About this granth
The Matsya Mahapurana (मत्स्य महापुराण) is one of the eighteen major Puranas, named after Vishnu's fish incarnation. In the traditional frame, the divine Fish narrates it to King Vaivasvata Manu and the seven sages during the great deluge; authorship is ascribed to Maharshi Veda Vyasa.
This is the illustrated Gita Press, Gorakhpur edition with a Hindi translation alongside the Sanskrit, running to about 1,098 pages; the imprint records the fourteenth reprint of Samvat 2076. Its chapters cover creation and the manvantaras, the lineage of Kashyapa, the life of King Prithu and the milking of the earth, the solar and lunar dynasties with the story of Ila, the lineages of the Pitris and the 108 names of the Goddess, and the well-known episode of Yayati, Devayani and Puru.
The Matsya Purana is especially valued for its detailed rules on shraddha (ordinary, ekoddishta and sapindikarana rites, proper times and tirthas), and also treats vows, gifts, pilgrimage and image-making, which makes it a frequent source for students of dharmashastra, history and Indian art.
| * अध्याय २५१ * | ९६९ |
|---|---|
| अथास्त्राणि च मुख्यानि महाप्रहरणानि च।<br>प्रगृह्याभ्यद्रवन् देवान् सहिता दैत्यदानवाः॥ ९<br><br>ततस्तदमृतं देवो विष्णुरादाय वीर्यवान्।<br>जहार दानवेन्द्रेभ्यो नरेण सहितः प्रभुः॥ १० | दैत्यों और दानवोंका मन उसपर मोहित हो गया था। तदनन्तर वे सभी दैत्य-दानव संगठित होकर मुख्य-मुख्य महान् शस्त्रास्त्रोंको लेकर देवताओंपर टूट पड़े। इस समय नरके साथ-साथ पराक्रमी एवं सामर्थ्यशाली भगवान् विष्णुने उस अमृतको दानवेन्द्रोंसे छीन लिया॥ ९-१०॥ |
| ततो देवगणाः सर्वे पपुस्तदमृतं तदा।<br>विष्णोः सकाशात् सम्प्राप्य संग्रामे तुमुले सति॥ ११ | तदनन्तर सभी देवता उस तुमुल युद्धके बीच ही विष्णु भगवान्से उस अमृतको लेकर पान करने लगे। |
| ततः पिबत्सु तत्कालं देवेष्वमृतमीप्सितम्।<br>राहुर्विबुधरूपेण दानवोऽप्यपिबत् तदा॥ १२ | उस अभिलषित अमृतको पीते समय देवताओंके मध्यमें देवरूपधारी राहु नामक दानव भी अमृतका पान करने लगा। |
| तस्य कण्ठमनुप्राप्ते दानवस्यामृते तदा।<br>आख्यातं चन्द्रसूर्याभ्यां सुराणां हितकाम्यया॥ १३ | वह अमृत उसके कण्ठदेशतक ही पहुँच पाया था कि देवताओंकी कल्याण-भावनासे प्रेरित होकर चन्द्रमा और सूर्यने उसके भेदको प्रकट कर दिया। |
| ततो भगवता तस्य शिरश्छिन्नमलंकृतम्।<br>चक्रायुधेन चक्रेण पिबतोऽमृतमोजसा॥ १४ | तब अमृत पीते हुए उस दानवके अलंकृत सिरको भगवान्ने अपने पराक्रमसे चक्रद्वारा काट दिया। |
| तच्छैलशृङ्गप्रतिमं दानवस्य शिरो महत्।<br>चक्रेणोत्कृत्तमपतच्चालयद् वसुधातलम्॥ १५ | फिर तो उस दानवका चक्रसे कटा हुआ पर्वतशिखरकी भाँति विशाल मस्तक वसुधातलको कँपाता हुआ भूतलपर गिर पड़ा। |
| ततो वैरविनिर्बन्धः कृतो राहुमुखेन वै।<br>शाश्वतश्चन्द्रसूर्याभ्यां प्रसह्माद्यापि बाधते॥ १६ | तभीसे राहुके उस मुखने चन्द्रमा और सूर्यके साथ अटूट वैर निश्चित कर दिया, जो आज भी उन्हें पीड़ा पहुँचाता है। |
| विहाय भगवांश्चापि स्त्रीरूपमतुलं हरिः।<br>नानाप्रहरणैर्भीमैर्दानवान् समकम्पयत्।<br>प्रासाः सुविपुलास्तीक्ष्णाः पतन्तश्च सहस्रशः॥ १७ | तत्पश्चात् विष्णु भी उस अनुपम स्त्रीरूपको त्यागकर विविध प्रकारके भयंकर शस्त्रास्त्रोंद्वारा दानवोंको प्रकम्पित करने लगे। उस समय विशाल और तीखी धारवाले हजारों भाले दानवोंपर गिरने लगे। |
| तेऽसुराश्चक्रनिर्भिन्ना वमन्तो रुधिरं बहु।<br>अशिशक्तिगदाभिन्ना निपेतुर्धरणीतले॥ १८ | भगवान्के चक्रसे छिन्न-भिन्न अङ्गोंवाले राक्षसगण अत्यधिक रक्त वमन करते हुए तलवार और गदाके प्रहारसे घायल होकर पृथ्वीतलपर गिरने लगे। |
| भिन्नानि पट्टिशैश्चापि शिरांसि युधि दारुणैः।<br>तप्तकाञ्चनमाल्यानि निपेतुर्निशं तदा॥ १९ | उस समय उस युद्धमें तपाये हुए स्वर्णकी मालाओंसे सुशोभित असुरोंके सिर भीषण पट्टिशोंके प्रहारसे विदीर्ण होकर निरन्तर गिर रहे थे। |
| रुधिरेणावलिप्ताङ्गा निहताश्च महासुराः।<br>अद्रिणामिव कूटानि धातुरक्तानि शेरते॥ २० | वहाँ रक्तसे लथपथ हुए अङ्गोंवाले मारे गये महान् असुर गेरूसे रँगे हुए पर्वतोंके शिखरोंकी भाँति सो रहे थे। |
| ततो हलहलाशब्दः सम्बभूव समन्ततः।<br>अन्योन्यं छिन्दतां शस्त्रैरादित्ये लोहितायति॥ २१ | तदनन्तर सूर्यके लाल हो जानेपर परस्पर एक-दूसरेको शस्त्रोंद्वारा काटनेवालोंका महान् कोलाहल चारों ओर गूँज उठा। |
| परिघैश्चायसैः पातैः सन्निकर्षैश्च मुष्टिभिः।<br>निघ्नतां समरेऽन्योन्यं शब्दो दिवमिवास्पृशत्॥ २२ | उस समरमें लोहनिर्मित परिघों और मुष्टियोंके प्रहारसे एक-दूसरेको मारनेवालोंका शब्द आकाश-मण्डलका स्पर्श-सा कर रहा था। |
| छिन्धि भिन्धि प्रधावेति पातयाभिसरेति वै।<br>विश्रूयन्ते महाघोराः शब्दास्तत्र समन्ततः॥ २३ | उस समय वहाँ चारों ओर 'काट डालो, विदीर्ण कर दो, दौड़ो, गिरा दो, आगे बढ़ो'— इस प्रकारके महान् भयंकर शब्द सुनायी पड़ रहे थे। |
९७० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एवं सुतुमुले युद्धे वर्तमाने महाभये।<br>नरनारायणौ देवौ समाजग्मतुराहवम्॥ २४<br>तत्र दिव्यं धनुर्दृष्ट्वा नरस्य भगवानपि।<br>चिन्तयामास वै चक्रं विष्णुर्दानवसूदनः॥ २५ | इस प्रकार महान् भयंकारक घमासान युद्धके चलते समय भगवान् नर-नारायण युद्धस्थलमें उपस्थित हुए। वहाँ नरके दिव्य धनुषको देखकर दैत्यसूदन भगवान् नारायणने भी अपने सुदर्शन चक्रका स्मरण किया॥ १९–२५॥ |
| ततोऽम्बराच्चिन्तितमात्रमागतं<br>महाप्रभं चक्रममित्रनाशनम्।<br>विभावसोस्तुल्यमकुण्ठमण्डलं<br>सुदर्शनं भीममसह्यविक्रमम् ॥ २६ | तदनन्तर स्मरण करते ही वह असह्य प्रभावशाली, अत्यन्त कान्तिमान्, शत्रुनाशक, सूर्यके समान तेजस्वी, विस्तृत मण्डलोंवाला भयंकर सुदर्शन चक्र आकाशमार्गसे नीचे उतरा। |
| तदागतं ज्वलितहुताशनप्रभं<br>भयंकरः करिकरबाहुरच्युतः।<br>महाप्रभं दनुकुलदैत्यदारणं<br>तथोज्ज्वलज्ज्वलनसमानविग्रहम् ॥ २७ | तब हाथीकी शुण्डके समान बाहुवाले उग्र वेगशाली भगवान् विष्णुने प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी दानवकुलसंहारक धधकती हुई अग्निके सदृश शरीरवाले परम कान्तिशाली भयंकर चक्रको आया हुआ देखकर उसे दैत्यसेनापर चला दिया। फिर तो रिपुके |
| मुमोच वै तदतुलमुग्रवेगवान्<br>महाप्रभं रिपुनगरावदारणम्।<br>संवर्तकज्वलनसमानवर्चसं<br>पुनःपुनर्न्यपतत वेगवत् तदा॥ २८ | नगरोंका विध्वंस करनेवाला, संवर्तक नामक प्रलयाग्निके समान तेजस्वी, अनुपम कान्तिमान् वह सुदर्शन चक्र बारंबार वेगपूर्वक शत्रुओंपर प्रहार करने लगा। |
| व्यदारयद् दितितनयान् सहस्रशः<br>करेरितं पुरुषवरेण संयुगे।<br>दहत् क्वचिज्ज्वलन इवानिलेरितः<br>प्रसह्य तानसुरगणानकृन्तत ॥ २९ | युद्धभूमिमें पुरुषोत्तमके हाथसे छोड़े गये उस चक्रने हजारों दैत्योंको विदीर्ण कर दिया। उसने वायुसे प्रेरित अग्निकी भाँति कहीं सेनाओंको भस्म कर दिया तो कहीं उन असुरोंको बलपूर्वक काट डाला। |
| तत्प्रेरितं वियति मुहुः क्षितौ तदा<br>पपौ रणे रुधिरमथो पिशाचवत्।<br>अथासुरा गिरिभिरदीनमानसा<br>मुहुर्मुहुः सुरगणममर्दयंस्तदा ॥ ३० | रणभूमिमें भगवान्के हाथसे प्रेरित वह सुदर्शन चक्र बारंबार आकाशमें तथा पृथ्वीतलपर पिशाचके समान रक्तपान करने लगा। इसके बाद निर्भय चित्तवाले असुर पर्वतोंद्वारा बारंबार देवताओंकी सेनाको नष्ट करने लगे। |
| महाबला विगलितमेघवर्चसः<br>सहस्रशो गगनमहाप्रपातिनः।<br>अथासुरा भयजननाः प्रपेदिरे<br>सपादपा बहुविधमेघरूपिणः ॥ ३१ | हजारों महाबलवान् असुर जलरहित मेघोंके समान आकाशमण्डलसे नीचे गिर रहे थे, जिससे वे अतिशय भयंकर हो गये थे। उनके द्वारा फेंके गये वृक्ष मेघोंके समान दिखायी पड़ते थे। |
| महाद्रयः प्रविगलिताग्रसानवः<br>परस्परं द्रुतमभिपत्य सस्वराः।<br>ततो मही प्रचलितसाद्रिकानना<br>तदाद्रिपाताभिहता समन्ततः ॥ ३२ | विशाल पर्वत, जिनकी चोटियाँ छिन्न-भिन्न हो गयी थीं, शब्द करते हुए एक-दूसरेसे टकरा रहे थे। उन पर्वतोंके गिरनेसे अभिहत हुई पर्वत-वनोंसहित सारी पृथ्वी कम्पायमान हो गयी। |
| परस्परं समभिनिगर्जतां मुहू<br>रणाजिरे भृशमभिसम्प्रवर्तिते।<br>नरस्ततो वरकनकाग्रभूषणै-<br>र्महेषुभिः पवनपथं समावृणोत्॥ ३३ | इस प्रकार जब युद्धस्थलमें एक-दूसरेपर भीषण गर्जन करते हुए बारंबार घात-प्रतिघात होने लगा और दानवोंने देव-सेनाओंको आतंकित कर दिया, तब नरने सुन्दर सुवर्णजटित अग्रभागवाले अपने विशाल बाणोंसे वायुमार्गको अवरुद्ध |
- अध्याय २५२ * | ९७१
