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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 565 of 649

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Page 565

ग्यारहवां अध्याय। ४२५
एषोऽनाद्यादनस्योक्तो व्रतानां विविधो विधिः ।
स्तेयदोषापहतॄणां व्रतानां श्रूयतां विधिः ॥ १६२ ॥
धान्यान्नधनचौर्याणि कृत्वा कामाद्विजोत्तमः ।
स्वजातीयगृहादेव कृच्छ्राब्देन विशुध्यति ॥ १६३ ॥
मनुष्याणां तु हरणे स्त्रीणां क्षेत्रगृहस्य च ।
कूपवापीजलानां च शुद्धिश्चान्द्रायणं स्मृतम् ॥ १६४॥
द्रव्याणामल्पसाराणां स्तेयं कृत्वान्यवेश्मतः ।
चरेत्सान्तपनं कृच्छ्रं तन्निर्यात्यात्मशुद्धये ॥ १६५ ॥
भक्ष्यभोज्यापहरणे यानशय्यासनस्य च ।
पुष्पमूलफलानां च पञ्चगव्यं विशोधनम् ॥ १६६ ॥
तृणकाष्ठद्रुमाणां च शुष्कान्नस्य गुडस्य च ।
चैलचर्मामिषाणां च त्रिरात्रं स्यादभोजनम् ॥ १६७॥
मणिमुक्ताप्रवालानां ताम्रस्य रजतस्य च ।
अयः कांस्योपलानां च द्वादशाहं कणान्नता ॥ १६८॥
अपनी शुद्धि चाहनेवाला पुरुष अभोज्य अन्न न खाय और
अज्ञान से खाया हुआ वमन करदे। यह न करसके तो शीघ्र
प्रायश्चित्तों से शुद्धि करे। यह सब अभक्ष्य-भक्षण व्रतों की अनेक
प्रकार की विधि कही। अब चोरी के पाप को नाश करनेवाले
व्रतों को सुनो। ब्राह्मण यदि जानकर अपने सजातीय के घर से
अन्न, पक्वान्न और धन चुरावे तो एक वर्ष प्राजापत्य करने से
शुद्ध होता है। मनुष्य, स्त्री, खेत, घर, कूप और बावड़ी के जल
की चोरी करने पर चान्द्रायण व्रत करना चाहिये। कम कीमत
के पदार्थ दूसरे के घर से चुराने पर सान्तपन व्रत करे और वह
पदार्थ लौटा देवे। लड्डू आदि भक्ष्य, खीर वगैरह भोज्य, सवारी,
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