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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages
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४२४ मनुस्मृति ।
क्रव्यादांस्सूकरोष्ट्राणां कुक्कुटानां च भक्षणे ।
नरकाकखराणां च तप्तकृच्छ्रं विशोधनम् ॥ १५७ ॥
मासिकान्नं तु योऽश्नीयादसमावर्तको द्विजः ।
स त्रीण्यह्रान्युपवसेदेकाहं चोदके वसेत् ॥ १५८ ॥
ब्रह्मचारी तु योऽश्नीयान्मधुमांसं कथंचन ।
स कृत्वा प्राकृतं कृच्छ्रं व्रतशेषं समापयेत् ॥ १५६ ॥
विडालकाकाखूच्छिष्टं जग्ध्वाश्वनकुलस्य च ।
केशकीटावपन्नं च पिबेद् ब्रह्मसुवर्चलाम् ॥ १६० ॥
अभोज्यों का अन्न, स्त्री और शूद्र का जूठन खाकर और अभक्ष्य
मांस खाकर सात रात जव की लपसी खावे । सिरका आदि
सड़ी भोज्य वस्तु और काढ़ा पीकर बिना वमन किये द्विज शुद्ध
नहीं होता। गांव का सुअर, गधा, ऊंट, सियार, वानर और
कौआ का मूत्र, विष्ठा खाजाने पर, चान्द्रायण व्रत करे। सूखा
मांस, ज़मीन के फूल, अज्ञात और कसाईखाने का मांस खाकर
भी चान्द्रायण ही करे। कच्चे मांस खानेवाले, सुअर, ऊंट, मुरगा,
मनुष्य, कौआ और गधे का मांस खाने में आजाय तो तप्तकृच्छ्र
से शुद्ध होता है। बिना समावर्तन के जो ब्रह्मचारी द्विज, मा-
सिक श्राद्ध का अन्न खाय वह तीन दिन उपवास करे और एक
दिन जल में बैठे। जो ब्रह्मचारी किसी प्रकार मांस सेवन करले,
वह प्राजापत्य व्रत करे और बाक़ी ब्रह्मचर्य को खतम करदे।
बिल्ली, कौआ, चूहा, कुत्ता और नौला का जूठा और बाल,
कीड़ा पड़ा अन्न खाकर 'ब्रह्मसुवर्चला' का काढ़ा पीवे ॥१५३-१६०॥
अभोज्यमन्नं नात्तव्यमात्मनः शुद्धिमच्छता ।
अज्ञानभुक्तं तूत्तार्यं शोध्यं वाऽप्याशु शोधनैः ॥१६१॥

ग्यारहवां अध्याय। ४२५

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ग्यारहवां अध्याय। ४२५
एषोऽनाद्यादनस्योक्तो व्रतानां विविधो विधिः ।
स्तेयदोषापहतॄणां व्रतानां श्रूयतां विधिः ॥ १६२ ॥
धान्यान्नधनचौर्याणि कृत्वा कामाद्विजोत्तमः ।
स्वजातीयगृहादेव कृच्छ्राब्देन विशुध्यति ॥ १६३ ॥
मनुष्याणां तु हरणे स्त्रीणां क्षेत्रगृहस्य च ।
कूपवापीजलानां च शुद्धिश्चान्द्रायणं स्मृतम् ॥ १६४॥
द्रव्याणामल्पसाराणां स्तेयं कृत्वान्यवेश्मतः ।
चरेत्सान्तपनं कृच्छ्रं तन्निर्यात्यात्मशुद्धये ॥ १६५ ॥
भक्ष्यभोज्यापहरणे यानशय्यासनस्य च ।
पुष्पमूलफलानां च पञ्चगव्यं विशोधनम् ॥ १६६ ॥
तृणकाष्ठद्रुमाणां च शुष्कान्नस्य गुडस्य च ।
चैलचर्मामिषाणां च त्रिरात्रं स्यादभोजनम् ॥ १६७॥
मणिमुक्ताप्रवालानां ताम्रस्य रजतस्य च ।
अयः कांस्योपलानां च द्वादशाहं कणान्नता ॥ १६८॥
अपनी शुद्धि चाहनेवाला पुरुष अभोज्य अन्न न खाय और
अज्ञान से खाया हुआ वमन करदे। यह न करसके तो शीघ्र
प्रायश्चित्तों से शुद्धि करे। यह सब अभक्ष्य-भक्षण व्रतों की अनेक
प्रकार की विधि कही। अब चोरी के पाप को नाश करनेवाले
व्रतों को सुनो। ब्राह्मण यदि जानकर अपने सजातीय के घर से
अन्न, पक्वान्न और धन चुरावे तो एक वर्ष प्राजापत्य करने से
शुद्ध होता है। मनुष्य, स्त्री, खेत, घर, कूप और बावड़ी के जल
की चोरी करने पर चान्द्रायण व्रत करना चाहिये। कम कीमत
के पदार्थ दूसरे के घर से चुराने पर सान्तपन व्रत करे और वह
पदार्थ लौटा देवे। लड्डू आदि भक्ष्य, खीर वगैरह भोज्य, सवारी,
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४२६ : मनुस्मृति ।
शय्या, आसन, फूल, मूल और फल की चोरी में पञ्चगव्य से
शुद्धि होती है। तृण, काष्ठ, वृक्ष, सूखा अन्न, गुड़, वस्त्र, चर्म और
मांस चुराने पर तीन दिन उपवास करे। मणि, मोती, मूँगा,
तांबा, चांदी, लोहा, कांस और पत्थर चुराने पर बारह दिन
चावल की कनकी खावे ॥ १६१-१६८ ॥
कार्पासकीटजीर्णानां द्विशफैकशफस्य च ।
पक्षिगन्धौषधीनां च रज्जवाश्चैव त्र्यहं पयः॥१६६॥
एतैर्व्रतैरपोहेत पापं स्तेयकृतं द्विजः।
अगम्यागमनीयं तु व्रतैरेभिरपानुदेत् ॥ १७० ॥
गुरुतल्पव्रतं कुर्याद्रेतः सिक्त्वा स्वयोनिषु ।
सख्युः पुत्रस्य च स्त्रीषु कुमारीष्वन्त्यजासु च ॥१७१॥
पैतृष्वस्रेयीं भगिनीं स्वस्त्रीयां मांतुरेव च ।
मातुश्च भ्रातुस्तनयां गत्वा चान्द्रायणं चरेत्॥१७२॥
एतास्तिस्रस्तु भार्यार्थे नोपयच्छेत्तु बुद्धिमान् ।
ज्ञातित्वेनानुपेयास्ताः पतति ह्युपयन्नधः ॥ १७३ ॥
कपास, रेशम, ऊन दो और एक खुर के पशु, पक्षी, सुगन्ध
द्रव्य, औषध, रस्सी की चोरी करने पर तीन दिन पानी पीकर
बितावे। द्विजों को इन व्रतों से चोरी के पाप को दूर करना चा-
हिए। अगम्या स्त्री के गमन का पाप इन व्रतों से दूर करे:-सगी
बहन, मित्र और पुत्र की स्त्री, कुमारी और चाण्डाली के साथ ग-
मन में, गुरुपत्नी-गमन का प्रायश्चित्त करे। फूफूकी बेटी, मौसी
की बेटी और मामा की बेटी इन तीन बहिनों से गमन करके
चान्द्रायण व्रत करे। बुद्धिमान् पुरुष इन तीनों को स्त्रीरूप से स्वी-
कार न करे। ये जाति की होने से अगम्या हैं इनसे गमन करने
से नरकगामी होता है ॥ १६६-१७३ ॥

