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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

नवां अध्याय। ३३५

नवां अध्याय। ३३५
धर्म का नाश होता हो तो शीघ्रही करले । पति देवताओं की दी
हुई स्त्री को पाता है अपनी इच्छा से नहीं * इसलिए देवताओं
के प्रीत्यर्थ उस सती का पालन पोषण नित्य करे। ईश्वर ने गर्भ-
धारणार्थ स्त्रियों को रचा और सन्तान पैदा करने को पुरुष रचा
इसलिए स्त्री-पुरुष साथ में धर्माचरण करें—यह वेद में कहा है।
आसुरविवाह के लिए कन्या का मूल्य दिया हो और उसका पति
मर जाय तो कन्या की इच्छा से देवर का विवाह कर दे ॥ ९४-९७ ॥
आददीत न शूद्रोऽपि शुल्कं दुहितरं ददत् ।
शुल्कं हि गृह्णन् कुरुते छन्नं दुहितृविक्रयम् ॥ ९८ ॥
एतत्तु न परे चक्रुर्नापरे जातु साधवः ।
यदन्यस्य प्रतिज्ञाय पुनरन्यस्य दीयते ॥ ९९ ॥
नानुशुश्रुम जात्वेतत् पूर्वेष्वपि हि जन्मसु ।
शुल्कसंज्ञेन मूल्येन छन्नं दुहितृविक्रयम् ॥ १०० ॥
अन्योन्यस्याव्यभिचारो भवेदामरणान्तिकः ।
एष धर्मः समासेन ज्ञेयः स्त्रीपुंसयोः परः ॥ १०१ ॥
कन्यादान में शूद्र भी धन न ले । जो लेता है वह छिपा हुआ
कन्या बेंचता है। यह कर्म पहले सत्पुरुषों ने नहीं किया और न
इस समय करते हैं जोकि एक को कन्यादान करके दूसरे को
दीजावे । पूर्व कल्पों में भी कन्या-विक्रय नहीं सुना गया। स्त्री-
पुरुष मरण पर्यन्त आपस में प्रेमपूर्वक रहकर धर्म आदि चतुर्वर्ग
फल को प्राप्त करें। इस प्रकार स्त्री-पुरुषों का परम-धर्म संक्षेप
से कहा गया है ॥ ९८-१०१ ॥
तथा नित्यं यतेयातां स्त्रीपुंसौ तु कृतक्रियौ ।
यथा नाभिचरेतां तौ वियुक्तावितरेतरम् ॥ १०२ ॥

  • मन्त्र है:-' भगो अर्यमा सविता पुरंधिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः । ' इत्यादि ।

३३६ मनुस्मृति ।
एष स्त्रीपुंसयोरुक्तो धर्मो वो रतिसंहितः ।
आपद्यपत्यप्राप्तिश्च दायभागं निबोधत ॥ १०३ ॥
स्त्री-पुरुष विवाह करके ऐसा व्यवहार करें, जिसमें धर्माचरण में
अलग न हों। यह स्त्री-पुरुषों का धर्म और आपत्काल में सन्तान-
विधि कही गई है। अब दायभाग की व्यवस्था सुनो ॥१०२-१०३ ॥
ऊर्ध्वं पितुश्च मातुश्च समेत्य भ्रातरः समम् ।
भजेरन् पैतृकं रिक्थमनीशास्ते हि जीवतोः ॥१०४॥
ज्येष्ठ एव तु गृह्णीयात्पित्र्यं धनमशेषतः ।
शेषास्तमुपजीवेयुर्यथैव पितरं तथा ॥ १०५ ॥
ज्येष्ठेन जातमात्रेण पुत्री भवति मानवः ।
पितॄणामनृणश्चैव स तस्मात् सर्वमर्हति ॥ १०६ ॥
यस्मिन्नृणं संनयति येन चानन्त्यमश्नुते ।
स एव धर्मजः पुत्रः कामजानितरान् विदुः ॥ १०७ ॥
पितेव पालयेत्पुत्रान्ज्येष्ठो भ्रातॄन् यवीयसः ।
पुत्रवच्चापि वर्तेरञ्ज्येष्ठे भ्रातरि धर्मतः ॥ १०८ ॥
ज्येष्ठः कुलं वर्धयति विनाशयति वा पुनः ।
ज्येष्ठः पूज्यतमो लोके ज्येष्ठः सद्भिरगर्हितः ॥ १०६ ॥
दायभाग-व्यवस्था ।
पिता और माता की मृत्यु के बाद, भाई आपस में पिता की
सम्पत्ति बाँट ले, पर उनके जीते नहीं बाँट सकते। बड़ा भाई पिता
का सब धन ग्रहण करे और शेष भाई जैसे पिता की आशा में जी-
विका करते थे, वैसेही भाई के वश में रहकर करें । बड़े पुत्र का
जन्म होने से मनुष्य पुत्रवान् होता है और पितृऋण से छूटता है,

