मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
तीसरा अध्याय। ७७
तीसरा अध्याय। ७७
पञ्च सूना गृहस्थस्य चुल्ली पेषण्युपस्करः ।
कण्डनी चोदकुम्भश्च बध्यते यास्तु वाहयन् ॥ ६८ ॥
पञ्चयज्ञ, हवन आदि।
अनधिकारी को यज्ञ कराने से, श्रौत-स्मार्त कर्मों में अश्रद्धा से
और वेद न पढ़ने से उत्तम कुल भी शीघ्र नष्ट होजाते हैं। जो कुल
निर्धन भी वेदाध्ययन रूप सम्पत्तिवाले हैं, वे बड़े कुलों में गिने
जाते हैं और यशभागी होते हैं। जिस अग्नि की साक्षी में विवाह
किया जाता है उसको वैवाहिक कहते हैं। उसमें सायं प्रातः होम,
वैश्वदेव, शान्ति-पौष्टिक कर्म, नित्य पाक आदि वैदिक कर्म गृहस्थ
को करना चाहिए। गृहस्थों के यहां हिंसा के पाँच स्थान होते हैं-
चूल्हा, चक्की, बुहारी, ओखली, और जल का घड़ा इनको काम में
लाने से पाप लगता है ॥ ६५-६८ ॥
तासां क्रमेण सर्वासां निष्कृत्यर्थं महर्षिभिः ।
पञ्च कॢप्ता महायज्ञाः प्रत्यहं गृहमेधिनः ॥ ६९ ॥
अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम् ।
होमो दैवो बलिर्भौतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम् ॥ ७० ॥
पञ्चैतान् यो महायज्ञान्न हापयति भक्तितः ।
स गृहेऽपि वसन्नित्यं सूनादोषैर्न लिप्यते ॥ ७१ ॥
इन दोषों को मिटाने के लिए महर्षियों ने गृहस्थ के लिए पांच
महायज्ञ नित्य करने को रचा है। उनके नाम ये हैं-ब्रह्मयज्ञ-पढ़ाना,
पितृयज्ञ-पितरों का तर्पण, देवयज्ञ-होम, भूतयज्ञ-प्राणियों को
बलि देना, मनुष्ययज्ञ-अतिथि सत्कार करना । इन पाँच महायज्ञों
को जो गृहस्थ, शक्ति भर न छोड़े वह हिंसा दोष का भागी
नहीं होता ॥ ६९-७१ ॥
देवतातितिभृत्यानां पितॄणामात्मनश्च यः ।
न निर्वपति पञ्चानामुच्छ्रसन्न स जीवति ॥ ७२ ॥
७८ मनुस्मृति ।
अहुतं च हुतं चैव तथा प्रहुतमेव च ।
ब्राह्मं हुतं प्राशितं च पञ्चयज्ञान् प्रचक्षते ॥ ७३ ॥
जपोऽहुतो हुतो होमः प्रहुतो भौतिको बलिः ।
ब्राह्मं हुतं द्विजाग्र्यार्चा प्राशितं पितृतर्पणम् ॥ ७४ ॥
स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्याद्दैवे चैवेह कर्मणि ।
दैवकर्माणि युक्तो हि बिभर्तीदं चराचरम् ॥ ७५ ॥
जो पुरुष, देवता, अतिथि, सेवक, माता-पिता आदि, और
आत्मा इन पाँचों को अन्न नहीं देता वह जीता भी मरा सा है।
कोई ऋषि पाँच महायज्ञों को अहुत, हुत, प्रहुत, ब्राह्महुत और
प्राशित नाम से भी कहते हैं। अहुत-जप, हुत-होम, प्रहुत-भूत
बलि, ब्राह्महुत-ब्राह्मणकी पूजा, प्राशित-नित्य श्राद्ध को कहते हैं।
द्विज, वेदाध्ययन और अग्निहोत्र में सदा लगा रहे। जो देवकर्म
में लगा रहता है, वह इस जगत का पोषण करता है ॥ ७२--७५ ॥
अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते ।
आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥ ७६ ॥
यथा वायुं समाश्रित्य वर्तन्ते सर्वजन्तवः ।
तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्तन्ते सर्व आश्रमाः ॥ ७७ ॥
यस्मात्त्रयोऽप्याश्रमिणो ज्ञानेनान्नेन चान्वहम् ।
गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमो गृही ॥ ७८ ॥
क्योंकि—अग्नि में आहुति देने से सूर्य को मिलती है, सूर्य से
वर्षा होती है, वर्षा से अन्न और अन्न से प्रजा का पालन होता है।
जैसे सब प्राणी प्राणवायु के सहारे जीते हैं वैसेही सब आश्रम
गृहस्थ के सहारे रहते हैं। तीनों आश्रमों को विद्या और अन्न
दान से गृहस्थही धारण करता है इसलिए सब आश्रमवालों से
गृहस्थाश्रमवाला बड़ा है ॥ ७६-७८ ॥