ग्यारहवां अध्याय। ४२७

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ग्यारहवां अध्याय। ४२७
अमानुषीषु पुरुष उदक्यायामयोनिषु ।
रेतः सिक्त्वा जले चैव कृच्छ्रं सान्तपनं चरेत् ॥१७४॥
मैथुनं तु समासेव्य पुंसि योषिति वा द्विजः ।
गोयानेऽप्सु दिवा चैव सवासाः स्नानमाचरेत् ॥१७५॥
चण्डालान्त्यस्त्रियो गत्वा भुक्त्वा च प्रतिगृह्य च ।
पतत्यज्ञानतो विप्रो ज्ञानात् साम्यं तु गच्छति॥ १७६॥
अमानुषी योनि, रजस्वला और जल में वीर्यपात करके सान्त-
पन व्रत करे । द्विज को पुरुष, स्त्री, बैलगाड़ी में, जल में और
दिन में, मैथुन करके वस्त्र सहित स्नान करना चाहिए । ब्राह्मण
अज्ञान से चाण्डाल, म्लेच्छस्त्री से गमन करके, भोजन करके
उनसे दान लेकर पतित होता है। और जानकर ऐसा कर्म करने
पर उनके समान होजाता है ॥ १७४-१७६ ॥
विप्रदुष्टां स्त्रियं भर्ता निरुन्ध्यादेकवेश्मनि ।
यत्पुंसः परदारेषु तच्चैनां चारयेद्व्रतम् ॥ १७७ ॥
सा चेत्पुनः प्रदुष्येत्तु सदृशेनोपयन्त्रिता ।
कृच्छ्रं चान्द्रायणं चैव तदस्याः पावनं स्मृतम्॥१७८॥
यत्करोत्येकरात्रेण वृषलीसेवनाद्द्विजः ।
तद्भैक्षभुग्जपन्नित्यं त्रिभिर्वर्षैरपोहति ॥ १७६ ॥
एषा पापकृतामुक्ता चतुर्णामपि निष्कृतिः ।
पतितैः संप्रयुक्तानामिमाः शृणुत निष्कृतीः ॥ १८०॥
दुराचारी स्त्री को उसका पति एक घर में बन्द करे और जो
पुरुष को परस्त्रीगमन में प्रायश्चित्त है वही उससे करवावे ।
किसी जातीय पुरुष के बहकाने पर फिर भी वह बिगड़ जावे तो
उसको चान्द्रायण व्रत करावे । एक रात चांडाली के साथ

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४२८ :: मनुस्मृति ।
समागम से जो पाप द्विज करता है वह तीन वर्ष तक भिक्षा अन्न
खाकर गायत्री जप से दूर होता है । यह सब पाप करनेवाले चारों
वर्णं की शुद्धि कही है । अब पतितों के संसर्ग का प्रायश्चित्त
सुनो ॥ १७७-१८० ॥
संवत्सरेण पतति पतितेन सहाचरन् ।
याजनाध्यापनाद्यौनान्न तु यानासनाशनात् ॥ १८१ ॥
यो येन पतितेनैषां संसर्गं याति मानवः ।
स तस्यैव व्रतं कुर्यात्तत्संसर्गविशुद्धये ॥ १८२ ॥
पतितस्योदकं कार्यं सपिण्डैर्बान्धवैर्बहिः ।
निन्दितेऽहनि सायाह्ने ज्ञात्यृत्विग्गुरुसन्निधौ ॥ १८३ ॥
दासी घटमपां पूर्णं पर्यस्येत्प्रेतवत्पदा ।
अहोरात्रमुपासीरन् अशौचं बान्धवैः सह ॥ १८४ ॥
एक वर्ष तक पतितों के साथ एक सवारी वा आसन पर बैठने
से और एक पंक्ति में भोजन करने से उनको यज्ञकर्म कराने, वेद
पढ़ाने और विवाहसम्बन्ध करने से पतित होजाता है। जो मनुष्य
इन पतितों के साथ जो संसर्ग करता है वह उस संसर्ग की शुद्धि
के लिए वही व्रत करे। पतित प्रायश्चित्त न करे तो उसके स-
पिण्ड और ममेरे-फुफेरे भाई आदि निन्दित तिथिको सायंकाल
गाँव के बाहर जाति-पुरोहित-गुरुजनों के सामने जलदान करे।
दासी जल भरे पुराने घड़े को प्रेत के समान पैर से ठोकर देकर
फोड़ दे और सपिण्ड बान्धवों के साथ एक दिन-रात का
प्रायश्चित्त माने ॥ १८१-१८४ ॥
निवत्र्तेरंश्च तस्मात्तु संभाषणमहाशने ।
दायाद्यस्य प्रदानं च यात्रा चैव हि लौकिकी॥१८५॥

