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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

नवां अध्याय । ३६७

नवां अध्याय । ३६७
के ऊपर किया गया हो वह न सरे, वशीकरण, उच्चाटन आदि से
कोई काम न सिद्ध हो तो उस पर दो सौ पण दण्ड करे । खराब
बीजों को बेंचनेवाला या अच्छे में बुरा मिलाकर बेंचनेवाला और
हद तोड़नेवाले को अंगच्छेद का दण्ड देय ॥ २८४-२६१ ॥
सर्वकण्टकपापिष्ठं हेमकारं तु पार्थिवः ।
प्रवर्त्तमानमन्याये छेदयेल्लवशः क्षुरैः ॥ २६२ ॥
सीताद्रव्यापहरणे शस्त्राणामौषधस्य च ।
कालमासाद्य कार्यं च राजा दण्डं प्रकल्पयेत्॥ २६३॥
सब चोरों में महापापी सुनार यदि कोई दुराचार करे तो
उसको चाकू से टुकड़े टुकड़े करवादे । खेती के हल, कुदाल
आदि शस्त्र और औषध चुराने पर राजा समयानुसार दण्ड
करे ॥ २६२-२६३ ॥
स्वाम्यमात्यौ पुरं राष्ट्रं कोशदण्डौ सुहृत्तथा ।
सप्तप्रकृतयो ह्येताः सप्ताङ्गं राज्यमुच्यते ॥ २६४ ॥
सप्तानां प्रकृतीनां तु राज्यस्यासां यथाक्रमम् ।
पूर्वं पूर्वं गुरुतरं जानीयाद्व्यसनं महत् ॥ २६५ ॥
सप्ताङ्गस्येह राज्यस्य विष्टब्धस्य त्रिदण्डवत् ।
अन्योन्यगुणवैशेष्यान्न किञ्चिदतिरिच्यते ॥ २६६ ॥
तेषु तेषु तु कृत्येषु तत्तदङ्गं विशिष्यते ।
येन यत्साध्यते कार्यं तत्तस्मिन् श्रेष्ठमुच्यते॥ २६७॥
चारेणोत्साहयोगेन क्रिययैव च कर्मणाम् ।
स्वशक्तिं परशक्तिं च नित्यं विद्यान्महीपतिः ॥२६८ ॥
पीडनानि च सर्वाणि व्यसनानि तथैव च ।

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३६८ मनुस्मृति ।

आरभेत ततः कार्यं संचिन्त्य गुरुलाघवम् ॥ २६६ ॥
राजा, मन्त्री, राज्य, देश, खजाना, दण्ड और मित्र, राज्य-शक्ति ये सात
प्रकृतियों में क्रम से पहली से अगली अगली श्रेष्ठ है । इसलिए पहले
अङ्ग की हानि होने से आगे के अङ्ग पर बड़ा दुःख आपड़ता है ।
जैसे तीन दण्ड, एक दूसरे के आधार पर रुके रहते हैं, वैसे सात
अङ्गवाला राज्य भी प्रत्येक अङ्गके आधार पर टिका रहता है।
प्रत्येक अङ्ग अपनी विशेषता से समान हैं। जिससे जो काम सधता है
उसमें वही श्रेष्ठ कहा जाता है । राजा नित्य दूतों के द्वारा सेनाको
उत्साह देवे, सब कार्यों को ठीक रक्खे अपने और शत्रुकी शक्तिको
जाना करे । सब प्रकार की पीड़ा और व्यसनों का गौरव-लाघव
विचार कर कार्य का आरम्भ करे ॥ २६४-२६६ ॥
आरभेतैव कर्माणि श्रान्तः श्रान्तः पुनः पुनः ।
कर्माण्यारहमाणं हि पुरुषं श्रीर्निषेवते ॥ ३०० ॥
कृतं त्रेतायुगं चैव द्वापरं कलिरेव च ।
राज्ञो वृत्तानि सर्वाणि राजा हि युगमुच्यते ॥ ३०१ ॥
कलिः प्रसुप्तो भवति स जाग्रद्द्वापरं युगम् ।
कर्मस्वभ्युद्यतस्त्रेता विचरंस्तु कृतं युगम् ॥ ३०२ ॥
इन्द्रकार्यस्य वायोश्च यमस्य वरुणस्य च ।
चन्द्रस्याग्नेः पृथिव्याश्च तेजोवृत्तं नृपश्चरेत् ॥ ३०३॥
राजा राज्यवृद्धि के कार्यों को धीरे धीरे करताही रहे । क्योंकि
कर्म करनेवाले को ही लक्ष्मी प्राप्त होती है । सत्ययुग, त्रेतायुग,
द्वापरयुग और कलियुग, सब राजा के कार्यों पर हीं आधार रखते
हैं क्योंकि राजा ही भले-बुरे समय का कारण है-युगस्वरूप
है । जब राजा आलस्य, निद्रा में समय बितावे तो कलियुग, जब
सावधानी से राज्य करे तो द्वापर, जब अपने कार्यों में लगा रहे
तब त्रेता और जब शास्त्रानुसार कर्मों का संपादन करे तब सत्ययुग