मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पांचवां अध्याय । १६६
पांचवां अध्याय । १६६
अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी ।
संस्कर्त्ता चोपहर्त्ता च खादकश्चेति घातकाः ॥ ५१ ॥
स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति ।
अनभ्यर्च्यपितॄन्देवांस्ततोऽन्योनास्त्यपुण्यकृत्॥५२॥
जो विधि छोड़कर, पिशाच के भांति मांस भक्षण नहीं करता
वह सबका प्रिय होजाता है। और रोगों से दुःखी नहीं होता है।
जिसकी राय से मारा जाता है, अङ्गों को काटकर अलग अलग
करनेवाला, मारनेवाला, खरीदनेवाला, बेचनेवाला, पकानेवाला,
परोसनेवाला और खानेवाला ये सब घातक-मारनेवाले होते हैं ।
जो पुरुष, देवता और पितरों का पूजन बिना किये, दूसरे के मांस
से अपना मांस बढ़ाना चाहता है, उससे बढ़कर कोई पाप करने
वाला नहीं है ॥ ४६-५२ ॥
वर्षे वर्षेऽश्वमेधेन यो यजेत शतं समाः ।
मांसानि च न खादेद्यस्तयोः पुण्यफलं समम् ॥ ५३ ॥
फलमूलाशनैर्मेध्यैर्मुन्न्यन्नानां च भोजनैः ।
न तत्फलमवाप्नोति यन्मांसपरिवर्जनात् ॥ ५४ ॥
मांसभक्षयितामुत्र यस्य मांसमिहाद्मयहम् ।
एतन्मांसस्य मांसत्वं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ५५ ॥
न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने ।
प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला ॥ ५६ ॥
जो सौ वर्ष तक प्रतिवर्ष अश्वमेध यज्ञ करता है और जो जन्म
भर मांस भक्षण नहीं करता, इन दोनों को समान पुण्य फल मि-
लता है। पवित्र फल, मूल और मुनि अन्नों के खाने से वह फल
नहीं मिलता जो मांस छोड़ने से प्राप्त होता है। इस लोक में जिस
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का मांस भक्षण मैं करता हूं 'सः' अर्थात् वह परलोक में 'मां'
अर्थात् मेरा भक्षण करेगा। यही 'मांस' शब्द का अर्थ विद्वानों
ने कहा है। मांस खाना, मद्य पीना और मैथुन इन कामों में मनुष्यों
की प्रवृत्ति स्वाभाविक हुआ करती है, इस कारण इनमें दोष नहीं
है। परन्तु इनको छोड़ देने से बड़ा पुण्य होता है ॥ ५३-५६ ॥
प्रेतशुद्धिं प्रवक्ष्यामि द्रव्यशुद्धिं तथैव च।
चतुर्णामपि वर्णानां यथावदनुपूर्वशः ॥ ५७ ॥
दन्तजातेऽनुजाते च कृतचूड़े च संस्थिते ।
अशुद्धा बान्धवाः सर्वे सूतके च तथोच्यते ॥ ५८ ॥
दशाशं शावमाशौचं सपिण्डेषु विधीयते ।
अर्वाक् संचयनादस्थ्नां त्र्यहमेकाहमेव च ॥ ५६ ॥
सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते ।
समानोदकभावस्तु जन्मनाम्नोरवेदने ॥ ६० ॥
आशौच-व्यवस्था ।
अब चारों वर्णों की सूतक व्यवस्था और धातु पात्रों की शुद्धि
को क्रम से कहते हैं। दांत निकल आये हों, या दांत निकलने के बाद
और चूड़ा कर्म होजाने पर मृत्यु होने से सब बान्धवों को अशुद्धि
और सूतक लगता है। सपिण्ड अर्थात् सात पुस्त तक मरणाशौच
दश दिन तक रहता है। किसी को अस्थि संचयन के पूर्व ॥५७-६०॥
यथेदं शावमाशौचं सपिण्डेषु विधीयते ।
जननेऽप्येवमेव स्यान्निपुणं शुद्धिमिच्छताम् ॥ ६१ ॥
सर्वेषां शावमाशौचं मातापित्रोस्तु सूतकम्।
सूतकं मातुरेव स्यादुपस्पृश्य पिता शुचिः ॥ ६२ ॥
निरस्य तु पुमान् शुक्रमुपस्पृश्यैव शुध्यति ।