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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 983 of 1098

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Page 983

* अध्याय २५३ * । ९७३

अज्ञानात् तु कृतो यज्ञस्तवाहारो भविष्यति।<br>एवमुक्तस्ततो हृष्टः स वास्तुर्भवत् तदा।<br>वास्तुयज्ञः स्मृतस्तस्मात् ततः प्रभृति शान्तये ॥ १९अज्ञानसे किया गया यज्ञ भी तुम्हें आहाररूपमें प्राप्त होगा।' ऐसा कहे जानेपर वह वास्तु नामक प्राणी प्रसन्न हो गया। इसी कारण तबसे शान्तिके लिये वास्तु-यज्ञका प्रवर्तन हुआ॥ १९—१९॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वास्तुभूतोद्भवो नाम द्विपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २५२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वास्तु-प्रादुर्भाव नामक दो सौ बावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २५२॥


दो सौ तिरपनवाँ अध्याय

वास्तु-चक्रका वर्णन

सूत उवाच
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि गृहकालविनिर्णयम्।<br>यथा कालं शुभं ज्ञात्वा सदा भवनमारभेत्॥ १सूतजी कहते हैं—ऋषियो! अब मैं गृहनिर्माणके उस समयका निर्णय बतला रहा हूँ, जिस शुभ समयको जानकर मनुष्यको सर्वदा भवनका आरम्भ करना चाहिये।
चैत्रे व्याधिमवाप्नोति यो गृहं कारयेन्नरः।<br>वैशाखे धेनुरत्नानि ज्येष्ठे मृत्युं तथैव च॥ २जो मनुष्य चैत्रमासमें घर बनाता है, वह व्याधि, वैशाखमें घर बनानेवाला धेनु और रत्न तथा ज्येष्ठमें मृत्युको प्राप्त होता है।
आषाढे भृत्यरत्नानि पशुवर्गमवाप्नुयात्।<br>श्रावणे भृत्यलाभं तु हानिं भाद्रपदे तथा॥ ३आषाढ़में नौकर, रत्न और पशु समूहकी और श्रावणमें नौकरोंकी प्राप्ति तथा भाद्रपदमें हानि होती है।
पत्नीनाशोऽश्विने विद्यात् कार्तिके धनधान्यकम्।<br>मार्गशीर्षे तथा भक्तं पौषे तस्करतो भयम्॥ ४आश्विनमें घर बनानेसे पत्नीका नाश होता है। कार्तिक-मासमें धन-धान्यादिकी तथा मार्गशीर्षमें श्रेष्ठ भोज्यपदार्थोंकी प्राप्ति होती है। पौषमें चोरोंका भय और माघमासमें
लाभं च बहुशो विन्द्यादग्निं माघे विनिर्दिशेत्।<br>फाल्गुने काञ्चनं पुत्रानिति कालबलं स्मृतम्॥ ५अनेक प्रकारके लाभ होते हैं, किंतु अग्निका भी भय रहता है। फाल्गुनमें सुवर्ण तथा अनेक पुत्रोंकी प्राप्ति होती है। इस प्रकार समयका फल एवं बल बतलाया जाता है।
अश्विनी रोहिणी मूलमुत्तरात्रयमैन्दवम्।<br>स्वाती हस्तोऽनुराधा च गृहारम्भे प्रशस्यते॥ ६गृहारम्भमें अश्विनी, रोहिणी, मूल, तीनों उत्तरा, मृगशिरा, स्वाती, हस्त और अनुराधा—ये नक्षत्र प्रशस्त कहे गये हैं।
आदित्यभौमवर्ज्यास्तु सर्वे वाराः शुभावहाः।<br>वर्ज्यं व्याघातशूले च व्यतीपातातिगण्डयोः॥ ७रविवार और मङ्गलवारको छोड़कर शेष सभी दिन शुभदायक हैं। व्याघात, शूल, व्यतीपात; अतिगण्ड,
विष्कम्भगण्डपरिघवज्रयोगे न कारयेत्।<br>श्वेते मैत्रेऽथ माहेन्द्रे गान्धर्वाभिजिति रौहिणे॥ ८विष्कम्भ, गण्ड, परिघ और वज्र—इन योगोंमें गृहारम्भ नहीं करना चाहिये। श्वेत, मैत्र, माहेन्द्र, गान्धर्व, अभिजित्, रौहिण, वैराज और सावित्र—इन
तथा वैराजसावित्रे मुहूर्ते गृहमारभेत्।<br>चन्द्रादित्यबलं लब्ध्वा शुभलग्नं निरीक्षयेत्॥ ९मुहूर्तोंमें गृहारम्भ करना चाहिये। चन्द्रमा और सूर्यके बलके साथ-ही-साथ शुभ लग्नका भी निरीक्षण करना चाहिये।
स्तम्भोच्छ्रायादि कर्तव्यमन्यत्तु परिवर्जयेत्।<br>प्रासादेष्वेवमेवं स्यात् कूपवापीषु चैव हि॥ १०सर्वप्रथम अन्य कार्योंको छोड़कर स्तम्भारोपण करना चाहिये। यही विधि प्रासाद, कूप एवं बावलियोंके लिये भी मानी गयी है॥ १—१०॥