। तत्पश्चात् प्रधान-प्रधान देवताओंके समूह पृथ्वीपर घुटने टेककर उन वरदायक षण्मुखकी निम्नाङ्कित स्तोत्रद्वारा स्तुति करने लगे॥ १—१२॥ |
| * अध्याय १५९ * | ६६३ |
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| देवा ऊचुः<br>नमः कुमाराय महाप्रभाय<br>स्कन्दाय च स्कन्दितदानवाय।<br>नवार्कविद्युद्द्युतये नमोऽस्तु ते<br>नमोऽस्तु ते षण्मुख कामरूप॥ १३<br>पिनद्धनानाभरणाय भर्त्रे<br>नमो रणे दारुणदारुणाय।<br>नमोऽस्तु तेऽर्कप्रतिमप्रभाय<br>नमोऽस्तु गुह्याय गुहाय तुभ्यम्॥ १४<br>नमोऽस्तु त्रैलोक्यभयापहाय<br>नमोऽस्तु ते बालकृपापराय।<br>नमो विशालामललोचनाय<br>नमो विशाखाय महाव्रताय॥ १५<br>नमो नमस्तेऽस्तु मनोहराय<br>नमो नमस्तेऽस्तु रणोत्कटाय।<br>नमो मयूरोज्ज्वलवाहनाय<br>नमोऽस्तु केयूरधराय तुभ्यम्॥ १६<br>नमो धृतोदग्रपताकिने नमो<br>नमः प्रभावप्रणताय तेऽस्तु।<br>नमो नमस्ते वरवीर्यशालिने<br>कृपापरो नो भव भव्यमूर्ते॥ १७<br>क्रियापरा यज्ञपतिं च स्तुत्वा<br>विरेमुरेवं त्वमराधिपाद्याः।<br>एवं तदा षड्वदनं तु सेन्द्रा<br>मुदा सुतुष्टश्च गुहस्ततस्तान्।<br>निरीक्ष्य नेत्रैरमलैः सुरेशान्<br>शत्रून् हनिष्यामि गतज्वराः स्थ॥ १८ | **देवताओंने कहा—**कामरूप षण्मुख! आप कुमार, महान् तेजस्वी, शिवतेजसे उत्पन्न और दानवोंका कचूमर निकालनेवाले हैं। आपकी शरीर-कान्ति उदयकालीन सूर्य एवं बिजलीकी-सी है। आपको हमारा बारंबार नमस्कार प्राप्त हो। आप नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित, जगत्के पालनकर्ता और रणभूमिमें भीषण दानवोंके लिये अत्यन्त भयंकर हैं, आपको प्रणाम है। सूर्य-सरीखे प्रतिभाशाली आपको अभिवादन है। गुह्य रूपवाले आप गुहको हमारा नमस्कार है। त्रिलोकीके भयको दूर करनेवाले आपको प्रणाम है। कृपा करनेमें तत्पर रहनेवाले बालरूप आपको अभिवादन है। विशाल एवं निर्मल नेत्रोंवाले आपको नमस्कार है। महान् व्रतका पालन करनेवाले आप विशाखको प्रणाम है। सामान्यतया मनोहर रूपधारी तथा रणभूमिमें भयानक रूपसे युक्त आपको बारंबार अभिवादन है। उज्ज्वल मयूरपर सवार होनेवाले आपको नमस्कार है। आप केयूरधारीको प्रणाम है। अत्यन्त ऊँचाईपर फहरानेवाली पताकाको धारण करनेवाले आपको अभिवादन है। प्रणतजनोंपर प्रभाव डालनेवाले आपको नमस्कार है। आप सर्वश्रेष्ठ पराक्रमसे सम्पन्न हैं। आपको बारंबार प्रणाम है। मनोहर रूपधारिन्! हमलोगोंपर कृपा कीजिये। इस प्रकार देवराज इन्द्र आदि सभी क्रियापरायण देवगण जब हर्षपूर्वक यज्ञपति षडाननकी स्तुति करके चुप हो गये, तब परम प्रसन्न हुए गुह अपने निर्मल नेत्रोंसे उन सुरेश्वरोंकी ओर निहारकर बोले—'देवगण! मैं आपलोगोंके शत्रुओंका संहार करूँगा, अब आपलोग शोकरहित हो जायँ'॥ १३–१८॥ |
