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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 981 of 1098

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Page 981
  • अध्याय २५२ * | ९७१

| विदारयन् गिरिशिखराणि पत्रिभि- <br> र्महाभये सुरगणविग्रहे तदा । <br> ततो महीं लवणजलं च सागरं <br> महासुराः प्रविविशुरर्दिताः सुरैः ॥ ३४ <br> वियद्गतं ज्वलितहुताशनप्रभं <br> सुदर्शनं परिकुपितं निशम्य च । <br> ततः सुरैर्विजयमवाप्य मन्दरः <br> स्वमेव देशं गमितः सुपूजितः ॥ ३५ <br> वितत्य खं दिवमथ चैव सर्वश- <br> स्ततो गताः सलिलधरा यथागतम् । <br> ततोऽमृतं सुनिहितमेव चक्रिरे <br> सुराः परां मुदमभिगम्य पुष्कलाम् । <br> ददुश्च तं निधिममृतस्य रक्षितं <br> किरीटिने बलिभिरथामरैः सह ॥ ३६ | कर दिया और बाणोंके प्रहारसे पर्वत-शिखरोंको विदीर्ण कर दिया। इस प्रकार देवताओंद्वारा ताड़ित किये गये बड़े-बड़े असुर योद्धा पाताल एवं खारे समुद्रमें प्रविष्ट हो गये। जलती हुई अग्निके समान कान्तिमान् एवं अतिशय कोपमें भरे हुए सुदर्शन चक्रको आकाशमें गया हुआ सुनकर देवगण विजयी हुए। तदनन्तर मन्दराचलको आदरपूर्वक अपने स्थानपर स्थापित कर दिया गया और सभी दिशाओं तथा आकाशमें फैले हुए बादसमूह भी जैसे आये थे वैसे ही चले गये। तत्पश्चात् देवगण परम हर्षपूर्वक अमृतको सुरक्षित कर लिये और उसकी संचित निको बलवान् देवताओंके साथ किरीटधारी भगवान्‌को सुरक्षाके लिये सौंप दिया गया ॥ २६-३६ ॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽमृतमन्थनं नामैकपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५१ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अमृतमन्थन नामक दो सौ इक्यावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २५१ ॥


दो सौ बावनवाँ अध्याय

वास्तुके प्रादुर्भावकी कथा

| ऋषय ऊचुः <br> प्रासादभवनादीनां निवेशं विस्तराद् वद। <br> कुर्यात् केन विधानेन कश्च वस्तुरुदाहृतः ॥ १ | ऋषियोंने पूछा— सूतजी! अब आप हमलोगोंको राजभवन आदिके संनिवेशकी और उनके बनाये जानेकी विधि विस्तारपूर्वक बतलाइये। साथ ही वास्तु क्या कहलाता है, इसपर भी प्रकाश डालिये ॥ १ ॥ |
| सूत उवाच <br> भृगुरत्रिर्वसिष्ठश्च विश्वकर्मा मयस्तथा। <br> नारदो नग्नजिच्चैव विशालाक्षः पुरंदरः ॥ २ <br> ब्रह्मा कुमारो नन्दीशः शौनको गर्ग एव च। <br> वासुदेवोऽनिरुद्धश्च तथा शुक्रबृहस्पती ॥ ३ <br> अष्टादशैते विख्याता वास्तुशास्त्रोपदेशकाः। <br> संक्षेपेणोपदिष्टं यन्मनवे मत्स्यरूपिणा ॥ ४ | सूतजी कहते हैं— ऋषियो! भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वकर्मा, मय, नारद, नग्नजित्, भगवान् शंकर, इन्द्र, ब्रह्मा, कुमार, नन्दीश्वर, शौनक, गर्ग, वासुदेव, अनिरुद्ध, शुक्र तथा बृहस्पति—ये अठारह वास्तुशास्त्रके* उपदेष्टा माने गये हैं। जिसे मत्स्यरूपधारी भगवान्‌ने संक्षेपमें मनुके प्रति उपदेश किया था, |


* वास्तुके अर्थ बसनेकी जगह, घर, गाँव, नींव आदि हैं। इसपर समराङ्गणसूत्रधार, वास्तुराजवल्लभ, वृहत्संहिता, शिल्परत्न, गृहरत्नभूषण आदि ग्रन्थोंमें पूर्ण विचार है। पुराणोंमें अग्नि, विष्णुधर्म आदिमें ऐसी ही चर्चा है। इस विद्याका संक्षिप्त उल्लेख ऋग्वेद, शतपथ ब्राह्मण, श्रौतसूत्रों एवं मनु० ३।८९ आदिमें भी है। इसके मुख्य प्रवर्तक एवं ज्ञाता-कर्ता विश्वकर्मा एवं मयदानव हैं।