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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 982 of 1098

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Page 982
९७२* मत्स्यपुराण *
संस्कृतहिन्दी
तदिदानीं प्रवक्ष्यामि वास्तुशास्त्रमनुत्तमम्।<br>पुरान्धकवधे घोरे घोररूपस्य शूलिनः॥ ५<br>ललाटस्वेदसलिलमपतद् भुवि भीषणम्।<br>करालवदनं तस्माद् भूतमुद्भूतमुल्यणम्॥ ६<br>ग्रसमानमिवाकाशं सप्तद्वीपां वसुंधराम्।<br>ततोऽन्धकानां रुधिरमपिबत् पतितं क्षितौ॥ ७<br>तेन तत् समरे सर्वं पतितं यन्महीतले।<br>तथापि तृप्तिमगमन्न तद् भूतं यदा तदा॥ ८<br>सदाशिवस्य पुरतस्तपश्चक्रे सुदारुणम्।<br>क्षुधाविष्टं तु तद् भूतमाहर्तुं जगतीतत्रयम्॥ ९<br>ततः कालेन संतुष्टो भैरवस्तस्य चाह वै।<br>वरं वृणीष्व भद्रं ते यदभीष्टं तवानघ॥ १०उसी श्रेष्ठ वास्तुशास्त्रको मैं आपलोगोंसे बतला रहा हूँ। प्राचीन कालमें भयंकर अन्धक-वधके समय विकराल रूपधारी भगवान् शंकरके ललाटसे पृथ्वीपर स्वेदबिन्दु गिरे थे। उससे एक भीषण एवं विकराल मुखवाला उत्कट प्राणी उत्पन्न हुआ। वह ऐसा प्रतीत होता था मानो सातों द्वीपोंसहित वसुंधरा तथा आकाशको निगल जायगा। तत्पश्चात् वह पृथ्वीपर गिरे हुए अन्धकोंके रक्तका पान करने लगा। इस प्रकार वह उस युद्धमें पृथ्वीपर गिरे हुए सारे रक्तको पान कर गया। किंतु इतनेपर भी जब वह तृप्त न हुआ, तब भगवान् सदाशिवके सम्मुख अत्यन्त घोर तपस्यामें संलग्न हो गया। भूखसे व्याकुल होनेपर जब वह पुनः त्रिलोकीको भक्षण करनेके लिये उद्यत हुआ, तब उसकी तपस्यासे संतुष्ट होकर भगवान् शंकर उससे बोले—'निष्पाप! तुम्हारा कल्याण हो, अब तुम्हारी जो अभिलाषा हो, वह वर माँग लो'॥ २—१०॥
तमुवाच ततो भूतं त्रैलोक्यग्रसनक्षमम्।<br>भवामि देवदेवेश तथेत्युक्तं च शूलिना॥ ११तब उस प्राणीने शिवजीसे कहा—'देवदेवेश! मैं तीनों लोकोंको ग्रस लेनेके लिये समर्थ होना चाहता हूँ।' इसपर त्रिशूलधारी शिवजीने कहा—'ऐसा ही होगा'।
ततस्तत् त्रिदिवं सर्वं भूमण्डलमशेषतः।<br>स्वदेहेनान्तरिक्षं च रुन्धानं प्रपतद् भुवि॥ १२फिर तो वह प्राणी अपने विशाल शरीरसे स्वर्ग, सम्पूर्ण भूमण्डल और आकाशको अवरुद्ध करता हुआ पृथ्वीपर आ गिरा।
भीतभीतैस्ततो देवैर्ब्रह्माणा चाथ शूलिना।<br>दानवासुररक्षोभिरवष्टब्धं समन्ततः॥ १३<br>येन यत्रैव चाक्रान्तं स तत्रैवावसत् पुनः।<br>निवासात् सर्वदेवानां वास्तुरीत्यभिधीयते॥ १४तब भयभीत हुए देवताओं तथा ब्रह्मा, शिव, दानव, दैत्य और राक्षसोंद्वारा वह स्तम्भित कर दिया गया। उस समय जिसने उसे जहाँपर आक्रान्त कर रखा था, वह वहीं निवास करने लगा। इस प्रकार सभी देवताओंके निवास करनेके कारण वह वास्तु नामसे विख्यात हुआ।
अवष्टब्धेन तेनापि विज्ञप्ताः सर्वदेवताः।<br>प्रसीदध्वं सुराः सर्वे युष्माभिर्निश्चलीकृतः॥ १५<br>स्थास्याम्यहं किमाकारो ह्यवष्टब्धो ह्यधोमुखः।<br>ततो ब्रह्मादिभिः प्रोक्तं वास्तुमध्ये तु यो बलिः॥ १६तब उस दबे हुए प्राणीने भी सभी देवताओंसे निवेदन किया—'देवगण! आपलोग मुझपर प्रसन्न हों। आपलोगोंद्वारा मैं दबाकर निश्चल बना दिया गया हूँ। भला इस प्रकार अवरुद्ध कर दिये जानेपर नीचे मुख किये हुए मैं किस तरह कबतक स्थित रह सकूँगा।' उसके ऐसा निवेदन करनेपर ब्रह्मा आदि देवताओंने कहा—
आहारो वैश्वदेवान्ते नूनमस्य भविष्यति।<br>वास्तूपशमनो यज्ञस्तवाहारो भविष्यति॥ १७'वास्तुके प्रसङ्गमें तथा वैश्वदेवके अन्तमें जो बलि दी जायगी, वह निश्चय ही तुम्हारा आहार होगी। वास्तु-शान्तिके लिये जो यज्ञ होगा, वह भी तुम्हें आहारके रूपमें प्राप्त होगा।
यज्ञोत्सवादौ च बलिस्तवाहारो भविष्यति।<br>वास्तूपूजामकुर्वाणस्तवाहारो भविष्यति॥ १८यज्ञोत्सवमें दी गयी बलि भी तुम्हें आहाररूपमें प्राप्त होगी। वास्तु-पूजा न करनेवाले भी तुम्हारे आहार होंगे।