| विदारयन् गिरिशिखराणि पत्रिभि- <br> र्महाभये सुरगणविग्रहे तदा । <br> ततो महीं लवणजलं च सागरं <br> महासुराः प्रविविशुरर्दिताः सुरैः ॥ ३४ <br> वियद्गतं ज्वलितहुताशनप्रभं <br> सुदर्शनं परिकुपितं निशम्य च । <br> ततः सुरैर्विजयमवाप्य मन्दरः <br> स्वमेव देशं गमितः सुपूजितः ॥ ३५ <br> वितत्य खं दिवमथ चैव सर्वश- <br> स्ततो गताः सलिलधरा यथागतम् । <br> ततोऽमृतं सुनिहितमेव चक्रिरे <br> सुराः परां मुदमभिगम्य पुष्कलाम् । <br> ददुश्च तं निधिममृतस्य रक्षितं <br> किरीटिने बलिभिरथामरैः सह ॥ ३६ | कर दिया और बाणोंके प्रहारसे पर्वत-शिखरोंको विदीर्ण कर दिया। इस प्रकार देवताओंद्वारा ताड़ित किये गये बड़े-बड़े असुर योद्धा पाताल एवं खारे समुद्रमें प्रविष्ट हो गये। जलती हुई अग्निके समान कान्तिमान् एवं अतिशय कोपमें भरे हुए सुदर्शन चक्रको आकाशमें गया हुआ सुनकर देवगण विजयी हुए। तदनन्तर मन्दराचलको आदरपूर्वक अपने स्थानपर स्थापित कर दिया गया और सभी दिशाओं तथा आकाशमें फैले हुए बादसमूह भी जैसे आये थे वैसे ही चले गये। तत्पश्चात् देवगण परम हर्षपूर्वक अमृतको सुरक्षित कर लिये और उसकी संचित निको बलवान् देवताओंके साथ किरीटधारी भगवान्को सुरक्षाके लिये सौंप दिया गया ॥ २६-३६ ॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽमृतमन्थनं नामैकपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५१ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अमृतमन्थन नामक दो सौ इक्यावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २५१ ॥
दो सौ बावनवाँ अध्याय
वास्तुके प्रादुर्भावकी कथा
| ऋषय ऊचुः <br> प्रासादभवनादीनां निवेशं विस्तराद् वद। <br> कुर्यात् केन विधानेन कश्च वस्तुरुदाहृतः ॥ १ | ऋषियोंने पूछा— सूतजी! अब आप हमलोगोंको राजभवन आदिके संनिवेशकी और उनके बनाये जानेकी विधि विस्तारपूर्वक बतलाइये। साथ ही वास्तु क्या कहलाता है, इसपर भी प्रकाश डालिये ॥ १ ॥ |
| सूत उवाच <br> भृगुरत्रिर्वसिष्ठश्च विश्वकर्मा मयस्तथा। <br> नारदो नग्नजिच्चैव विशालाक्षः पुरंदरः ॥ २ <br> ब्रह्मा कुमारो नन्दीशः शौनको गर्ग एव च। <br> वासुदेवोऽनिरुद्धश्च तथा शुक्रबृहस्पती ॥ ३ <br> अष्टादशैते विख्याता वास्तुशास्त्रोपदेशकाः। <br> संक्षेपेणोपदिष्टं यन्मनवे मत्स्यरूपिणा ॥ ४ | सूतजी कहते हैं— ऋषियो! भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वकर्मा, मय, नारद, नग्नजित्, भगवान् शंकर, इन्द्र, ब्रह्मा, कुमार, नन्दीश्वर, शौनक, गर्ग, वासुदेव, अनिरुद्ध, शुक्र तथा बृहस्पति—ये अठारह वास्तुशास्त्रके* उपदेष्टा माने गये हैं। जिसे मत्स्यरूपधारी भगवान्ने संक्षेपमें मनुके प्रति उपदेश किया था, |
* वास्तुके अर्थ बसनेकी जगह, घर, गाँव, नींव आदि हैं। इसपर समराङ्गणसूत्रधार, वास्तुराजवल्लभ, वृहत्संहिता, शिल्परत्न, गृहरत्नभूषण आदि ग्रन्थोंमें पूर्ण विचार है। पुराणोंमें अग्नि, विष्णुधर्म आदिमें ऐसी ही चर्चा है। इस विद्याका संक्षिप्त उल्लेख ऋग्वेद, शतपथ ब्राह्मण, श्रौतसूत्रों एवं मनु० ३।८९ आदिमें भी है। इसके मुख्य प्रवर्तक एवं ज्ञाता-कर्ता विश्वकर्मा एवं मयदानव हैं।
| ९७२ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| तदिदानीं प्रवक्ष्यामि वास्तुशास्त्रमनुत्तमम्।<br>पुरान्धकवधे घोरे घोररूपस्य शूलिनः॥ ५<br>ललाटस्वेदसलिलमपतद् भुवि भीषणम्।<br>करालवदनं तस्माद् भूतमुद्भूतमुल्यणम्॥ ६<br>ग्रसमानमिवाकाशं सप्तद्वीपां वसुंधराम्।<br>ततोऽन्धकानां रुधिरमपिबत् पतितं क्षितौ॥ ७<br>तेन तत् समरे सर्वं पतितं यन्महीतले।<br>तथापि तृप्तिमगमन्न तद् भूतं यदा तदा॥ ८<br>सदाशिवस्य पुरतस्तपश्चक्रे सुदारुणम्।<br>क्षुधाविष्टं तु तद् भूतमाहर्तुं जगतीतत्रयम्॥ ९<br>ततः कालेन संतुष्टो भैरवस्तस्य चाह वै।<br>वरं वृणीष्व भद्रं ते यदभीष्टं तवानघ॥ १० | उसी श्रेष्ठ वास्तुशास्त्रको मैं आपलोगोंसे बतला रहा हूँ। प्राचीन कालमें भयंकर अन्धक-वधके समय विकराल रूपधारी भगवान् शंकरके ललाटसे पृथ्वीपर स्वेदबिन्दु गिरे थे। उससे एक भीषण एवं विकराल मुखवाला उत्कट प्राणी उत्पन्न हुआ। वह ऐसा प्रतीत होता था मानो सातों द्वीपोंसहित वसुंधरा तथा आकाशको निगल जायगा। तत्पश्चात् वह पृथ्वीपर गिरे हुए अन्धकोंके रक्तका पान करने लगा। इस प्रकार वह उस युद्धमें पृथ्वीपर गिरे हुए सारे रक्तको पान कर गया। किंतु इतनेपर भी जब वह तृप्त न हुआ, तब भगवान् सदाशिवके सम्मुख अत्यन्त घोर तपस्यामें संलग्न हो गया। भूखसे व्याकुल होनेपर जब वह पुनः त्रिलोकीको भक्षण करनेके लिये उद्यत हुआ, तब उसकी तपस्यासे संतुष्ट होकर भगवान् शंकर उससे बोले—'निष्पाप! तुम्हारा कल्याण हो, अब तुम्हारी जो अभिलाषा हो, वह वर माँग लो'॥ २—१०॥ |
| तमुवाच ततो भूतं त्रैलोक्यग्रसनक्षमम्।<br>भवामि देवदेवेश तथेत्युक्तं च शूलिना॥ ११ | तब उस प्राणीने शिवजीसे कहा—'देवदेवेश! मैं तीनों लोकोंको ग्रस लेनेके लिये समर्थ होना चाहता हूँ।' इसपर त्रिशूलधारी शिवजीने कहा—'ऐसा ही होगा'। |
| ततस्तत् त्रिदिवं सर्वं भूमण्डलमशेषतः।<br>स्वदेहेनान्तरिक्षं च रुन्धानं प्रपतद् भुवि॥ १२ | फिर तो वह प्राणी अपने विशाल शरीरसे स्वर्ग, सम्पूर्ण भूमण्डल और आकाशको अवरुद्ध करता हुआ पृथ्वीपर आ गिरा। |
| भीतभीतैस्ततो देवैर्ब्रह्माणा चाथ शूलिना।<br>दानवासुररक्षोभिरवष्टब्धं समन्ततः॥ १३<br>येन यत्रैव चाक्रान्तं स तत्रैवावसत् पुनः।<br>निवासात् सर्वदेवानां वास्तुरीत्यभिधीयते॥ १४ | तब भयभीत हुए देवताओं तथा ब्रह्मा, शिव, दानव, दैत्य और राक्षसोंद्वारा वह स्तम्भित कर दिया गया। उस समय जिसने उसे जहाँपर आक्रान्त कर रखा था, वह वहीं निवास करने लगा। इस प्रकार सभी देवताओंके निवास करनेके कारण वह वास्तु नामसे विख्यात हुआ। |
| अवष्टब्धेन तेनापि विज्ञप्ताः सर्वदेवताः।<br>प्रसीदध्वं सुराः सर्वे युष्माभिर्निश्चलीकृतः॥ १५<br>स्थास्याम्यहं किमाकारो ह्यवष्टब्धो ह्यधोमुखः।<br>ततो ब्रह्मादिभिः प्रोक्तं वास्तुमध्ये तु यो बलिः॥ १६ | तब उस दबे हुए प्राणीने भी सभी देवताओंसे निवेदन किया—'देवगण! आपलोग मुझपर प्रसन्न हों। आपलोगोंद्वारा मैं दबाकर निश्चल बना दिया गया हूँ। भला इस प्रकार अवरुद्ध कर दिये जानेपर नीचे मुख किये हुए मैं किस तरह कबतक स्थित रह सकूँगा।' उसके ऐसा निवेदन करनेपर ब्रह्मा आदि देवताओंने कहा— |
| आहारो वैश्वदेवान्ते नूनमस्य भविष्यति।<br>वास्तूपशमनो यज्ञस्तवाहारो भविष्यति॥ १७ | 'वास्तुके प्रसङ्गमें तथा वैश्वदेवके अन्तमें जो बलि दी जायगी, वह निश्चय ही तुम्हारा आहार होगी। वास्तु-शान्तिके लिये जो यज्ञ होगा, वह भी तुम्हें आहारके रूपमें प्राप्त होगा। |
| यज्ञोत्सवादौ च बलिस्तवाहारो भविष्यति।<br>वास्तूपूजामकुर्वाणस्तवाहारो भविष्यति॥ १८ | यज्ञोत्सवमें दी गयी बलि भी तुम्हें आहाररूपमें प्राप्त होगी। वास्तु-पूजा न करनेवाले भी तुम्हारे आहार होंगे। |
* अध्याय २५३ * । ९७३
| अज्ञानात् तु कृतो यज्ञस्तवाहारो भविष्यति।<br>एवमुक्तस्ततो हृष्टः स वास्तुर्भवत् तदा।<br>वास्तुयज्ञः स्मृतस्तस्मात् ततः प्रभृति शान्तये ॥ १९ | अज्ञानसे किया गया यज्ञ भी तुम्हें आहाररूपमें प्राप्त होगा।' ऐसा कहे जानेपर वह वास्तु नामक प्राणी प्रसन्न हो गया। इसी कारण तबसे शान्तिके लिये वास्तु-यज्ञका प्रवर्तन हुआ॥ १९—१९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वास्तुभूतोद्भवो नाम द्विपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २५२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वास्तु-प्रादुर्भाव नामक दो सौ बावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २५२॥
दो सौ तिरपनवाँ अध्याय
वास्तु-चक्रका वर्णन
| सूत उवाच | |
|---|---|
| अथातः सम्प्रवक्ष्यामि गृहकालविनिर्णयम्।<br>यथा कालं शुभं ज्ञात्वा सदा भवनमारभेत्॥ १ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! अब मैं गृहनिर्माणके उस समयका निर्णय बतला रहा हूँ, जिस शुभ समयको जानकर मनुष्यको सर्वदा भवनका आरम्भ करना चाहिये। |
| चैत्रे व्याधिमवाप्नोति यो गृहं कारयेन्नरः।<br>वैशाखे धेनुरत्नानि ज्येष्ठे मृत्युं तथैव च॥ २ | जो मनुष्य चैत्रमासमें घर बनाता है, वह व्याधि, वैशाखमें घर बनानेवाला धेनु और रत्न तथा ज्येष्ठमें मृत्युको प्राप्त होता है। |
| आषाढे भृत्यरत्नानि पशुवर्गमवाप्नुयात्।<br>श्रावणे भृत्यलाभं तु हानिं भाद्रपदे तथा॥ ३ | आषाढ़में नौकर, रत्न और पशु समूहकी और श्रावणमें नौकरोंकी प्राप्ति तथा भाद्रपदमें हानि होती है। |
| पत्नीनाशोऽश्विने विद्यात् कार्तिके धनधान्यकम्।<br>मार्गशीर्षे तथा भक्तं पौषे तस्करतो भयम्॥ ४ | आश्विनमें घर बनानेसे पत्नीका नाश होता है। कार्तिक-मासमें धन-धान्यादिकी तथा मार्गशीर्षमें श्रेष्ठ भोज्यपदार्थोंकी प्राप्ति होती है। पौषमें चोरोंका भय और माघमासमें |
| लाभं च बहुशो विन्द्यादग्निं माघे विनिर्दिशेत्।<br>फाल्गुने काञ्चनं पुत्रानिति कालबलं स्मृतम्॥ ५ | अनेक प्रकारके लाभ होते हैं, किंतु अग्निका भी भय रहता है। फाल्गुनमें सुवर्ण तथा अनेक पुत्रोंकी प्राप्ति होती है। इस प्रकार समयका फल एवं बल बतलाया जाता है। |
| अश्विनी रोहिणी मूलमुत्तरात्रयमैन्दवम्।<br>स्वाती हस्तोऽनुराधा च गृहारम्भे प्रशस्यते॥ ६ | गृहारम्भमें अश्विनी, रोहिणी, मूल, तीनों उत्तरा, मृगशिरा, स्वाती, हस्त और अनुराधा—ये नक्षत्र प्रशस्त कहे गये हैं। |
| आदित्यभौमवर्ज्यास्तु सर्वे वाराः शुभावहाः।<br>वर्ज्यं व्याघातशूले च व्यतीपातातिगण्डयोः॥ ७ | रविवार और मङ्गलवारको छोड़कर शेष सभी दिन शुभदायक हैं। व्याघात, शूल, व्यतीपात; अतिगण्ड, |
| विष्कम्भगण्डपरिघवज्रयोगे न कारयेत्।<br>श्वेते मैत्रेऽथ माहेन्द्रे गान्धर्वाभिजिति रौहिणे॥ ८ | विष्कम्भ, गण्ड, परिघ और वज्र—इन योगोंमें गृहारम्भ नहीं करना चाहिये। श्वेत, मैत्र, माहेन्द्र, गान्धर्व, अभिजित्, रौहिण, वैराज और सावित्र—इन |
