मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३९- अष्टक और ययातिका संवाद
| १३० | * मत्स्यपुराण * |
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| प्रकृतय ऊचुः<br>यः पुत्रो गुणसम्पन्नो मातापित्रोर्हितः सदा।<br>सर्वं सोऽर्हति कल्याणं कनीयानपि स प्रभुः॥ २६<br>अहं पूरोरिदं राज्यं यः प्रियः प्रियकृत् तव।<br>वरदानेन शुक्रस्य न शक्यं वक्तुमुत्तरम्॥ २७<br><br>शौनक उवाच<br>पौरजानपदैस्तुष्टैरित्युक्तो नाहुषस्तदा।<br>अभिषिच्य ततः पूरुं राज्ये स्वसुतमात्मजम्॥ २८<br>दत्त्वा च पूरवे राज्यं वनवासाय दीक्षितः।<br>पुरात् स निर्ययौ राजा ब्राह्मणैस्तापसैः सह॥ २९<br>यदोस्तु यादवा जातास्तुर्वसोर्यवनाः सुताः।<br>द्रुह्योश्चैव सुता भोजा अनोस्तु म्लेच्छजातयः॥ ३०<br>पूरोस्तु पौरवो वंशो यत्र जातोऽसि पार्थिव।<br>इदं वर्षसहस्रात् तु राज्यं कुरु कुलागतम्॥ ३१ | **प्रजावर्गके लोग बोले—**जो पुत्र गुणवान् और सदा माता-पिताका हितैषी हो, वह छोटा होनेपर भी श्रेष्ठतम है। वही सम्पूर्ण कल्याणका भागी होने योग्य है। पूरु आपका प्रिय करनेवाले पुत्र हैं, अतः शुक्राचार्यके वरदानके अनुसार ये ही इस राज्यको पानेके अधिकारी हैं। इस निश्चयके विरुद्ध अब कुछ भी उत्तर नहीं दिया जा सकता॥ २६-२७॥<br><br>**शौनकजी कहते हैं—**नगर और राज्यके लोगोंने संतुष्ट होकर जब इस प्रकार कहा, तब नहुषनन्दन ययातिने अपने पुत्र पूरुको ही अपने राज्यपर अभिषिक्त किया। इस प्रकार पूरुको राज्य दे वनवासकी दीक्षा लेकर राजा ययाति तपस्वी ब्राह्मणोंके साथ नगरसे बाहर निकल गये। यदुसे यादव क्षत्रिय उत्पन्न हुए, तुर्वसुकी संतान (सीमन्तसे लेकर यूनानतकके निवासी) यवन कहलायी, द्रुह्युके पुत्र भोज नामसे प्रसिद्ध हुए और अनुसे म्लेच्छ जातियाँ उत्पन्न हुईं। राजन्! पूरुसे पौरव वंश चला, जिसमें तुम उत्पन्न हुए हो। हजारों वर्षोंसे यह राज्य कुरुकुलमें सम्मिलित हो गया है, अर्थात् यह कुरुवंश नामसे प्रसिद्ध हो गया है॥ २८-३१॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे ययातिचरिते चतुस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें ययाति-चरित्र-वर्णन नामक चौंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३४॥
पैंतीसवाँ अध्याय
वनमें राजा ययातिकी तपस्या और उन्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति
