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सर्वकोश
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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

२२०- राजधर्म एवं सामान्य नीतिका वर्णन

८७०* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यवसानां प्रभूतानामिन्धनस्य च संचयः।<br>गुडस्य सर्वतैलानां गोरसानां तथैव च॥ ३५<br>वसानामथ मज्जानां स्नायूनामस्थिभिः सह।<br>गोचर्मपटहानां च धान्यानां सर्वतस्तथा॥ ३६<br>तथैवाभ्रपटानां च यवगोधूमयोरपि।<br>रत्नानां सर्ववस्त्राणां लोहानामप्यशेषतः॥ ३७<br>कलायमुद्गमाषाणां चणकानां तिलैः सह।<br>तथा च सर्वसस्यानां पांसुगोमययोरपि॥ ३८<br>शणसर्ज्रसं भूर्ज जतु लाक्षा च टङ्कणम्।<br>राजा संचिनुयाद् दुर्गे यच्चान्यदपि किञ्चन॥ ३९<br>कुम्भाश्चाशीविषैः कार्या व्यालसिंहादयस्तथा।<br>मृगाश्च पक्षिणश्चैव रक्ष्यास्ते च परस्परम्॥ ४०<br>स्थानानि च विरुद्धानां सुगुप्तानि पृथक् पृथक्।<br>कर्तव्यानि महाभाग यत्नेन पृथिवीक्षिता॥ ४१<br>उक्तानि चाप्यनुक्तानि राजद्रव्याण्यशेषतः।<br>सुगुप्तानि पुरे कुर्याज्जनानां हितकाम्यया॥ ४२वहाँ प्रचुरमात्रामें घास-भूसा, ईंधन, गुड, सभी प्रकारके तेल तथा गोरसका भी संचय हो। राजाको दुर्गमें वसा, मज्जा, हड्डियोंसहित स्नायु, गोचर्मसे बने नगाड़े, धान्य, तम्बू, जौ, गेहूँ, रत्न, सभी प्रकारके वस्त्र, लौह, कुलथी, मूँग, उड़द, चना, तिल, सभी प्रकारके अन्न, धूल, गोबर, सन, भोजपत्र, जस्ता, लाह, पत्थर तोड़नेकी छेनी तथा अन्य भी जो कुछ पदार्थ हों, उनका संचय करना चाहिये। सर्पोंके विषसे भरे घड़े, साँप, सिंह आदि हिंसक जन्तु, मृग तथा पक्षी रखे जाने चाहिये, किंतु वे एक-दूसरेसे सुरक्षित रहें। महाभाग! राजाको विरोधी जीवोंकी रक्षाके लिये यत्नपूर्वक पृथक्-पृथक् स्थान बनवाना चाहिये। राजाको प्रजाकी कल्याण-भावनासे कही गयी अथवा न कही गयी सम्पूर्ण राजवस्तुओंको दुर्गमें गुप्तरूपसे संग्रहीत करना चाहिये॥२७—४२॥
जीवकर्षभकाकोलमामलक्याटरूषकम् ।<br>शालपर्णी पृश्निपर्णी मुद्गपर्णी तथैव च॥ ४३<br>माषपर्णी च मेदे द्वे शारिवे द्वे बलात्रयम्।<br>वीरा श्वसन्ती वृष्या च बृहती कण्टकारिका॥ ४४<br>शृङ्गी शृङ्गाटकी द्रोणी वर्षाभूर्दर्भ रेणुका।<br>मधुपर्णी विदार्यौ द्वे महाक्षीरा महातपाः॥ ४५<br>धन्वनः सहदेवाह्वा कटुकैरण्डकं विषः।<br>पर्णी शताह्वा मृद्वीका फल्गुखर्जूरयष्टिकाः॥ ४६<br>शुक्रातिशुक्रकाश्मर्यश्छत्रातिच्छत्रवीरणाः ।<br>इक्षुरिक्षुविकाराश्च फाणिताद्याश्च सत्तम॥ ४७<br>सिंही च सहदेवी च विश्वेदेवाश्वरोधकम्।<br>मधुकं पुष्पहंसाख्या शतपुष्पा मधूलिका॥ ४८<br>शतावरीमधूके च पिप्पलं तालमेव च।<br>आत्मगुप्ता कट्फलाख्या दार्विका राजशीर्षकी॥ ४९<br>राजसर्षपधान्याकमृष्यप्रोक्ता तथोत्कटा।<br>कालशाकं पद्मबीजं गोवल्ली मधुवल्लिका॥ ५०<br>शीतपाकी कुलिङ्गाक्षी काकजिह्वोरुपुष्पिका।<br>पर्वतत्रपुसौ चोभौ गुञ्जातकपुनर्नवे॥ ५१जीवक, ऋषभक, काकोल, इमली, आटरूष, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, मुद्गपर्णी, माषपर्णी, दोनों प्रकारकी मेदा, दोनों प्रकारकी शारिवा, तीनों बलाएँ (एक ओषधि), वीरा, श्वसन्ती, वृष्या, बृहती, कण्टकारिका, शृङ्गी, शृङ्गाटकी, द्रोणी, वर्षाभू, कुश, रेणुका, मधुपर्णी, दोनों विदारी, महाक्षीरा, महातपा, धन्वन, सहदेवी, कटुक, रेड़, विष, शतपर्णी, मृद्वीका, फल्गु, खजूर, यष्टिका, शुक्र, अतिशुक्र, काश्मरी, छत्र, अतिच्छत्र, वीरण, ईख और ईखसे होनेवाली अन्य वस्तुएँ, फाणित आदि, सिंही, सहदेवी, विश्वदेव, अश्वरोधक, महुआ, पुष्पहंसा, शतपुष्पा, मधूलिका, शतावरी, महुआ, (दाख) पिप्पल, ताल, आत्मगुप्ता, कटफल, दार्विका, राजशीर्षकी, श्वेत सरसों, धनिया, ऋष्यप्रोक्ता, उत्कटा, कालशाक, पद्मबीज, गोवल्ली, मधुवल्लिका, शीतपाकी, कुलिंगाक्षी, काकजिह्वा, उरुपुष्पका, दोनों पर्वत और त्रपुष, गुंजातक, पुनर्नवा,

