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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पहला अध्याय ।

श्रीगणेशाय नमः ।
मनुस्मृति ।
पहला अध्याय ।
मनुमेकाग्रमासीनमभिगम्य महर्षयः ।
प्रतिपूज्य यथान्यायमिदं वचनमब्रुवन् ॥ १ ॥
भगवन् सर्ववर्णानां यथावदनुपूर्वशः ।
अन्तरप्रभवानाञ्च धर्मान्नो वक्तुमर्हसि ॥ २ ॥
त्वमेको ह्यस्य सर्वस्य विधानस्य स्वयंभुवः ।
अचिन्त्यस्याप्रमेयस्य कार्यतत्त्वार्थवित्प्रभो ॥ ३ ॥
स तैः पृष्टस्तथा सम्यगमितौजा महात्मभिः ।
प्रत्युवाचार्च्य तान्सर्वान्महर्षीञ्छ्रूयतामिति ॥ ४ ॥
ॐ नमः शिवाय ।
पहला अध्याय ।
महर्षियों ने एकाग्रचित्त बैठे हुए मनु महाराज के पास जाकर
और उनका पूजन करके, विधिपूर्वक यह प्रश्न किया—हे भगवन् !
आप सब ब्राह्मण आदि वर्णों के और सङ्कीर्ण जातियों के वर्णाश्रम-
धर्म क्रम से कहने में समर्थ हैं, इस लिये हमलोगों को उपदेश क-
रिए । आप सब वैदिक श्रौत-स्मार्त्त कर्मों के अगाध और अनन्त
विषयों के एकही जानने वाले हैं ॥ १-३ ॥ इस प्रकार महर्षियों
के विनयपूर्वक प्रश्नों को सुनकर, महात्मा मनु ने, सब का आदर
करके कहा-अच्छा सुनो ॥ ४ ॥

२ मनुस्मृति।
आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम्।
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः॥ ५॥
ततः स्वयम्भूर्भगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम्।
महाभूतादिवृत्तौजाः प्रादुरासीत्तमोनुदः॥ ६॥
योऽसावतीन्द्रियग्राह्यः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः।
सर्वभूतमयोऽचिन्त्यः स एव स्वयमुद्बभौ॥ ७॥
सोऽभिध्याय शरीरात्स्वात्सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः।
अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत्॥ ८॥
तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम्।
तस्मिञ्जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः॥ ६॥
जगत् की सृष्टि।
यह संसार अपनी उत्पत्ति के पूर्व अन्धकारमय था † अज्ञात था,
इसका कोई लक्षण न था *। किसी अनुमान से जानने लायक़ न
था। चारों तरफ़ से मानो सोया हुआ था। इस महाप्रलय स्थिति
के अनन्तर, सृष्टि के आरम्भ में, पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश
आदि विश्वको सूक्ष्मरूप से, स्थूलरूप में प्रकट करनेकी इच्छा से
अतीन्द्रिय, महासूक्ष्म, नित्य, विश्वव्यापक, अचिन्त्य परमात्मा ने,
अपने को जाहिर किया। अर्थात् महत्तत्त्व आदि की उत्पत्ति द्वारा
अपनी शक्ति को संसार में प्रकट किया। उसके बाद नानाविध
प्रजासृष्टिकी इच्छा से, पूर्व जलसृष्टि करके, उसमें अपना शक्ति-
रूप बीज स्थापित किया॥ ५-८॥ वह बीज ईश्वरेच्छा से, सूर्य के
समान चमकीला सुवर्ण कासा गोला ‡ होगया। उसमें संपूर्ण
विश्व के पितामह स्वयं ब्रह्मा का प्रादुर्भाव हुआ॥ ६॥
† श्रुति है 'तम आसीत् तमसा गूढमग्रे इति।'

  • श्रुति है 'तद्धीदन्तर्ह्यव्याकृतमासीत्।' छान्दोग्य श्रुति है 'सदेव सौम्येदमग्र आसीत्।'
    ‡ इसी अण्ड से हिरण्यगर्भ नामसे परमात्मा का प्रादुर्भाव हुआ है। वैदिक श्रुतीभी
    है:- 'हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। सदाधारपृथिवीं द्यामुतेमाम्।'