| शौनक उवाच<br>एवं स नाहुषो राजा ययातिः पुत्रमीप्सितम्।<br>राज्येऽभिषिच्य मुदितो वानप्रस्थोऽभवन्मुनिः॥ १<br>उषित्वा वनवासं स ब्राह्मणैः सह संश्रितः।<br>फलमूलाशनो दान्तो यथा स्वर्गमितो गतः॥ २<br>स गतः स्वर्गवासं तु न्यवसन्मुदितः सुखी।<br>कालस्य नातिमहतः पुनः शक्रेण पातितः॥ ३<br>विवशः प्रच्युतः स्वर्गादप्राप्तो मेदिनीतलम्।<br>स्थितश्चासीदन्तरिक्षे स तदेति श्रुतं मया॥ ४<br>तत एव पुनश्चापि गतः स्वर्गमिति श्रुतिः।<br>राज्ञा वसुमता सार्धमष्टकेन च वीर्यवान्।<br>प्रतर्दनेन शिबिना समेत्य किल संसदि॥ ५ | **शौनकजी कहते हैं—**शतानीक! इस प्रकार नहुषनन्दन राजा ययाति अपने प्रिय पुत्र पूरुका राज्याभिषेक करके प्रसन्नतापूर्वक वानप्रस्थ मुनि हो गये। वे वनमें ब्राह्मणोंके साथ रहकर कठोर व्रतका पालन करते हुए फल-मूलका आहार तथा मन और इन्द्रियोंका संयम करते थे, इससे वे स्वर्गलोकमें गये। स्वर्गलोकमें जाकर वे बड़ी प्रसन्नताके साथ सुखपूर्वक रहने लगे और बहुत कालके बाद इन्द्रद्वारा वे पुनः स्वर्गसे नीचे गिरा दिये गये। स्वर्गसे भ्रष्ट हो पृथ्वीपर गिरते समय वे भूतलतक नहीं पहुँचे, आकाशमें ही स्थिर हो गये, ऐसा मैंने सुना है। फिर यह भी सुननेमें आया है कि वे पराक्रमी राजा ययाति मुनिसमाजमें राजा वसुमान्, अष्टक, प्रतर्दन और शिबिसे मिलकर पुनः वहींसे साधु पुरुषोंके सङ्गके प्रभावसे स्वर्गलोकमें चले गये॥ १—५॥ |
* अध्याय ३५ * १३१
| शतानीक उवाच | |
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| कर्मणा केन स दिवं पुनः प्राप्तो महीपतिः।<br>कथमिन्द्रेण भगवन् पातितो मेदिनीतले॥ ६<br><br>सर्वमेतदशेषेण श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः।<br>कथ्यमानं त्वया विप्र देवर्षिगणसंनिधौ॥ ७<br><br>देवराजसमो ह्यासीद् ययातिः पृथिवीपतिः।<br>वर्धनः कुरुवंशस्य विभावसुसमद्युतिः॥ ८<br><br>तस्य विस्तीर्णयशसः सत्यकीर्तेर्महात्मनः।<br>श्रोतुमिच्छामि देवेश दिवि चेह च सर्वशः॥ ९ | शतानीकने पूछा— भगवन्! किस कर्मसे वे भूपाल पुनः स्वर्गमें पहुँचे थे? तथा इन्द्रने उन्हें भूतलपर क्यों ढकेल दिया था? विप्रवर! मैं ये सारी बातें पूर्णरूपसे यथावत् सुनना चाहता हूँ। इन ब्रह्मर्षियोंके समीप आप इस प्रसंगका वर्णन करें। कुरुवंशकी वृद्धि करनेवाले अग्निके समान तेजस्वी राजा ययाति देवराज इन्द्रके समान थे। उनका यश चारों ओर फैला था। देवेश! मैं उन सत्यकीर्ति महात्मा ययातिका चरित्र, जो इहलोक और स्वर्गलोकमें सर्वत्र प्रसिद्ध है, सुनना चाहता हूँ॥ ६–९॥ |
| शौनक उवाच | |
| हन्त ते कथयिष्यामि ययातेरुत्तमां कथाम्।<br>दिवि चेह च पुण्यार्थां सर्वपापप्रणाशिनीम्॥ १०<br><br>ययातिर्नाहुषो राजा पूरुं पुत्रं कनीयसम्।<br>राज्येऽभिषिच्य मुदितः प्रवव्राज वनं तदा॥ ११<br><br>अन्तेषु स विनिक्षिप्य पुत्रान् यदुपुरोगमान्।<br>फलमूलाशनो राजा वनेऽसौ न्यवसच्चिरम्॥ १२<br><br>स जितात्मा जितक्रोधस्तर्पयन् पितृदेवताः।<br>अग्नींश्च विधिवज्जुह्वन् वानप्रस्थविधानतः॥ १३<br><br>अतिथीन् पूजयन् नित्यं वन्येन हविषा विभुः।