ग्यारहवां अध्याय । ४२६

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ग्यारहवां अध्याय । ४२६
ज्येष्ठता च निवर्त्तेत ज्येष्ठावाप्यं च यद्धनम् ।
ज्येष्ठांशं प्राप्नुयाच्चास्य यवीयान्गुणतोऽधिकः ॥१८६॥
प्रायश्चित्ते तु चरिते पूर्णकुम्भमपां नवम् ।
तेनैव सार्धं प्रास्येयुः स्नात्वा पुण्ये जलाशये ॥१८७॥
स त्वप्सु तं घटं प्रास्य प्रविश्य भवनं स्वकम् ।
सर्वाणि ज्ञातिकार्याणि यथापूर्वं समाचरेत् ॥ १८८ ॥
एतदेव विधिं कुर्याद्योषित्सु पतितास्वपि ।
वस्त्रान्नपानं देयं तु वसेयुश्च गृहान्तिके ॥ १८६ ॥
सपिण्ड उनके साथ बोल-चाल उठना-बैठना छोड़ दें । पिता
के धन में उसको भाग न दें और लौकिक व्यवहार भी न करें ।
पतित की ज्येष्ठता और उसके भाग का धन जाता रहता है ।
इसलिये वह भाग छोटों में जो गुणी हो उसको देना चाहिये ।
परन्तु वह प्रायश्चित्त करे तो सपिण्ड-बान्धव साथही पवित्र
जलाशय में स्नान करें और जल भरा घड़ा उस जलाशय में
डालें । ओर घर में आकर जाति के सब काम पूर्ववत् करे ।
पतित स्त्रियों के विषय में भी यही विधि करे । परन्तु उनको अन्न,
वस्त्र, जल देना चाहिए और घर के पास में रहें ॥ १८५-१८६ ॥
एनास्विभिरनिर्णिक्तैर्नार्थं किञ्चित् सहाचरेत् ।
कृतनिर्णेजनांश्चैव न जुगुप्सेत कर्हिचित् ॥१९०॥
बालघ्नांश्च कृतघ्नांश्च विशुद्धानपि धर्मतः ।
शरणागतहन्तूंश्च स्त्रीहन्तूंश्च न संवसेत् ॥ १६१ ॥
येषां द्विजानां सावित्री नानूच्येत यथाविधि ।
तांश्चारयित्वात्रीन्कृच्छ्रान्यथाविध्युपनाययेत् ॥१९२॥

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४३० मनुस्मृति ।
प्रायश्चित्त न करनेवाले पातकियों के साथ दान आदि का
कोई सम्बन्ध न रक्खे । और प्रायश्चित्त करनेवालों की फिर
निन्दा भी न करे । बालहत्यावाले, कृतघ्न, शरणागत को मारने
वाले और स्त्रियों की हत्या करनेवाले, प्रायश्चित्त कर भी लें
तोभी उनका संसर्ग न करे । जिन द्विजों का शास्त्रोक्त समय में
यज्ञोपवीत न हुआ हो उनको तीन प्राजापत्य व्रत कराकर विधि-
पूर्वक यज्ञोपवीत करावे ॥ १६०-१६२ ॥
प्रायश्चित्तं चिकीर्षन्ति विकर्मस्था तु ये द्विजाः ।
ब्राह्मणा च परित्यक्तास्तेषामप्येतदादिशेत् ॥ १६३ ॥
यद्गर्हितेनार्जयन्ति कर्मणा ब्राह्मणा धनम् ।
तस्योत्सर्गेण शुद्ध्यन्ति जप्येन तपसैव च ॥ १६४ ॥
जपित्वा त्रीणि सावित्र्याः सहस्राणि समाहितः ।
मासं गोष्ठे पयः पीत्वा मुच्यतेऽसत्प्रतिग्रहात् ॥ १६५ ॥
उपवासकृशं तं तु गोव्रजान्पुनरागतम् ।
प्रणतं प्रतिपृच्छेयुः साम्यं सौम्येच्छसीति किम् ॥ १६६ ॥
सत्यमुक्त्वा तु विप्रेषु विकिरेद्यवसं गवाम् ।
गोभिः प्रवर्तिते तीर्थे कुर्युस्तस्य परिग्रहम् ॥ १६७ ॥
व्रात्यानां याजनं कृत्वा परेषामन्त्यकर्म च ।
अभिचारमहीनं च त्रिभिः कृच्छ्रैर्व्यपोहति ॥ १६८ ॥
शरणागतं परित्यज्य वेदं विप्लाव्या च द्विजः ।
संवत्सरं यवाहारस्तत्पापमपसेधति ॥ १६६ ॥
श्वशृगालखरैर्दष्टो ग्राम्यैः क्रव्याद्भिरेव च ।
नराश्वोष्ट्रवराहेश्च प्राणायामेन शुद्ध्यति ॥ २०० ॥

