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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

१। कर्मकाण्ड। वेद प्रतिपाद्य कर्म, श्रौत और स्मार्त भेद

'भूमिका।' ३५
१। कर्मकाण्ड। वेद प्रतिपाद्य कर्म, श्रौत और स्मार्त भेद
से दो प्रकार का है; इसका उल्लेख पहिले भी हो चुका है।
यद्यपि श्रुतियों के आधार पर स्मार्तकर्म हैं और श्रौतकर्म
साक्षात् श्रुतियों से सिद्ध हैं, इस युक्तिसे श्रौतकर्म का प्राधान्य
प्राप्त होता है तो भी स्मार्तकर्म उपनयन के विना श्रौतकर्म अग्निहोत्र
आदि नहीं हो सकता यह वैदिक सिद्धान्त है। इसीलिये
श्रौतकर्म का अधिकारी बनने के लिये पहिले उपनयनद्वारा
द्विजाति होना अत्यावश्यक है।
उपनयन=यज्ञोपवीत=जनेऊ। उपनयनसंस्कार के पूर्व
पश्चाद्भावी संस्कारों की चर्चा आगे की जायगी, पहिले यह
जानना बहुत जरूरी है कि 'उपनयन' ऐसा प्रधान संस्कार
जिसके ऊपर सारी वर्णाश्रम-व्यवस्था का भार है, वह इस
समय कष्टतरदशा को झेल रहा है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य
से विवाहिता-ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या में उत्पन्न बालक अपने
अपने समय पर उपनयन होने से 'द्विजाति' पद को
प्राप्त करते थे। क्षत्रिय, वैश्यों की कथा पीछे की जायगी, पहिले
उन अभागे ब्राह्मण बालकों की दशा दिखलाई जाती है कि
जिनके माता पिता दान लेने के लिये द्विजोत्तम बनकर अग्रसर
होते हैं। बहुधा देखने में आता है कि आठ वर्ष क्या, बल्कि
सोलह वर्ष का जवान बन गया है लेकिन गले से जनेऊ लिपटने
का अवसर नहीं आया। यदि भाग्यवश अवसर भी आया तो
किसी देवता वा तीर्थ के स्थान पर जाकर जनेऊ गले में डाल
लिया गया। यदि लड़के के माता पिता धनिक हुए तो विवाह-
मुहूर्त्त के एक दो दिन पेश्तर, कैसा ही दुर्मुहूर्त्त क्यों न हो,
झटपट गले में जनेऊ डाल दिया जायगा! उस पर भी

३६ मनुस्मृति ।
किसी किसी प्रदेश में यह 'विशेष' है कि बालक के पिता के
भगिनीपति या जामाता आदि ही गायत्री का उपदेश किया
करते हैं और वे 'मान्य' शब्द से पुकारे जाते हैं। कहीं
कहीं कुलगुरु कान फूंका करते हैं, वे चाहे गायत्री से परिचित
हों वा अपरिचित । और यही दशा उन मान्यधुरंधरों की भी है।
किसी मौके पर यहां तक नौबत गुजरती है कि 'रामनाम'
सुना दिया गया। क्या इससे भी गायत्री बड़ी है ! हरे हरे,
ऐसा अँधियारा छा गया। देखो 'रामनाम' बड़ा पदार्थ
है, इसमें कोई शक नहीं पर 'गायत्री' भी वह पदार्थ है
जिसकी पाबन्दी वर्णाश्रम श्रृंखला में बँधकर रामजी ने भी की थी।
और ऐसा भी देखने में आया है कि जिन लड़कों के माता पिता
सामान्य हैं, या विवाह की राह देख रहे हैं, या लापरवाह
हैं उनके दश, बीस, पचास, सौ लड़कों को एकत्र करके कोई
कोई साहसिक धनी एकदम जनेऊ करा डालते हैं। यह
ताण्डव प्रातःकाल से लेकर सायंकाल तक पांच सात ब्राह्मणों
से खतम होता है........इत्यादि ।
लड़कों के पिता लोग 'गोत्र, प्रवर' से अपरिचित रहते
हैं, ऐसी दशा में संध्या-तर्पण की तो बात ही क्या है ? कोई
गोत्र से परिचित भी रहते हैं पर 'प्रवर' से अपरिचित रहते
हैं। कोई गोत्र से परिचित होकर भी गोत्र का व्यवहार नहीं
करते हैं, किंतु गोत्र की जगह 'गोत' एक निराला ही पदार्थ
मानते हैं और उस गोत ही से विवाह-संबंध करते हैं। ऐसी
दशा में 'सगोत्रा' तथा 'समानप्रवरा' कन्या से विवाह
करने में कितना बड़ा दोष है यह बात धर्मशास्त्र या लोक-
१ परिणीय सगोत्रां तु समानप्रवरां तथा।
त्यागं कुर्याद्द्विजस्तस्यास्ततश्चान्द्रायणं चरेत् ॥

