मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
दूसरा अध्याय । ६३
दूसरा अध्याय । ६३
स्वरूप है, ये तीनों अग्नि संसार में बड़े हैं। इन तीनों की भक्ति-
सेवा से तीनों लोक गृहस्थ जीतता है। और स्वर्ग में देवताओं
की भांति सुख पाता है। मातृभक्ति से यह लोक, पितृभक्ति से
मध्यलोक और गुरुभक्ति से ब्रह्मलोक को पाता है। जिसने इन
तीनों का आदर किया उसने सब धर्मों का पालन किया—और
जिसने अनादर किया उसके सब धर्म-कर्म निष्फल हैं। जब तक ,
पिता, माता और गुरु जीवित रहें तब तक इनकी सेवा में विशेष
लगा रहे ॥ २२८—२३५ ॥
तेषामनुपरोधेन पारत्र्यं यद्यदाचरेत् ।
तत्तन्निवेदयेत्तेभ्यो मनोवचनकर्मभिः ॥ २३६ ॥
त्रिष्वेतेष्विति कृत्यं हि पुरुषस्य समाप्यते ।
एष धर्मः परः साक्षादुपधर्मोऽन्य उच्यते ॥ २३७ ॥
श्रद्दधानः शुभां विद्यामाददीतावरादपि ।
अन्त्यादपि परं धर्मं स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ॥ २३८ ॥
विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम् ।
अमित्रादपि सद्वृत्तममेध्यादपि काञ्चनम् ॥ २३६ ॥
स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्मः शौचं सुभाषितम् ।
विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वतः ॥२४०॥
इसके सिवा जो कर्म करे वह इनको निवेदन करदेवे। इन तीनों
की सेवा से, पुरुष के कर्तव्य पूरे पड़जाते हैं। यह मुख्य धर्म है
और गौणधर्म माना जाता है। श्रद्धामय पुरुष उत्तम विद्याओं को
हीनजाति से भी सीखे और चण्डाल से भी लोकमर्यादा सीखे
और हीनकुल से भी सुशील स्त्री का विवाह करे। विष से भी
अमृत और बालक से भी हित वचन ग्रहण करले। शत्रु से भी
सदाचार और अपवित्र में से भी सुवर्ण निकाल लेवे। स्त्री, रत्न
विद्या, धर्म, शौच, अच्छे वचन और भांति भांति की दस्तकारी
आदि सब से सीख लेवे ॥ २३६—२४० ॥
५४ मनुस्मृति ।
अब्राह्मणादध्ययनमापत्काले विधीयते ।
अनुव्रज्या च शुश्रूषा यावदध्ययनं गुरोः ॥ २४१ ॥
नाब्राह्मणे गुरौ शिष्यो वासमात्यन्तिकं वसेत् ।
ब्राह्मणे चाननूचाने काङ्क्षन् गतिमनुत्तमाम् ॥ २४२ ॥
यदि त्वात्यन्तिकं वासं रोचयेत गुरोः कुले ।
युक्तः परिचरेदेनमाशरीरविमोचनात् ॥ २४३ ॥
आपत्तिकाल में क्षत्रिय, वैश्य से भी अध्ययन का विधान है ।
पर ऐसे गुरु की सेवा अध्ययनकाल तक ही करनी चाहिए । जो
गुरु ब्राह्मण न हो या साङ्गवेद का ज्ञाता न हो तो मोक्षार्थी ब्रह्म-
चारी जीवनभर गुरुकुलवास न करे । यदि नैष्ठिक-ब्रह्मचारी जीवन
भर गुरुकुलवास चाहे तो देहान्त तक सावधानी से गुरुसेवा में
लगा रहे ॥ २४१—२४३ ॥
आसमाप्तेः शरीरस्य यस्तु शुश्रूषते गुरुम् ।
स गच्छत्यञ्जसा विप्रो ब्रह्मणः सद्म शाश्वतम् ॥ २४४ ॥
न पूर्वं गुरवे किञ्चिदुपकुर्वीत धर्मवित् ।
स्नास्यंस्तु गुरुणाज्ञप्तः शक्त्या गुर्वर्थमाहरेत् ॥ २४५ ॥
क्षेत्रं हिरण्यं गामश्वं छत्रोपानहमासनम् ।
धान्यं शाकं च वासांसि गुरवे प्रीतिमावहेत् ॥ २४६ ॥
जो ब्राह्मण देहान्त तक गुरु की शुश्रूषा करता है वह मोक्ष को
पाता है । धर्मज्ञ ब्रह्मचारी, अध्ययन के पहले दक्षिणा आदि से गुरु
का कुछ भी उपकार न करे । किन्तु समावर्तन के बाद, गुरु की
आज्ञा से शक्ति के अनुसार गुरुदक्षिणा देनी चाहिए । खेत, सोना,
गौ, घोड़ा, छतरी, जूता, आसन, अन्न, शाक और वस्त्र अर्पण
करके गुरुको प्रसन्न करे ॥ २४४—२४६ ॥