| कुमार उवाच<br>कं वः कामं प्रयच्छामि देवता ब्रूत निर्वृताः।<br>यद्यप्यसाध्यं हृद्यं वो हृदये चिन्तितं परम्॥ १९<br>इत्युक्तास्तु सुरास्तेन प्रोचुः प्रणतमौलयः।<br>सर्व एव महात्मानं गुहं तद्गतमानसाः॥ २०<br>दैत्येन्द्रस्तारको नाम सर्वामरकुलान्तकृत्।<br>बलवान् दुर्जयो दुष्टो दुराचारोऽतिकोपनः।<br>तमेव जहि हृद्योऽर्थ एषोऽस्माकं भयापह॥ २१ | **कुमारने पूछा—**देवगण! आपलोग निःसंकोच बतलायें कि मैं आपलोगोंकी कौन-सी अभिलाषा पूर्ण करूँ? वह उत्तम अभिलाषा, जिसे आपलोगोंने अपने हृदयमें चिरकालसे सोच रखा है, यदि दुःसाध्य भी होगी तो भी मैं उसे अवश्य पूर्ण करूँगा। कुमारद्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर सभी देवता उनके मनोऽनुकूल हो सिर झुकाकर महात्मा गुहसे बोले—'भय-विनाशक गुह! तारक नामवाले दैत्येन्द्रने सभी देवकुलोंका विनाश कर दिया है। वह बलवान्, दुर्जय, अत्यन्त दुष्ट, दुराचारी और अतिशय क्रोधी है, आप उसीका वध कीजिये। यही हमलोगोंकी हार्दिक अभिलाषा है।' |
| ६६४ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा सर्वामरपदानुगः।<br>जगाम जगतां नाथः स्तूयमानोऽमरेश्वरैः ॥ २२<br>तारकस्य वधार्थाय जगतः कण्टकस्य वै।<br>ततश्च प्रेषयामास शक्रो लब्धसमाश्रयः ॥ २३<br>दूतं दानवसिंहस्य परुषाक्षरवादिनम्।<br>स तु गत्वाब्रवीद् दैत्यं निर्भयो भीमदर्शनः ॥ २४<br>दूत उवाच<br>शक्रस्त्वामाह देवेशो दैत्यकेतो दिवस्पतिः।<br>तारकासुर तच्छ्रुत्वा घट शक्त्या यथेच्छया ॥ २५<br>यज्जगद्दालनादाप्तं किल्बिषं दानव त्वया।<br>तस्याहं शासकस्तेऽद्य राजास्मि भुवनत्रये ॥ २६<br>श्रुत्वैतद् दूतवचनं कोपसंरक्तलोचनः।<br>उवाच दूतं दुष्टात्मा नष्टप्रायविभूतिकः ॥ २७<br>तारक उवाच<br>दृष्टं ते पौरुषं शक्र रणेषु शतशो मया।<br>निस्त्रपत्वान्न ते लज्जा विद्यते शक्र दुर्मते ॥ २८<br>एवमुक्ते गते दूते चिन्तयामास दानवः।<br>नालब्धसंश्रयः शक्रो वक्तुमेवं हि चार्हति ॥ २९<br>जितः स शक्रो नाकस्माज्जायते संश्रयाश्रयः।<br>निमित्तानि च दुष्टानि सोऽपश्यद् दुष्टचेष्टितः ॥ ३०<br>पांसुवर्षमसृक्पातं गगनादवनीतले।<br>भुजनेत्रप्रकम्पं च वक्त्रशोषं मनोभ्रमम् ॥ ३१<br>स्वकान्तावक्त्रपद्मानां म्लानतां च व्यलोकयत्।