| तथा वैराजसावित्रे मुहूर्ते गृहमारभेत्।<br>चन्द्रादित्यबलं लब्ध्वा शुभलग्नं निरीक्षयेत्॥ ९ | मुहूर्तोंमें गृहारम्भ करना चाहिये। चन्द्रमा और सूर्यके बलके साथ-ही-साथ शुभ लग्नका भी निरीक्षण करना चाहिये। |
| स्तम्भोच्छ्रायादि कर्तव्यमन्यत्तु परिवर्जयेत्।<br>प्रासादेष्वेवमेवं स्यात् कूपवापीषु चैव हि॥ १० | सर्वप्रथम अन्य कार्योंको छोड़कर स्तम्भारोपण करना चाहिये। यही विधि प्रासाद, कूप एवं बावलियोंके लिये भी मानी गयी है॥ १—१०॥ |
| ९७४ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पूर्वं भूमिं परीक्षेत पश्चाद्वास्तुं प्रकल्पयेत् ।<br>श्वेता रक्ता तथा पीता कृष्णा चैवानुपूर्वशः ॥ ११<br><br>विप्रादः शस्यते भूमिरतः कार्यं परीक्षणम् ।<br>विप्राणां मधुरास्वादा कटुका क्षत्रियस्य तु ॥ १२<br><br>तिक्ता कषाया च तथा वैश्यशूद्रेषु शस्यते ।<br>अरत्निमात्रे वै गर्ते स्वनुलिप्ते च सर्वशः ॥ १३<br><br>घृतमामशरावस्थं कृत्वा वर्त्तिचतुष्टयम् ।<br>ज्वालयेद् भूपरीक्षार्थं तत्पूर्णं सर्वदिङ्मुखम् ॥ १४<br><br>दीप्तौ पूर्वादि गृह्णीयाद् वर्णानामनुपूर्वशः ।<br>वास्तुः सामूहिको नाम दीप्यते सर्वतस्तु यः ॥ १५<br><br>शुभदः सर्ववर्णानां प्रासादेषु गृहेषु च ।<br>रत्निमात्रमधोगर्ते परीक्ष्यं खातपूरणे ॥ १६<br><br>अधिके श्रियमाप्नोति न्यूने हानिं समे समम् ।<br>फालकृष्टेऽथवा देशे सर्वबीजानि वापयेत् ॥ १७<br><br>त्रिपञ्चसप्तरात्रे च यत्रारोहन्ति तान्यपि ।<br>ज्येष्ठोत्तमा कनिष्ठा भूर्वर्जनीयतरा सदा ॥ १८<br><br>पञ्चगव्यौषधिजलैः परीक्ष्यित्वा च सेचयेत् ।<br>एकाशीतिपदं कृत्वा रेखाभिः कनकेन च ॥ १९<br><br>पश्चात् पिष्टेन चालिप्य सूत्रेणालोड्य सर्वतः ।<br>दश पूर्वायता लेखा दश चैवोत्तरायताः ॥ २०<br><br>सर्ववास्तुविभागेषु विज्ञेया नवका नव ।<br>एकाशीतिपदं कृत्वा वास्तुवित् सर्ववास्तुषु ॥ २१ | पहले भूमिकी परीक्षाकर फिर बादमें वहाँ गृहका निर्माण करना चाहिये। श्वेत, लाल, पीली और काली—इन चार वर्णोंवाली पृथिवी क्रमशः ब्राह्मणादि चारों वर्णोंके लिये प्रशंसित मानी गयी है। इसके बाद उसके स्वादकी परीक्षा करनी चाहिये। ब्राह्मणके लिये मधुर स्वादवाली, क्षत्रियके लिये कड़वी, वैश्यके लिये तिक्त तथा शूद्रके लिये कसैली स्वादवाली पृथ्वी उत्तम मानी गयी है। तत्पश्चात् भूमिकी पुनः परीक्षाके लिये एक हाथ गहरा गड्डा खोदकर उसे सब ओरसे भलीभाँति लीप-पोतकर स्वच्छ कर दे। फिर एक कच्चे पुरवेमें घी भरकर उसमें चार बत्तियाँ जला दे और उसे उसी गड्ढेमें रख दे। उन बत्तियोंकी लौ क्रमशः चारों दिशाओंकी ओर हों। यदि पूर्व दिशाकी बत्ती अधिक कालतक जलती रहे तो ब्राह्मणके लिये उसका फल शुभ होता है। इसी प्रकार क्रमशः उत्तर, पश्चिम और दक्षिणकी बत्तियोंको क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रोंके लिये कल्याणकारक समझना चाहिये। यदि वह वास्तुदीपक चारों दिशाओंमें जलता रहे तो प्रासाद एवं साधारण गृह-निर्माणके लिये वहाँकी भूमि सभी वर्णोंके लिये शुभदायिनी है। एक हाथ गहरा गड्डा खोदकर उसे उसी मिट्टीसे पूर्ण करते समय इस प्रकार परीक्षा करे कि यदि मिट्टी शेष रह जाय तो श्रीकी प्राप्ति होती है, न्यून हो जाय तो हानि होती है तथा सम रहनेसे समभाव होता है। अथवा भूमिको हलद्वारा जुतवाकर उसमें सभी प्रकारके बीज बो दे। यदि वे बीज तीन, पाँच तथा सात रातोंमें अङ्कुरित हो जाते हैं तो उनके फल इस प्रकार जानने चाहिये। तीन रातवाली भूमि उत्तम, पाँच रातवाली भूमि मध्यम तथा सात रातवाली कनिष्ठ है। कनिष्ठ भूमिको सर्वथा त्याग देना चाहिये। इस प्रकार भूमि-परीक्षा कर पञ्चगव्य और ओषधियोंके जलसे भूमिको सींच दे और सुवर्णकी सलाईद्वारा रेखा खींचकर इक्यासी कोष्ठ बनावे। (कोष्ठ बनानेका ढंग इस प्रकार है—) पिष्टकसे चुपड़े हुए सूतसे दस रेखाएँ पूर्वसे पश्चिम तथा दस रेखाएँ उत्तरसे दक्षिणकी ओर खींचे। सभी प्रकारके वास्तु-विभागोंमें इस नव-नव (९x९) अर्थात् इक्यासी* कोष्ठका वास्तु जानना चाहिये। वास्तुशास्त्रको जाननेवाला सभी प्रकारके वास्तुसम्बन्धी कार्योंमें इसका उपयोग करे ॥ ११—२१ ॥ |
| पदस्थान् पूजयेद् देवांस्त्रिंशत् पञ्चदशैव तु ।<br>द्वात्रिंशद् बाह्यतः पूज्याः पूज्याश्चान्तस्त्रयोदश ॥ २२ | फिर उन कोष्ठोंमें स्थित पैंतालीस देवताओंकी पूजा करे। उनमें बत्तीसकी बाहरसे तथा तेरहकी भीतरसे पूजा |
* वास्तुचक्र तीन प्रकारके होते हैं—एक सौ पदका, दूसरा ८१ पदका और तीसरा ६४ पदका। यहाँ ८१ पदका ही वर्णन है।
| * अध्याय २५३ * | १७५ |
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| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
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| नामस्तस्तान् प्रवक्ष्यामि स्थानानि च निबोधत।<br>ईशानकोणादिषु तान् पूजयेद्धविषा नरः॥ २३<br>शिखी चैवाथ पर्जन्यो जयन्तः कुलिशायुधः।<br>सूर्यसत्यौ भृशश्चैव आकाशो वायुरेव च॥ २४<br>पूषा च वितथश्चैव बृहत्क्षतयमावुभौ*।<br>गन्धर्वो भृङ्गराजश्च मृगः पितृगणस्तथा॥ २५<br>दौवारिकोऽथ सुग्रीवः पुष्पदन्तो जलाधिपः।<br>असुरः शोषपापौ च रोगोऽहिमुख्य एव च॥ २६<br>भल्लाटः सोमसर्पौ च अदितिश्च दितिस्तथा।<br>बहिर्द्वात्रिंशदेते तु तदन्तस्तु ततः शृणु॥ २७<br>ईशानादिचतुष्कोणसंस्थितान् पूजयेद् बुधः।<br>आपश्चैवाथ सावित्रो जयो रुद्रस्तथैव च॥ २८<br>मध्ये नवपदे ब्रह्मा तस्याष्टौ च समीपगान्।<br>साध्यानेकान्तरान् विद्यात् पूर्वाद्यान् नामतः शृणु॥ २९<br>अर्यमा सविता चैव विवस्वान् विबुधाधिपः।<br>मित्रोऽथ राजयक्ष्मा च तथा पृथ्वीधरः स्मृतः॥ ३०<br>अष्टमश्चापवत्सस्तु परितो ब्रह्मणः स्मृताः।<br>आपश्चैवापवत्सश्च पर्जन्योऽग्निर्दितिस्तथा॥ ३१<br>पदिकानां तु वर्गोऽयमेवं कोणेष्वशेषतः।<br>तन्मध्ये तु बहिर्विंशद् द्विपदास्ते तु सर्वशः॥ ३२<br>अर्यमा च विवस्वांश्च मित्रः पृथ्वीधरस्तथा।<br>ब्रह्मणः परितो दिक्षु त्रिपदास्ते तु सर्वशः॥ ३३ | करनी चाहिये। मैं उनके नाम और स्थान बतला रहा हूँ, आपलोग सुनिये। (इन्हें जानकर) मनुष्यको ईशान आदि कोणोंमें हविष्यद्वारा उन-उन देवताओंकी पूजा करनी चाहिये। शिखी, पर्जन्य, जयन्त, इन्द्र, सूर्य, सत्य, भृश, अन्तरिक्ष, वायु, पूषा, वितथ, बृहत्क्षत, यम, गन्धर्व, भृङ्गराज, मृग, पितृगण, दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदन्त, जलाधिप, असुर, शोष, पाप, रोग, अहि, मुख्य, भल्लाट, सोम, सर्प, अदिति और दिति—ये बत्तीस बाह्य देवता हैं। बुद्धिमान् पुरुषको ईशान आदि चारों कोणोंमें स्थित इन देवताओंकी पूजा करनी चाहिये। अब वास्तु चक्रके भीतरी देवताओंके नाम सुनिये—आप, सावित्र, जय, रुद्र—ये चार चारों ओरसे तथा मध्यके नौ कोष्ठोंमें ब्रह्मा और उनके समीप अन्य आठ देवताओंकी भी पूजा करनी चाहिये। (ये सब मिलकर मध्यके तेरह देवता होते हैं।) ब्रह्माके चारों ओर स्थित ये आठ देवता, जो क्रमशः पूर्वादि दिशाओंमें दो-दोके क्रमसे स्थित रहते हैं, साध्यनामसे कहे जाते हैं। उनके नाम सुनिये—अर्यमा, सविता, विवस्वान्, विबुधाधिप, मित्र, राजयक्ष्मा, पृथ्वीधर तथा आठवें आपवत्स। आप, आपवत्स, पर्जन्य, अग्नि तथा दिति—ये पाँच देवताओंके वर्ग हैं। (इनकी पूजा अग्निकोणमें करनी चाहिये।) उनके बाहर बीस देवता हैं जो दो पदोंमें रहते हैं। अर्यमा, विवस्वान्, मित्र और पृथ्वीधर—ये चार ब्रह्माके चारों ओर तीन-तीन पदोंमें स्थित रहते हैं॥ २२–३३॥ |
| वंशानिदानीं वक्ष्यामि ऋजूनपि पृथक् पृथक्।<br>वायुं यावत् तथा रोगात् पितृभ्यः शिखिनं पुनः॥ ३४<br>मुख्याद् भृशं तथा शोषाद् वितथं यावदेव तु।<br>सुग्रीवाददितिं यावन्मृगात् पर्जन्यमेव च॥ ३५<br>एते वंशाः समाख्याताः क्वचिच्च जयमेव तु।<br>एतेषां यस्तु सम्पातः पदं मध्यं समं तथा॥ ३६<br>मर्म चैतत् समाख्यातं त्रिशूलं कोणगं च यत्।<br>स्तम्भं न्यासेषु वर्ज्यानि तुलाविधिषु सर्वदा॥ ३७<br>कीलोच्छिष्टोपघातादि वर्जयेद् यत्नतो जनः।<br>सर्वत्र वास्तुनिर्दिष्टो पितृवैश्वानरायतः॥ ३८ | अब मैं उनके वंशोंको पृथक्-पृथक् संक्षेपमें कह रहा हूँ। वायुसे लेकर रोगपर्यन्त, पितृगणसे शिखीपर्यन्त, मुख्यसे भृशपर्यन्त, शोषसे वितथपर्यन्त, सुग्रीवसे अदितिपर्यन्त तथा मृगसे पर्जन्यपर्यन्त—ये ही वंश कहे जाते हैं। कहीं-कहीं मृगसे लेकर जयपर्यन्त वंश कहा गया है। पदके मध्यमें इनका जो सम्पात है, वह पद, मध्य तथा सम नामसे प्रसिद्ध है। त्रिशूल और कोणगामी मर्मस्थल कहे जाते हैं, जो सर्वदा स्तम्भन्यास और तुलाकी विधिमें वर्जित माने गये हैं। मनुष्यके लिये यत्नपूर्वक देवताके पदोंपर कीलें गाड़ना, जूठन फेंकना तथा चोटें पहुँचाना वर्जित है। यह वास्तु-चक्र, सर्वत्र पितृवर्गीय वैश्वानरके अधीन माना गया है। |
* 'बृहत्क्षत' इति बृहत्संहितायां ५३।५४ स्थः पाठः।
९७६ * मत्स्यपुराण *
