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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

तीसरा अध्याय। ८५

तीसरा अध्याय। ८५
देवानृषीन्मनुष्यांश्च पितॄन्गृह्याश्च देवताः ।
पूजयित्वा ततः पश्चाद्गृहस्थःशेषभुग्भवेत् ॥११७॥
अघं स केवलं भुङ्क्ते यः पचत्यात्मकारणात् ।
यज्ञशिष्टाशनं ह्येतत्सतामन्नं विधीयते ॥ ११८ ॥
इस प्रकार सबको भोजन दिये बिना जो पहले आपही खा
लेता है। मरने पर उसके मांस को कुत्ते और गीध खाते हैं ।
ब्राह्मण, अतिथि, सम्बन्धी आदि को खिलाकर पीछे बचा अन्न
आप और स्त्री खावे । देवता, ऋषि, मनुष्य, पितर और घर के
पूज्य देवताओं का पूजन करके शेष अन्न गृहस्थ को खाना चा-
हिए । जो अपनेही लिए भोजन तैयार करता है वह केवल पाप
को ही खाता है, क्योंकि उत्तम पुरुषों को पञ्च महायज्ञ से बचे
अन्न काही भोजन फलदायक होता है ॥ ११५-११८ ॥
राजर्त्विक्स्नातकगुरून् प्रियश्वशुरमातुलान् ।
अर्हयेन्मधुपर्केण परिसंवत्सरात्पुनः ॥ ११९ ॥
राजा च श्रोत्रियश्चैव यज्ञकर्मण्युपस्थितौ ।
मधुपर्केण संपूज्यौ न त्वयज्ञ इति स्थितिः ॥ १२० ॥
सायं त्वन्नस्य सिद्धस्य पत्न्यमन्त्रं बलिं हरेत् ।
वैश्वदेवं हि नामैतत्सायं प्रातर्विधीयते ॥ १२१ ॥
राजा, ऋत्विक्, स्नातक, गुरु, मित्र, जामाता, प्रिय पुरुष और
श्वशुर, मामा, एक साल के बीतने पर घर आवें तो मधुपर्क से
पूजन करना चाहिए। राजा और वेदज्ञ ब्राह्मण साल के भीतर भी
यदि यज्ञ के मौक़े पर आजांयें तो मधुपर्क से पूजन करना चाहिए।
अगर यज्ञमें न आवें तो न पूजन करे। स्त्री को शाम को पकाये अन्न
में से बिना मन्त्र पढ़े ही बलि देना चाहिए । इस बलि को
वैश्वदेव कहते हैं । यह सायंकाल और प्रातःकाल करना
चाहिए ॥ ११९-१२१ ॥

८६ मनुस्मृति ।
पितृयज्ञं तु निर्वर्त्य विप्रश्चेन्दुक्षयेऽग्निमान् ।
पिण्डान्वाहार्यकं श्राद्धं कुर्यान्मासानुमासिकम्॥१२२॥
पितॄणां मासिकं श्राद्धमन्वाहार्यं विदुर्बुधाः ।
तच्चामिषेण कर्तव्यं प्रशस्तेन प्रयत्नतः ॥ १२३ ॥
तत्र ये भोजनीयाः स्युर्ये च वर्ज्या द्विजोत्तमाः ।
यावन्तश्चैव यैश्चान्नैस्तान्प्रवक्ष्याम्यशेषतः॥१२४॥
द्वौ दैवे पितृकार्ये त्रीनैकैकमुभयत्र वा ।
भोजयेत्सुसमृद्धोऽपि न प्रसज्जेत विस्तरे ॥ १२५ ॥
सत्क्रियां देशकालौ च शौचं ब्राह्मणसंपदः ।
पञ्चैतान् विस्तरो हन्ति तस्मान्नेहेत विस्तरम् ॥ १२६ ॥
श्राद्ध-प्रकरण ।
अग्निहोत्री द्विज अमावास्या को पितृयज्ञ पूरी करके प्रतिमास
पिण्डान्वाहार्यक श्राद्ध को करे । पितरों का हर मास में जो श्राद्ध
होता है उसको अन्वाहार्यक श्राद्ध कहते हैं । वह उत्तम मांस से
करना चाहिए । उसमें जो ब्राह्मण ग्राह्य हैं और जो त्याज्य हैं
जितने भोजन कराने चाहिएं और जो अन्न चाहिए उसका विस्तार
इस प्रकार है—
देवकर्म में दो ब्राह्मण और पितृकर्म में तीन ब्राह्मण या दोनों में
एक एक ही भोजन कराना चाहिए । धनी पुरुष भी अधिक
ब्राह्मणों के भोजन में न लगे । विस्तार करने से ब्राह्मणों का
सत्कार, देश, काल, पवित्रता और श्रेष्ठ ब्राह्मण इन पाँचों को नष्ट
करता है। इसलिए ज्यादा फैलाव कभी न करना चाहिए।१२२-१२६॥
प्रथिता प्रेतकृत्यैषा पित्र्यं नाम विधुक्षये ।
तस्मिन्युक्तस्यैति नित्यं प्रेतकृत्यैव लौकिकी ॥ १२७ ॥
श्रोत्रियायैव देयानि हव्यकव्यानि दातृभिः ।
अर्हत्तमाय विप्राय तस्मै दत्तं महाफलम् ॥ १२८ ॥