ग्यारहवां अध्याय । ४३१

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ग्यारहवां अध्याय । ४३१
विरुद्ध कर्म करनेवाले और वेद न पढेहुए द्विज प्रायश्चित्त
करना चाहें तो उनको भी यही तीन कृच्छ्र का प्रायश्चित्त बतावे ।
जो ब्राह्मण निंदित कर्मों से धन कमाते हैं वे उसको छोड़ने और
जप-तप से शुद्ध होते हैं । एकाग्रचित्त से तीन हज़ार गायत्री का
जप करके एक महीना गोष्ठ में दुग्धाहार करके, बुरे दान लेने के
पाप से छूटता है । उस उपवास से कृश, गोष्ठ से आए विनीत
ब्राह्मण से पूछे कि हे सौम्य ! “क्या तू हमारे समान रहने की
प्रतिज्ञा करना चाहता है ?” उन ब्राह्मणों से ‘अब असत् दान
न लूंगा’ यह सत्यवचन कहे और गौओं को चारा देवे फिर
गौओं से पवित्र किए स्थान (जहां जल पीती हों) में वे ब्राह्मण
उसके साथ व्यवहार आरम्भ करें । व्रात्यों को यज्ञ कराकर माता,
पिता और गुरु से अन्य का प्रेतकर्म कराके मारणकर्म और
'व्रात्य' नामक यज्ञ करके तीन प्राजापत्य व्रत करने से शुद्ध
होता है । शरणागत को छोड़कर अनधिकारी को वेद पढ़ाकर एक
वर्ष जौ खाय तो पाप से छुटकारा पाता है । गाँव के रहनेवाले
कोई जीव कुत्ता, सियार, गदहा, मांसाहारी जीव, मनुष्य, घोड़ा,
ऊंट और सुअर काट लें या स्पर्श कर लें तो प्राणायाम से शुद्ध
होता है ॥ १६३-२०० ॥
षष्ठान्नकालता मासं संहिताजप एव वा ।
होमाश्च सकला नित्यमपाङ्क्त्यानां विशोधनम् ॥२०१॥
उष्ट्रयानं समारुह्य खरयानं तु कामतः ।
स्नात्वा तु विप्रो दिग्वासाः प्राणायामेन शुद्धयति ॥२०२॥
विनाद्भिरप्सु वाप्यार्तः शारीरं सन्निवेश्य च ।
सचैलो बहिराप्लुत्य गामानभ्य विशुद्ध्यति ॥ २०३ ॥
वेदोदितानां नित्यानां कर्मणां समतिक्रमे ।
स्नातकव्रतलोपे च प्रायश्चित्तमभोजनम् ॥ २०४ ॥

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४३२ मनुस्मृति ।
हुङ्कारं ब्राह्मणस्योक्त्वा त्वङ्कारं च गरीयसः ।
स्नात्वाऽनश्नन्नहः शेषमभिवाद्य प्रसादयेत् ॥ २०५ ॥
ताडयित्वा तृणेनापि कण्ठे वाबध्य वाससा ।
विवादे वा विनिर्जित्य प्रणिपत्य प्रसादयेत् ॥ २०६ ॥
अवगूर्य त्वब्दशतं सहस्रमभिहत्य च ।
जिघांसया ब्राह्मणस्य नरकं प्रतिपद्यते ॥ २०७ ॥
शोणितं यावतः पांशून् संगृह्णातिमहीतले ।
तावन्त्यब्द सहस्राणि तत्कर्ता नरके वसेत् ॥ २०८ ॥
एक मास तक दो दिन के बाद तीसरे दिन सायंकाल को
भोजन, वेदसंहिता का पाठ और साकल मन्त्रों से होम, पंक्ति-
बाह्य को शुद्ध करता है । ब्राह्मण जानकर ऊंट या गधे की सवारी
में बैठे या नंगा होकर स्नान करे तो प्राणायाम से शुद्ध होता
है । मल, मूत्र के वेग से आतुर पुरुष बिना जलके वा जल में
मल-मूत्र करे तो गाँव के बाहर सचैल स्नान करे और गौ का
स्पर्श करके शुद्ध होता है । वेदोक्त नित्यकर्मों का और स्नातक
का व्रत का लोप होने पर उपवास करना प्रायश्चित्त है । ब्राह्मण
को हुंकार (चुप रह आदि) और बड़े को (तू) कहकर स्नान
करके भोजन करे और प्रणाम करके उनको प्रसन्न करे । ब्राह्मण
को तिनुके से भी मारकर अथवा वस्त्र से बांधकर या विवाद
से जीतकर प्रणाम करके उनको प्रसन्न करे । ब्राह्मण को मारने
की इच्छा से दण्डा उठाकर सौ वर्ष और मारकर हज़ार वर्ष
नरक में पड़ता है । मारेहुए ब्राह्मण के देह से गिरा रुधिर धूल
के जितने कणों को भिगोता है मारनेवाला उतने हज़ार वर्ष
नरक में पड़ता है ॥ २०५-२०८ ॥
अवगूर्य चरेत्कृच्छ्रमतिकृच्छ्रं निपातने ।
कृच्छ्रातिकृच्छ्रौ कुर्वीत विप्रस्योत्पाद्य शोणितम् ॥ २०६॥