<br>शिलोञ्छवृत्तिमास्थाय शेषान्नकृतभोजनः॥ १४<br><br>पूर्णं सहस्रं वर्षाणामेवंवृत्तिरभून्नृपः।<br>अम्बुभक्षः स चाब्दांस्त्रीनासीन्नियतवाङ्मनः॥ १५<br><br>ततस्तु वायुभक्षोऽभूत् संवत्सरमतन्द्रितः।<br>पञ्चाग्निमध्ये च तपस्तेपे संवत्सरं पुनः॥ १६<br><br>एकपादस्थितश्चासीत् षण्मासाननिलाशनः।<br>पुण्यकीर्तिस्ततः स्वर्गं जगामावृत्य रोदसी॥ १७ | शौनकजी कहते हैं— शतानीक! ययातिकी उत्तम कथा इहलोक और स्वर्गलोकमें भी पुण्यदायक है। यह सब पापोंका नाश करनेवाली है, मैं तुमसे उसका वर्णन करता हूँ। नहुष-पुत्र महाराज ययातिने अपने छोटे पुत्र पूरुको राज्यपर अभिषिक्त करके यदु आदि अन्य पुत्रोंको सीमान्त (किनारेके देशों)-में रख दिया। फिर बड़ी प्रसन्नताके साथ वे वनमें चले गये। वहाँ फल-मूलका आहार करते हुए उन्होंने दीर्घकालतक निवास किया। उन्होंने अपने मनको शुद्ध करके क्रोधपर विजय पायी और प्रतिदिन देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करते हुए वानप्रस्थाश्रमकी विधिसे शास्त्रीय विधानके अनुसार अग्निहोत्र प्रारम्भ किया। वे राजा शिलोञ्छवृत्तिका आश्रय ले यज्ञशेष अन्नका भोजन करते थे। भोजनसे पूर्व वनमें उपलब्ध होनेवाले फल, मूल आदि हविष्यके द्वारा अतिथियोंका आदर-सत्कार करते थे। राजाको इसी वृत्तिसे रहते हुए पूरे एक हजार वर्ष बीत गये। उन्होंने मन और वाणीपर संयम करके तीन वर्षोंतक केवल जलका आहार किया। तत्पश्चात् वे आलस्यरहित हो एक वर्षतक केवल वायु पीकर रहे। फिर एक वर्षतक पाँच अग्नियोंके बीच बैठकर तपस्या की। इसके बाद छह महीनेतक हवा पीकर वे एक पैरसे खड़े रहे। तदनन्तर पुण्यकीर्ति महाराज ययाति पृथ्वी और आकाशमें अपना यश फैलाकर स्वर्गलोकमें चले गये॥ १०—१७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते पञ्चत्रिंशोऽध्यायः॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययाति-चरित्र-वर्णन नामक पैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३५॥
१३२ * मत्स्यपुराण *
छत्तीसावाँ अध्याय
इन्द्रके पूछनेपर ययातिका अपने पुत्र पूरुको दिये हुए उपदेशकी चर्चा करना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| शौनक उवाच<br>स्वर्गतस्तु स राजेन्द्रो न्यवसद् देवसद्मनि।<br>पूजितस्त्रिदशैः साध्यैर्मरुद्भिर्वसुभिस्तथा॥ १<br>देवलोकाद् ब्रह्मलोकं स चरन् पुण्यकृद् वशी।<br>अवसत् पृथिवीपालो दीर्घकालमिति श्रुतिः॥ २<br>स कदाचिन्नृपश्रेष्ठो ययातिः शक्रमागतः।<br>कथान्ते तत्र शक्रेण पृष्टः स पृथिवीपतिः॥ ३ | **शौनकजी कहते हैं—**शतानीक! स्वर्गलोकमें जाकर महाराज ययाति देव-भवनमें निवास करने लगे। वहाँ देवताओं, साध्यगणों, मरुद्गणों तथा वसुओंने उनका बड़ा स्वागत-सत्कार किया। पुण्यात्मा तथा जितेन्द्रिय राजा वहाँ देवलोकसे ब्रह्मलोकतक भ्रमण करते हुए दीर्घकालतक रहे—ऐसी पौराणिक परम्परा है। एक दिन नृपश्रेष्ठ ययाति देवराज इन्द्रके पास आये। वार्तालापके अन्तमें इन्द्रने राजा ययातिसे इस प्रकार प्रश्न किया॥ १–३॥ |
