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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 984 of 1098

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Page 984
९७४* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पूर्वं भूमिं परीक्षेत पश्चाद्वास्तुं प्रकल्पयेत् ।<br>श्वेता रक्ता तथा पीता कृष्णा चैवानुपूर्वशः ॥ ११<br><br>विप्रादः शस्यते भूमिरतः कार्यं परीक्षणम् ।<br>विप्राणां मधुरास्वादा कटुका क्षत्रियस्य तु ॥ १२<br><br>तिक्ता कषाया च तथा वैश्यशूद्रेषु शस्यते ।<br>अरत्निमात्रे वै गर्ते स्वनुलिप्ते च सर्वशः ॥ १३<br><br>घृतमामशरावस्थं कृत्वा वर्त्तिचतुष्टयम् ।<br>ज्वालयेद् भूपरीक्षार्थं तत्पूर्णं सर्वदिङ्मुखम् ॥ १४<br><br>दीप्तौ पूर्वादि गृह्णीयाद् वर्णानामनुपूर्वशः ।<br>वास्तुः सामूहिको नाम दीप्यते सर्वतस्तु यः ॥ १५<br><br>शुभदः सर्ववर्णानां प्रासादेषु गृहेषु च ।<br>रत्निमात्रमधोगर्ते परीक्ष्यं खातपूरणे ॥ १६<br><br>अधिके श्रियमाप्नोति न्यूने हानिं समे समम् ।<br>फालकृष्टेऽथवा देशे सर्वबीजानि वापयेत् ॥ १७<br><br>त्रिपञ्चसप्तरात्रे च यत्रारोहन्ति तान्यपि ।<br>ज्येष्ठोत्तमा कनिष्ठा भूर्वर्जनीयतरा सदा ॥ १८<br><br>पञ्चगव्यौषधिजलैः परीक्ष्यित्वा च सेचयेत् ।<br>एकाशीतिपदं कृत्वा रेखाभिः कनकेन च ॥ १९<br><br>पश्चात् पिष्टेन चालिप्य सूत्रेणालोड्य सर्वतः ।<br>दश पूर्वायता लेखा दश चैवोत्तरायताः ॥ २०<br><br>सर्ववास्तुविभागेषु विज्ञेया नवका नव ।<br>एकाशीतिपदं कृत्वा वास्तुवित् सर्ववास्तुषु ॥ २१पहले भूमिकी परीक्षाकर फिर बादमें वहाँ गृहका निर्माण करना चाहिये। श्वेत, लाल, पीली और काली—इन चार वर्णोंवाली पृथिवी क्रमशः ब्राह्मणादि चारों वर्णोंके लिये प्रशंसित मानी गयी है। इसके बाद उसके स्वादकी परीक्षा करनी चाहिये। ब्राह्मणके लिये मधुर स्वादवाली, क्षत्रियके लिये कड़वी, वैश्यके लिये तिक्त तथा शूद्रके लिये कसैली स्वादवाली पृथ्वी उत्तम मानी गयी है। तत्पश्चात् भूमिकी पुनः परीक्षाके लिये एक हाथ गहरा गड्डा खोदकर उसे सब ओरसे भलीभाँति लीप-पोतकर स्वच्छ कर दे। फिर एक कच्चे पुरवेमें घी भरकर उसमें चार बत्तियाँ जला दे और उसे उसी गड्ढेमें रख दे। उन बत्तियोंकी लौ क्रमशः चारों दिशाओंकी ओर हों। यदि पूर्व दिशाकी बत्ती अधिक कालतक जलती रहे तो ब्राह्मणके लिये उसका फल शुभ होता है। इसी प्रकार क्रमशः उत्तर, पश्चिम और दक्षिणकी बत्तियोंको क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रोंके लिये कल्याणकारक समझना चाहिये। यदि वह वास्तुदीपक चारों दिशाओंमें जलता रहे तो प्रासाद एवं साधारण गृह-निर्माणके लिये वहाँकी भूमि सभी वर्णोंके लिये शुभदायिनी है। एक हाथ गहरा गड्डा खोदकर उसे उसी मिट्टीसे पूर्ण करते समय इस प्रकार परीक्षा करे कि यदि मिट्टी शेष रह जाय तो श्रीकी प्राप्ति होती है, न्यून हो जाय तो हानि होती है तथा सम रहनेसे समभाव होता है। अथवा भूमिको हलद्वारा जुतवाकर उसमें सभी प्रकारके बीज बो दे। यदि वे बीज तीन, पाँच तथा सात रातोंमें अङ्कुरित हो जाते हैं तो उनके फल इस प्रकार जानने चाहिये। तीन रातवाली भूमि उत्तम, पाँच रातवाली भूमि मध्यम तथा सात रातवाली कनिष्ठ है। कनिष्ठ भूमिको सर्वथा त्याग देना चाहिये। इस प्रकार भूमि-परीक्षा कर पञ्चगव्य और ओषधियोंके जलसे भूमिको सींच दे और सुवर्णकी सलाईद्वारा रेखा खींचकर इक्यासी कोष्ठ बनावे। (कोष्ठ बनानेका ढंग इस प्रकार है—) पिष्टकसे चुपड़े हुए सूतसे दस रेखाएँ पूर्वसे पश्चिम तथा दस रेखाएँ उत्तरसे दक्षिणकी ओर खींचे। सभी प्रकारके वास्तु-विभागोंमें इस नव-नव (९x९) अर्थात् इक्यासी* कोष्ठका वास्तु जानना चाहिये। वास्तुशास्त्रको जाननेवाला सभी प्रकारके वास्तुसम्बन्धी कार्योंमें इसका उपयोग करे ॥ ११—२१ ॥
पदस्थान् पूजयेद् देवांस्त्रिंशत् पञ्चदशैव तु ।<br>द्वात्रिंशद् बाह्यतः पूज्याः पूज्याश्चान्तस्त्रयोदश ॥ २२फिर उन कोष्ठोंमें स्थित पैंतालीस देवताओंकी पूजा करे। उनमें बत्तीसकी बाहरसे तथा तेरहकी भीतरसे पूजा

* वास्तुचक्र तीन प्रकारके होते हैं—एक सौ पदका, दूसरा ८१ पदका और तीसरा ६४ पदका। यहाँ ८१ पदका ही वर्णन है।