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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पत और पञ्चरात्र का खण्डन ब्रह्मसूत्रही में आचुका है और

भूमिका। ११५
पत और पञ्चरात्र का खण्डन ब्रह्मसूत्रही में आचुका है और
अनिषिद्ध पाशुपत तथा पञ्चरात्र सर्वथा ग्राह्य हैं यह विचार
भी पहिले आचुका है। सांख्य और तत्समान तन्त्र-योग के
प्रधान कारण वादादि कतिपय विषय का निरास ब्रह्मसूत्रही
में आया है बाकी के विषय माननीय हैं, इसीलिये सांख्य-योग
की महिमा सर्वत्र प्रसिद्ध है। न्याय और वैशेषिक के भी कति-
पय अंश दूष्य हैं उनका भी खण्डन ब्रह्मसूत्र में लिखा है।
चार्वाकादि नास्तिक दर्शन की अग्राह्यता सर्वत्र सुप्रसिद्ध है
जिसका यहां प्रस्ताव ही नहीं है। बाकी रही पूर्वोत्तरमीमांसा;
जिनमें पूर्वमीमांसा का निरास पद्मपुराण के ही वाक्य से प्राप्त
हुआ। और उत्तरमीमांसा का नामही नहीं है; यदि 'माया-
वाद' शब्द से उसका नाम ग्रहण किया जाय तो उत्तर-
मीमांसा का प्रतिपाद्य मायावाद सिद्ध होगा, वह इष्ट नहीं है;
यदि स्वतन्त्र ग्रन्थ माना जाय तो इस नाम का धार्मिक ग्रन्थ
मिलना चाहिये; यदि मायावाद स्वतन्त्र विषय मानाजाय तो
विषयी ग्रन्थों की गणना में विषयमात्र का निर्देश विरुद्ध है;
यदि वक्ता के अभिप्राय से शाङ्कर-भाष्य मानलिया जावे तो
भी पद्मपुराण के कथनमात्र से वह अग्राह्य कथमपि नहीं हो
सकता और पूर्वमीमांसा की मान्यता के बारे में पराशर-
पुराण का वाक्य लिखा जा चुका है। विचार का विषय है
कि जब मायावाद, ब्रह्म जीवैक्य तथा नैर्गुण्य (निर्विशेषत्व)
आदि वेदान्त के विषय अद्वैतवाद के अनुयायी हैं और अद्वैत
वाद तथा मायावाद आदि, श्रुति-स्मृति-इतिहास-पुराण
संस्कृत-भाषा निबन्धों में परिपूर्ण रीति से कहे हैं तब उनका
अन्यान्य अभिप्राय है यह कहना वा इसके लिये प्रयत्न करना

११६ मनुस्मृति ।
आकाश में धूलिप्रक्षेप वा बीजवाप वा मुष्टिप्रकार के समान
गिना जाता है । और जो उक्त ग्रन्थों को तामस ठहराया है
वह उनकी पारिभाषिक संज्ञा है और जो पाहित्य कारणता
बतलाई है वह भी—
'शङ्खचक्रोर्ध्वपुण्ड्रादिरहितो ब्राह्मणाधमः ।
स जीवन्नेव चण्डालः सर्वधर्मबहिष्कृतः ॥'
इसके समान उनका हृद्योद्गार है । ऐसी दशा में उक्त
वाक्य पद्मपुराणीय हैं वा भविष्योत्तरखण्ड के समान
अनाकर हैं, यह विचारकों को उपायन किया जाता है ।
मायावाद—माया, अज्ञान, प्रकृति आदि नाम एकही
वस्तु के हैं वह सत् वा असत् रूप से निर्वचन करने योग्य नहीं
है इसीलिये अनिर्वचनीय कहलाती है । अनिर्वचनीय ख्याति
का प्रतिपादन गौड ब्रह्मानन्द प्रणीत ख्यातिवाद आदि ग्रन्थों
में है । उस अनिर्वचनीय-माया का विलास इन्द्रजाल आदि
दृष्टान्त से आध्यात्मिक प्रकरणों में कहा है । माया के संबन्धही
से वह निर्विशेष ब्रह्म 'मायी' कहलाता है 'जालवान्'
बतलाया जाता है; इस विषय में 'अस्मान् मायी सृजते विश्व-
मेतत्' 'य एको जालवानीशते' 'भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः'
इत्यादि श्रुति प्रसिद्ध हैं जिनके पूरे विचार होने के लिये
ग्रन्थान्तर की अपेक्षा है । यहां यह भी श्लोक द्रष्टव्य है—
'गुणानां परमं रूपं न दृष्टिपथमृच्छति ।
यत्तु दृष्टिपथं प्राप्तं तन्मायैव सुतुच्छकम् ॥'
योगसूत्रीय व्यासभाष्य.
'एवं बुद्ध्वा जगद्रूपं विष्णोर्मायामयं मृषा ।'
ब्रह्मपुराण.