ग्यारहवां अध्याय । ४३३

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ग्यारहवां अध्याय । ४३३
अनुक्तनिष्कृतीनां तु पापानामपनुत्तये।
शक्तिं चावेक्ष्य पापं च प्रायश्चित्तं प्रकल्पयेत्॥२१०॥
यैरभ्युपायैरेनांसि मानवो व्यपकर्षति ।
तान्वोऽभ्युपायानूवक्ष्यामिदेवर्षिपितृसेवितान् ॥२११॥
त्र्यहं प्रातस्त्र्यहं सायं त्र्यहमद्यादयाचितम् ।
त्र्यहं परं च नाश्नीयात्प्राजापत्यं चरन् द्विजः ॥२१२॥
गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् ।
एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रं सान्तपनं स्मृतम् ॥ २१३ ॥
एकैकं ग्रासमश्नीयात् त्र्यहाणि त्रीणि पूर्ववत् ।
त्र्यहं चोपवसेदन्त्यमतिकृच्छ्रं चरन् द्विजः ॥ ॥ २१४॥
तप्तकृच्छ्रं चरन् विप्रो जलक्षीरघृतानिलान् ।
प्रतित्र्यहं पिबेदुष्णान् सकृत्स्नायी समाहितः ॥२१५॥
यतात्मनोऽप्रमत्तस्य द्वादशाहमभोजनम् ।
पराको नाम कृच्छ्रोऽयं सर्वपापापनोदनः ॥ २१६ ॥
ब्राह्मण के ऊपर मारने के लिए लकड़ी उठाकर प्राजापत्य,
मारने पर अतिकृच्छ्र और रुधिर निकलने पर कृच्छ्रातिकृच्छ्र व्रत
करे। जिन दोषों का प्रायश्चित्त नहीं कहा है उनका शक्ति और
पाप विचार कर प्रायश्चित्त नियत करे। मनुष्य जिन उपायों से
पाप नष्ट करता है उन देवर्षि और पितरों के सेवित उपायों को
तुम से कहता हूं । प्राजापत्य-व्रत करनेवाला द्विज तीन दिन प्रातः-
काल और तीन दिन सायंकाल और तीन दिन बिना मांगा अन्न
खावे और तीन दिन व्रत करे यों बारह दिनका होता है। एक दिन
गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी और कुशका जल मिलाकर खाय और
एक रात्रिका उपवास करे तब 'कृच्छ्र-सान्तपन' होता है। तीन
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४३४ मनुस्मृति ।
दिन प्रातःकाल एक एक ग्रास खाय, दूसरे दिन सायंकाल को
एक एक ग्रास खाय, तीसरे दिन बिना मांगा एक एक ग्रास खाय
और अन्त के तीन दिन उपवास करे यह अतिकृच्छ्र कहलाता है।
तप्तकृच्छ्र करनेवाला द्विज एक बार स्नान करे और तीन दिन
गरम जल तीन दिन गरम दूध तीन दिन गरम घी और तीन दिन
वायु का पान करे। जितेन्द्रिय होकर बारह दिन भोजन न करना
'पराक' नामक कृच्छ्र है। यह सब पापों को दूर कर देता है॥२०६-२१६॥
एकैकं ह्रासयेत् पिण्डं कृष्णे शुक्ले च वर्धयेत् ।
उपस्पृशंस्त्रिषवणमेतच्चान्द्रायणं स्मृतम् ॥ २१७ ॥
एतमेव विधिं कृत्स्नमाचरेद्यवमध्यमे ।
शुक्लपक्षादिनियतश्चरंश्चान्द्रायणं व्रतम् ॥ २१८ ॥
अष्टावष्टौ समश्नीयात् पिण्डान् मध्यंदिने स्थिते ।
नियतात्मा हविष्याशी यतिश्चान्द्रायणं चरन् ॥ २१९॥
चतुरः प्रातरश्नीयात् पिण्डान् विप्रः समाहितः ।
चतुरोऽस्तमिते सूर्ये शिशुश्चान्द्रायणं स्मृतम् ॥ २२०॥
यथाकथंचित् पिण्डानां तिस्रोऽशीतीः समाहितः ।
मासेनाश्नन् हविष्यस्य चन्द्रस्यैति सलोकताम् ॥ २२१॥
एतद्रुद्रास्तथादित्या वसवश्चाचरन् व्रतम् ।
सर्वाकुशलमोक्षाय मरुतश्च महर्षिभिः ॥ २२२ ॥
महाव्याहृतिभिर्होमः कर्तव्यः स्वयमन्वहम् ।
अहिंसा सत्यमक्रोधमार्जवं च समाचरेत् ॥ २२३ ॥
त्रिरहस्त्रिर्निशायां च सवासा जलमाविशेत् ।
स्त्रीशूद्रपतितांश्चैव नाभिभाषेत कर्हिचित् ॥ २२४ ॥

ग्यारहवां अध्याय । ४३५

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ग्यारहवां अध्याय । ४३५
तीन समय स्नान करे, कृष्णपक्ष में एक एक ग्रास घटावे,
शुक्लपक्ष में एक एक ग्रास बढ़ावे यह चान्द्रायण व्रत कहलाता
है। 'यवमध्यम' व्रत में शुक्लपक्ष से नियमपूर्वक चान्द्रायणव्रत
करता हुआ इन्हीं सब विधियों को करे। 'यतिचान्द्रायण'
करनेवाला, नित्य दोपहर में हविष्यान्न के आठ आठ ग्रास खावे
और नियमसे रहे। चार ग्रास प्रातःकाल और चार ग्रास सूर्यास्त
में खाय, यह 'शिशुचान्द्रायण' व्रत है। एक मास में हविष्यान्न
के दोसौ चालीस २४० ग्रास खाने से चन्द्रलोक प्राप्त होता है।
रुद्र, आदित्य, वसु, मरुत और महर्षियों ने सब पापों के नाशार्थ
इस व्रत को किया था। यह व्रत करनेवाला पुरुष प्रतिदिन स्वयं
महाव्याहृतियों से हवन करे। और अहिंसा, सत्यभाषण, क्रोध-
त्याग और सरलता का बर्ताव करे। तीन बार दिन में और तीन
बार रात में सवस्त्र स्नान करे। स्त्री, शूद्र और पतितों से कभी
बातचीत न करे ॥ २१७-२२४ ॥
स्थानासनाभ्यां विहरेदशक्तोऽधः शयीत वा ।
ब्रह्मचारी व्रती च स्याद्गुरुदेव द्विजार्थकः ॥ २२५ ॥
सावित्रीं च जपेन्नित्यं पवित्राणि च शक्तितः ।
सर्वेष्वेव व्रतेष्वेवं प्रायश्चित्तार्थमाहृतः ॥ २२६ ॥
एतैर्द्विजातयः शोध्या व्रतैराविष्कृतैनसः ।
अनाविष्कृतपापांस्तु मन्त्रैर्होमैश्च शोधयेत् ॥ २२७ ॥
ख्यापनेनानुतापेन तपसाऽध्ययनेन च ।
पापकृन्मुच्यते पापात् तथा दानेन चापदि ॥ २२८ ॥
यथा यथा नरो धर्मं स्वयं कृतवानुभाषते ।
तथा तथा त्वचेवाहिस्तेनाधर्मेण मुच्यते ॥ २२६ ॥
यथा यथा मनस्तस्य दुष्कृतं कर्म गर्हति ।