| मूर्ध्न्यग्निः समादिष्टो मुखे चापः समाश्रितः।<br>पृथ्वीधरोऽर्यमा चैव स्कन्धयोस्तावधिष्ठितौ॥ ३९<br>वक्षःस्थले चापवत्सः पूजनीयः सदा बुधैः।<br>नेत्रयोर्दितिपर्जन्यौ श्रोत्रेऽदितिजयन्तकौ॥ ४०<br>सर्पेन्द्रावंससंस्थौ तु पूजनीयौ प्रयत्नतः।<br>सूर्यसोमादयस्तद्वद् बाह्वोः पञ्च च पञ्च च॥ ४१<br>रुद्रश्च राजयक्ष्मा च वामहस्ते समास्थितौ।<br>सावित्रः सविता तद्वद्धस्तं दक्षिणमास्थितौ॥ ४२<br>विवस्वानाथ मित्रश्च जठरे संव्यवस्थितौ।<br>पूषा च पापयक्ष्मा च हस्तयोर्मणिबन्धने॥ ४३<br>तथैवासुरशोषौ च वामपार्श्वं समाश्रितौ।<br>पार्श्वे तु दक्षिणे तद्वद् वितथः सबृहत्क्षतः॥ ४४<br>ऊर्वोर्यमाम्बुपौ ज्ञेयौ जान्वोर्गन्धर्वपुष्पकौ।<br>जङ्घयोर्भृङ्गसुग्रीवौ स्फिकस्थौ दौवारिको मृगः॥ ४५<br>जयशक्रौ तथा मेढ्रे पादयोः पितरस्तथा।<br>मध्ये नवपदे ब्रह्मा हृदये स तु पूज्यते॥ ४६ | उसके मस्तकपर अग्नि और मुखमें जलका निवास है, दोनों स्कन्धोंपर पृथ्वीधर तथा अर्यमा अधिष्ठित हैं। बुद्धिमान्को वक्षःस्थलपर आपवत्सकी पूजा करनी चाहिये। नेत्रोंमें दिति और पर्जन्य तथा कानोंमें अदिति और जयन्त हैं। कंधोंपर सर्प और इन्द्रकी प्रयत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिये। इसी प्रकार बाहुओंमें सूर्य और चन्द्रमासे लेकर पाँच-पाँच देवता स्थित हैं। रुद्र और राजयक्ष्मा—ये दोनों बायें हाथपर अवस्थित हैं। उसी प्रकार सावित्र और सविता दाहिने हाथपर स्थित हैं। विवस्वान् और मित्र—ये उदरमें तथा पूषा और पापयक्ष्मा—ये हाथोंके मणिबन्धोंमें स्थित हैं। उसी प्रकार असुर और शोष—ये बायें पार्श्वमें तथा दाहिने पार्श्वमें वितथ और बृहत्क्षत स्थित हैं। ऊरुभागोंपर यम और वरुण, घुटनोंपर गन्धर्व और पुष्पक, दोनों जंघोंपर क्रमशः भृङ्ग और सुग्रीव, दोनों नितम्बोंपर दौवारिक और मृग, लिङ्गस्थानपर जय और शक्र तथा पैरोंपर पितृगण स्थित हैं। मध्यके नौ पदोंमें, जो हृदय कहलाता है, ब्रह्माकी पूजा होती है॥ ३४—४६॥ |
| चतुःषष्टिपदो वास्तुः प्रासादे ब्रह्मणा स्मृतः।<br>ब्रह्मा चतुष्पदस्तत्र कोणेष्वर्धपदस्तथा॥ ४७<br>बहिष्कोणेषु वास्तौ तु सार्धाश्चोभयसंस्थिताः।<br>विंशतिद्विपदाश्चैव चतुःषष्टिपदे स्मृताः॥ ४८<br>गृहारम्भेषु कण्डूतिः स्वाम्यङ्गे यत्र जायते।<br>शल्यं त्वपनयेत् तत्र प्रासादे भवने तथा॥ ४९<br>सशल्यं भयदं यस्मादशल्यं शुभदायकम्।<br>हीनाधिकाङ्गतां वास्तोः सर्वथा तु विवर्जयेत्॥ ५०<br>नगरग्रामदेशेषु सर्वत्रैवं विवर्जयेत्।<br>चतुःशालं त्रिशालं च द्विशालं चैकशालकम्।<br>नामतस्तान् प्रवक्ष्यामि स्वरूपेण द्विजोत्तमाः॥ ५१ | ब्रह्माने प्रासादके निर्माणमें चौंसठ पदोंवाले वास्तुको श्रेष्ठ बतलाया है। उसके चार पदोंमें ब्रह्मा तथा उनके कोणोंमें आपवत्स, सविता आदि आठ देवगण स्थित हैं। वास्तुके बाहरवाले कोणोंमें भी अग्नि आदि आठ देवताओंका निवास है तथा दो पदोंमें जयन्त आदि बीस देवता स्थित हैं। इस प्रकार चौंसठ पदवाले वास्तुचक्रमें देवताओंकी स्थिति बतलायी गयी है। गृहारम्भके समय गृहपतिके जिस अङ्गमें खुजली जान पड़े, महल तथा भवनमें वास्तुके उसी अङ्गपर गड़ी हुई शल्य या कीलको निकाल देना चाहिये; क्योंकि शल्यसहित गृह भयदायक और शल्यरहित कल्याणकारक होता है। वास्तुका अधिक एवं हीन अङ्गका होना सर्वथा त्याज्य है। इसी प्रकार नगर, ग्राम और देश—सभी जगहपर इन दोषोंका परित्याग करना चाहिये। द्विजवरो! अब मैं चतुःशाल, त्रिशाल, द्विशाल तथा एकशालवाले भवनोंके नाम और स्वरूपका वर्णन करूँगा॥ ४७—५१॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे एकाशीतिपदवास्तुनिर्णयो नाम त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २५३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें इक्यासीपद-निर्णय नामक दो सौ तिरपनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २५३॥
| * अध्याय २५४ * | ९७७ |
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दो सौ चौवनवाँ अध्याय
वास्तुशास्त्रके अन्तर्गत राजप्रासाद आदिकी निर्माण-विधि
| सूत उवाच | |
|---|---|
| चतुःशालं प्रवक्ष्यामि स्वरूपान्नामतस्तथा।<br>चतुःशालं चतुर्द्वारैरलिन्दैः सर्वतोमुखम्॥ १<br><br>नाम्ना तत् सर्वतोभद्रं शुभं देवनृपालये।<br>पश्चिमद्वारहीनं च नन्द्यावर्तं प्रचक्षते॥ २<br><br>दक्षिणद्वारहीनं तु वर्धमानमुदाहृतम्।<br>पूर्वद्वारविहीनं तत् स्वस्तिकं नाम विश्रुतम्॥ ३<br><br>रुचकं चोत्तरद्वारविहीनं तत् प्रचक्षते।<br>सौम्यशालाविहीनं यत् त्रिशालं धान्यकं च तत्॥ ४<br><br>क्षेमवृद्धिकरं नृणां बहुपुत्रफलप्रदम्।<br>शालया पूर्वया हीनं सुक्षेत्रमिति विश्रुतम्॥ ५<br><br>धन्यं यशस्यमायुष्यं शोकमोहविनाशनम्।<br>शालया याम्यया हीनं यद् विशालं तु शालया॥ ६<br><br>कुलक्षयकरं नृणां सर्वव्याधिभयावहम्।<br>हीनं पश्चिमया यत् तु पक्षघ्नं नाम तत् पुनः॥ ७<br><br>मित्रबन्धुसुतान् हन्ति तथा सर्वभयावहम्।<br>याम्यापराभ्यां शालाभ्यां धनधान्यफलप्रदम्॥ ८<br><br>क्षेमवृद्धिकरं नृणां तथा पुत्रफलप्रदम्।<br>यमसूर्यं च विज्ञेयं पश्चिमोत्तरशालकम्॥ ९<br><br>राजाग्निभयदं नृणां कुलक्षयकरं च यत्।<br>उदक्पूर्वे तु शाले दण्डाख्ये यत्र तद् भवेत्॥ १० | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! अब मैं चतुःशाल* (त्रिशाल, द्विशाल आदि) भवनोंके स्वरूप, उनके विशिष्ट नामोंके साथ बतला रहा हूँ। जो चतुःशाल चारों ओर भवन, द्वार तथा बरामदोंसे युक्त हो, उसे 'सर्वतोभद्र' कहा जाता है। वह देव-मन्दिर तथा राजभवनके लिये मङ्गलकारक होता है। वह चतुःशाल यदि पश्चिम द्वारसे हीन हो तो 'नन्द्यावर्त', दक्षिणद्वारसे हीन हो तो 'वर्धमान', पूर्वद्वारसे रहित हो तो 'स्वस्तिक', उत्तरद्वारसे विहीन हो तो 'रुचक' कहा जाता है। (अब त्रिशाल भवनोंके भेद बतलाते हैं।) उत्तर दिशाकी शालासे रहित जो त्रिशाल भवन होता है, उसे 'धान्यक' कहते हैं। वह मनुष्योंके लिये कल्याण एवं वृद्धि करनेवाला तथा अनेक पुत्ररूप फल देनेवाला होता है। पूर्वकी शालासे विहीन त्रिशाल भवनको 'सुक्षेत्र' कहते हैं। वह धन, यश और आयु प्रदान करनेवाला तथा शोक-मोहका विनाशक होता है। जो दक्षिणकी शालासे विहीन होता है, उसे 'विशाल' कहते हैं। वह मनुष्योंके कुलका क्षय करनेवाला तथा सब प्रकारकी व्याधि और भय देनेवाला होता है। जो पश्चिमशालासे हीन होता है, उसका नाम 'पक्षघ्न' है, वह मित्र, बन्धु और पुत्रोंका विनाशक तथा सब प्रकारका भय उत्पन्न करनेवाला होता है। (अब 'द्विशालों'के भेद कहते हैं—) दक्षिण एवं पश्चिम—दो शालाओंसे युक्त भवनको धनधान्यप्रद कहते हैं। वह मनुष्योंके लिये कल्याणका वर्धक तथा पुत्रप्रद कहा गया है। पश्चिम और उत्तरशालावाले भवनको 'यमसूर्य' नामक शाल जानना चाहिये। वह मनुष्योंके लिये राजा और अग्निसे भयदायक और कुलका विनाशक होता है। जिस भवनमें केवल पूर्व और उत्तरकी ही दो शालाएँ हों, उसे 'दण्ड' कहते हैं। |
* रावणादिके ऐसे चतुःशाल, त्रिशाल आदि भवनोंका उल्लेख वाल्मीकीय रामायण, सुन्दरकाण्ड, राजतरङ्गिणी ३। १२, मृच्छकटिकनाटक ३। ७ तथा बृहत्संहिता अ० ५३ आदिमें आता है। शिल्परत्न, समराङ्गण, काश्यपशिल्पादिमें इनकी रचनाका विस्तृत विधान है।
९७८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अकालमृत्युभयदं परचक्रभयावहम्।<br>धनाख्यं पूर्वयाम्यभ्यां शालाभ्यां यद् शालकम्॥ ११ | वह अकालमृत्यु तथा शत्रुपक्षसे भय उत्पन्न करनेवाला होता है। जो पूर्व और दक्षिणकी शालाओंसे युक्त द्विशाल भवन हो, उसे 'धन' कहते हैं। वह मनुष्योंके लिये शस्त्र तथा पराजयका भय उत्पन्न करनेवाला होता है। |
| तच्छस्त्रभयदं नृणां पराभवभयावहम्।<br>चुल्ली पूर्वापराभ्यां तु सा भवेन्मृत्युसूचनी॥ १२ | इसी प्रकार केवल पूर्व तथा पश्चिमकी ओर बना हुआ 'चुल्ली' नामक द्विशालभवन मृत्युसूचक है। वह स्त्रियोंको विधवा करनेवाला तथा अनेकों प्रकारका भय उत्पन्न करनेवाला होता है। |
| वैधव्यदायकं स्त्रीणामनेकभयकारकम्।<br>कार्यमुत्तरयाम्यभ्यां शालाभ्यां भयदं नृणाम्॥ १३ | केवल उत्तर एवं दक्षिणकी शालाओंसे युक्त द्विशाल भवन मनुष्योंके लिये भयदायक होता है। अतः ऐसे भवनको नहीं बनवाना चाहिये। |
| सिद्धार्थवज्रवर्ज्याणि द्विशालानि सदा बुधैः।<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि भवनं पृथिवीपतेः॥ १४ | बुद्धिमानोंको सदा सिद्धार्थ$^१$ और वज्रसे$^२$ भिन्न द्विशालभवन बनवाना चाहिये॥ १-१३$\frac{१}{२}$॥<br><br>अब मैं राजभवनके विषयमें वर्णन कर रहा हूँ। |
| पञ्चप्रकारं तत् प्रोक्तमुत्तमादिविभेदतः।<br>अष्टोत्तरं हस्तशतं विस्तरश्चोत्तमो मतः॥ १५ | वह उत्तम आदि भेदसे पाँच प्रकारका कहा गया है। एक सौ आठ हाथके विस्तारवाला राजभवन उत्तम माना गया है। |
| चतुर्ष्वन्येषु विस्तारो हीयते चाष्टभिः करैः।<br>चतुर्थांशाधिकं दैर्घ्यं पञ्चस्वपि निगद्यते॥ १६ | अन्य चार प्रकारके भवनोंमें विस्तार क्रमशः आठ-आठ हाथ कम होता जाता है; किंतु पाँचों प्रकारके भवनोंमें लम्बाई विस्तारके चतुर्थांशसे अधिक होती है। |
| युवराजस्य वक्ष्यामि तथा भवनपञ्चकम्।<br>षड्भिः षड्भिस्तथाशीतिर्हीयते तत्र विस्तरात्॥ १७ | अब मैं युवराजके पाँच प्रकारके भवनोंका वर्णन कर रहा हूँ। उसमें उत्तम भवनकी चौड़ाई अस्सी हाथकी होती है। अन्य चारकी चौड़ाई क्रमशः छः-छः हाथ कम होती जाती है। |
| त्र्यंशेन चाधिकं दैर्घ्यं पञ्चस्वपि निगद्यते।<br>सेनापतेः प्रवक्ष्यामि तथा भवनपञ्चकम्॥ १८ | इन पाँचों भवनोंकी लम्बाई चौड़ाईसे एक तिहाई अधिक कही गयी है। इसी प्रकार अब मैं सेनापतिके पाँच प्रकारके भवनोंका वर्णन कर रहा हूँ। |
| चतुःषष्टिस्तु विस्तारात् षड्भिः षड्भिस्तु हीयते।<br>पञ्चस्वेतेषु दैर्घ्यं च षड्भागेनाधिकं भवेत्॥ १९ | उसके उत्तम भवनकी चौड़ाई चौंसठ हाथकी मानी गयी है। अन्य चार भवनोंकी चौड़ाई क्रमशः छः-छः हाथ कम होती जाती है। इन पाँचोंकी लम्बाई चौड़ाईके षष्ठांशसे अधिक होनी चाहिये। |