भूमिका । ११७
' तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गो मृषा '
श्रीभागवत.
ऐसी दशा में जगत् को सत्य सिद्ध करने के लिये प्राति-
भासिक ( रज्जु सर्प-शुक्ति रजत-मरीचि सलिल ) वस्तुओं की
भी सत्यता साधन के वारे में श्रीभाष्यकारों के जो प्रतिवाद
भयंकर लेख हैं वे स्पृहणीय हैं। श्रीभाष्यकारों के प्रधानमूर्ति
शेष ने तो अपने परमार्थसार में यों कहा है—
' रज्ज्वां नास्ति भुजङ्गस्त्रासं कुरुते च मृत्युपर्यंतम् ।
भ्रान्तेर्महती शक्तिर्न विवेक्तुं शक्यते नाम ॥ '
जो ब्रह्मजिवैक्य—पूर्व्वलिखित प्रमाणों से शतधा सिद्ध
है तो भी अद्वैतानुरागियों के विनोदार्थ ये वचन लिखते हैं—
' राजसूनोः स्मृतिप्राप्तौ व्याधभावो निवर्तते ।
यथैवमात्मनोऽज्ञस्य तत्त्वमस्यादिवाक्यतः ॥ '
' ग्रहाविष्टो द्विजः कश्चिच्छूद्रोऽहमिति मन्यते ।
ग्रहनाशात्पुनः स्वीयं ब्राह्मएयं मन्यते यथा ॥
मायाविष्टस्तथा जीवो देहोऽहमिति मन्यते ।
मायानाशात्पुनः स्वीयं रूपं ब्रह्मास्मि मन्यते ॥ '
' आत्मा कर्त्रादिरूपश्चेन्माकाङ्क्षीस्तर्हि मुक्तताम् ।
नहि स्वभावो भावानां व्यावर्तेतौष्ण्यवद्रवेः ॥ '
' यद्यात्मा मलिनोऽस्वच्छो विकारी स्यात् स्वभावतः ।
नहि तस्य भवेन्मुक्तिर्जन्मान्तरशतैरपि ॥ '
' वस्तुस्थित्या न बन्धोऽस्ति तदभावान्न मुक्तता ।
विकल्पघटितावेतावुभावपि न किंचन ॥ '
सांख्यवृत्ति.