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४३६ मनुस्मृति।
तथा तथा शरीरं तत्तेनाधर्मेण मुच्यते ॥ २३० ॥
कृत्वा पापं हि संतप्य तस्मात्पापात् प्रमुच्यते ।
नैवं कुर्यां पुनरिति निवृत्या पूयते तु सः ॥ २३१ ॥
एवं संचिन्त्य मनसा प्रेत्य कर्मफलोदयम् ।
मनोवाङ्मूर्तिभिर्नित्यं शुभं कर्म समाचरेत् ॥ २३२ ॥
आसन पर उठा बैठा करे, अशक्त हो तो भूमि पर सोवे और
ब्रह्मचारी, व्रती, गुरु, देवता और द्विजोंका पूजक होवे । नित्य
यथाशक्ति गायत्री और अघमर्षणादि पवित्र मन्त्रों का जप करे ।
प्रायश्चित्त के सभी व्रतों में यह विधि मान्य है । पापी द्विजों को
इन व्रतों से शुद्ध करे और गुप्त पापियों को ब्राह्मणसभा, मन्त्र
जप और होम कराकर शुद्ध करे। पाप करनेवाला पाप प्रकट
करने, पश्चात्ताप करने और तप स्वाध्याय करने से और आपत्ति
में दानही करने से पाप से छूटता है। मनुष्य जैसे जैसे अपने
अधर्म प्रकट करता है वैसे वैसेही उससे छूटता है जैसे सांप
केंचुल से अलग होजाता है। जैसे जैसे उसका मन दुष्कृत-कर्म
की निंदा करता है वैसे वैसे उसका शरीर अधर्म से छूटता
है। पाप करने के बाद संताप करके उससे छूटता है और फिर
ऐसा न करूंगा-इस संकल्प से पवित्र होता है। परलोक में कर्म-
फल मिलता है, ऐसा मन से विचार कर नित्य मन, वाणी और
शरीर से शुभकर्म किया करे ॥ २२५-२३२ ॥
अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानात्कृत्वा कर्म विगर्हितम् ।
तस्माद्विमुक्तिमन्विच्छन् द्वितीयं न समाचरेत् ॥२३३॥
यस्मिन् कर्मण्यस्य कृते मनसः स्यादलाघवम् ।
तस्मिंस्तावत्तपः कुर्याद्यावत्तुष्टिकरं भवेत् ॥ २३४ ॥
तपो मूलमिदं सर्वं दैवं मानुषकं सुखम् ।

ग्यारहवां अध्याय । ४३७

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ग्यारहवां अध्याय । ४३७
तपो मध्यं बुधैः प्रोक्तं तपोऽन्तं वेददर्शिभिः ॥ २३५ ॥
ब्राह्मणस्य तपो ज्ञानं तपः क्षत्रस्य रक्षणम् ।
वैश्यस्य तु तपो वार्त्ता तपः शूद्रस्य सेवनम् २३६ ॥
ऋषयः संयतात्मानः फलमूलानिलाशनाः ।
तपसैव प्रपश्यन्ति त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ २३७ ॥
औषधान्यगदो विद्या दैवी च विविधा स्थितिः ।
तपसैव प्रसिद्ध्यन्ति तपस्तेषां हि साधनम् ॥ २३८ ॥
यद्दुस्तरं यद्दुरापं यद्दुर्गं यच्च दुष्करम् ।
सर्वं तु तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ॥ २३६ ॥
महापातकिनश्चैव शेषाश्चाकार्यकारिणः ।
तपसैव सुतप्तेन मुच्यन्ते किल्विषायततः ॥ २४० ॥
जानकर वा न जानकर निंदित कर्म करके उससे छुटकारा
चाहनेवाला फिर दूसरा पापकर्म न करे। पापी के मन में यदि
प्रायश्चित्त से संतोष न हो तो जबतक सन्तोष हो तबतक तप
करे। देवलोक और मनुष्यलोक के सब सुख तपोमूलक हैं।
तप से ही मध्य में और अन्त में सुख मिलता है, यह ऋषियों का
मत है। ब्राह्मण का ज्ञान तप है, क्षत्रिय का तप रक्षा है, वैश्य का
तप व्यापार है और शूद्र का तप सेवा है। संयमी फल, मूल,
पवन का आहार करनेवाले ऋषि तप से ही चराचर विश्व को
प्रत्यक्ष देखते हैं। रसायन, औषध, ब्रह्मविद्या और स्वर्गादि लोक
में निवास ये सब तप से ही सिद्ध होते हैं। उनके साधन तपही
हैं। जो दुस्तर है, दुर्लभ है, दुर्गम है, दुष्कर है, वह सब तप से
सिद्ध होजाता है। क्योंकि तप की शक्ति अलङ्घ्य है। महापातकी
और उपपातकी सब तप करने सेही उस पाप से छूटते हैं ॥२३३-२४०॥
कीटाश्चाहि पतङ्गाश्च पशवश्च वयांसि च ।