<br>दुष्टांश्च प्राणिनो रौद्रान्सोऽपश्यद् दुष्टवेदिनः ॥ ३२<br>तदचिन्त्यैव दितिजो न्यस्तचिन्तोऽभवत् क्षणात्।<br>यावद्गजघटाघण्टारणत्काररवोत्कटाम् ॥ ३३<br>तद्धतुरगसङ्घातक्षुण्णभूरेणुपिञ्जराम् ।<br>चञ्चलस्यन्दनोदग्रध्वजराजिविराजिताम् ॥ ३४ | देवताओंद्वारा ऐसा निवेदन किये जानेपर गुहने 'तथैति' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। तत्पश्चात् वे जगन्नाथ गुह देवेश्वरोंद्वारा स्तुति किये जाते हुए सम्पूर्ण देवगणोंके साथ जगत्के कण्टकस्वरूप तारकका वध करनेके लिये प्रस्थित हुए। तदुपरान्त सहायक उपलब्ध हो जानेपर इन्द्रने एक कठोर वचन बोलनेवाले दूतको दैत्यसिंह तारकके पास भेजा। वह भयंकर रूपधारी दूत दैत्यराजके पास जाकर निर्भय होकर बोला ॥ १९–२४॥<br><br>दूतने कहा—दैत्यकेतु तारकासुर! स्वर्गके अधीश्वर देवराज इन्द्रने तुम्हें कुछ संदेश कहला भेजा है, उसे सुनकर तुम शक्तिपूर्वक स्वेच्छानुसार प्रयत्न करो। (उन्होंने कहलाया है कि) 'दानव! जगत्का विनाश करके तुमने जो पाप कमाया है, तुम्हारे उस पापका शासन करनेके लिये मैं प्रस्तुत हूँ। इस समय मैं त्रिभुवनका राजा हूँ।' दूतकी ऐसी बात सुनकर तारकके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। उसकी विभूति प्रायः नष्ट हो चुकी थी। तब उस दुष्टात्माने दूतसे कहा॥ २५–२७॥<br><br>तारक बोला—इन्द्र! मैंने रणभूमिमें सैकड़ों बार तुम्हारे पुरुषार्थको देख लिया है। दुर्बुद्धि इन्द्र! निर्लज्ज होनेके कारण तुम्हें ऐसा कहते हुए लज्जा नहीं आती। ऐसा उत्तर पाकर दूतके चले जानेपर दानवराज तारक विचार करने लगा कि किसी विशिष्टकी सहायता प्राप्त हुए बिना इन्द्र इस तरहकी बातें नहीं कह सकते; क्योंकि वे हमसे पराजित हो चुके हैं। पता नहीं, अकस्मात् उन्हें कहाँसे सहायता उपलब्ध हो गयी है। इसी बीच उस दुष्ट चेष्टावाले दानवको अनर्थसूचक निमित्त दीख पड़े। उसी समय आकाशसे भूतलपर धूलकी वर्षा होने लगी तथा रक्तपात होने लगा। उसकी भुजाएँ और नेत्र काँपने लगे। उसका मुख सूख गया और उसके मनमें घबराहट उत्पन्न हो गयी। उसे अपनी पत्नियोंके मुखकमल मलिन दीख पड़ने लगे तथा अनर्थकी सूचना देनेवाले भयंकर दुष्ट प्राणियोंके दर्शन हुए, किंतु इन सबका कुछ भी विचार न कर दैत्य तारक क्षणभरमें ही चिन्तारहित हो गया। इतनेमें ही अट्टालिकापर बैठे हुए दैत्यने आती हुई देवताओंकी सेनाको देखा जिसमें गजयूथोंके बजते हुए घंटोंका उत्कट शब्द हो रहा था। उसी प्रकार जो घोड़ोंकी टापोंसे पिसी हुई धूलसे आच्छादित होनेके कारण पीली दीख रही थी तथा चलते हुए रथोंके ऊपर फहराते हुए ध्वजसमूहों, |