| मन्त्रिणामथ वक्ष्यामि तथा भवनपञ्चकम्।<br>चतुश्र्चतुर्भिर्हीना स्यात् करषष्टिः प्रविस्तरे॥ २० | अब मैं मन्त्रियोंके भी पाँच प्रकारके भवन बतला रहा हूँ। उनमें उत्तम भवनका विस्तार साठ हाथ होता है तथा अन्य चार क्रमशः चार-चार हाथ कम चौड़े होते हैं। |
| अष्टांशेनाधिकं दैर्घ्यं पञ्चस्वपि निगद्यते।<br>सामन्तामात्यलोकानां वक्ष्ये भवनपञ्चकम्॥ २१ | इन पाँचोंकी लम्बाई चौड़ाईके अष्टांशसे अधिक कही गयी है। अब मैं सामन्त, छोटे राजा और अमात्य (छोटे मन्त्री) लोगोंके पाँच प्रकारके भवनोंको बतलाता हूँ। |
| चत्वारिंशत् तथाष्टौ च चतुर्भिर्हीयते क्रमात्।<br>चतुर्थांशाधिकं दैर्घ्यं पञ्चस्वेतेषु शस्यते॥ २२ | इनमें उत्तम भवनकी चौड़ाई अड़तालीस हाथकी होनी चाहिये तथा अन्य चारोंकी चौड़ाई क्रमशः चार-चार हाथ कम कही गयी है। इन पाँचों भवनोंकी लम्बाई चौड़ाईकी अपेक्षा सवाया अधिक कही गयी है। |
१. एक प्रकारका स्तम्भ जिसमें ८ पहल या कोण होते हैं।
२. जिस द्विशालमें केवल दक्षिण और पश्चिमकी ओर भवन हों (वृहत्संहिता ५३। ३९)।
| * अध्याय २५४ * | १७९ |
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| शिल्पिनां कञ्चुकीनां च वेश्यानां गृहपञ्चकम्।<br>अष्टाविंशत् कराणां तु विहीनं विस्तरे क्रमात्॥ २३<br><br>द्विगुणं दैर्घ्यमेवोक्तं मध्यमेष्वेवमेव तत्।<br>दूतीकर्मान्तिकादीनां वक्ष्ये भवनपञ्चकम्॥ २४<br><br>चतुर्थांशाधिकं दैर्घ्यं विस्तारो द्वादशैव तु।<br>अर्धार्धकरहानिः स्याद् विस्तारात् पञ्चशः क्रमात्॥ २५<br><br>दैवज्ञगुरुवैद्यानां सभास्तारपुरोधसाम्।<br>तेषामपि प्रवक्ष्यामि तथा भवनपञ्चकम्॥ २६<br><br>चत्वारिंशत् तु विस्ताराच्चतुर्भिर्हीयते क्रमात्।<br>पञ्चस्वेतेषु दैर्घ्यं च षड्भागेनाधिकं भवेत्॥ २७<br><br>चतुर्वर्णस्य वक्ष्यामि सामान्यं गृहपञ्चकम्।<br>द्वात्रिंशतः कराणां तु चतुर्भिर्हीयते क्रमात्॥ २८<br><br>आषोडशादिति परं नूनमन्त्यावसायिनाम्।<br>दशांशेनाष्टभागेन त्रिभागेनाथ पादिकम्॥ २९<br><br>अधिकं दैर्घ्यमित्याहुर्ब्राह्मणादेः प्रशस्यते।<br>सेनापतेर्नृपस्यापि गृहयोरन्तरेण तु॥ ३०<br><br>नृपवासगृहं कार्यं भाण्डागारं तथैव च।<br>सेनापतेर्गृहस्यापि चातुर्वर्ण्यस्य चान्तरे।<br>वासाय च गृहं कार्यं राजपूज्येषु सर्वदा॥ ३१<br><br>अन्तरप्रभवानां च स्वपितुर्गृहमिष्यते।<br>तथा हस्तशतादर्धं गदितं वनवासिनाम्॥ ३२<br><br>सेनापतेर्नृपस्यापि सप्तत्या सहितेऽन्विते।<br>चतुर्दशहृते व्यासे शालान्यासः प्रकीर्तितः॥ ३३<br><br>पञ्चत्रिंशान्विते तस्मिन्नालिन्दः समुदाहृतः।<br>तथा षड्विंशद्धस्ता तु सप्ताङ्गुलसमन्विता॥ ३४<br><br>विप्रस्य महती शाला न दैर्घ्यं परतो भवेत्।<br>दशाङ्गुलाधिका तद्वत् क्षत्रियस्य विधीयते॥ ३५ | अब शिल्पकार, कंचुकी और वेश्याओंके पाँच प्रकारके भवनोंको सुनिये। इन सभी भवनोंकी चौड़ाई अट्ठाईस हाथ कही गयी है। अन्य चारों भवनोंकी चौड़ाईमें क्रमशः दो-दो हाथकी न्यूनता होती है। लम्बाई चौड़ाईसे दुगुनी कही गयी है॥ १४-२३ १/२ ॥<br><br>अब मैं दूती-कर्म करनेवालों तथा परिवारके अन्य लोगोंके पाँच प्रकारके भवनोंको बतला रहा हूँ। उनकी चौड़ाई बारह हाथकी तथा लम्बाई उससे सवाया अधिक होती है। शेष चार गृहोंकी चौड़ाई क्रमशः आधा-आधा हाथ न्यून होती है। अब मैं ज्योतिषी, गुरु, वैद्य, सभापति और पुरोहित—इन सभीके पाँच प्रकारके भवनोंका वर्णन कर रहा हूँ। उनके उत्तम भवनकी चौड़ाई चालीस हाथकी होती है। शेषकी क्रमसे चार-चार हाथकी कम होती है। इन पाँचों भवनोंकी लम्बाई चौड़ाईके षष्ठांशसे अधिक होती है। अब फिर साधारणतया चारों वर्णोंके लिये पाँच प्रकारके गृहोंका वर्णन करता हूँ। उनमें ब्राह्मणके घरकी चौड़ाई बत्तीस हाथकी होनी चाहिये। अन्य जातियोंके लिये क्रमशः चार-चार हाथकी कमी होनी चाहिये। (अर्थात् ब्राह्मणके उत्तम गृहकी चौड़ाई बत्तीस हाथ, क्षत्रियके घरकी अट्ठाईस हाथ, वैश्यके घरकी चौबीस हाथ तथा सत्-शूद्रके घरकी बीस हाथ और असत्-शूद्रके घरकी सोलह हाथ होनी चाहिये।) किंतु सोलह हाथसे कमकी चौड़ाई अन्त्यजोंके लिये है। ब्राह्मणके घरकी लम्बाई चौड़ाईसे दशांश, क्षत्रियके घरकी अष्टमांश, वैश्यके घरकी तिहाई और शूद्रके घरकी चौथाई भाग अधिक होनी चाहिये। यही विधि श्रेष्ठ मानी गयी है। सेनापति और राजाके गृहोंके बीचमें राजाके रहनेका गृह बनाना चाहिये। उसी स्थानपर भाण्डागार भी रहना चाहिये। सेनापतिके तथा चारों वर्णोंके गृहोंके मध्य भागमें सर्वदा राजाके पूज्य लोगोंके निवासार्थ गृह बनवाना चाहिये। इसके अतिरिक्त विभिन्न जातियोंके लिये एवं वनेचरोंके लिये शयन करनेका घर पचास हाथका बनवाना चाहिये। सेनापति और राजाके गृहके परिमाणमें सत्तरका योग करके चौदहका भाग देनेपर व्यासमें शालाका न्यास कहा गया है। उसमें पैंतीस हाथपर बरामदेका स्थान कहा गया है। छत्तीस हाथ सात अङ्गुल लम्बी ब्राह्मणकी बड़ी शाला होनी चाहिये। उसी प्रकार दस अङ्गुल अधिक क्षत्रियकी शाला होनी चाहिये॥ २४-३५॥ |
९८० * मत्स्यपुराण *
| पञ्चत्रिंशत्करा वैश्ये ह्यङ्गुलानि त्रयोदश।<br>तावत्करैव शूद्रस्य युता पञ्चदशाङ्गुलैः ॥ ३६<br><br>शालायास्तु त्रिभागेन यस्याग्रे वीथिका भवेत्।<br>सोष्णीषं नाम तद्वास्तु पश्चाच्छ्रेयोच्छ्रयं भवेत् ॥ ३७<br><br>पार्श्वयोर्वीथिका यत्र सावष्टम्भं तदुच्यते।<br>समन्ताद्वीथिका यत्र सुस्थितं तदिहोच्यते ॥ ३८<br><br>शुभदं सर्वमेतत् स्याच्चातुर्वर्ण्ये चतुर्विधम्।<br>विस्तरात् षोडशो भागस्तथा हस्तचतुष्टयम् ॥ ३९<br><br>प्रथमो भूमिकोच्छ्राय उपरिष्टात् प्रहीयते।<br>द्वादशांशेन सर्वासु भूमिकासु तथोच्छ्रयः ॥ ४०<br><br>पक्केष्टका भवेद् भित्तिः षोडशांशेन विस्तरात्।<br>दारुवैरपि कल्प्या स्यात् तथा मृन्मयभित्तिका ॥ ४१<br><br>गर्भमानेन मानं तु सर्ववास्तुषु शस्यते।<br>गृहव्यासस्य पञ्चाशदष्टादशभिरङ्गुलैः ॥ ४२<br><br>संयुतो द्वारविष्कम्भो द्विगुणश्चोच्छ्रयो भवेत्।<br>द्वारशाखासु बाहुल्यमुच्छ्रायकरसम्मितैः ॥ ४३<br><br>अङ्गुलैः सर्ववास्तूनां शस्यते पृथुत्वं बुधैः।<br>उदुम्बरोत्तमाङ्गं च तदर्धार्धप्रविस्तरात् ॥ ४४ | वैश्यके लिये पैंतीस हाथ तेरह अङ्गुल लम्बी शाला होनी चाहिये। उतने ही हाथ तथा पंद्रह अङ्गुल शूद्रकी शालाका परिमाण है। शालाकी लम्बाईके तीन भागपर यदि सामनेकी ओर गली बनी हो तो वह 'सोष्णीष' नामक वास्तु है। पीछेकी ओर गली हो तो वह 'श्रेयोच्छ्रय' कहलाता है। यदि दोनों पार्श्वोंमें वीथिका हो तो वह 'सावष्टम्भ' तथा चारों ओर वीथिका हो तो 'सुस्थित' नामक वास्तु कहा जाता है। ये चारों प्रकारकी वीथियाँ चारों वर्णोंके लिये मङ्गलदायी हैं। शालाके विस्तारका सोलहवाँ भाग तथा चार हाथ—यह पहले खण्डकी ऊँचाईका मान है। अधिक ऊँचा करनेसे हानि होती है। उसके बाद अन्य सभी खण्डोंकी ऊँचाई बारहवें भागके बराबर रखनी चाहिये। यदि पक्की ईंटोंकी दीवाल बनायी जा रही हो तो गृहकी चौड़ाईके सोलहवें भागके परिमाणके बराबर मोटाई होनी चाहिये। वह दीवाल लकड़ी तथा मिट्टीसे भी बनायी जा सकती है। सभी वास्तुओंमें भीतरके मानके अनुसार लम्बाई-चौड़ाईका मान श्रेष्ठ माना गया है। गृहके व्याससे पचास अङ्गुल विस्तार तथा अठारह अङ्गुल वेधसे युक्त द्वारकी चौड़ाई रखनी चाहिये और उसकी ऊँचाई चौड़ाईसे दुगुनी होनी चाहिये। जितनी ऊँचाई द्वारकी हो उतनी ही दरवाजेमें लगी हुई शाखाओंकी भी होनी चाहिये। ऊँचाई जितने हाथोंकी हो उतने ही अङ्गुल उन शाखाओंकी मोटाई होनी चाहिये—यही सभी वास्तुविद्याके ज्ञाताओंने बताया है। द्वारके ऊपरका कलश (बुर्ज) तथा नीचेकी देहली (चौखट)—ये दोनों शाखाओंसे आधे अधिक मोटे हों, अर्थात् इन्हें शाखाओंसे ड्योढ़ा मोटा रखना चाहिये ॥ ३६—४४ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वास्तुविद्यासु गृहमाननिर्णयो नाम चतुःपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५४ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वास्तुप्रकरणमें गृह-मान-निर्णय नामक दो सौ चौवनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २५४ ॥
- अध्याय २५५ * १८१
दो सौ बचपनवाँ अध्याय
वास्तुविषयक वेधका विवरण
| सूत उवाच | |
|---|---|