* अध्याय २१७ * | ८७१

Sanskrit ShlokaHindi Meaning
कसेरुका तु काश्मीरी बिल्वशालूककेसरम्।<br>तुषधान्यानि सर्वाणि शमी धान्यानि चैव हि॥ ५२<br>क्षीरं क्षौद्रं तथा तक्रं तैलं मज्जा वसा घृतम्।<br>नीपश्चारिष्टकक्षोदवातामसोमबाणकम् ॥५३<br>एवमादीनि चान्यानि विज्ञेयो मधुरो गणः।<br>राजा संचिनुयात् सर्वं पुरे निरवशेषतः॥ ५४कसेरुका, काश्मीरी, बिल्व, शालूक, केसर, सभी प्रकारकी भूमियाँ, शमी, अन्न, दुग्ध, शहद, मट्ठा, तेल, मज्जा, वसा, घी, कदम्ब, अरिष्टक, अक्षोट, बादाम, सोम और बाणक—इन सबको तथा इसी प्रकार अन्य पदार्थोंको मधुर जानना चाहिये। राजा इन सबका पूर्णरूपसे दुर्गमें संग्रह करे॥ ४३-५४॥
दाडिमाम्रातकौ चैव तिन्तिडीकाम्लवेतसम्।<br>भव्यकर्कन्धुलकुचकरमर्दकरूषकम् ॥५५<br>बीजपूरककण्डूरे मालती राजबन्धुकम्।<br>कोलद्वयपर्णानि द्वयोराम्रातयोरपि॥ ५६<br>पारावतं नागरकं प्राचीनारुकमेव च।<br>कपित्थामलकं चुक्रफलं दन्तशठस्य च॥५७<br>जाम्बवं नवनीतं च सौवीरकरुषोदके।<br>सुरासवं च मद्यानि मण्डतक्रदधीनि च॥ ५८<br>शुक्लानि चैव सर्वाणि ज्ञेयामम्लगणं द्विज।<br>एवमादीनि चान्यानि राजा संचिनुयात् पुरे॥ ५९अनार, आम्रातक, इमली, अम्लवेतस, सुन्दर बेर, बड़हर, करमर्द, करूषक, बिजौरा, कण्डूर, मालती, राज-बन्धुक, दोनों कोलकों और अमड़ोंके पत्ते, पारावत, नागरक, प्राचीन अरुक, कैथ, आँवला, चुक्रफल, दन्तशठ, जामुन, मक्खन, सौवीरक, रुषोदक, सुरा, आसव आदि मद्य, माँड, मट्ठा, दही एवं ऐसे सभी प्रकारके श्वेत पदार्थोंको खट्टा समझना चाहिये। राजा इनका तथा ऐसे अन्यान्य पदार्थोंका अपने दुर्गमें संचय करे।
सैन्धवोद्भिदपाठेयपाक्यसामुद्रलोमकम् ।<br>कुप्यसौवर्चलाविल्वं बालकेयं यवाह्वकम्॥ ६०<br>औव क्षारं कालभस्म विज्ञेयो लवणो गणः।<br>एवमादीनि चान्यानि राजा संचिनुयात् पुरे॥ ६१सैन्धव, उद्भिद, पाठेय, पाक्य, सामुद्र (साँभर), लोमक, कुप्य, सौवर्चल, अविल्व, बालकेय, यव, भौम, क्षार, कालभस्म—ये सभी लवणके भेदोपभेद हैं। राजा इन सबका तथा अन्य लवणोंका दुर्गमें संग्रह करे।
पिप्पली पिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरम्।<br>कुबेरकं च मरिचं शिग्रुभल्लातसर्षपाः॥ ६२<br>कुष्ठाजमोदा किणिही हिङ्गुमूलकधान्यकम्।<br>कारवी कुञ्चिका याज्या सुमुखा कालमालिका॥ ६३<br>फणिज्झकोऽथ लशुनं भूस्तृणं सुरसं तथा।<br>कायस्था च वयःस्था च हरितालं मनःशिला॥ ६४<br>अमृता च रुदन्ती च रोहिषं कुङ्कुमं तथा।<br>जया एरण्डकाण्डीरं शल्लकी हिङ्गिका तथा॥ ६५<br>सर्वपित्तानि मूत्राणि प्रायो हरितकानि च।<br>संगतानि च मूलानि यष्टिश्चातिविषाणि च।<br>फलानि चैव हि तथा सूक्ष्मैला हिङ्गुपत्रिका॥ ६६<br>एवमादीनि चान्यानि गणः कटुकसंज्ञितः।<br>राजा संचिनुयाद् दुर्गे प्रयत्नेन नृपोत्तम ॥ ६७पीपर, पीपरका मूल, चव्य, शीता, साँठ, कुबेरक, मिर्च, सहजना, भिलावा, सरसों, कुठ, अजमोदा, ओंगा, हींग, मूली, धनियाँ, सौंफ, अजवाइन, मंजीठ, जवीर, कलमालिका, फणिज्जक, लहसुन, पालाके आकारवाला जलीय तृण, हरड़, कायस्था, वयःस्था, हरताल, मैनसिल, गिलोय, रुदंती, रोहिष, केशर, जया, रेड़ी, नरकट, शल्लकी, भारंगी, सभी प्रकारके पित्त और मूत्र, हर्रै, आवश्यक मूल, मुलहठी, अतिविष, छोटी इलायची, तेजपात आदि कटु ओषधियाँ हैं। राजश्रेष्ठ! राजा दुर्गमें प्रयत्नपूर्वक इनका संग्रह करे।
८७२* मत्स्यपुराण *

