मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
सातवां अध्याय। २४१
सातवां अध्याय। २४१
साम्ना दानेन भेदेन समस्तैरथवा पृथक् ।
विजेतुं प्रयतेतारीन् न युद्धेन कदाचन ॥ १९८ ॥
अनित्यो विजये यस्माद्दृश्यते युध्यमानयोः ।
पराजयश्च संग्रामे तस्माद्युद्धं विवर्जयेत् ॥ १९९ ॥
त्रयाणामप्युपायानां पूर्वोक्तानामसम्भवे ।
तथा युद्ध्येत संपन्नो विजयेत रिपून् यथा ॥ २०० ॥
जित्वा संपूजयेद्देवान् ब्राह्मणांश्चैव धार्मिकान् ।
प्रदद्यात्परिहारांश्च ख्यापयेदभयानि च ॥ २०१ ॥
सर्वेषां तु विदित्वैषां समासेन चिकीर्षितम् ।
स्थापयेत्तत्र तद्वंश्यं कुर्याच्च समयक्रियाम् ॥ २०२ ॥
प्रमाणानि च कुर्वीत तेषां धर्मान् यथोदितान् ।
रत्नैश्च पूजयेदेनं प्रधानपुरुषैः सह ॥ २०३ ॥
आदानमप्रियकरं दानं च प्रियकारकम् ।
अभीप्सितानामर्थानां काले युक्तं प्रशस्यते ॥ २०४ ॥
सर्वं कर्मेदमादत्तं विधाने दैवमानुषे ।
तयोर्दैवमचिन्त्यं तु मानुषे विद्यते क्रिया ॥ २०५ ॥
राजा साम, दान और भेद इन तीनों से या एकही किसी से
शत्रु के जीतने का उपाय करे। पर जहांतक होसके युद्ध का उद्योग
न करे। युद्ध में लड़नेवालों की हार वा जीत कोई निश्चित नहीं
देखने में आती, कभी कोई कभी कोई, इसलिए युद्ध न करे। जब
उक्त तीनों उपायों से शत्रु को जीतने का भरोसा न हो तभी युद्ध
का उपाय पूरी तौर से करना उचित है जिसमें वह अधीन होजाय।
युद्ध में विजय पाने पर देवता, ब्राह्मणों की पूजा करे। जीती
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२४२ मनुस्मृति ।
प्रजाओं का भूमि कर कम करे और यह ढिंढोरा पिटावे कि
जिन्होंने हमारे साथ बुरा बर्ताव किया है उन्हें भी अभय दिया
गया। जीते राजा और मंत्री का अभिप्राय जानकर, उसी के
वंशवाले को गद्दी देकर अपनी शर्तें पक्की कर लेवे। और उनके
धर्मों को-रिवाजों को माने, रत्नों से मंत्री आदि के साथ उसका
सत्कार करे अर्थात्-खिलत देवे। यद्यपि किसी की प्रिय वस्तु
ले लेना अप्रिय और देना प्रिय होता है तौभी समयानुसार लेना
और देना दोनों अच्छा माना जाता है। ये सब कर्म दैव और
मनुष्य के पुरुषार्थ के अधीन हैं। इन में दैव का निर्णय अशक्य
है परन्तु पुरुषार्थ से कार्य किया जाता है। अर्थात् मनुष्य-साध्य-
कार्य में पुरुषार्थ प्रधान माना जाता है ॥ १६८-२०५॥
सह वापि व्रजेद्युक्तः संधिं कृत्वा प्रयत्नतः ।
मित्रं हिरण्यं भूमिं वा संपश्यंस्त्रिविधं फलम् ॥२०६॥
पाष्णिग्राहं च संप्रेक्ष्य तथाक्रन्दं च मण्डले ।
मित्रादथाप्यमित्राद्वा यात्राफलमवाप्नुयात् ॥ २०७ ॥
हिरण्यभूमिसंप्राप्त्या पार्थिवो न तथैधते ।
यथा मित्रं ध्रुवं लब्ध्वा कृशमप्यायतिक्षमम् ॥ २०८॥
अथवा राजा मित्रता या कुछ द्रव्य या भूमि शत्रु से पाकर
सुलह करके लौट आवे अर्थात् इन पदार्थों को देना शत्रु मंजूर करे
तो लेकर सुलह कर ले। जो विजय करते हुए राजा के पीछे दूसरा
राजा दबाकर चढ़ आवे उसको 'पाष्णिग्राह' कहते हैं और जो
उसको इस काम से रोके उसे 'क्रन्द' कहते हैं। इन दोनों को
देखकर, मित्र या अमित्र से यात्रा का फल ग्रहण करे । (ऐसा न
करे जिसमें ये दोनों बिगड़ जावें) राजा सुवर्ण और भूमि को
पाकर वैसा नहीं बढ़ता, जैसा दुर्बल भी स्थिर मित्र को पाकर
बढ़ता है ॥२०६-२०८ ॥
धर्मज्ञं च कृतज्ञं च तुष्टप्रकृतिमेव च ।
अनुरक्तं स्थिरारम्भं लघुमित्रं प्रशस्यते ॥ २०६ ॥