| शक्र उवाच<br>यदा स पूरुस्तव रूपेण राज-<br>ञ्जरां गृहीत्वा प्रचचार लोके।<br>तदा राज्यं सम्प्रदायैवमस्मै<br>त्वया किमुक्तः कथयेह सत्यम्॥ ४ | **इन्द्रने पूछा—**राजन्! जिस समय पूरु आपसे वृद्धावस्था लेकर आपके स्वरूपसे इस पृथ्वीपर विचरण करने लगा, सत्य कहिये, उस समय राज्य देकर आपने उसको क्या आदेश दिया था?॥ ४॥ |
| ययातिरुवाच<br>प्रकृत्यनुमते पूरुं राज्ये कृत्वेदमब्रुवम्।<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये कृत्स्नोऽयं विषयस्तव।<br>मध्ये पृथिव्यास्त्वं राजा भ्रातरोऽन्तेऽधिपास्तव॥ ५<br>अक्रोधनः क्रोधनेभ्यो विशिष्ट-<br>स्तथा तितिक्षुरतितिक्षोर्विशिष्टः।<br>अमानुषेभ्यो मानुषश्च प्रधानो<br>विद्वांस्तथैवाविदुषः प्रधानः॥ ६<br>आक्रोशमानो नाक्रोशेन्मन्युमेव तितिक्षति।<br>आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति॥ ७<br>नारंतुदः स्यान्न नृशंसवादी<br>न हीनतः परमभ्याददीत।<br>ययास्य वाचा पर उद्विजेत<br>न तां वदेद् रुशतीं पापलौल्याम्॥ ८ | **ययातिने कहा—**देवराज! मैंने प्रजाओंकी अनुमतिसे पूरुको राज्याभिषिक्त करके उससे यह कहा था कि 'बेटा! गङ्गा और यमुनाके बीचका यह सारा प्रदेश तुम्हारे अधिकारमें रहेगा। यह पृथ्वीका मध्य भाग है, इसके तुम राजा होओगे और तुम्हारे भाई सीमान्त देशोंके अधिपति होंगे।' देवेन्द्र! (इसके बाद मैंने यह उपदेश दिया कि मनुष्यको चाहिये कि वह दीनता, शठता और क्रोध न करे। कुटिलता, मात्सर्य और वैर कहीं न करे। माता, पिता, विद्वान्, तपस्वी तथा क्षमाशील पुरुषका बुद्धिमान् मनुष्य कभी अपमान न करे। शक्तिशाली पुरुष सदा क्षमा करता है। शक्तिहीन मनुष्य सदा क्रोध करता है। दुष्ट मानव साधु पुरुषसे और दुर्बल अधिक बलवान्से द्वेष करता है। कुरूप मनुष्य रूपवान्से, निर्धन धनवान्से, अकर्मण्य कर्मनिष्ठसे और अधार्मिक धर्मात्मासे द्वेष करते हैं। इसी प्रकार गुणहीन मनुष्य गुणवान्से डाह रखता है। इन्द्र! यह कलिका लक्षण है।) क्रोध करनेवालोंसे वह पुरुष श्रेष्ठ है जो कभी क्रोध नहीं करता। इसी प्रकार असहनशीलसे सहनशील उत्तम है, मनुष्येतर प्राणियोंसे मनुष्य श्रेष्ठ है और मूर्खोंसे विद्वान् उत्तम है। यदि कोई किसीकी निन्दा करता या उसे गाली देता है तो वह भी बदलेमें निन्दा या गाली-गलौज न करे; क्योंकि जो गाली या निन्दा सह लेता है, उस पुरुषका आन्तरिक दुःख ही गाली देनेवाले या अपमान करनेवालेको जला डालता है। साथ ही उसके पुण्यको भी वह ले लेता है। क्रोधवश किसीके मर्म-स्थानमें |