| अथातः सम्प्रवक्ष्यामि स्तम्भमानविनिर्णयम्।<br>कृत्वा स्वभवनोच्छ्रायं सदा सप्तगुणं बुधैः॥ १<br><br>अशीत्यंशः पृथुत्वे स्यादग्रे नवगुणे सति।<br>रुचकश्चतुरः स्यात् तु अष्टास्रो वज्र उच्यते॥ २<br><br>द्विवज्रः षोडशास्रस्तु द्वात्रिंशास्रः प्रलीनकः।<br>मध्यप्रदेशे यः स्तम्भो वृत्तो वृत्त इति स्मृतः॥ ३<br><br>एते पञ्च महास्तम्भाः प्रशस्ताः सर्ववास्तुषु।<br>पद्मवल्लीलताकुम्भपत्रदर्पणरूषिताः ॥ ४<br><br>स्तम्भस्य नवमांशेन पद्मकुम्भान्तराणि तु।<br>स्तम्भतुल्या तुला प्रोक्ता हीना चोपतुला ततः॥ ५<br><br>त्रिभागेनेह सर्वत्र चतुर्भागेन वा पुनः।<br>हीनं हीनं चतुर्थांशात् तथा सर्वासु भूमिषु॥ ६<br><br>वासगेहानि सर्वेषां प्रविशेद् दक्षिणेन तु।<br>द्वाराणि तु प्रवक्ष्यामि प्रशस्तानीह यानि तु॥ ७<br><br>पूर्वेणेन्द्रं जयन्तं च द्वारं सर्वत्र शस्यते।<br>याम्यं च वितथं चैव दक्षिणेन विदुबुर्धाः॥ ८<br><br>पश्चिमे पुष्पदन्तं च वारुणं च प्रशस्यते।<br>उत्तरेण तु भल्लाटं सौम्यं तु शुभदं भवेत्॥ ९<br><br>तथा वास्तुषु सर्वत्र वेधं द्वारस्य वर्जयेत्।<br>द्वारे तु रथ्यया विद्धे भवेत् सर्वकुलक्षयः॥ १०<br><br>तरुणा द्वेषबाहुल्यं शोकः पङ्केन जायते।<br>अपस्मारो भवेन्नूनं कूपवेधेन सर्वदा॥ ११<br><br>व्यथा प्रस्रवणेन स्यात् कीलेनाग्निभयं भवेत्।<br>विनाशो देवताविद्धे स्तम्भेन स्त्रीकृतो भवेत्॥ १२ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! अब मैं स्तम्भके परिमाणके विषयमें बतला रहा हूँ। बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि वे अपने गृहकी ऊँचाईके मानको सातसे गुणाकर उसके अस्सीवें भागके बराबर खम्भेकी मोटाई रखें। उसकी मोटाईमें नौसे गुणा कर अस्सीवें भागके बराबर खम्भेका मूलभाग रखना चाहिये। चार कोणवाला स्तम्भ 'रुचक', आठ कोणवाला 'वज्र', सोलह कोणवाला 'द्विवज्र' तथा बत्तीस कोणवाला 'प्रलीनक' कहा जाता है। मध्य प्रदेशमें जो खम्भा वृत्ताकार रहता है, उसे 'वृत्त' कहा गया है। ये पाँच प्रकारके स्तम्भ सभी प्रकारके वास्तु-कार्यमें प्रशंसनीय कहे गये हैं। ये सभी स्तम्भ पद्म, वल्ली, लता, कुम्भ, पत्र एवं दर्पणसे चित्रित रहने चाहिये। इन कमलों तथा कुम्भोंमें स्तम्भके नवें अंशके बराबर अन्तर रहना चाहिये। स्तम्भके बराबर ऊँचाईको 'तुला' तथा उससे न्यूनको 'उपतुला' कहते हैं। मानके तृतीय या चतुर्थ भागसे हीन जो तुला है, वही 'उपतुला' है। यह उपतुला सभी भूमियोंमें रहती है। सभी वास-गृहोंमें दाहिनी ओर प्रवेशद्वार रखना चाहिये। अब मैं गृहके जो प्रशस्तद्वार हैं, उन्हें बतला रहा हूँ। पूर्व दिशामें इन्द्र और जयन्तद्वार सभी गृहोंमें श्रेष्ठ माने गये हैं। बुद्धिमान् लोग दक्षिण द्वारोंमें याम्य और वितथको श्रेष्ठ मानते हैं। पश्चिम द्वारोंमें पुष्पदन्त और वरुण प्रशंसित हैं। उत्तर द्वारोंमें भल्लाट तथा सौम्य शुभदायक होते हैं। सभी वास्तुओंमें द्वारवेधको बचाना चाहिये। गली, सड़क या मार्गद्वारा द्वार-वेध होनेपर पूरे कुलका क्षय हो जाता है। वृक्षके द्वारा वेध होनेपर द्वेषकी अधिकता होती है। कीचड़से वेध होनेपर शोक होता है और कूपद्वारा वेध होनेपर अवश्य ही सदाके लिये मिरगीका रोग होता है। नाबदान या जलप्रवाहसे वेध होनेपर व्यथा होती है, कीलसे वेध होनेपर अग्निभय होता है, देवतासे विद्ध होनेपर विनाश तथा स्तम्भसे विद्ध होनेपर स्त्रीद्वारा क्लेशकी प्राप्ति होती है॥१—१२॥ |
| ९८२ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| गृहभर्तुर्विनाशः स्याद् गृहेण च गृहे कृते।<br>अमेध्यावस्करैर्विद्धे गृहिणी बन्धकी भवेत्॥ १३<br>तथा शस्त्रभयं विद्यादन्त्यजस्य गृहेण तु।<br>उच्छ्रायाद् द्विगुणां भूमिं त्यक्त्वा वेधो न जायते॥ १४<br>स्वयमुद्घाटिते द्वारे उन्मादो गृहवासिनाम्।<br>स्वयं वा पिहिते विद्यात् कुलनाशं विचक्षणः॥ १५<br>मानाधिके राजभयं न्यूने तस्करतो भवेत्।<br>द्वारोपरि च यद् द्वारं तदन्तकमुखं स्मृतम्॥ १६<br>अध्वनो मध्यदेशे तु अधिको यस्य विस्तरः।<br>वज्रं तु संकटं मध्ये सद्यो भर्तुर्विनाशनम्॥ १७<br>तथान्यपीडितं द्वारं बहुदोषकरं भवेत्।<br>मूलद्वारात् तथान्यत् तु नाधिकं शोभनं भवेत्॥ १८<br>कुम्भश्रीपर्णीवल्लीभिर्मूलद्वारं तु शोभयेत्।<br>पूजयेच्चापि तन्नित्यं बलिना चाक्षतोदकैः॥ १९<br>भवनस्य वटः पूर्वे दिग्भागे सार्वकामिकः।<br>उदुम्बरस्तथा याम्ये वारुण्यां पिप्पलः शुभः॥ २०<br>प्लक्षश्चोत्तरतो धन्यो विपरीतास्त्वसिद्धये।<br>कण्टकी क्षीरवृक्षश्च आसनः सफलो द्रुमः॥ २१<br>भार्याहानौ प्रजाहानौ भवेतां क्रमशस्तदा।<br>न च्छिन्द्याद् यदि तानन्यानन्तरे स्थापयेच्छुभान्॥ २२<br>पुन्नागाशोकबकुलशमीतैलकचम्पकान् ।<br>दाडिमीपिप्पलीद्राक्षास्तथा कुसुममण्डपान्॥ २३<br>जम्बीरपूगपनसद्रुमकेतकीभि-<br>र्वातीसरोजशतपत्रिकमल्लिकाभिः।<br>बन्नारिकेलकदलीदलपाटलाभि-<br>र्युक्तं तदत्र भवनं श्रियमातनोति॥ २४ | एक घरसे दूसरे घरमें वेध पड़नेपर गृहपतिका विनाश होता है तथा अपवित्र द्रव्यादिद्वारा वेध होनेपर घरकी स्वामिनी वन्ध्या हो जाती है। अन्त्यजके घरके द्वारा वेध होनेपर हथियारसे भय प्राप्त होता है। गृहकी ऊँचाईसे दुगुनी भूमिकी दूरीपर वेधका दोष नहीं होता। जिस घरके द्वार बिना हाथ लगाये स्वयं खुल जाते हैं, उस घरके निवासियोंको उन्मादका रोग होता है। इसी प्रकार स्वयं बंद हो जानेपर कुलका नाश हो जाता है—ऐसा विद्वान् लोग बतलाते हैं। गृहके द्वार यदि अपने मानसे अधिक ऊँचे हैं तो राजभय तथा यदि नीचे हैं तो चोरोंका भय होता है। द्वारके ऊपर जो द्वार बनता है, वह यमराजका मुख कहा जाता है। मार्गके बीचमें बने हुए जिस गृहकी चौड़ाई बहुत अधिक होती है, वह वज्रके समान शीघ्र ही गृहपतिके विनाशका कारण होता है। यदि मुख्यद्वार अन्य द्वारोंसे निकृष्ट हो तो वह बहुत बड़ा दोषकारक होता है। अतः मुख्यद्वारकी अपेक्षा अन्य द्वारोंका बड़ा होना शुभकारक नहीं है। घट, श्रीपर्णी और लताओंसे मूलद्वारको सुशोभित रखना चाहिये और उसकी नित्य बलि, अक्षत और जलसे पूजा करनी चाहिये। घरकी पूर्व दिशामें बरगदका वृक्ष सभी प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला होता है। दक्षिणमें गूलर और पश्चिममें पीपलका पेड़ शुभकारक होता है। इसी तरह उत्तरमें पाकड़का पेड़ मङ्गलकारी है। इससे विपरीत दिशामें रहनेपर ये वृक्ष विपरीत फल देनेवाले होते हैं। घरके समीप यदि काँटे या दूधवाले वृक्ष, असनाका वृक्ष एवं फलदार वृक्ष हों तो उनसे क्रमशः स्त्री और संतानकी हानि होती है। यदि कोई उन्हें काट न सके तो उनके समीप अन्य शुभदायक वृक्षोंको लगा दे। पुंनाग, अशोक, मौलसिरी, शमी, तिलक, चम्पा, अनार, पीपली, दाख, अर्जुन, जंबीर, सुपारी, कटहल, केतकी, मालती, कमल, चमेली, मल्लिका, नारियल, केला एवं पाटल—इन वृक्षोंसे सुशोभित घर लक्ष्मीका विस्तार करता है॥ १३–२४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वास्तुविद्यासु वेधपरिवर्जनं नाम पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २५५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके वास्तु-विद्या-प्रसङ्गमें वेधविवरण नामक दो सौ पचपनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २५५ ॥
| * अध्याय २५६ * | १८३ |
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दो सौ छप्पनवाँ अध्याय
वास्तुप्रकरणमें गृह-निर्माणविधि
| सूत उवाच | |
|---|---|
| उदगादिप्लवं वास्तु समानशिखरं तथा।<br>परीक्ष्य पूर्ववत् कुर्यात् स्तम्भोच्छ्रायं विचक्षणः॥ १<br><br>न देवधूर्तसचिवचत्वराणां समीपतः।<br>कारयेद् भवनं प्राज्ञो दुःखशोकमयं ततः॥ २<br><br>तस्य प्रदेशाश्चत्वारस्तथोत्सर्गोऽग्रतः शुभः।<br>पृष्ठतः पृष्ठभागस्तु सव्यावर्तः प्रशस्यते॥ ३<br><br>अपसव्यो विनाशाय दक्षिणे शीर्षकस्तथा।<br>सर्वकामफलो नृणां सम्पूर्णो नाम वामतः॥ ४<br><br>एवं प्रदेशमालोक्य यत्नेन गृहमारभेत्।<br>अथ सांवत्सरोक्ते मुहूर्ते शुभलक्षणे॥ ५<br><br>रत्नोपरि शिलां कृत्वा सर्वबीजसमन्विताम्।<br>चतुर्भिर्ब्राह्मणैः स्तम्भं कारयित्वा सुपूजितम्॥ ६<br><br>शुक्लाम्बरधरः शिल्पिसहितो वेदपारगः।<br>स्नापितं विन्यसेत् तद्वत् सर्वौषधिसमन्वितम्॥ ७<br><br>नानाक्षतसमोपेतं वस्त्रालङ्कारसंयुतम्।<br>ब्रह्मघोषेण वाद्येन गीतमङ्गलनिःस्वनैः॥ ८<br><br>पायसं भोजयेद् विप्रान् होमं तु मधुसर्पिषा।<br>वास्तोष्पते प्रतिजानीहि मन्त्रेणानेन सर्वदा॥ ९<br><br>सूत्रपाते तथा कार्यमेवं स्तम्भोदये पुनः।<br>द्वारवंशोच्छ्रये तद्वत् प्रवेशसमये तथा॥ १०<br><br>वास्तूपशमने तद्वद् वास्तुयज्ञस्तु पञ्चधा।<br>ईशाने सूत्रपातः स्यादाग्नेये स्तम्भारोपणम्॥ ११<br><br>प्रदक्षिणं च कुर्वीत वास्तोः पदविलेखनम्।<br>तर्जनी मध्यमा चैव तथाङ्गुष्ठस्तु दक्षिणे॥ १२<br><br>प्रवालरत्नकनकफलं पिष्ट्वा कृतोदकम्।<br>सर्ववास्तुविभागेषु शस्तं पदविलेखने॥ १३ | **सूतजी कहते हैं—*ऋषियो ! बुद्धिमान् पुरुष उत्तरकी ओर झुकी हुई या समान भागवाली भूमिकी परीक्षा कर पूर्व कही गयी रीतिसे स्तम्भकी ऊँचाई आदिका निर्माण कराये। बुद्धिमान् पुरुषको देवालय, धूर्त, सचिव या चौराहेके समीप अपना घर नहीं बनवाना चाहिये; क्योंकि इससे दुःख, शोक और भय बना रहता है। घरके चारों ओर तथा द्वारके सम्मुख और पीछे कुछ भूमिको छोड़ देना शुभकारक है। पिछला भाग दक्षिणावर्त रहना ठीक है; क्योंकि वामावर्त विनाशकारक होता है। दक्षिण भागमें ऊँचा रहनेवाला घर 'सम्पूर्ण' वास्तुके नामसे अभिहित किया जाता है। वह मनुष्योंकी सभी कामनाओंको पूर्ण करता है। इस प्रकारके प्रदेशको देखकर प्रयत्नपूर्वक गृह आरम्भ करना चाहिये। सर्वप्रथम वेदज्ञ पुरोहित श्वेत वस्त्र धारण कर कारीगरके साथ ज्योतिषीके कथनानुसार शुभ मुहूर्तमें सभी बीजोंसे युक्त आधार-शिलाको रत्नके ऊपर स्थापित करे। पुनः चार ब्राह्मणोंद्वारा उस स्तम्भकी भलीभाँति पूजा कराकर उसे धो-पोंछकर अक्षत, वस्त्र, अलंकार और सर्वौषधिसे पूजितकर पूर्ववत् मन्त्रोच्चारण, बाजा और माङ्गलिक गीत आदिके शब्दके साथ स्थापित कर दे। ब्राह्मणोंको खीरका भोजन कराये और 'वास्तोष्पते प्रतिजानीहि' (ऋक्संहिता ७।५४।१) इस मन्त्रके द्वारा मधु और घीसे हवन करे। वास्तुयज्ञ पाँच प्रकारके हैं—सूत्रपात, स्तम्भारोपण, द्वारवंशोच्छ्रय (चौखट-स्थापन), गृहप्रवेश और वास्तु-शान्ति। इन सभीमें पूर्ववत् कार्य करनेका विधान है। ईशानकोणमें सूत्रपात और अग्निकोणमें स्तम्भारोपण होता है। वास्तुके पदचिह्नोंको बनाकर उसकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये। सभी वास्तु-विभागोंमें दाहिने हाथकी तर्जनी, मध्यमा और अङ्गूठेसे मूँगा, रत्न और सुवर्णके चूर्णसे मिश्रित जलद्वारा पद-चिह्न बनाना श्रेष्ठ माना गया है॥ १—१३ ॥ |
