Skip to content
SarvaKosh
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 989 of 1098

Read in context
Page 989
* अध्याय २५४ *१७९

| शिल्पिनां कञ्चुकीनां च वेश्यानां गृहपञ्चकम्।<br>अष्टाविंशत् कराणां तु विहीनं विस्तरे क्रमात्॥ २३<br><br>द्विगुणं दैर्घ्यमेवोक्तं मध्यमेष्वेवमेव तत्।<br>दूतीकर्मान्तिकादीनां वक्ष्ये भवनपञ्चकम्॥ २४<br><br>चतुर्थांशाधिकं दैर्घ्यं विस्तारो द्वादशैव तु।<br>अर्धार्धकरहानिः स्याद् विस्तारात् पञ्चशः क्रमात्॥ २५<br><br>दैवज्ञगुरुवैद्यानां सभास्तारपुरोधसाम्।<br>तेषामपि प्रवक्ष्यामि तथा भवनपञ्चकम्॥ २६<br><br>चत्वारिंशत् तु विस्ताराच्चतुर्भिर्हीयते क्रमात्।<br>पञ्चस्वेतेषु दैर्घ्यं च षड्भागेनाधिकं भवेत्॥ २७<br><br>चतुर्वर्णस्य वक्ष्यामि सामान्यं गृहपञ्चकम्।<br>द्वात्रिंशतः कराणां तु चतुर्भिर्हीयते क्रमात्॥ २८<br><br>आषोडशादिति परं नूनमन्त्यावसायिनाम्।<br>दशांशेनाष्टभागेन त्रिभागेनाथ पादिकम्॥ २९<br><br>अधिकं दैर्घ्यमित्याहुर्ब्राह्मणादेः प्रशस्यते।<br>सेनापतेर्नृपस्यापि गृहयोरन्तरेण तु॥ ३०<br><br>नृपवासगृहं कार्यं भाण्डागारं तथैव च।<br>सेनापतेर्गृहस्यापि चातुर्वर्ण्यस्य चान्तरे।<br>वासाय च गृहं कार्यं राजपूज्येषु सर्वदा॥ ३१<br><br>अन्तरप्रभवानां च स्वपितुर्गृहमिष्यते।<br>तथा हस्तशतादर्धं गदितं वनवासिनाम्॥ ३२<br><br>सेनापतेर्नृपस्यापि सप्तत्या सहितेऽन्विते।<br>चतुर्दशहृते व्यासे शालान्यासः प्रकीर्तितः॥ ३३<br><br>पञ्चत्रिंशान्विते तस्मिन्नालिन्दः समुदाहृतः।<br>तथा षड्विंशद्धस्ता तु सप्ताङ्गुलसमन्विता॥ ३४<br><br>विप्रस्य महती शाला न दैर्घ्यं परतो भवेत्।<br>दशाङ्गुलाधिका तद्वत् क्षत्रियस्य विधीयते॥ ३५ | अब शिल्पकार, कंचुकी और वेश्याओंके पाँच प्रकारके भवनोंको सुनिये। इन सभी भवनोंकी चौड़ाई अट्ठाईस हाथ कही गयी है। अन्य चारों भवनोंकी चौड़ाईमें क्रमशः दो-दो हाथकी न्यूनता होती है। लम्बाई चौड़ाईसे दुगुनी कही गयी है॥ १४-२३ १/२ ॥<br><br>अब मैं दूती-कर्म करनेवालों तथा परिवारके अन्य लोगोंके पाँच प्रकारके भवनोंको बतला रहा हूँ। उनकी चौड़ाई बारह हाथकी तथा लम्बाई उससे सवाया अधिक होती है। शेष चार गृहोंकी चौड़ाई क्रमशः आधा-आधा हाथ न्यून होती है। अब मैं ज्योतिषी, गुरु, वैद्य, सभापति और पुरोहित—इन सभीके पाँच प्रकारके भवनोंका वर्णन कर रहा हूँ। उनके उत्तम भवनकी चौड़ाई चालीस हाथकी होती है। शेषकी क्रमसे चार-चार हाथकी कम होती है। इन पाँचों भवनोंकी लम्बाई चौड़ाईके षष्ठांशसे अधिक होती है। अब फिर साधारणतया चारों वर्णोंके लिये पाँच प्रकारके गृहोंका वर्णन करता हूँ। उनमें ब्राह्मणके घरकी चौड़ाई बत्तीस हाथकी होनी चाहिये। अन्य जातियोंके लिये क्रमशः चार-चार हाथकी कमी होनी चाहिये। (अर्थात् ब्राह्मणके उत्तम गृहकी चौड़ाई बत्तीस हाथ, क्षत्रियके घरकी अट्ठाईस हाथ, वैश्यके घरकी चौबीस हाथ तथा सत्-शूद्रके घरकी बीस हाथ और असत्-शूद्रके घरकी सोलह हाथ होनी चाहिये।) किंतु सोलह हाथसे कमकी चौड़ाई अन्त्यजोंके लिये है। ब्राह्मणके घरकी लम्बाई चौड़ाईसे दशांश, क्षत्रियके घरकी अष्टमांश, वैश्यके घरकी तिहाई और शूद्रके घरकी चौथाई भाग अधिक होनी चाहिये। यही विधि श्रेष्ठ मानी गयी है। सेनापति और राजाके गृहोंके बीचमें राजाके रहनेका गृह बनाना चाहिये। उसी स्थानपर भाण्डागार भी रहना चाहिये। सेनापतिके तथा चारों वर्णोंके गृहोंके मध्य भागमें सर्वदा राजाके पूज्य लोगोंके निवासार्थ गृह बनवाना चाहिये। इसके अतिरिक्त विभिन्न जातियोंके लिये एवं वनेचरोंके लिये शयन करनेका घर पचास हाथका बनवाना चाहिये। सेनापति और राजाके गृहके परिमाणमें सत्तरका योग करके चौदहका भाग देनेपर व्यासमें शालाका न्यास कहा गया है। उसमें पैंतीस हाथपर बरामदेका स्थान कहा गया है। छत्तीस हाथ सात अङ्गुल लम्बी ब्राह्मणकी बड़ी शाला होनी चाहिये। उसी प्रकार दस अङ्गुल अधिक क्षत्रियकी शाला होनी चाहिये॥ २४-३५॥ |