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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 987 of 1098

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Page 987
* अध्याय २५४ *९७७

दो सौ चौवनवाँ अध्याय

वास्तुशास्त्रके अन्तर्गत राजप्रासाद आदिकी निर्माण-विधि

सूत उवाच
चतुःशालं प्रवक्ष्यामि स्वरूपान्नामतस्तथा।<br>चतुःशालं चतुर्द्वारैरलिन्दैः सर्वतोमुखम्॥ १<br><br>नाम्ना तत् सर्वतोभद्रं शुभं देवनृपालये।<br>पश्चिमद्वारहीनं च नन्द्यावर्तं प्रचक्षते॥ २<br><br>दक्षिणद्वारहीनं तु वर्धमानमुदाहृतम्।<br>पूर्वद्वारविहीनं तत् स्वस्तिकं नाम विश्रुतम्॥ ३<br><br>रुचकं चोत्तरद्वारविहीनं तत् प्रचक्षते।<br>सौम्यशालाविहीनं यत् त्रिशालं धान्यकं च तत्॥ ४<br><br>क्षेमवृद्धिकरं नृणां बहुपुत्रफलप्रदम्।<br>शालया पूर्वया हीनं सुक्षेत्रमिति विश्रुतम्॥ ५<br><br>धन्यं यशस्यमायुष्यं शोकमोहविनाशनम्।<br>शालया याम्यया हीनं यद् विशालं तु शालया॥ ६<br><br>कुलक्षयकरं नृणां सर्वव्याधिभयावहम्।<br>हीनं पश्चिमया यत् तु पक्षघ्नं नाम तत् पुनः॥ ७<br><br>मित्रबन्धुसुतान् हन्ति तथा सर्वभयावहम्।<br>याम्यापराभ्यां शालाभ्यां धनधान्यफलप्रदम्॥ ८<br><br>क्षेमवृद्धिकरं नृणां तथा पुत्रफलप्रदम्।<br>यमसूर्यं च विज्ञेयं पश्चिमोत्तरशालकम्॥ ९<br><br>राजाग्निभयदं नृणां कुलक्षयकरं च यत्।<br>उदक्पूर्वे तु शाले दण्डाख्ये यत्र तद् भवेत्॥ १०सूतजी कहते हैं—ऋषियो! अब मैं चतुःशाल* (त्रिशाल, द्विशाल आदि) भवनोंके स्वरूप, उनके विशिष्ट नामोंके साथ बतला रहा हूँ। जो चतुःशाल चारों ओर भवन, द्वार तथा बरामदोंसे युक्त हो, उसे 'सर्वतोभद्र' कहा जाता है। वह देव-मन्दिर तथा राजभवनके लिये मङ्गलकारक होता है। वह चतुःशाल यदि पश्चिम द्वारसे हीन हो तो 'नन्द्यावर्त', दक्षिणद्वारसे हीन हो तो 'वर्धमान', पूर्वद्वारसे रहित हो तो 'स्वस्तिक', उत्तरद्वारसे विहीन हो तो 'रुचक' कहा जाता है। (अब त्रिशाल भवनोंके भेद बतलाते हैं।) उत्तर दिशाकी शालासे रहित जो त्रिशाल भवन होता है, उसे 'धान्यक' कहते हैं। वह मनुष्योंके लिये कल्याण एवं वृद्धि करनेवाला तथा अनेक पुत्ररूप फल देनेवाला होता है। पूर्वकी शालासे विहीन त्रिशाल भवनको 'सुक्षेत्र' कहते हैं। वह धन, यश और आयु प्रदान करनेवाला तथा शोक-मोहका विनाशक होता है। जो दक्षिणकी शालासे विहीन होता है, उसे 'विशाल' कहते हैं। वह मनुष्योंके कुलका क्षय करनेवाला तथा सब प्रकारकी व्याधि और भय देनेवाला होता है। जो पश्चिमशालासे हीन होता है, उसका नाम 'पक्षघ्न' है, वह मित्र, बन्धु और पुत्रोंका विनाशक तथा सब प्रकारका भय उत्पन्न करनेवाला होता है। (अब 'द्विशालों'के भेद कहते हैं—) दक्षिण एवं पश्चिम—दो शालाओंसे युक्त भवनको धनधान्यप्रद कहते हैं। वह मनुष्योंके लिये कल्याणका वर्धक तथा पुत्रप्रद कहा गया है। पश्चिम और उत्तरशालावाले भवनको 'यमसूर्य' नामक शाल जानना चाहिये। वह मनुष्योंके लिये राजा और अग्निसे भयदायक और कुलका विनाशक होता है। जिस भवनमें केवल पूर्व और उत्तरकी ही दो शालाएँ हों, उसे 'दण्ड' कहते हैं।

* रावणादिके ऐसे चतुःशाल, त्रिशाल आदि भवनोंका उल्लेख वाल्मीकीय रामायण, सुन्दरकाण्ड, राजतरङ्गिणी ३। १२, मृच्छकटिकनाटक ३। ७ तथा बृहत्संहिता अ० ५३ आदिमें आता है। शिल्परत्न, समराङ्गण, काश्यपशिल्पादिमें इनकी रचनाका विस्तृत विधान है।