| * अध्याय ३६ * | १३३ |
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| अरंतुदं पुरुषं तीव्रवाचं<br>वाक्कण्टकैर्विंतुदन्तं मनुष्यान्।<br>विद्यादलक्ष्मीकतमं जनानां<br>मुखे निबद्धं निर्ऋतिं वहन्तम्॥ ९<br><br>सद्भिः पुरस्तादभिपूजितः स्यात्<br>सद्भिस्तथा पृष्ठतो रक्षितः स्यात्।<br>सदासतामतिवादांस्तितिक्षेत्<br>सतां वृत्तं पालयन् साधुवृत्तः॥ १०<br><br>वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति<br>यैराहतः शोचति रात्र्यहानि।<br>परस्य वा मर्मसु ते पतन्ति<br>तान् पण्डितो नावसृजेत् परेषु॥ ११<br><br>नास्तीदृशं संवननं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।<br>यथा मैत्री च लोकेषु दानं च मधुरा च वाक्॥ १२<br><br>तस्मात् सान्त्वं सदा वाच्यं न वाच्यं परुषं क्वचित्।<br>पूज्यान् सम्पूजयेद् दद्यान्नाभिशापं कदाचन॥ १३ | चोट न पहुँचाये (ऐसा बर्ताव न करे, जिससे किसीको मार्मिक पीड़ा हो)। किसीके प्रति कठोर बात भी मुँहसे न निकाले, अनुचित उपायसे शत्रुको भी वशमें न करे। जो जीको जलानेवाली हो, जिससे दूसरेको उद्वेग होता हो ऐसी बात मुँहसे न बोले; क्योंकि पापीलोग ही ऐसी बातें बोला करते हैं। जो स्वभावका कठोर हो, दूसरोंके मर्ममें चोट पहुँचाता हो, तीखी बातें बोलता हो और कठोर वचनरूपी काँटोंसे दूसरे मनुष्यको पीड़ा देता हो, उसे अत्यन्त लक्ष्मीहीन (दरिद्र या अभागा) समझे। उसको देखना भी बुरा है; क्योंकि वह कड़वी बोलीके रूपमें अपने मुँहमें बँधी हुई एक पिशाचिनीको ढो रहा है। (अपना बर्ताव और व्यवहार ऐसा रखे, जिससे) साधु पुरुष सामने तो सत्कार करें ही, पीठ-पीछे भी उनके द्वारा अपनी रक्षा हो। दुष्ट लोगोंकी कही हुई अनुचित बातें सदा सह लेनी चाहिये तथा श्रेष्ठ पुरुषोंके सदाचारका आश्रय लेकर साधु पुरुषोंके व्यवहारको ही अपनाना चाहिये। दुष्ट मनुष्योंके मुखसे कटुवचनरूपी बाण सदा छूटते रहते हैं, जिनसे आहत होकर मनुष्य रात-दिन शोक और चिन्तामें डूबा रहता है। वे वाग्बाण दूसरोंके मर्मस्थानोंपर ही चोट करते हैं; अतः विद्वान् पुरुष दूसरेके प्रति ऐसी कठोर वाणीका प्रयोग न करे। सभी प्राणियोंके प्रति दया और मैत्रीका बर्ताव, दान और सबके प्रति मधुर वाणीका प्रयोग—तीनों लोकोंमें इनके समान कोई वशीकरण नहीं है। इसलिये कभी कठोर वचन न बोले। सदा सान्त्वनापूर्ण मधुर वचन ही बोले। पूजनीय पुरुषोंका पूजन (आदर-सत्कार) करे। दूसरोंको दान दे और स्वयं कभी किसीसे कुछ न माँगे॥ ५—१३॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते षट्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययाति-चरित्र-वर्णन नामक छत्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३६॥