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४३८ मनुस्मृति ।
स्थावराणि च भूतानि दिवं यान्ति तपोबलात्॥२४१॥
यत्किञ्चिदेनः कुर्वन्ति मनोवाङ्‌मूर्त्तिभिर्जनाः ।
तत्सर्वं निर्दहन्त्याशु तपसैव तपोधनाः ॥ २४२ ॥
तपसैव विशुद्धस्य ब्राह्मणस्य दिवौकसः ।
इज्याश्च प्रतिगृह्णन्ति कामान् संवर्धयन्ति च॥२४३॥
प्रजापतिरिदं शास्त्रं तपसैवासृजत् प्रभुः ।
तथैव वेदानृषयस्तपसा प्रतिपेदिरे ॥ २४४ ॥
इत्येतत्तपसो देवा महाभाग्यं प्रचक्षते ।
सर्वस्यास्य प्रपश्यन्तस्तपसः पुण्यमुत्तमम् ॥ २४५ ॥
वेदाभ्यासोऽन्वहं शक्त्या महायज्ञक्रिया क्षमा ।
नाशयन्त्याशु पापानि महापातकजान्यपि ॥ २४६ ॥
यथैधस्तेजसा वह्निः प्राप्तं निर्दहति क्षणात् ।
तथा ज्ञानाग्निना पापं सर्वं दहति वेदवित् ॥ २४७ ॥
कीट, सर्प, पतंग, पशु, पक्षी और स्थावर प्राणी भी तपोबल
से स्वर्ग को जाते हैं। मनुष्य मन, वाणी और शरीर से जो कुछ
पाप करते हैं उन सब को तपोधन ऋषि तप से शीघ्र ही भस्म
करदेते हैं। तप से शुद्ध ब्राह्मण के यज्ञबलि को देवता ग्रहण करते
हैं और कामनाओं को पूर्ण करते हैं। तपोबल से ही प्रजापति ने
इस शास्त्र को रचाथा और ऋषियों ने वेद भी तप से पाया था।
सब प्राणियों का तप से उत्तम योनि में जन्म होता है यह देख
कर देवगण तप का माहात्म्य करते हैं। प्रतिदिन वेदाध्ययन,
पञ्चमहायज्ञों का अनुष्ठान, अपराध सहन ये महापातक के भी
पापों का शीघ्र नाश कर देते हैं। जैसे अग्नि तेज से ईंधन को
जला देता है वैसे वेदविशारद, ज्ञानरूपी अग्नि से सब पाप को
जला देता है ॥ २४१-२४७ ॥

ग्यारहवां अध्याय । ४३६

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ग्यारहवां अध्याय । ४३६
इत्येतदेत सा मुक्तं प्रायश्चित्तं यथाविधि ।
अत ऊर्ध्वं रहस्यानां प्रायश्चित्तं निबोधत ॥ २४८ ॥
सव्याहृतिप्रणवकाः प्राणायामास्तु षोडश ।
अपि भ्रूणहणं मासात्पुनन्त्यहरहः कृताः ॥ २४६ ॥
कौत्सं जप्त्वाप इत्येतद्द्वाशिष्ठं च प्रतीत्यृचम् ।
माहित्रं शुद्धवत्यश्च सुरापोऽपि विशुद्ध्यति ॥ २५० ॥
सकृज्जप्त्वास्य वामीयं शिवसङ्कल्पमेव च ।
अपहृत्य सुवर्णं तु क्षणाद्भवति निर्मलः ॥ २५१ ॥
हविष्यन्तीयमभ्यस्य नतमंह इतीति च ।
जपित्वा पौरुषं सूक्तं मुच्यते गुरुतल्पगः ॥ २५२ ॥
एनसां स्थूलसूक्ष्माणां चिकीर्षन्नपनोदनम् ।
अवेत्यृचं जपेदब्दं यत्किञ्चेदमितीति वा ॥ २५३ ॥
प्रतिगृह्याप्रतिग्राह्यं भुक्त्वा चान्नं विगर्हितम् ।
जपंस्तरत्समन्दीयं पूयते मानवस्त्र्यहात् ॥ २५४॥
इस प्रकार पापों का यथाविधि प्रायश्चित्त कहा गया है ।
अब गुप्त पापों का प्रायश्चित्त सुनो । एक मास तक ॐकार और
व्याहृति के साथ सोलह प्राणायाम करने से भ्रूणहत्या से मनुष्य
छूट जाता है । 'अपन्नःशुशोचदघम्' इत्यादि ऋग्वेद का कौत्स-
सूक्त और 'प्रतिस्तोमेतिरुषसंचशिष्ठा०' इत्यादि वाशिष्ठमंत्र,
'महित्रीणाम्' इत्यादि सूक्त और 'शुद्धवत्य०' इत्यादि ऋचाओं
का पाठ करने से सुरापान दोष से मुक्त होजाता है। 'अस्य वां
मस्य०' इत्यादि ऋचा के सूक्त और 'शिवसंकल्प०' इत्यादि
सूक्त के पाठ से, सुवर्णचोरी के पाप से तुरंत छूट जाता है।
'हविष्याङ्गमजरं०' इत्यादि उन्नीस ऋचा, 'नतमंहोन दुरितं०'

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४४० । मनुस्मृति ।

इत्यादि आठ ऋचा और पुरुषसूक्त का एक मास नित्य पाठ
करने से गुरुपत्नी संभोग का पाप दूर हो जाता है। महापातक
और उपपातकों को दूर करने के लिए 'अव ते हेड़ वरुण०'
इत्यादि ऋचा, अथवा 'यत्किञ्चेदं वरुण दैव्ये जने०' इत्यादि
ऋचाका एक वर्ष तक जप करे। प्रतिग्रह के अयोग्य का लेने और
निंदित अन्न के भोजन का पाप, 'तरत्समन्दिधावति०' इत्यादि
चार मंत्र का पाठ तीन दिन करने से दूर होता है ॥ २४८-२५४ ॥

सोमारौद्रं तु बहेना मासमभ्यस्य शुद्धयति ।
स्रवन्त्यामाचरन्स्नानमर्यम्णामिति चऋचम्॥२५५॥
अब्दार्धमिन्द्रमित्येतदेनस्वी सप्तकं जपेत् ।
अप्रशस्तं तु कृत्वाप्सु मासमासीत भैक्षभुक्॥२५६॥
मन्त्रैः शाकलहोमीयैरब्दं हुत्वा घृतं द्विजः ।
सुगुर्वप्यपहन्त्येनो जप्त्वा वा नम इत्यृचम् ॥२५७ ॥
महापातकसंयुक्तोऽनुगच्छेद्गाः समाहितः ।
अभ्यस्याब्दं पावमानीर्भैक्षाहारो विशुद्ध्यति ॥२५८॥
अरण्ये वा त्रिरभ्यस्य प्रयतो वेदसंहिताम् ।
मुच्यते पातकैः सर्वैः पराकैः शोधितास्त्रिभिः ॥ २५६ ॥
त्र्यहं तूपवसेद्युक्तस्त्रिरह्नोऽभ्युपयन्नपः ।
मुच्यते पातकैः सर्वैस्त्रिर्जपित्वाऽघमर्षणम् ॥ २६० ॥