| मुस्तं चन्दनह्रीबेरकृतमालकदारवः।<br>हरिद्रानलदोशीरनक्तमालकदम्बकम् ॥ ६८<br>दूर्वा पटोलकटुका दन्तीत्वक् पत्रकं वचा।<br>किराततिक्तभूतुम्बी विषा चातिविषा तथा॥ ६९<br>तालीसपत्रतगरं सप्तपर्णविकङ्कताः।<br>काकोदुम्बरिका दिव्यास्तथा चैव सुरोद्भवा॥ ७०<br>षड्ग्रन्था रोहिणी मांसी पर्पटश्चाथ दन्तिका।<br>रसाञ्जनं भृङ्गराजं पतङ्गी परिपेलवम् ॥ ७१<br>दुःस्पर्शा गुरुणी कामा श्यामाकं गन्धनाकुली।<br>रूपपर्णी व्याघ्रनखं मञ्जिष्ठा चतुरङ्गुला॥ ७२<br>रम्भा चैवाङ्कुरास्फीता तालास्फीता हरेणुका।<br>वेत्राग्रवेतसस्तुम्बी विषाणी लोध्रपुष्पिणी ॥ ७३<br>मालती करकृष्णाख्या वृश्चिका जीविता तथा।<br>पर्णिका च गुडूची च स गणस्तिक्तसंज्ञकः ॥ ७४<br>एवमादीनि चान्यानि राजा संचिनुयात् पुरे।<br>अभयाममलके चोभे तथैव च बिभीतकम् ॥ ७५<br>प्रियङ्गुधातकीपुष्पं मोचाख्या चार्जुनासनाः।<br>अनन्ता स्त्री तुवरिका श्योणाकं कट्फलं तथा॥ ७६<br>भूर्जपत्रं शिलापत्रं पाटलापत्रलोमकम्।<br>समङ्गात्रिवृतामूलकार्पासगैरिकाञ्जनम् ॥ ७७<br>विद्रुमं समधूच्छिष्टं कुम्भिका कुमुदोत्पलम्।<br>न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थकिंशुकाः शिंशपा शमी॥ ७८<br>प्रियालपीलुकासारिशिरीषाः पद्मकं तथा।<br>बिल्वोऽग्निमन्थः प्लक्षश्च श्यामाकं च बको धनम् ॥ ७९<br>राजादनं करीरं च धान्यकं प्रियकस्तथा।<br>कङ्कोलाशोकबदराः कदम्बखदिरद्वयम्॥ ८०<br>एषां पत्राणि साराणि मूलानि कुसुमानि च।<br>एवमादीनि चान्यानि कषायाख्यो गणो मतः ॥ ८१<br>प्रयत्नेन नृपश्रेष्ठ राजा संचिनुयात् पुरे।<br>कीटाश्च मारणे योग्या व्यङ्गतायां तथैव च॥ ८२<br>वातधूमाम्बुमार्गाणां दूषणानि तथैव च।<br>धार्याणि पार्थिवैर्दुर्गे तानि वक्ष्यामि पार्थिव ॥ ८३ | नागरमोथा, चन्दन, हीबेर, कृतहारक, दारुहल्दी, हल्दी, नलद, खश, नक्तमाल, कदम्ब, दूर्वा, परवल, तेजपात, वच, चिरायता, भूतुम्बी, विषा, अतिविषा, तालीसपत्र, तगर, छितवन, खैर, काली गूलर, दिव्या, सुरोद्भवा, षड्ग्रन्थी, रोहिणी, जटामासी, पर्पट, दन्ती, रसांजन, भृंगराज, पतंगी, परिपेलव, दुःस्पर्शा, अगुरुद्रव्य, कामा, श्यामाक, गंधनाकुली, तुषपर्णी, व्याघ्रनख, मंजीठ, चतुरंगुला, केला, अंकुरास्फीता, तालास्फीता, रेणुकबीज, बेतका अग्रभाग, बेत, तुम्बी, केंकरासींगी, लोध्रपुष्पिणी, मालती, करकृष्णा, वृश्चिका, जीविता, पर्णिका तथा गुडूच—यह तिक्त औषधियोंका समूह है। राजा इनका तथा इसी प्रकारके अन्य तिक्त पदार्थोंका दुर्गमें संग्रह रखे॥ ५५—७४ १/२ ॥<br><br>हर्रें, बहेड़ा, आँवला, मालकागुन, धायके फूल, मोचरस, अर्जुन, असन, अनन्ता, कामिनी, तुबरिका, श्योणाक, जायफल, भोजपत्र, शिलाजीत, पाटलवृक्ष, लोहबान, समंगा, त्रिवृता, मूल, कपास, गेरु, अंजन, विद्रुम, शहद, जलकुम्भी, कुमुदिनी, कमल, बरगद, गूलर, पीपल, पालाश, शीशम, शमी, प्रियाल, पीलु, कासारि, शिरीष, पद्म, बेल, अरणी, पाकड़, श्यामाक, बक, धन, राजादन, करीर, धनिया, प्रियक, कंकोल, अशोक, बेर, कदंब, दोनों प्रकारके खैर—इन वृक्षोंके पत्ते, सारभाग (सत्त्व), मूल तथा पुष्प काषाय माने गये हैं। राजश्रेष्ठ! राजाको ये काषाय ओषधियाँ दुर्गमें रखनी चाहिये। राजन्! मारने एवं घायल करनेवाले कीट-पतंग तथा वायु, धूम, जल तथा मार्गको दूषित करनेवाली ओषधियोंको, जिन्हें मैं आगे बतलाऊँगा, राजाको दुर्गमें रखनी चाहिये। |