* यह पूरा मन्त्र इस प्रकार है—वास्तोष्पते प्रतिजानीह्यस्मान्स्वावेशो अनमीवो भवा नः। यत् त्वेमहे प्रति तन्नो जुषस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे॥ (ऋ० ७।५४।१, तैत्ति० सं० ३।४।१०।१)
९८४ * मत्स्यपुराण *
| श्लोक | हिन्दी अर्थ |
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| न भस्माङ्गारकाष्ठेन नखशस्त्रेण चर्मभिः।<br>न शृङ्गास्थिकपालैश्च क्वचिद् वास्तु विलेखयेत्॥ १४<br><br>एभिर्विलिखितं कुर्याद्दुःखशोकभयादिकम्।<br>यदा गृहप्रवेशः स्याच्छिल्पी तत्रापि लक्षयेत्॥ १५<br><br>स्तम्भसूत्रादिकं तद्वच्छुभाशुभफलप्रदम्।<br>आदित्याभिमुखं रौति शकुनिः परुषं यदि॥ १६<br><br>तुल्यकालं स्पृशेदङ्गं गृहभर्तुर्यदात्मनः।<br>वास्त्वङ्गे तद् विजानीयान्नरशल्यं भयप्रदम्॥ १७<br><br>अङ्कनानन्तरं यत्र हस्त्यश्वश्वापदं भवेत्।<br>तदङ्गसम्भवं विन्द्यात् तत्र शल्यं विचक्षणः॥ १८<br><br>प्रसार्यमाणे सूत्रे तु श्वा गोमायुर्विलङ्घते।<br>तत्तु शल्यं विजानीयात् खरशब्देऽतिभैरवे॥ १९<br><br>यदीशाने तु दिग्भागे मधुरं रौति वायसः।<br>धनं तत्र विजानीयाद् भागे वा स्वाम्यधिष्ठिते॥ २०<br><br>सूत्रच्छेदे भवेन्मृत्युर्व्याधिः कीले त्वधोमुखे।<br>अङ्गारेषु तथोन्मादं कपालेषु च सम्भ्रमम्॥ २१<br><br>कम्बुशल्येषु जानीयात्पौँश्चल्यं स्त्रीषु वास्तुवित्।<br>गृहभर्तुर्गृहस्यापि विनाशः शिल्पिसम्भ्रमे॥ २२<br><br>स्तम्भे स्कन्धच्युते कुम्भे शिरोरोगं विनिर्दिशेत्।<br>कुम्भापहारे सर्वस्य कुलस्यापि क्षयो भवेत्॥ २३<br><br>मृत्युः स्थानच्युते कुम्भे भग्ने बन्धं विदुर्बुधाः।<br>करसंख्याविनाशे तु नाशं गृहपतेर्विदुः॥ २४<br><br>बीजौषधिविहीने तु भूतेभ्यो भयमादिशेत्।<br>ततः प्रदक्षिणेनान्यान्यसेत् स्तम्भान् विचक्षणः॥ २५<br><br>यस्माद् भयंकरा नृणां योजिता ह्यप्रदक्षिणम्। | राख, अंगार, काष्ठ, नख, शास्त्र, चर्म, सींग, हड्डी, कपाल—इन वस्तुओंद्वारा कहीं भी वास्तुके चिह्न नहीं बनाना चाहिये; क्योंकि इनके द्वारा बनाया गया चिह्न दुःख, शोक और भय आदि उत्पन्न करता है। जिस समय गृहप्रवेश हो, उस समय कारीगरका भी रहना उचित है। स्तम्भारोपण और सूत्रपातके समय पूर्ववत् शुभ एवं अशुभ फल देनेवाले शुक होते हैं। यदि ऐसे अवसरोंपर कोई पक्षी सूर्यकी ओर मुख कर कठोर वाणी बोलता है या उस समय गृहपति अपने शरीरके किसी अङ्गपर हाथ रखता है तो समझ लेना चाहिये कि वास्तुके उसीपर भय प्रदान करनेवाली मनुष्यकी हड्डी पड़ी हुई है। सूत्र अङ्कित कर देनेके बाद यदि गृहपति अपने किसी अङ्गका स्पर्श करता है तो वास्तुके उसी अङ्गमें हाथी, अश्व तथा कुत्तेकी हड्डियाँ हैं, ऐसा बुद्धिमान् पुरुषको समझ लेना चाहिये। सूत्रको फैलाते समय उसे शृगाल या कुत्ता लाँघ जाता है और गदहा अत्यन्त भयंकर चीत्कार करता है तो ठीक उस स्थानपर हड्डी जाननी चाहिये। यदि सूत्रपातके समय ईशान कोणमें कौआ मीठे स्वरसे बोलता हो तो वास्तुके उस भागमें या जहाँ गृहपति खड़ा है, वहाँ धन है—ऐसा जानना चाहिये। सूत्रपातके समय यदि सूत्र टूट जाता है तो गृहपतिकी मृत्यु होती है। वास्तुवेत्ताको ऐसा समझना चाहिये कि कीलके नीचेकी ओर झुक जानेपर व्याधि, अंगार दिखायी पड़नेपर उन्माद, कपाल दीख पड़नेपर भय और शङ्ख या घोंघेकी हड्डी मिलनेपर कुलाङ्गनाओंमें व्यभिचारकी सम्भावना रहती है। भवन-निर्माणके समय कारीगरके पागल हो जानेपर गृहपति और घरका विनाश हो जाता है। स्थापित किये हुए स्तम्भ या कुम्भके कंधेपर गिर जानेसे गृहपतिके सिरमें रोग होता है तथा कलशकी चोरी हो जानेपर समूचे कुलका विनाश हो जाता है। कुम्भके अपने स्थानसे च्युत हो जानेपर गृहस्वामीकी मृत्यु होती है तथा फूट जानेपर वह बन्धनमें पड़ता है—ऐसा पण्डितोंने कहा है। गृहारम्भके समय हाथोंकी परिमाण-संख्या नष्ट हो जानेपर गृहपतिका नाश समझना चाहिये। बीज और ओषधियोंसे विहीन होनेपर भूतोंसे भय होता है। अतः विचारवान् पुरुष प्रदक्षिण-क्रमसे अन्य स्तम्भोंकी स्थापना करे; क्योंकि प्रदक्षिणक्रमके बिना स्थापित किये गये स्तम्भ मनुष्योंके लिये भयदायक होते हैं॥ १४–२५१/२॥ |
| * अध्याय २५६ * | ९८५ |
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| रक्षां कुर्वीत यत्नेन स्तम्भोपद्रवनाशिनीम्॥ २६<br>तथा फलवतीं शाखां स्तम्भोपरि निवेशयेत्।<br>प्रागुदकप्रवणं कुर्याद् दिङ्मूढं तु न कारयेत्॥ २७<br>स्तम्भं वा भवनं वापि द्वारं वासगृहं तथा।<br>दिङ्मूढे* कुलनाशः स्यान्न च संवर्धयेद् गृहम्॥ २८<br>यदि संवर्धयेद् गेहं सर्वदिक्षु विवर्धयेत्।<br>पूर्वेण वर्धितं वास्तु कुर्याद् वैराणि सर्वदा॥ २९<br>दक्षिणे वर्धितं वास्तु मृत्यवे स्यान्न संशयः।<br>पश्चाद् विवृद्धं यद् वास्तु तदर्थक्षयकारकम्॥ ३०<br>वर्धापितं तथा सौम्ये बहुसन्तापकारकम्।<br>आग्नेये यत्र वृद्धिः स्यात् तदग्निभयदं भवेत्॥ ३१<br>वर्धितं राक्षसे कोणे शिशुक्षयकरं भवेत्।<br>वर्धापितं तु वायव्ये वातव्याधिप्रकोपकृत्॥ ३२<br>ईशान्यामन्नहानिः स्याद् वास्तौ संवर्धिते सदा।<br>ईशाने देवतागारं तथा शान्तिगृहं भवेत्॥ ३३<br>महानसं तथाग्नेये तत्पार्श्वे चोत्तरे जलम्।<br>गृहस्योपस्करं सर्वं नैर्ऋत्ये स्थापयेद् बुधः॥ ३४<br>बन्धस्थानं बहिः कुर्यात् स्नानमण्डपमेव च।<br>धनधान्यं च वायव्ये कर्मशालां ततो बहिः।<br>एवं वास्तुविशेषः स्याद् गृहभर्तुः शुभावहः॥ ३५ | स्तम्भके उपद्रवोंका विनाश करनेवाली रक्षा-विधि भी यत्नपूर्वक सम्पन्न करनी चाहिये। इसके लिये स्तम्भके ऊपर फलोंसे युक्त वृक्षकी शाखा डाल देनी चाहिये। स्तम्भ उत्तर या पूर्वकी ओर ढालू होना चाहिये, अस्पष्ट दिशामें नहीं कराना चाहिये। इस बातका ध्यान भवन, स्तम्भ, निवासगृह तथा द्वार निर्माणके समय भी स्थापन रखना चाहिये; क्योंकि दिशाकी अस्पष्टतासे कुलका नाश हो जाता है। घरके किसी अंशको पिण्डसे आगे नहीं बढ़ाना चाहिये। यदि बढ़ाना ही हो तो सभी दिशामें बढ़ावे। पूर्व दिशामें बढ़ाया गया वास्तु सर्वदा वैर पैदा करता है, दक्षिण दिशाकी ओर बढ़ाया हुआ वास्तु मृत्युकारी होता है, इसमें संदेह नहीं है। जो वास्तु पश्चिमकी ओर बढ़ाया जाता है, वह धनक्षयकारी होता है तथा उत्तरकी ओर बढ़ाया हुआ दुःख एवं सन्तापकी वृद्धि करता है। जहाँ अग्निकोणमें वृद्धि होती है, वहाँ वह अग्निका भय देनेवाला नैर्ऋत्यकोण बढ़ानेपर शिशुओंका विनाशक, वायव्य कोणमें बढ़ानेपर वात-व्याधि-उत्पादक, ईशान कोणमें बढ़ानेपर अन्नके लिये हानिकारक होता है। गृहके ईशान कोणमें देवताका स्थान और शान्तिगृह, अग्निकोणमें रसोई घर और उसके बगलमें उत्तर दिशामें जलस्थान होना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुष सभी घरेलू सामग्रियोंको नैर्ऋत्य कोणमें करे। पशुओं आदिके बाँधनेका स्थान और स्नानागार गृहके बाहर बनाये। वायव्य कोणमें अन्नादिका स्थान बनाये। इसी प्रकार कार्यशाला भी निवास-स्थानसे बाहर बनानी चाहिये। इस ढंगसे बना हुआ भवन गृहपतिके लिये मङ्गलकारी होता है॥ २६–३५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वास्तुविद्यायां गृहनिर्णयो नाम षट्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २५६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वास्तुविद्याके प्रसङ्गमें गृहनिर्णय कथन नामक दो सौ छप्पनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २५६॥
* वाल्मी० ३।६०।६, बृहत्संहिता ५३।११५ के अनुसार जहाँ कोई निशान प्रतीत हो, वे भवनादि विमूढ कहे गये हैं।
९८६ | * मत्स्यपुराण *
दो सौ सत्तावनवाँ अध्याय
गृहनिर्माण ( वास्तुकार्य )-में ग्राह्य काष्ठ
| सूत उवाच | |
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| अथातः सम्प्रवक्ष्यामि दार्व्वाहणमुत्तमम्।<br>धनिष्ठापञ्चकं मुक्त्वा त्विष्ट्यादिकमतः परम्॥ १<br>ततः सांवत्सरादिष्टे दिने यायाद् वनं बुधः।<br>प्रथमं बलिपूजां च कुर्याद् वृक्षस्य सर्वदा॥ २<br>पूर्वोत्तरेण पतितं गृहदारु प्रशस्यते।<br>अन्यथा न शुभं विन्द्याद् याम्योपरि निपातनम्॥ ३<br>क्षीरवृक्षोद्भवं दारु न गृहे विनिवेशयेत्।<br>कृताधिवासं विहगैरनिलानलपीडितम्॥ ४<br>गजावरुग्णं च तथा विद्युन्निर्घातपीडितम्।<br>अर्धशुष्कं तथा दारु भग्नशुष्कं तथैव च॥ ५<br>चैत्यदेवालयोत्पन्नं नदीसङ्गमजं तथा।<br>श्मशानकूपनिलं तडागादिसमुद्भवम्॥ ६<br>वर्जयेत् सर्वथा दारु यदिच्छेद विपुलां श्रियम्।<br>तथा कण्टकिनो वृक्षान् नीपनिम्बविभीतकान्॥ ७<br>श्लेष्मातकानाप्रतरून्वर्जयेद्गृहकर्मणि ।<br>आसनाशोकमधुकसर्जशालाः शुभावहाः॥ ८<br>चन्दनं पनस्रं धन्यं सुरदारु हरिद्रवः।<br>द्वाभ्यामेकेन वा कुर्यात् त्रिभिर्वा भवनं शुभम्॥ ९<br>बहुभिः कारितं यस्मादनेकभयदं भवेत्।<br>एकैकशिंशपा धन्या श्रीपर्णी तिन्दुको तथा॥ १०<br>एता नान्यसमायुक्ताः कदाचिच्छुभकारकाः।<br>स्यन्दनः पनसस्तद्वत् सरलार्जुनपद्मकाः॥ ११<br>एते नान्यसमायुक्ता वास्तुकार्यफलप्रदाः। | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! अब मैं उत्तम काष्ठ लानेकी विधि बतलाता हूँ। धनिष्ठा आदि पाँच नक्षत्रों और इसके बाद भद्रा आदिको छोड़कर ज्योतिषीद्वारा बताये गये शुभ दिनमें बुद्धिमान् पुरुष काष्ठ लानेके लिये वनको प्रस्थान करे। सर्वप्रथम ग्रहण किये जानेवाले वृक्षकी बलिपूजा करनी चाहिये। पूर्व तथा उत्तर दिशाकी ओर गिरनेवाले वृक्षका काष्ठ गृहनिर्माणमें मङ्गलकारी होता है तथा दक्षिणकी ओर गिरा हुआ अशुभ होता है। दूधवाले वृक्षोंका काष्ठ घरमें नहीं लगाना चाहिये। जो वृक्ष पक्षियोंद्वारा अधिष्ठित तथा वायु और अग्निसे पीड़ित हो, हाथीसे तोड़ा हुआ हो, बिजली गिरनेसे जल गया हो, जिसका आधा भाग सूख गया हो या कुछ अंश टूट-फूट गया हो, अश्वत्थवृक्ष समाधि या देवमन्दिरसे निकले वृक्ष, नदीके संगमपर स्थित वृक्षोंको अथवा जो श्मशानभूमि तालाब आदि जलाशयोंपर उगा हुआ हो, ऐसे वृक्षोंको विपुल लक्ष्मीकी इच्छा करनेवाले व्यक्तिको छोड़ देना चाहिये। इसी प्रकार काँटेदार वृक्ष, कदम्ब, निम्ब, बहेड़ा, ढेरा और आमके वृक्षोंको भी गृहकर्ममें नहीं लेना चाहिये। असना, अशोक, महुआ, सर्ज और साखूके काष्ठ मङ्गलप्रद हैं। चन्दन, कटहल, देवदारु तथा दारुल्दीके काष्ठ धनप्रद कहे गये हैं। एक, दो या तीन प्रकारके काष्ठोंद्वारा बनाया गया भवन शुभ होता है; क्योंकि अनेक प्रकारके काष्ठोंसे बनाया हुआ भवन अनेकों भय देनेवाला होता है। धनदायक शीशम, श्रीपर्णी तथा तिन्दुकोके काष्ठको अकेले ही लगाना चाहिये; क्योंकि ये अन्य किसी काष्ठके साथ सम्मिलित कर देनेसे कभी मङ्गलकारी नहीं होते। इसी प्रकार धव, कटहल, चीड़, अर्जुन और पद्म वृक्ष भी अन्य काष्ठोंके साथ सम्मिलित होनेपर गृहकार्यके लिये शुभदायक नहीं होते॥ १—११ १/२॥ |