११८ मनुस्मृति ।
इत्यादि प्रमाणों से श्रीभाष्यकार श्रीरामानुजाचार्य के
निम्नलिखित लेख मान्य नहीं होसकते—
'यतो वाक्यादपरोक्षज्ञानासम्भवाद् वाक्यार्थज्ञानेनाविद्या न
निवर्तते, तत एव जीवन्मुक्तिरपि दूरोत्सारिता' एवमादि ।
नैर्गुण्य—आत्मा, सांख्य-योग और वेदान्तों में असकृत्
निर्गुण कहा है । जैसा—'निर्गुणत्वमात्मनोऽसङ्गादिति श्रुतेः।'
'असङ्गोऽयं पुरुष इति ।' इत्यादि.
श्रीरामानुजाचार्य नारायण के कलावतार थे यह इन वचनों
से ज्ञात होता है—
'यत्र मे लोककल्याणकारिणी परमा कला ।
द्विजरूपेण भविता या तु संकर्षणाभिधा ॥ ६६ ॥
द्वापरान्ते कलेरादौ पाखण्डप्रचुरे जने ।
रामानुज इति ख्याता विष्णुधर्मप्रवर्तिका ॥ ६७ ॥
श्रीरङ्गेश-दयापात्रं विद्धि रामानुजं मुनिम् ।
येन संदर्शितः पन्थां वैकुण्ठाख्यस्य सञ्जनः ॥ ६८ ॥
परमैकान्तिको धर्मो भवपाशविमोचकः ।
यत्रानन्यतया प्रोक्त आवयोः पादसेवनम् ॥ ६९ ॥
कालेनाच्छादितो धर्मो मदीयोऽयं वरानने ।
तदा मया प्रवृत्तोऽयं तत्कालोचितमूर्तिना ॥ ७० ॥
विष्वक्सेनादिभिर्भक्तैः शठारिप्रमुखैर्द्विजैः ।
रामानुजेन मुनिना कलौ संस्थापयिष्यते ॥ ७१ ॥
बृहद्ब्रह्मसंहिता-द्वितीयपाद.
और श्रीरामानुजाचार्य निर्णीत विशिष्टाद्वैत का नामो-
ल्लेख यों आया है—

भूमिका । ११६
' गुणिनस्तु गुणो यद्वद् गुणादेव गुणी यथा ।
एवं विशिष्टाद्वैतं हि श्रुतिस्मृत्युदितं नृप ॥ ८ ॥'
बृहद्ब्रह्मसंहिता-रुद्रगीता.
श्रीरामानुजाचार्य के विषय में कल्पक ने जो कुछ लिखा
है सो सब 'यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं' के न्याय से माननीय है,
परंतु द्वापरान्त और कलि के आदि में श्री ६ कृष्ण आदि की
सत्ता में मनुष्यों का विधर्मी होना तथा उसी समय में वा उस
के आसपास भी श्रीरामानुजाचार्य का अवतार लेना तथा
श्रीशठकोप आदि का उनसे भी पूर्व विराजमान रहना तथा
'श्रुतिस्मृत्युदित' इस लेख के अनुसार 'विशिष्टाद्वैत' शब्द
का आनुपूर्वीक न मिलना तथा वाल्मीकि-व्यास आदिकों के
वचनानुसार विशिष्टाद्वैत प्रतिपाद्य ब्रह्मजीवैक्य के निरूपण को
न पाना तथा अन्यान्य शङ्काओं का उठना-विचारशीलों के
सामने उक्त प्रमाणों को अप्रामाणिक ठहराता है।
श्रीरामानुजाचार्य जिनका दूसरा नाम लक्ष्मणाचार्य है,आपने
अपने श्रीभाष्य में विशिष्टाद्वैत वादसे अतिरिक्त जो श्रीमद्ध्वाचार्य
का द्वैतवाद, श्रीनिम्बार्काचार्यका द्वैताद्वैतवाद आदि हैं, उनका
खण्डन किया है परंतु वे भी पारम्परिक-वैष्णवसंप्रदायसे सिद्ध हैं।
१ विशिष्टं च विशिष्टं च विशिष्टे, विशिष्टयोरद्वैतं विशिष्टाद्वैतम् । अर्थात् अव्या-
कृत नामरूप विशिष्टचिदचित्, व्याकृत नामरूपविशिष्ट चिदचित् ।
२ 'कपर्दिमतकर्दमे कपिलकल्पनावागुरां दुरत्ययमतीत्य तद् द्रुहिणतन्त्रयन्त्रोदरम् ।
कुदृष्टिकुहनामुखे निपततः परब्रह्मणः करग्रहविचक्षणो जयति लक्ष्मणोऽयं मुनिः॥'
इति निगमन्तमहादेशिकाः ।
३ 'कलौ प्रवृत्ते बौद्धादिमतं रामानुजं तथा ।
शाके चैकोनपञ्चाशदधिकान्दसहस्रके १०४६ ॥
निराकर्तुं मुख्यवपुं सन्मतस्थापनाय च ।
एकादशशते शाके ११०० विंशत्यष्टयुगे गते ॥
अवतीर्णं मध्वगुरुं सदा वन्दे महागुणम् ॥' .इति माध्वाः ।