  • अध्याय २१८ * | ८७३
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विषणं धारणं कार्यं प्रयत्नेन महीभुजा।<br>विचित्राश्चागदा धार्या विषस्य शमनास्तथा॥ ८४<br>रक्षोभूतपिशाचघ्नाः पापघ्नाः पुष्टिवर्धनाः।<br>कलाविदश्च पुरुषाः पुरे धार्याः प्रयत्नतः॥ ८५<br>भीतान् प्रमत्तान् कुपितांस्तथैव च विमानितान्।<br>कुभृत्यान् पापशीलांश्च न राजा वासयेत् पुरे॥ ८६<br>यन्त्रायुधाट्टालचयोपपन्नं<br>समग्रधान्यौषधिसम्प्रयुक्तम् ।<br>वणिग्जनैश्चावृतमावसेत<br>दुर्गं सुपुष्टं नृपतिः सदैव॥ ८७राजाको प्रयत्नपूर्वक सभी विषोंका संग्रह करना चाहिये तथा विष-प्रभावको शान्त करनेवाली विचित्र ओषधियोंको भी धारण करना उचित है। राक्षस, भूत तथा पिशाचोंके प्रभावको नष्ट करनेवाले, पापनाशक, पुष्टिकारक पदार्थों तथा कलाविज्ञ पुरुषोंको भी दुर्गमें प्रयत्नपूर्वक स्थापित करना चाहिये। राजाको चाहिये कि उस दुर्गमें डरकर भागे हुए, उन्मत्त, क्रुद्ध, अपमानित तथा पापी दुष्ट अनुचरोंको न ठहरने दे। सभी प्रकारके यन्त्र, अस्त्र तथा अट्टालिकाओंके समूहसे संयुक्त, सभी प्रकारके अन्न तथा ओषधियोंसे सुसम्पन्न और व्यवसायी जनोंसे परिपूर्ण दुर्गमें राजाको सदैव सुखपूर्वक निवास करना चाहिये॥ ७५—८७॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे राजधर्मे दुर्गनिर्माणौषध्यादिसंचयकथनं नाम सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें राजाओंके लिये दुर्गनिर्माण और ओषधि आदिके संचयका वर्णन नामक दो सौ सतरहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१७॥


