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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 580 of 649

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Page 580

४४० । मनुस्मृति ।

इत्यादि आठ ऋचा और पुरुषसूक्त का एक मास नित्य पाठ
करने से गुरुपत्नी संभोग का पाप दूर हो जाता है। महापातक
और उपपातकों को दूर करने के लिए 'अव ते हेड़ वरुण०'
इत्यादि ऋचा, अथवा 'यत्किञ्चेदं वरुण दैव्ये जने०' इत्यादि
ऋचाका एक वर्ष तक जप करे। प्रतिग्रह के अयोग्य का लेने और
निंदित अन्न के भोजन का पाप, 'तरत्समन्दिधावति०' इत्यादि
चार मंत्र का पाठ तीन दिन करने से दूर होता है ॥ २४८-२५४ ॥

सोमारौद्रं तु बहेना मासमभ्यस्य शुद्धयति ।
स्रवन्त्यामाचरन्स्नानमर्यम्णामिति चऋचम्॥२५५॥
अब्दार्धमिन्द्रमित्येतदेनस्वी सप्तकं जपेत् ।
अप्रशस्तं तु कृत्वाप्सु मासमासीत भैक्षभुक्॥२५६॥
मन्त्रैः शाकलहोमीयैरब्दं हुत्वा घृतं द्विजः ।
सुगुर्वप्यपहन्त्येनो जप्त्वा वा नम इत्यृचम् ॥२५७ ॥
महापातकसंयुक्तोऽनुगच्छेद्गाः समाहितः ।
अभ्यस्याब्दं पावमानीर्भैक्षाहारो विशुद्ध्यति ॥२५८॥
अरण्ये वा त्रिरभ्यस्य प्रयतो वेदसंहिताम् ।
मुच्यते पातकैः सर्वैः पराकैः शोधितास्त्रिभिः ॥ २५६ ॥
त्र्यहं तूपवसेद्युक्तस्त्रिरह्नोऽभ्युपयन्नपः ।
मुच्यते पातकैः सर्वैस्त्रिर्जपित्वाऽघमर्षणम् ॥ २६० ॥

अधिक पाप करनेवाला नदी में स्नान करके 'सोमा रुद्रा
धारयेथा०' इत्यादि और 'अर्यमणं वरुणं मित्रं०' इत्यादि तीन
ऋचाओंका एक मास तक नित्य पाठ करे तो शुद्ध होता है।
पापी पुरुष, छः मास तक, 'इन्द्रं मित्रं वरुणमग्नि०' इत्यादि सात
ऋचा का नित्य पाठ करे और जल में मल-मूत्र डालनेवाला एक