मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
आठवां अध्याय । २७९
आठवां अध्याय । २७९
यत्किञ्चिद्दशवर्षाणि सन्निधौ प्रेक्षते धनी ।
भुज्यमानं परैस्तूष्णीं न स तल्लब्धुमर्हति ॥ १४७ ॥
भूमि, गौ, धन आदि भोग के पदार्थ यदि आधि-गिरवी महा-
जन के रक्खे तो महाजन को व्याज न मिले और नियमित समय
में ऋणी छुड़ा न सके तो उसको महाजन बेंच या किसीको दे
नहीं सकता । आधि-गिरवी की वस्तु को ऋणी की आज्ञा बिना
न वर्ते यदि काम में लावे तो व्याज छोड़ देवे और टूट फूटजाय तो
ऋणीको उसका बदला धन आदि देकर खुशकरे नहीं तो चोर माना
जाता है । आधि-गिरवी और उपनिधि-अमानत के पदार्थ बहुत
दिन पड़े रहें तो भी अवधि नहीं बीत जाती । जब मालिक चाहे
तभी ले सकता है । गौ, ऊँट, घोड़ा वगैरह किसीने प्रेम से वर्तने को
दिए हों और वह वर्तता हो तो भी उसके मालिक का हक बना
रहता है । यदि किसी वस्तु को दूसरे लोग दश वर्ष तक वर्तते
रहें और उसका मालिक चुपचाप देखाकरे, तो फिर वह उसको
नहीं पासकता ॥ १४३-१४७ ॥
अजडश्चेदपौगण्डो विषये चास्य भुज्यते ।
भग्नं तद्व्यवहारेण भोक्ता तद्द्रव्यमर्हति ॥ १४८ ॥
आधिः सीमा बालधनं निक्षेपोपनिधिः स्त्रियः ।
राजस्वं श्रोत्रियस्वं च नं भोगेन प्रणश्यति ॥ १४६ ॥
यः स्वामिनाऽननुज्ञातमाधिं भुङ्क्ते विचक्षणः ।
तेनार्धवृद्धिर्मोक्तव्या तस्य भोगस्य निष्कृतिः ॥१५०॥
वस्तु का स्वामी पागल न हो और नादान न हो पर उसका वस्तु
दूसरा भोगता रहे तो न्याय से उसका अधिकार नहीं रहता ।
भोगनेवाला पाजाता है । गिरवी वस्तु, सीमा, बालक का धन,
धरोहर, प्रसन्नता से भोगार्थ दिया धन, स्त्री और राजा का धन,
२७२ मनुस्मृति ।
श्रोत्रिय का धन इनको दूसरा भोगे तो भी स्वामी का अधिकार
नहीं जाता । जो चालाक मनुष्य आधि को बिना स्वामी के कहे
भोगता है उसको आधा ब्याज छोड़ देना चाहिए क्योंकि उसका
आधा भोग से पट गया ॥ १४८-१५० ॥
कुसीदवृद्धिद्वैगुण्यं नात्येति सकृदाहता ।
धान्ये सदे लवे वाह्ये नातिक्रामति पञ्चताम् ॥ १५१ ॥
कृतानुसारादधिका व्यतिरिक्ता न सिध्यति ।
कुसीदपथमाहुस्तं पञ्चकं शतमर्हति ॥ १५२ ॥ –
नातिसांवत्सरीं वृद्धिं न चादृष्टां पुनर्हरेत् ।
चक्रवृद्धिः कालवृद्धिः कारिता कायिका च या ॥१५३॥
ऋणं दातुमशक्तो यः कर्त्तुमिच्छेत्पुनः क्रियाम् ।
स दत्त्वा निर्जितां वृद्धिं करणं परिवर्तयेत् ॥ १५४ ॥
अदर्शयित्वा तत्रैव हिरण्यं परिवर्तयेत् ।
यावती संभवेद्वृद्धिस्तावतीं दातुमर्हति ॥ १५५ ॥
कर्ज़ा के रुपयों का सूद एकबार लेने पर, ऋण का धन दूने से
अधिक नहीं लिया जा सकता । और धान्य, वृक्ष के मूल, फल,
ऊन और वाहन पांचगुने से अधिक नहीं लिये जाते हैं । जो सूद
का ठहराव हो चुका है उससे अधिक शास्त्र के खिलाफ़ नहीं मिल
सकता है । ब्याज का क़ायदा यही है कि-अधिक से अधिक
पांच रुपये सैकड़ा लिया जा सकता है । एक वर्ष में ब्याज मिला-
कर, मूल धन दूना हो जाय तो उतना ब्याज न लेय 'व्याज का
ब्याज न लेय' नियतकाल बीतने पर दूना तिगुना आदि लेने का
ठहराव न करे और उससे कोई काम धोखा देकर न करावे । जो
कर्ज़दार पुराना कर्ज़ा अदा न करसके और नया व्यवहार चलाना
चाहे तो पुराने काग़ज़ को बदलाकर नया करा लेवे । लेकिन