| * अध्याय १५९ * | ६६५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विमानैश्चाद्भुताकारैश्चलितामरचामरैः ।<br>तां भूषणनिबद्धां च किंनरोद्गीतनादिताम्॥ ३५<br>नानानाकतरूत्फुल्लकुसुमापीडधारिणीम् ।<br>विकोशशस्त्रपरिष्कारां वर्मनिर्मलदर्शनाम्॥ ३६<br>बन्द्युद्घुष्टस्तुतिरसां नानावाद्यनिनादिताम्।<br>सेनां नाकसदां दैत्यः प्रासादस्थो व्यलोकयत्॥ ३७ | डुलाये जाते हुए देवताओंके चँवरों और अद्भुत आकारवाले विमानोंसे सुशोभित थी। जो आभूषणोंसे विभूषित, किन्नरोंके गानसे निनादित, नाना प्रकारके स्वर्गीय वृक्षोंके खिले हुए पुष्पोंको मस्तकपर धारण करनेवाले सैनिकोंसे युक्त, म्यानरहित शस्त्रास्त्रोंसे परिष्कृत और निर्मल कवचोंसे युक्त थी, जिसमें वन्दियोंद्वारा गायी जाती हुई स्तुतियोंके शब्द सुनायी पड़ रहे थे और जो नाना प्रकारके बाजोंसे निनादित हो रही थी॥ २८–३७॥ |
| चिन्तयामास स तदा किंचिदुद्भ्रान्तमानसः ।<br>अपूर्वः को भवेद् योद्धा यो मया न विनिर्जितः ॥ ३८ | उसे देखकर तारकका मन कुछ उद्भ्रान्त हो उठा। तब वह विचार करने लगा कि यह कौन अपूर्व योद्धा हो सकता है, जिसे मैंने पराजित नहीं किया है। |
| ततश्चिन्ताकुलो दैत्यः शुश्राव कटुकाक्षरम्।<br>सिद्धवन्दिभिरुद्घुष्टमिदं हृदयदारणम् ॥ ३९ | इस प्रकार वह दैत्य जब चिन्तासे व्याकुल हो रहा था, उसी समय उसने सिद्ध-वन्दियोंद्वारा गायी जाती हुई यह कठोर अक्षरोंवाली एवं हृदयविदारिणी गाथा सुनी ॥ ३८-३९ ॥ |
| अथ गाथा<br>जयातुलशक्तिदीधितिपिञ्जर<br>भुजदण्डचण्डरणरभस ।<br>सुखद कुमुदकाननविकासनेन्दो कुमार<br>जय दितिजकुलमहोदधिवडवानल ॥ ४० | कुमार! अप्रमेय शक्तिकी किरणोंसे आपका वर्ण पीला हो गया है। आप अपने भुजदण्डोंसे प्रचण्ड युद्धका दृश्य उत्पन्न कर देनेवाले, भक्तोंके लिये सुखदायक, कुमुदिनीके वनको विकसित करनेके लिये चन्द्रमा और दैत्यकुलरूप महासागरके लिये वडवानलके समान हैं, आपकी जय हो, जय हो। |
| षण्मुख मधुररवमयूररथ<br>सुरमुकुटकोटिघट्टितचरणनखाङ्कुरमहासन।<br>जय ललितचूड़ाकलापनवविमलदल-<br>कमलकान्त दैत्यवंशदुःसहदावानल ॥ ४१ | षण्मुख! मधुर शब्द करनेवाला मयूर आपका वाहन है, आपका सिंहासन देवताओंके मुकुटोंकी कोरसे संघट्टित चरणनखोंके अङ्कुरसे सुशोभित होता है, आपका रुचिर चूडासमूह नूतन एवं निर्मल कमलदलके सम्मेलनसे सुशोभित होता है, आप दैत्यवंशके लिये दुःसह दावानलके समान हैं, आपकी जय हो। |
