मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
नवां अध्याय। ३५३
नवां अध्याय। ३५३
कमाया धन हो तो उसमें पिता का धन छोड़कर समान भाग करना
चाहिए। यह धर्मशास्त्र की मर्यादा है ॥ २०३-२०५ ॥
विद्याधनं तु यद्यस्य तत्तस्यैव धनं भवेत् ।
मैत्र्यमौद्वाहिकं चैव माधुपर्किकमेव च ॥ २०६ ॥
भ्रातॄणां यस्तु नेहेत धनं शक्तः स्वकर्मणा ।
स निर्भाज्यः स्वकादंशात्किञ्चिद्दत्वोपजीवनम्॥२०७॥
अनुपघ्नन् पितृद्रव्यं श्रमेण यदुपार्जितम् ।
स्वयमीहितलब्धं तन्नाकामो दातुमर्हति ॥ २०८ ॥
पैतृकं तु पिता द्रव्यमनवाप्तं यदाप्नुयात् ।
न तत्पुत्रैर्भजेत्सार्धमकामः स्वयमर्जितम् ॥ २०६ ॥
विभक्ताः सह जीवन्तो विभजेरन् पुनर्यदि ।
समस्तत्र विभागः स्याज्ज्यैष्ठ्यं तत्र न विद्यते ॥ २१०॥
येषां ज्येष्ठः कनिष्ठो वा हीयेतांशप्रदानतः ।
म्रियेतान्यतरो वापि तस्य भागो न लुप्यते ॥ २११ ॥
सोदर्या विभजेरंस्ते समेत्यं सहिताः समम् ।
भ्रातरो ये च संसृष्टा भगिन्यश्च सनाभयः ॥ २१२ ॥
यो ज्येष्ठो विनिकुर्वीत लोभाद्भ्रातॄन् यवीयसः ।
सोऽज्येष्ठःस्यादभागश्च नियन्तव्यश्चराजभिः॥२१३॥
जिस को जो धन विद्या से पैदा करे वह उसी का है। मित्र से,
विवाह में और मधुपर्क में जो धन जिसको मिले वह उसीका है।
जो अपने पुरुषार्थ से धन कमा सकता है और भाइयों के साधा-
रण धन को न चाहे उसको कुछ निर्वाह योग्य देकर जुदा कर
दें। पिता के धन को हानि न पहुँचाकर अपने परिश्रम से जो धन
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३५४ मनुस्मृति।
पावे उसमें इच्छा न हो तो भाइयों को भाग न दे। पिता के पिता
का धन जिसको कोई न पासका हो उसको पिता पावे और
इच्छा न हो तो बाँट कर न दे, क्योंकि वह उसने स्वयं पाया
है। भाई एक बार जुदा होकर फिर साथ रहें और फिर बाँट क-
रना चाहें तो समभाग करें। उस समय बड़े भाई का अधिक भाग
नहीं लगता। जिन भाइयों में बड़ा वा छोटा भाई बांट के समय
संन्यासी होगया हो या मरगया हो तो भी उसका भाग नष्ट
नहीं होता। यदि उसके पुत्र, पुत्री, स्त्री, माता-पिता न हों तो
सगे भाई या सहोदर बहने आपस में विभाग कर लें। यदि बड़ा
भाई छोटे भाई को लोभ से धोखा दे तो उसको बड़ा न माने,
अधिक भाग न दे और राजा उसको दण्ड देवे ॥ २०६-२१३ ॥
सर्व एव विकर्मस्था नार्हन्ति भ्रातरो धनम् ।
न चादत्त्वा कनिष्ठेभ्यो ज्येष्ठः कुर्वीत यौतुकम् ॥ २१४ ॥
भ्रातॄणामविभक्तानां यद्युत्थानं भवेत्सह ।
न पुत्रभागं विषमं पिता दद्यात्कथंचन ॥ २१५ ॥
ऊर्ध्वं विभागाज्जातस्तु पित्र्यमेव हरेद्धनम् ।
संसृष्टास्तेन वा ये स्युर्विभजेत स तैः सह ॥ २१६ ॥
अनपत्यस्य पुत्रस्य मातादायमवाप्नुयात् ।
मातर्यपि च वृत्तायां पितुर्माता हरेद्धनम् ॥ २१७ ॥
ऋणे धने च सर्वस्मिन् प्रविभक्ते यथाविधि ।
पश्चाद्दृश्येत यत्किञ्चित्तत्सर्वं समतां नयेत् ॥ २१८ ॥
वस्त्रं पत्रमलङ्कारं कृतान्नमुदकं स्त्रियः ।
योगक्षेमं प्रचारं च न विभाज्यं प्रचक्षते ॥ २१९ ॥
अयमुक्तो विभागो वः पुत्राणां च क्रियाविधिः ।
क्रमशः क्षेत्रजादीनां द्यूतधर्मं निबोधत ॥ २२० ॥