| तरुच्छेदे महापीते गोधा विन्द्याद्विचक्षणः॥ १२<br><br>माञ्जिष्ठवर्णे भेकः स्यान्नीले सर्पादि निर्दिशेत्।<br>अरुणे सरटं विद्यान्मुक्ताभे शुकमादिशेत्॥ १३ | वृक्ष काटते समय विचक्षण पुरुषको यदि पीले वर्णका चिह्न मिले तो भावी गृहमें गोहका, मंजीठ रंगका मिलनेपर मेढकका, नीला रंग मिलनेपर सर्पका, अरुण |
| * अध्याय २५७ * | १८७ |
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| कपिले मूषकन् विद्यात्खड्गाभे जलमादिशेत्।<br>एवंविधं सगर्भं तु वर्जयेद् वास्तुकर्मणि॥ १४<br><br>पूर्वच्छिन्नं तु गृह्णीयान्निमित्तशकुनैः शुभैः।<br>व्यासेन गुणिते दैर्घ्ये अष्टाभिर्वै हृते तथा॥ १५<br><br>यच्छेषमायतं विद्यादष्टभेदं वदामि वः।<br>ध्वजो धूम्रश्च सिंहश्च खरः श्वावृष एव च॥ १६<br><br>हस्ती ध्वाङ्क्षश्च पूर्वाद्याः करशेषा भवन्त्यमी।<br>ध्वजः सर्वमुखो धन्यः प्रत्यग्द्वारो विशेषतः॥ १७<br><br>उदङ्मुखो भवेत् सिंहः प्राङ्मुखो वृषभो भवेत्।<br>दक्षिणाभिमुखो हस्ती सप्तभिः समुदाहृतः॥ १८<br><br>एकेन ध्वज उद्दिष्टस्त्रिभिः सिंहः प्रकीर्त्तितः।<br>पञ्चभिर्वृषभः प्रोक्तो विकोणस्थांश्च वर्जयेत्॥ १९<br><br>तमेवाष्टगुणं कृत्वा करराशिं विचक्षणः।<br>सप्तविंशाहते भागे ऋक्षं विद्याद् विचक्षणः॥ २०<br><br>अष्टभिर्भाजिते ऋक्षे यः शेषः स व्ययो मतः।<br>व्यायाधिकं न कुर्वीत यतो दोषकरं भवेत्।<br>आयाधिके भवेच्छान्तिरित्याह भगवान् हरिः॥ २१<br><br>कृत्वाग्रतो द्विजवरानथ पूर्णकुम्भं<br>दध्यक्षताग्रदलपुष्पफलोपशोभम्।<br>दत्त्वा हिरण्यवसनानि तदा द्विजेभ्यो<br>माङ्गल्यशान्तिनिलयाय गृहं विशेत्तु॥ २२<br><br>गृह्योक्तहोमविधिना बलिकर्म कुर्यात्<br>प्रासादवास्तुशमने च विधिर्य उक्तः।<br>संतर्पयेद् विजवरानथ भक्ष्यभोज्यैः<br>शुक्लाम्बरःस्वभवनं प्रविशेत् सधूपम्॥ २३ | रंगसे गिरगिटका, मोतीके समान श्वेत चिह्नसे शुकका, कपिल वर्णसे चूहेका और तलवारकी भाँति चिह्न मिलनेपर जलका भय जानना चाहिये। इस प्रकारके गर्भवाले वृक्षको वास्तुकर्ममें त्याग देना चाहिये। पहलेसे कटे हुए वृक्षको शुभदायी निमित्त शकुनोंके साथ ग्रहण किया जा सकता है। घरके व्याससे लम्बाईके मानमें गुणाकर आठका भाग दे, जो शेष बचे उसे आयत जानना चाहिये। अब मैं आपलोगोंको आठका भेद बतला रहा हूँ। उन करशेषोंकी क्रमशः ध्वज, धूम, सिंह, खर, श्वान, वृषभ, हस्ती और काक संज्ञा होती है। चारों ओर मुखवाला तथा विशेषतया पश्चिम द्वारवाला ध्वज शुभकारी होता है। सिंहका उत्तर, वृषभका पूर्व, हाथीका दक्षिण मुख दुःखदायी होता है। सात विभागोंद्वारा इसे कहा जा चुका है। एक हाथसे ध्वजको, तीन हाथसे सिंहको और पाँच हाथसे वृषभको तो कहा गया। इनके अतिरिक्त जो त्रिकोणस्थ हों उन्हें व्यवहारमें नहीं लाना चाहिये। विचक्षण पुरुष उक्त करराशिके अंकको आठसे गुणाकर सत्ताईसका भाग देनेपर शेषको नक्षत्र माने। पुनः उस नक्षत्रमें आठका भाग देनेसे जो शेष बचता है, वह व्यय माना गया है। जिसमें व्यय अधिक निकले, उसे नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह दोषकारक होता है। आय अधिक होनेपर शान्ति होती है, ऐसा भगवान् हरिने कहा है। गृह पूर्ण हो जानेपर उसमें माङ्गलिक शान्तिकी स्थितिके लिये श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको आगे कर दही, अक्षत, आमके पल्लव, पुष्प तथा फलादिसे सुशोभित जलपूर्ण कलशको देकर तथा अन्य ब्राह्मणोंको सुवर्ण और वस्त्र देकर उस भवनमें गृहपतिको प्रवेश करना चाहिये। उस समय गृह्यसूत्रोंमें प्रासाद एवं वास्तुकी शान्तिके लिये जो विधि कही गयी है, उसके अनुसार हवन एवं बलि-कर्म करे। फिर भक्ष्य एवं भोज्य पदार्थोंद्वारा ब्राह्मणोंको सन्तुष्ट करे। तत्पश्चात् श्वेत वस्त्र धारणकर धूपादि द्रव्योंके साथ भवनमें प्रवेश करना चाहिये॥ १२-२३॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वास्तुविद्यानुकीर्तनं नाम सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २५७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वास्तुविद्यानुकीर्तन नामक दो सौ सत्तावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २५७॥
९८८ * मत्स्यपुराण *
दो सौ अट्ठावनवाँ अध्याय
देव-प्रतिमाका प्रमाण-निरूपण
| ऋषय ऊचुः<br>क्रियायोगः कथं सिध्येद् गृहस्थादिषु सर्वदा।<br>ज्ञानयोगसहस्त्राद्धि कर्मयोगो विशिष्यते॥ १ | ऋषियोंने पूछा—सूतजी! गृहस्थादि आश्रमोंमें सभी युगोंमें क्रियायोगकी* सिद्धि किस प्रकार सम्भव है, क्योंकि क्रिया (भक्ति)-योगको हजारों ज्ञान-योगकी अपेक्षा विशिष्ट माना गया है॥ १॥ |
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| सूत उवाच<br>क्रियायोगं प्रवक्ष्यामि देवतार्चानुकीर्तनम्।<br>भुक्तिमुक्तिप्रदं यस्मान्नान्यल्लोकेषु विद्यते॥ २<br>प्रतिष्ठायां सुराणां तु देवतार्चानुकीर्तनम्।<br>देवयज्ञोत्सवं चापि बन्धनाद् येन मुच्यते॥ ३<br>विष्णोस्तावत् प्रवक्ष्यामि यादग्रूपं प्रशस्यते।<br>शङ्खचक्रधरं शान्तं पद्महस्तं गदाधरम्॥ ४<br>छत्राकारं शिरस्तस्य कम्बुग्रीवं शुभेक्षणम्।<br>तुङ्गनासं शुक्तिकर्णं प्रशान्तोर्भुजक्रमम्॥ ५<br>क्वचिदष्टभुजं विद्याच्चतुर्भुजमथापरम्।<br>द्विभुजश्चापि कर्तव्यो भवनेषु पुरोधसा॥ ६<br>देवस्याष्टभुजस्यास्य यथास्थानं निबोधत।<br>खड्गो गदा शरः पद्मं देयं दक्षिणतो हरेः॥ ७<br>धनुश्च खेटकं चैव शङ्खचक्रे च वामतः।<br>चतुर्भुजस्य वक्ष्यामि यथैवायुधसंस्थितिम्॥ ८<br>दक्षिणेन गदा पद्मं वासुदेवस्य कारयेत्।<br>वामतः शङ्खचक्रे च कर्तव्ये भूतिमिच्छता॥ ९<br>कृष्णावतारे तु गदा वामहस्ते प्रशस्यते।<br>यथेच्छया शङ्खचक्रे चोपरिष्टात् प्रकल्पयेत्॥ १० | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! अब मैं देवार्चनकथनस्वरूप क्रियायोगका वर्णन कर रहा हूँ। यह भोग और मोक्ष—दोनोंको देनेवाला है तथा भूलोकके अतिरिक्त इसकी अन्य लोकोंमें सत्ता नहीं है। इन देवताओंकी प्रतिमा-प्रतिष्ठाके प्रसङ्ग-क्रममें प्रतिमा-निर्माण और उनके अङ्गभूत यज्ञकी विधि भी निर्दिष्ट है, जिसके अनुष्ठानसे प्राणी बन्धनसे मुक्त हो जाता है। अब भगवान् विष्णुकी जैसी प्रतिमा श्रेष्ठ मानी जाती है उसका वर्णन कर रहा हूँ। उनकी प्रतिमाका रूप शान्त हो, हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा तथा पद्म धारण किये हुए हो, उसका सिर छत्रके समान गोल, गला शङ्खके समान, आँखें सुन्दर, नासिका कुछ ऊँची, कान सीपी-सदृश, भुजाएँ विशाल और ऊरु प्रशान्त—चढ़ाव-उतारवाले होने चाहिये। विष्णुभगवान्की प्रतिमा कहीं तो आठ भुजाओंवाली होती है और कहीं चार भुजाओंवाली; किंतु गृहस्थको अपने भवनमें दो भुजाओंकी (विष्णु-) प्रतिमा पुरोहितद्वारा स्थापित करानी चाहिये। अष्टभुज मूर्तिमें आयुधोंके यथास्थान क्रमको सुनिये—भगवान् श्रीहरिके दाहिनी ओरके चार हाथोंमें क्रमशः (नीचेसे ऊपरकी ओर) खड्ग, गदा, बाण और कमल तथा बायें हाथमें क्रमशः (नीचेसे ऊपर) धनुष, ढाल, शङ्ख और चक्र स्थापित करना चाहिये। अब चतुर्भुजमूर्तिके हाथोंमें आयुधकी स्थिति बतला रहा हूँ। समृद्धिकी इच्छा रखनेवालेको भगवान् वासुदेवकी प्रतिमामें दाहिनी ओरके दोनों हाथोंमें क्रमशः नीचेसे ऊपर गदा और पद्म तथा बायीं ओर क्रमशः नीचेसे ऊपर शङ्ख और चक्र रखना चाहिये। कृष्णावतारकी प्रतिमामें बायें हाथमें गदा ठीक मानी गयी है। दाहिने हाथमें स्वेच्छानुसार शङ्ख और चक्रको ऊपर-नीचे रखना चाहिये॥ २—१०॥ |
* यह पाद्मीय क्रियायोग-खण्डका सारांश तथा भाग ११। २७ के क्रियायोगका कुछ विस्तृत रूप है। यहाँ क्रियायोगका तात्पर्य देवपरक भगवद्भक्ति एवं देवार्चनसे है। मन्दिर, प्रतिमा-निर्माण, प्रतिष्ठादिका यह प्रकरण भारतीय धर्म-संस्कृति एवं कला-कौशलका प्राण है। इसकी विस्तृत जानकारीके लिये 'विष्णुधर्मोत्तर' 'शिल्परत्न' 'वास्तुरजवल्लभ'—'प्रतिमा-प्रसादमण्डन' 'काश्यपशिल्प' 'अपराजित-पृच्छा' 'समराङ्गणसूत्रधार' 'प्रतिष्ठामहोदधि' आदि सहायक ग्रन्थ भी अनुसंधेय है।