मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पांचवां अध्याय। १८३
पांचवां अध्याय। १८३
आदि के मारे जीवों का भी मांस पवित्र होता है यह मनुजी
की आज्ञा है ॥ १३०-१३१॥
ऊर्ध्वं नाभेर्यानि खानि तानि मेध्यानि सर्वशः ।
यान्यधस्तान्यमेध्यानि देहाच्चैव मलाश्च्युताः॥१३२॥
मक्षिका विप्रुषश्छाया गौरश्वः सूर्यरश्मयः ।
रजो भूर्वायुरग्निश्च स्पर्शे मेध्यानि निर्दिशेत् ॥ १३३॥
विण्मूत्रोत्सर्गशुद्ध्यर्थं मृद्वार्यादेयमर्थवत् ।
दैहिकानां मलानां च शुद्धिषु द्वादशस्वपि ॥ १३४ ॥
वसाशुक्रमसृङ्मज्जामूत्रं विड् घ्राणकर्णविद् ।
श्लेष्माश्रु दूषिकास्वेदो द्वादशैते नृणां मलाः ॥१३५॥
जो इन्द्रियां नाभि के ऊपर हैं वे सब पवित्र हैं और जो नाभि
के नीचे हैं वे सब अशुद्ध हैं। देह से निकला मल सब अपवित्र हैं।
मक्खी, मुख से निकली जल की छींट, छाया, गौ, घोड़ा, सूर्य की
किरण, धूलि, भूमि, वायु और अग्नि इन सब का स्पर्श पवित्र
होता है। देह मल की शुद्धि के लिए उतनी मिट्टी और जल लेवे
जिसमें दुर्गन्ध आदि शुद्ध होजाय। चरबी, वीर्य, रुधिर, मज्जा,
मूत्र, विष्ठा, नाक-कान का मैल, खखार, आँसू, आँखों का मैल,
और पसीना ये बारह मनुष्यदेह के मल हैं ॥ १३२-१३५ ॥
एका लिङ्गे गुदे तिस्रस्तथैकत्र करे दश ।
उभयोः सप्त दातव्या मृदः शुद्धिमभीप्सता ॥१३६॥
एतच्छौचं गृहस्थानां द्विगुणं ब्रह्मचारिणाम् ।
त्रिगुणं स्याद्वनस्थानां यतीनां तु चतुर्गुणम् ॥ १३७॥
कृत्वा मूत्रं पुरीषं वा खान्याचान्त उपस्पृशेत् ।
१८४ मनुस्मृति।
वेदमध्येष्यमाणश्च अन्नमश्नंश्च सर्वदा ॥ १३८ ॥
त्रिराचामेदपः पूर्वं द्विः प्रमृज्यात्ततो मुखम् ।
शारीरं शौचमिच्छन् हि स्त्रीशूद्रस्तु सकृत्सकृत् ॥ १३९॥
मल और मूत्र का त्याग करने पर लिङ्ग और योनि को एक
बार, गुदा को तीन बार, वाम हाथ को दशवार, फिर दोनों हाथों
को सातवार मिट्टी से धोना चाहिए । यह आचार-शौच गृहस्थों
के लिए है । ब्रह्मचारियों को इससे दूना शौच करना चाहिए । वान-
प्रस्थ आश्रमवालों को तिगुना और संन्यासियों को चौगुना क-
रना चाहिए । मल-मूत्र करने के पीछे शुद्ध होकर, आचमन करे
और नेत्र वगैरह का जल से स्पर्श करे । वेदपाठ के आरम्भ में
और भोजन के समय में आचमन करे । पहले तीनबार आचमन,
फिर दोबार मुख धोवे स्त्री और शूद्र एकवारही जल से आचमन
करें। इस प्रकार शरीरशुद्धि होती है ॥ १३६-१३९ ॥
शूद्राणां मासिकं कार्यं वपनं न्यायवर्त्तिनाम् ।
वैश्यवच्छौचकल्पश्च द्विजोच्छिष्टं च भोजनम् ॥ १४०॥
नोच्छिष्टं कुर्वते मुख्या विप्रुषोऽङ्गे पतन्ति याः ।
न श्मश्रूणि गतान्यास्यान्न दन्तान्तरधिष्ठितम् ॥१४१॥
स्पृशन्ति बिन्दवः पादौ य आचामयतः परान् ।
भौमिकैस्ते समा ज्ञेया न तैराप्रयतो भवेत् ॥ १४२॥
उच्छिष्टेन तु संस्पृष्टो द्रव्यहस्तः कथञ्चन ।
अनिधायैव तद्द्रव्यमाचान्तः शुचितामियात् ॥ १४३॥
वान्तो विरिक्तः स्नात्वा तु घृतप्राशनमाचरेत् ।
आचामेदेव भुक्त्वाऽन्नं स्नानं मैथुनिनः स्मृतम्॥१४४॥
सुप्त्वा श्रुत्वा च भुक्त्वा च निष्ठीव्योक्त्वानृतानि च ।