| जय विशाख विभो जय<br>सकललोकतारक जय देवसेनानायक।<br>स्कन्द जय गौरीनन्दन घण्टाप्रिय<br>प्रिय विशाख विभो धृतपताकप्रकीर्णपटल।<br>कनकभूषण भासुरदिनकरच्छाय ॥ ४२ | ऐश्वर्यशाली विशाख! आपकी जय हो। आप सम्पूर्ण लोकोंका उद्धार करनेवाले हैं, आपकी जय हो। देवसेनाके नायककी जय हो। स्कन्द! आप गौरीनन्दन और घंटाके प्रेमी हैं। ऐश्वर्यशाली प्रिय विशाख! आप हाथमें पताकासमूह धारण करनेवाले हैं और आपकी छवि स्वर्णमय आभूषण धारण करनेसे सूर्यके समान चमकीली है, आपकी जय हो। |
| जय जनितसम्भ्रम लीलालूनाखिलाराते<br>जय सकललोकतारक दितिजा सुरवर तारकान्तक।<br>स्कन्द जय बाल सप्तवासर<br>जय भुवनावलिशोकविनाशन ॥ ४३ | आप भय उत्पन्न करनेवाले और लीलापूर्वक सम्पूर्ण शत्रुओंके विनाशकर्ता हैं, आपकी जय हो। आप सम्पूर्ण लोकोंके उद्धारक तथा असुरवर दैत्य तारकके विनाशकारक हैं, आपकी जय हो। सप्तदिवसीय बालक स्कन्द। आप समस्त भुवनोंके शोकका विनाश करनेवाले हैं, आपकी जय हो, जय हो ॥ ४०–४३॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे देवासुरसंग्रामे रणोद्योगो नामैकोनषष्ठ्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५९ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके देवासुरसंग्राममें रणोद्योग नामक एक सौ उनसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १५९ ॥
६६६ * मत्स्यपुराण *
एक सौ साठवाँ अध्याय
तारकासुर और कुमारका भीषण युद्ध तथा कुमारद्वारा तारकका वध
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— |
|---|---|
| श्रुत्वैतत्तारकः सर्वमुद्घुष्टं देववन्दिभिः।<br>सस्मार ब्रह्मणो वाक्यं वधं बालादुपस्थितम्॥ १<br><br>स्मृत्वा धर्मं ह्यवर्माङ्गः पदातिरपदानुगः।<br>मन्दिरात्र्निर्जगामाशु शोकग्रस्तेन चेतसा॥ २<br><br>कालनेमिमुखा दैत्याः संरम्भाद् भ्रान्तचेतसः।<br>योधा धावत गृहीत योजयध्वं वरूथिनीम्॥ ३<br><br>कुमारं तारको दृष्ट्वा बभाषे भीषणाकृतिः।<br>किं बाल योद्धुकामोऽसि क्रीड कन्दुकलीलया॥ ४<br><br>त्वया न दानवा दृष्टा यत्सङ्गरविभीषकाः।<br>बालत्वादथ ते बुद्धिरेवं स्वल्पार्थदर्शिनी॥ ५<br><br>कुमारोऽपि तमग्रस्थं बभाषे हर्षयन् सुरान्।<br>शृणु तारक शास्त्रार्थस्तव चैव निरूप्यते॥ ६<br><br>शास्त्रैरर्था न दृश्यन्ते समये निर्भयैर्भटैः।<br>शिशुत्वं मावमंस्था मे शिशुः कालभुजङ्गमः॥ ७<br><br>दुष्प्रेक्ष्यो भास्करो बालस्तथाहं दुर्जयः शिशुः।