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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

तृतीयिनस्तृतीयांशाश्चतुर्थांशाश्च पादिनः ॥ २१० ॥

३८२ मनुस्मृति ।
रथं हरेत वाध्वर्युर्ब्रह्माधाने च वाजिनम् ।
होता वापि हरेदश्वमुद्गाता चाप्यनःक्रये ॥ २०६ ॥
सर्वेषामर्थिनो मुख्यास्तदर्धेनार्थिनोऽपरे ।
तृतीयिनस्तृतीयांशाश्चतुर्थांशाश्च पादिनः ॥ २१० ॥
संभूय स्वानि कर्माणि कुर्वद्भिरिह मानवैः ।
अनेन विधियोगेन कर्तव्यांशप्रकल्पना ॥ २११ ॥
आधान आदि कर्मों के जिन अङ्गों की जो दक्षिणा हों उनको
कर्म करानेवाले अलग अलग लें अथवा बाँट लेवें। आधान में रथ
अध्वर्यु, घोड़ा ब्रह्मा या होता लेवे और सोम खरीदकर गाड़ी
में आया हो तो गाड़ी उद्गाता पावे । यज्ञ के सोलह ऋत्विजों में
होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा ये चार मुख्य ऋत्विज् पूर्ण
दक्षिणा में आधी के अधिकारी हैं-४८ गौ देवे। दूसरे, मैत्रावरुण
आदि चार को उसका आधा-२४ गौ, तीसरे अच्छावाक् आदि
चार को तृतीयांश-१६ गौ और चौथे ग्रावस्तुत आदि को चतु-
र्थांश-१२ गौ देय । इस प्रकार सोलह ऋत्विज् मिलकर कर्म करें
तो अपना अपना भाग बाँट लेवें ॥ २०८-२११ ॥
धर्मार्थं येन दत्तं स्यात्कस्मैचिद्याचते धनम् ।
पश्चाच्च न तथा तत्स्यान्न देयं तस्य तद्भवेत् ॥ २१२ ॥
यदि संसाधयेत्तत्तु दर्पाल्लोभेन वा पुनः ।
राज्ञा दाप्यः सुवर्णं स्यात्तस्य स्तेयस्य निष्कृतिः॥२१३॥
दत्तस्यैषोदिता धर्म्या यथावदनपकिया ।
अतऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वेतनस्यानपक्रियाम् ॥ २१४ ॥
. किसी याचक को धर्मार्थ किसी ने कुछ देना कहा हो पर वह
कर्म न करे तो उसको प्रतिज्ञात धन न देवे । जो याचक गर्व या