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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

ग्यारहवां अध्याय । ४०६

ग्यारहवां अध्याय । ४०६
धान्यकुप्यपशुस्तेयं मद्यपस्त्रीनिषेवणम् ।
स्त्रीशूद्रविद्विक्षत्रवधो नास्तिक्यं चोपपातकम् ॥ ६७ ॥
ब्राह्मणस्य रुजःकृत्या घ्रातिरघ्रेयमद्ययोः ।
जैह्यं च मैथुनं पुंसि जातिभ्रंशकरं स्मृतम् ॥ ६८ ॥
खराश्वोष्ट्रमृगेभानामजाविकवधस्तथा ।
संकरीकरणं ज्ञेयं मीनाहिमहिषस्य च ॥ ६६ ॥
निन्दितेभ्यो धनादानं वाणिज्यं शूद्रसेवनम् ।
अपात्रीकरणं ज्ञेयमसत्यस्य च भाषणम् ॥ ७० ॥
कृमिकीटवयोहत्या मद्यानुगतभोजनम् ।
फलैधःकुसुमस्तेयमधैर्यं च मलावहम् ॥ ७१ ॥
एतान्येनांसि सर्वाणि यथोक्तानि पृथक् पृथक् ।
यैर्यैर्व्रतैरपोह्यन्ते तानि सम्यङ्निबोधत ॥ ७२ ॥
ईंधन के लिए हरे वृक्षों को काटना, अपने ही लिए भोजन
बनाना, दूषित अन्न को खाना, समर्थ होकर भी अग्निहोत्र न लेना,
चोरी करना, ऋणों को न चुकाना, असत् शास्त्रों का पढ़ना, नाच-
गान में लगना, धान्य, कुप्य और पशुओं की चोरी, मद्यप स्त्री
का संग, स्त्री, शूद्र, वैश्य और क्षत्रिय का वध और नास्तिकता,
ये सब उपपातक हैं। ब्राह्मण को पीड़ा देना, न सूंघने योग्य वस्तु
को और मद्य को सूंघना, कुटिलता और पुरुष से मैथुन, ये जाति-
से भ्रष्ट करनेवाले पाप हैं। गधा, घोड़ा, ऊंट, मृग, हाथी, बकरा,
मेढ़ा, मछली, सांप और भैंस का वध करना, इन कर्मों को ' संकरी-
करण ' पाप कहते हैं। निन्दितों से धन लेना, व्यापार, शूद्रसेवा
और असत्य बोलना ये ' अपात्रीकरण ' पाप हैं। कृमि, कीट और
पक्षियों का वध, मद्य के साथ भोजन, फल, काठ और फूल
चुराना और अधीरता ये ' मलिनीकरण ' पाप हैं । ये सब ब्रह्म-
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४१० मनुस्मृति।
हत्यादि पाप जो अलग अलग कहे गये हैं वे जिन जिन व्रतों से
नष्ट होते हैं-उनको सावधान होकर सुनो ॥ ६५-७२ ॥
ब्रह्महा द्वादशसमाः कुटीं कृत्वा वने वसेत् ।
भैक्षाश्यात्मविशुद्ध्यर्थं कृत्वा शवशिरोध्वजम् ॥७३॥
लक्ष्यं शस्त्रभृतां वा स्याद्विदुषामिच्छयात्मनः ।
प्रास्येदात्मानमग्नौ वा समिद्धे त्रिरवाक्शिराः॥ ७४ ॥
यजेत वाश्वमेधेन स्वर्जिता गोसवेन वा ।
अभिजिद्विश्वजिद्भ्यां वा त्रिवृताग्निष्टुतापि वा ॥७५॥
जपन् वान्यतमं वेदं योजनान्तं शतं व्रजेत् ।
ब्रह्महत्यापनोदाय मितभुङ्नियतेन्द्रियः ॥ ७६ ॥
सर्वस्वं वेदविदुषे ब्राह्मणायोपपादयेत् ।
धनं वा जीवनायालं गृहं वा सपरिच्छदम् ॥ ७७ ॥
हविष्यभुग्वाऽनुसरेत् प्रतिस्रोतः सरस्वतीम् ।
जपेद्वा नियताहारस्त्रिर्वे वेदस्य संहिताम् ॥ ७८ ॥
कृतावपनो निवसेद् ग्रामान्ते गोव्रजेऽपि वा ।
आश्रमे वृक्षमूले वा गोब्राह्मणहितेरतः ॥ ७९ ॥
ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा सद्यः प्राणान् परित्यजेत् ।
मुच्यते ब्रह्महत्याया गोप्ता गोर्ब्राह्मणस्य च ॥ ८० ॥
ब्रह्महत्या—प्रायश्चित्त ।
ब्रह्महत्या-पातक से निवृत्ति के लिए बारह वर्ष तक वन में कुटी
बनाकर रहे, भिक्षा मांगकर खावे और झोपड़ी में मुरदे की खोपड़ी
टांगे । अथवा शस्त्रधारियों की इच्छानुसार पातक ज़ाहिर होने