अधिक पाप करनेवाला नदी में स्नान करके 'सोमा रुद्रा
धारयेथा०' इत्यादि और 'अर्यमणं वरुणं मित्रं०' इत्यादि तीन
ऋचाओंका एक मास तक नित्य पाठ करे तो शुद्ध होता है।
पापी पुरुष, छः मास तक, 'इन्द्रं मित्रं वरुणमग्नि०' इत्यादि सात
ऋचा का नित्य पाठ करे और जल में मल-मूत्र डालनेवाला एक

ग्यारहवां अध्याय। ४४१

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ग्यारहवां अध्याय। ४४१

मास तक भीख मांगकर निर्वाह करे। द्विज, 'देवकृतस्य०'
इत्यादि शाकल होम के मन्त्रों से, एक वर्ष तक घी का होम करे
अथवा 'नम इन्द्रश्च०' इत्यादि मन्त्रका एक वर्षतक पाठ करे
तो महापाप से भी छूट जाता है। महापातकी एक वर्षतक भीख
मांगकर खाय, सावधानी से नित्य गौओं के पीछे फिरे। और
पवमान देवता के सूक्तों का पाठ करे तो शुद्ध होता है। तीन
पराक व्रतों से शुद्ध, जितेन्द्रिय होकर, वन में वेदसंहिता का
तीन बार पाठ करे तो सब पापों से छूटता है। तीन दिन उप-
वास करे, तीनों समय में स्नान करे और अघमर्षण-सूक्त का पाठ
करे तो सब पापों से छूट जाता है ॥ २५५-२६०॥
यथाश्वमेधः क्रतुराट् सर्वपापापनोदनम्।
तथाघमर्षणं सूक्तं सर्वपापापनोदनम् ॥ २६१ ॥
हत्वा लोकानपीमांस्त्रीनश्नन्नपि यतस्ततः ।
ऋग्वेदं धारयन् विप्रो नैनः प्राप्नोति किञ्चन ॥ २६२॥
ऋक्संहितां त्रिश्भ्यस्य यजुषां वा समाहितः ।
साम्नां वा सरहस्यानां सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २६३ ॥
यथा महाह्रदं प्राप्य क्षिप्तं लोष्ठं विनश्यति ।
तथा दुश्चरितं सर्वं वेदे त्रिवृति मज्जति ॥ २६४ ॥
ऋचो यजूंषि चान्यानि सामानि विविधानि च ।
एष ज्ञेयस्त्रिवृद्वेदो यो वेदैनं स वेदवित् ॥ २६५ ॥
आद्यं यत्त्र्यक्षरं ब्रह्म त्रयी यस्मिन् प्रतिष्ठिता ।
स गुह्योऽन्यस्त्रिवृद्वेदो यस्तं वेद स वेदवित् ॥ २६६ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रणीतायां स्मृतौ
एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
५६

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४४२ मनुस्मृति ।
जैसे यज्ञों का राजा अश्वमेध सब पापों का नाशक है, वैसे
अघमर्षण-सूक्त सब पापों का नाशक है। ऋग्वेद को धारण करने
वाला ब्राह्मण चाहे तीनों लोकों का संहार करे या मनमाने
भोजन करे तो भी उसको पातक नहीं लगता। जो द्विज, साव-
धानी से, ऋक्संहिता या यजुःसंहिता अथवा सामसंहिता की
ब्राह्मण-उपनिषदों के सहित तीन बार आवृत्ति करे तो सब
पापों से मुक्त होजाता है। जैसे बड़ी नदी में डाला हुआ ढेला
गल जाता है वैसे सब पाप तीन आवृत्ति वेद में डूब जाते हैं।
ऋक्, यजु और साम वेद और विविध मन्त्रों को त्रिवृत् वेद
जानना चाहिए। जो इनको जानता है वही वेदवेत्ता है। सब वेदों में
प्रधान तीन अक्षर का-जिसमें तीनों वेद अन्तर्गत हैं, वह गोपनीय
प्रणव 'ओं' कार, दूसरा त्रिवृत् वेद है। जो उसके स्वरूप और
अर्थ को जानता है वह वेदविशारद है॥ २६१-२६६॥
: ग्यारहवां अध्याय पूरा हुआ।

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अथ द्वादशोऽध्यायः।
चातुर्वर्ण्यस्य कृत्स्नोऽयमुक्तो धर्मस्त्वयानघ ।
कर्मणां फलनिर्वृत्तिं शंस नस्तत्त्वतः पराम् ॥ १ ॥
स तानुवाच धर्मात्मा महर्षीन् मानवो भृगुः ।
अस्य सर्वस्य शृणुत कर्मयोगस्य निर्णयम् ॥ २ ॥
शुभाशुभफलं कर्म मनोवाग्देहसम्भवम् ।
कर्मजा गतयो नृणामुत्तमाधममध्यमाः ॥ ३ ॥
तस्येह त्रिविधस्यापि त्र्यधिष्ठानस्य देहिनः ।
दशलक्षणयुक्तस्य मनो विद्यात्प्रवर्तकम् ॥ ४ ॥
परद्रव्येष्वभिध्यानं मनसानिष्टचिन्तनम् ।
वितथाभिनिवेशश्च त्रिविधं कर्म मानसम् ॥ ५ ॥
पारुष्यमनृतं चैव पैशुन्यं चापि सर्वशः ।
असंबद्धप्रलापश्च वाङ्मयं स्याच्चतुर्विधम् ॥ ६ ॥
अदत्तानामुपादानं हिंसा चैवाविधानतः ।
परदारोपसेवा च शारीरं त्रिविधं स्मृतम् ॥ ७ ॥
बारहवां अध्याय।
कर्मफल-निर्णय।
हे पापरहित ! यह चारों वर्णों का संपूर्ण धर्म तुमने कहा। अब
शुभाशुभ कर्मों के दूसरे जन्म में होनेवाले फलों को यथार्थरूप
से हम से कहिये। इस प्रकार महर्षियोंने भृगु से पूँछा। यह सुनकर