भूमिका । ३७
व्यवहार से छिपी नहीं है। यह केवल मूर्खों ही की कथा
नहीं है किंतु विद्वानों की भी है और उनको समाधान भी
मिलता ही जाता होगा।
बाक़ी रहे क्षत्रिय और वैश्य; उनको क्या कहा जावे ?
ब्राह्मणों को चारा देते हैं, तो भी 'दोषा वाच्या गुरोरपि'
इस न्याय का आश्रय लेकर कुछ कहा जाता है क्योंकि
याज्य होने से धर्मशास्त्रानुसार उनके ऊपर ब्राह्मणों का
अधिकार पुश्तैनी है। दुःख का विषय है कि क्षत्रिय और
वैश्य जाति से जनेऊ का व्यवहार उठ सा गया। कई घराने
तो ऐसें मिलेंगे कि उनमें से यदि किसी एक बूढ़े को पूछा
जावै कि आपके पुरुषों में किसका जनेऊ हुआ था तो देखना तो
दूर है पर सुनने का भी पता न चलेगा। कई घराने में किसी
क़दर जनेऊ होता भी है तो और घरानों के साथ खान् पान
संबंध होने से गजस्नान के समान उसका होना न होना बरा-
बर है। दूसरी यह बात है कि छोटे छोटे क्षत्रिय तथा वैश्य
विवाह आदि संबंधों के कारण बड़ों के अधीन हो रहे हैं
और बड़े तो बड़े ही हैं जिनमें बहुतेरे क्षत्रियों की उपभोग-
सामग्री महंमदियों की सी है और बहुतेरे वैश्यों का आचार
जैनों का सा है इसीलिये 'कलावाद्यन्तयोः स्थितिः' यह
कहना कई अंशों में यथार्थ हो गया है। और जो ब्राह्मणों के
प्रभाव से तथा अपने अपने अज्ञान से नवीन-त्रैवर्णिक जाति
बनती जाती है उसके विचार की आवश्यकता नहीं है। चातु-
र्वर्ण्यशिक्षा में कहा है—

३८ मनुस्मृति ।

‘ उत्पद्यतां नाम विलीयतां
वा नवा नवा जातिरहो तया किम् ।
न यत्र पारस्परिकी प्रतीतिः
क्रियापि सा जातिरनर्गला किम् ॥
जातिस्तदुत्कर्षविधिर्द्वयीति
स्मार्ती न लौकिक्यथ शासनेन ।
तत्राश्रयो युज्यत आत्मवृद्ध्यै
नहीच्छया सिध्यति भागधेयम् ॥’
अब ‘उपनयन’ के पूर्वपश्चाद्भावी संस्कारों का क्रम
दिखलाया जाता है, यह क्रम यद्यपि स्मृतिपाठभेद के कारण
कई स्थलों में भिन्न भिन्न प्राप्त होता है तो भी प्रौढ़ विद्वानों के
लेखानुसार ठीक कर लिया गया है। “ १ गर्भाधान, २ पुंस-
वन, ३ सीमन्तोन्नयन, ४ जातकर्म, ५ नामकरण, ६ अन्न-
प्राशन, ७ चौल, ८ उपनयन, १२ चतुर्वेदव्रत, १३ स्नान
(समावर्तन) १४ सहधर्मचारिणी-संयोग (विवाह) १६ पञ्च-
महायज्ञ, २० अष्टका, २१ पार्वण, २२ श्राद्ध, २३ श्रावणी,
२४ आग्रहायणी, २५ चैत्री, २६ आश्वयुजी, २७ अग्न्याधान,
२८ अग्निहोत्र, २९ दर्शपौर्णमास, ३० चातुर्मास्य, ३१ आग्र-
यणेष्टि, ३२ निरूढपशुबन्ध, ३३ सौत्रामणी, ३४ अग्निष्टोम,
३५ अत्यग्निष्टोम, ३६ उक्थ, ३७ षोडशी, ३८ वाजपेय,
३६ अतिरात्र, ४० आप्तोर्याम ये चालीस संस्कारों के नाम हैं।
इनके अनुष्ठान-क्रम और लक्षण कल्पसूत्रों से जाने जाते हैं।
इनमें गर्भाधान से लेकर विवाहपर्यन्त चौदह संस्कारों से
पवित्र गृहस्थ=गृही=घरवाला बनता है और अगले संस्कारों
से वह उत्तरोत्तर माननीय बनता है (और चतुर्वेदव्रत के