<br>अल्पाक्षरो न मन्त्रः किं सुस्फुरो दैत्य दृश्यते॥ ८ | ऋषियो! देववन्दियोंद्वारा उद्घोषित वह सारा प्रसङ्ग सुनकर तारकको ब्रह्माद्वारा कही हुई बालकके हाथसे वध होनेवाली बातका स्मरण हो आया। तब वह कालधर्मका स्मरण कर कवचरहित अवस्थामें अकेले पैदल ही तुरंत अपने भवनसे बाहर निकल पड़ा। उस समय उसका चित्त शोकसे ग्रस्त था। उसने पुकारकर कहा—'अरे कालनेमि आदि प्रमुख दैत्य योद्धाओ! यद्यपि आतुरतावश तुमलोगोंका चित्त उद्भ्रान्त हो उठा है, तथापि तुमलोग दौड़ो, इसे पकड़ लो और इस सेनाके साथ युद्ध करो।' तत्पश्चात् भयंकर आकृतिवाला तारक कुमारको देखकर बोला—'अरे बच्चे! क्या तुम युद्ध करना चाहते हो? यदि ऐसी बात है तो आओ और कन्दुकक्रीडाकी तरह खेलो। तुमने अभीतक रणभूमिमें भय उत्पन्न करनेवाले दानवोंको नहीं देखा है। बालक होनेके कारण तुम्हारी बुद्धि इस प्रकारके छोटे-मोटे प्रयोजनोंको देखनेवाली है अर्थात् दूरदर्शिनी नहीं है।' यह सुनकर कुमार भी देवताओंको हर्षित करते हुए आगे खड़े हुए तारकसे बोले—'तारक! सुनो, मैं तुम्हारे शास्त्रीय अर्थका निरूपण कर रहा हूँ। निर्भीक योद्धा समरभूमिमें शास्त्रीय प्रयोजनको नहीं देखते। तुम मेरे बालकपनकी अवहेलना मत करो। जैसे साँपका बच्चा कष्टकारक होता है और उदयकालीन सूर्यकी ओर भी नहीं देखा जा सकता, उसी तरह मैं दुर्जय बालक हूँ। दैत्य! थोड़े अक्षरोंवाला मन्त्र क्या महान् स्फूर्तिदायक नहीं देखा जाता?'॥ १—८॥ |
| कुमारे प्रोक्तवत्येवं दैत्यश्चिक्षेप मुद्गरम्।<br>कुमारस्तं निरस्याथ वज्रेणामोघवर्चसा॥ ९ | कुमार इस प्रकारकी बातें कह ही रहे थे कि दैत्यने उनपर मुद्गरसे आघात किया। तब कुमारने अपने अमोघ वर्चस्वी वज्रसे उसे निरस्त कर दिया। |
| ततश्चिक्षेप दैत्येन्द्रो भिन्दिपालमयोमयम्।<br>करेण तच्च जग्राह कार्तिकेयोऽमरारिहा॥ १० | तत्पश्चात् दैत्येन्द्रने उन पर लोहनिर्मित भिन्दिपाल चलाया, किंतु देवशत्रुओंका विनाश करनेवाले कार्तिकेयने उसे हाथसे पकड़ लिया। |
| गदां मुमोच दैत्याय षण्मुखोऽपि खरस्वनाम्।<br>तया हतस्ततो दैत्यश्चकम्पेऽचलराडिव॥ ११ | फिर षडाननने उस दैत्यके ऊपर घोर शब्द करती हुई गदा फेंकी। उस गदासे आहत हो वह दैत्य पर्वतराजकी तरह काँप उठा। |
| मेने च दुर्जयं दैत्यस्तदा षड्वदनं रणे।<br>चिन्तयामास बुद्ध्या वै प्राप्तः कालो न संशयः॥ १२ | तब उस दैत्यने षडाननको रणभूमिमें अजेय मान लिया और वह बुद्धिसे विचार करने लगा कि निश्चय ही मेरा काल आ पहुँचा है। |