दो सौ अठारहवाँ अध्याय

दुर्गमें संग्राह्य ओषधियोंका वर्णन

मनुरुवाच<br>रक्षोघ्नानि विषघ्नानि यानि धार्याणि भूभुजा।<br>अगदानि समाचक्ष्व तानि धर्मभृतां वर॥ १<br><br>मत्स्य उवाच<br>बिल्वाटकी यवक्षारं पाटला बाहिकोष्णा।<br>श्रीपर्णी शल्लकीयूक्तो निष्क्वाथः प्रोक्षणं परम्॥ २<br>सविषं प्रोक्षितं तेन सद्यो भवति निर्विषम्।<br>यवसैन्धवपानीयवस्त्रशय्यासनोदकम् ॥ ३<br>कवचाभरणं छत्रं वालव्यजनवेश्मनाम्।<br>शेलुः पाटलातिविषा शिग्रु मूर्वा पुनर्नवा॥ ४<br>समङ्गा वृषमूलं च कपित्थवृषशोषितम्।<br>महादन्तशठं तद्वत् प्रोक्षणं विषनाशनम्॥ ५<br>लाक्षाप्रियङ्गुमञ्जिष्ठा सममेला हरेणुका।<br>यष्ट्याह्वा मधुरा चैव बभ्रुपित्तेन कल्पिताः॥ ६<br>निखनेद् गोविषाणस्थं समरात्रं महीतले।<br>ततः कृत्वा मणिं हेम्ना बद्धं हस्तेन धारयेत्॥ ७मनुने पूछा— धार्मिकश्रेष्ठ! राजाको राक्षस, विष और रोगको दूरकर स्वस्थ करनेवाली जिन ओषधियोंका दुर्गमें संग्रह करना चाहिये, उनका वर्णन कीजिये॥ १॥<br><br>मत्स्यभगवान्ने कहा— बिल्वाटकी, जवाखार, पाटला, बाहिक, ऊषणा, श्रीपर्णी और शल्लकी—इन ओषधियोंका काढ़ा उत्तम प्रोक्षण है। विषग्रस्त प्राणीद्वारा उसका सेवन करनेसे वह तुरंत ही विषरहित हो जाता है। उसी प्रकार इनके द्वारा सेवन करनेसे यव, सैन्धव, पानीय, वस्त्र, शय्या, आसन, जल, कवच, आभरण, छत्र, चामर और गृह आदि विषरहित हो जाते हैं। शेलु, पाटली, अतिविषा, शिग्रु, मूर्वा, पुनर्नवा, समंगा, वृषमूल, कपित्थ, वृषशोषित तथा महादन्तशठ—इन ओषधियोंके काढ़ेका सेवन भी उसी प्रकार विषनाशक होता है। लाह, प्रियंगु, मंजीठ, समान भागमें इलायची, हर्रे, जेठीमधु और मधुरा—इन्हें नकुल-पित्तसे संयुक्त करके गायके सींगमें रखकर सात राततक पृथ्वीमें गाड़ दे। इसके बाद उसे सुवर्णजटित मणिकी अंगूठीमें रखकर हाथमें धारण कर