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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

दशवां अध्याय। ३८१

दशवां अध्याय। ३८१
निषादो मार्गवं सूते दासं नौकर्मजीविनम् ।
कैवर्त्तमिति यं प्राहुरार्यावर्त्तनिवासिनः ॥ ३४ ॥
मृतवस्त्रभृत्सु नारीषु गर्हितान्नाशनासु च ।
भवन्त्यायोगवीष्वेते जातिहीनाः पृथक् त्रयः ॥ ३५ ॥
कारावरो निषादात्तु चर्मकारः प्रसूयते ।
वैदेहिकान्ध्रमेदौ बहिर्ग्रामप्रतिश्रयौ ॥ ३६ ॥
चण्डालात्पाण्डुसोपाकस्त्वक्सारव्यवहारवान् ।
आहिण्डिको निषादेन वैदेह्यामेव जायते ॥ ३७ ॥
चण्डालेन तु सोपाको मूलव्यसनवृत्तिमान् ।
पुक्कस्यां जायते पापः सदा सज्जनगर्हितः ॥ ३८ ॥
निषादस्त्री तु चण्डालात्पुत्रमन्त्यावसायिनम् ।
श्मशानगोचरं सूते बाह्यानामपि गर्हितम् ॥ ३९ ॥
दस्यु से आयोगवी में 'सैरन्ध्र' जाति का पुत्र होता है । वह
दास न होकर भी केश सँभालना·हाथ-पैर दाबना वगैरह काम
करे और जाल से मृग आदि को पकड़े । वैदेह से आयोगवी स्त्री
में 'मैत्रेयक' जाति का पुत्र होता है । वह मधुरभाषी, सूर्योदय-स-
मय में घंटा आदि का शब्द करके राजा आदि भद्र पुरुषों की प्र-
शंसा का काम करे । निषाद, आयोगवी में मार्गव जाति का पुत्र
पैदा करता है वह दास भी कहाता है, नौका से जीविका करता
है और आर्यावर्त्तदेशनिवासी उसको 'कैवर्त्त' कहते हैं । इसी
प्रकार मृत मनुष्य वस्त्र पहननेवाली, क्ररस्वभाव, जूठने खाने
वाली आयोगवी में अपने पिता के भेद से अधम जातीय सैरन्ध्र,
मैत्रेय और मार्गवजाति के तीन पुत्र पैदा होते हैं । निषाद से
वैदेहीकन्या में कारावर जाति का पुत्र होता है, वह मोची का
काम करे । वैदेहिक से वैदेही में आंध्र और मेदजाति के पुत्र होते

[Header: ३८२ मनुस्मृति ।]

हैं वे गांव से बाहर रहें । चाण्डाल से वैदेही में पाण्डुसोपाक पैदा
होता है, वह वृक्षों की छाल से पंखा, सूप, आदि से जीविका
करे । निषाद से वैदेही में आहिण्डक, चाण्डाल से पुक्कसी में, सो-
पाक और चांडाल से निषादस्त्री में अन्त्यावसायी जाति के पुत्र
होते हैं । ये जल्लादी का काम करें, मरघटमें रहें । ये सब महादूषित
होते हैं ॥ ३२-३६ ॥

संकरे जातयस्त्वेताः पितृमातृप्रदर्शिताः ।
प्रच्छन्ना वा प्रकाशा वा वेदितव्याः स्वकर्मभिः॥४०॥
सजातिजानन्तरजाः षट् सुता द्विजधर्मिणः ।
शूद्राणां तु सधर्माणः सर्वेऽपध्वंसजाःस्मृताः ४१ ॥
तपो बीजप्रभावैस्तु ते गच्छन्ति युगे युगे ।
उत्कर्षं चापकर्षं च मनुष्येष्विह जन्मतः ॥ ४२ ॥
शनकैस्तु क्रियालोपादिमाः क्षत्रियजातयः ।
वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥ ४३ ॥
पौण्ड्रकाश्चौड्रद्रविडाः काम्बोजा यवनाः शकाः ।
पारदापह्लवाश्चीनाः किराता दरदाः खशाः ॥ ४४ ॥
मुखबाहूरुपज्जानां या लोके जातयो बहिः ।
म्लेच्छवाचश्चार्यवाचः सर्वे ते दस्यवः स्मृताः ॥ ४५ ॥
ये द्विजानामपसदा ये चापध्वंसजाः स्मृताः ।
ते निन्दितैर्वर्त्तेयुर्द्विजानामेव कर्मभिः ॥ ४६ ॥
सूतानामश्वसारथ्यमम्बष्ठानां चिकित्सनम् ।
वैदेहकानां स्त्रीकार्यं मागधानां वणिक्पथः ॥ ४७ ॥

इस प्रकार वर्णसंकरों की जातियां उनके माता-पिता के साथ