इसलिए वह सब धन का स्वामी हो सकता है। जिस के उत्पन्न
होने से, पितृऋण दूर होता है। और मोक्ष प्राप्त होता है वही धर्म-
पुत्र है। दूसरों को काम से उत्पन्न जाने। बड़ा भाई, छोटे भाइयों
का पालन पिता के समान करे। और छोटे भाई, बड़े भाई के
साथ पिता के समान धर्मानुसार बर्ताव करें। ज्येष्ठ कुलं को
बढ़ाता है और ज्येष्ठ ही नाश करता है, ज्येष्ठ गुणवान् जगत् में
पूज्य है और सत्पुरुषों में निंदा नहीं पाता ॥१०४-१०६॥
यो ज्येष्ठो ज्येष्ठवृत्तिः स्यान्मातेव स पितेव सः।
अज्येष्ठवृत्तिर्यस्तु स्यात्स संपूज्यस्तु बन्धुवत् ॥११०॥
एवं सह वसेयुर्वा पृथग्वा धर्मकाम्यया।
पृथग् विवर्द्धते धर्मस्तस्माद्धर्म्या पृथक् क्रिया ॥१११॥
ज्येष्ठस्य विंश उद्धारः सर्वद्रव्याच्च यद्वरम्।
ततोऽर्धं मध्यमस्य स्यात्तुरीयं तु यवीयसः ॥ ११२ ॥
ज्येष्ठश्चैव कनिष्ठश्च संहरेतां यथोदितम्।
येऽन्ये ज्येष्ठकनिष्ठाभ्यां तेषां स्यान्मध्यमं धनम् ॥११३॥
जो बड़ा भाई बड़प्पन का बर्ताव करे वह माता-पिता के स-
मान है। और वैसा बर्ताव न करे तो बन्धुवत् पूज्य है। भाइयों ने
यदि बांट न किया हो तो साथ रहें और बांट कर लिया हो तो अ-
लग अलग रहें। अलग रहने से धर्म-कर्म अधिक होता है ❋ इस
लिए अलग रहना धर्मानुकूल है। बड़े भाई को बीसवां भाग अ-
धिक भाग है और सब पदार्थों में जो उत्तम हो वह भी देना चा-
हिए। मध्यम भाई को इसका आधा—चालीसवां भाग अधिक दें
और बाक़ी धन को सब भाई समान बांट लें। बड़ा और सब से

❋ बृहस्पति का भी वचन है—
'एकपाकेन वसतां पितृदेवद्विजार्चनम्। एकम्भवद्विभक्तानां तदेवं स्याद् गृहे गृहे ॥'
अर्थात् अलग रहने से पञ्चमहायज्ञादि भी अलग होते हैं। यों धर्मवृद्धि होती है।
४३

३३८ मनुस्मृति ।
छोटा भाई इस प्रकार अपना भाग लें और दूसरे भाइयों का
मध्यम भाग होना चाहिए ॥ ११०-११३ ॥
सर्वेषां धनजातानामाददीताग्रयमग्रजः ।
यच्च सातिशयं किंचिदशतश्चाप्नुयाद्वरम् ॥ ११४ ॥
उद्धारो न दशस्त्वस्ति संपन्नानां स्वकर्मसु ।
यत्किञ्चिदेव देयं तु ज्यायसे मानवर्धनम् ॥ ११५ ॥
एवं समुद्धृतोद्धारे समानांशान् प्रकल्पयेत् ।
उद्धारेऽनुद्धृते त्वेषामियं स्यादंशकल्पना ॥ ११६ ॥
एकाधिकं हरेज्ज्येष्ठः पुत्रोऽप्यर्धं ततोऽनुजः ।
अंशमंशं यवीयांस इति धर्मो व्यवस्थितः ॥ ११७ ॥
बड़ाभाई गुणवान् हो और दूसरे गुणहीन हों तो सब सम्पत्ति
में जो श्रेष्ठ वस्तु हैं उनको बड़ाभाई पावे और गौ वगैरह दश—प-
शुओं में जो श्रेष्ठ हो उसको भी पावे। यदि सब भाई गुणी हों तो
बड़े भाई को दशमें से श्रेष्ठ वस्तु न देकर, उसके सम्मानार्थ कुछ
वस्तु अधिक देवे। इस प्रकार बीसवां भाग निकालकर बाक़ी का
बराबर भाग करे । और बीसवां अलग न किया हो तो इसभांति
करे—बड़ाभाई दो भाग उससे छोटा ड्योढ़ा और उससे छोटे
भाई सब एक एक भाग लें—यह मर्यादा है ॥ ११४-११७ ॥
स्वेभ्योऽशेभ्यस्तु कन्याभ्यः प्रदद्युर्भातरः पृथक् ।
स्वात्स्वाद्दंशाच्चतुर्भागं पतिताः स्युरदित्सवः ॥११८॥
अजाविकं सैकशफं न जातु विषमं भजेत् ।
अजाविकं तु विषमं ज्येष्ठस्यैव विधीयते ॥ ११९ ॥
यवीयाञ्ज्येष्ठभार्यायां पुत्रमुत्पादयेदिति ।
समस्तत्र विभागः स्यादिति धर्मो व्यवस्थितः॥१२०।