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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 578 of 649

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Page 578

४३८ मनुस्मृति ।
स्थावराणि च भूतानि दिवं यान्ति तपोबलात्॥२४१॥
यत्किञ्चिदेनः कुर्वन्ति मनोवाङ्‌मूर्त्तिभिर्जनाः ।
तत्सर्वं निर्दहन्त्याशु तपसैव तपोधनाः ॥ २४२ ॥
तपसैव विशुद्धस्य ब्राह्मणस्य दिवौकसः ।
इज्याश्च प्रतिगृह्णन्ति कामान् संवर्धयन्ति च॥२४३॥
प्रजापतिरिदं शास्त्रं तपसैवासृजत् प्रभुः ।
तथैव वेदानृषयस्तपसा प्रतिपेदिरे ॥ २४४ ॥
इत्येतत्तपसो देवा महाभाग्यं प्रचक्षते ।
सर्वस्यास्य प्रपश्यन्तस्तपसः पुण्यमुत्तमम् ॥ २४५ ॥
वेदाभ्यासोऽन्वहं शक्त्या महायज्ञक्रिया क्षमा ।
नाशयन्त्याशु पापानि महापातकजान्यपि ॥ २४६ ॥
यथैधस्तेजसा वह्निः प्राप्तं निर्दहति क्षणात् ।
तथा ज्ञानाग्निना पापं सर्वं दहति वेदवित् ॥ २४७ ॥
कीट, सर्प, पतंग, पशु, पक्षी और स्थावर प्राणी भी तपोबल
से स्वर्ग को जाते हैं। मनुष्य मन, वाणी और शरीर से जो कुछ
पाप करते हैं उन सब को तपोधन ऋषि तप से शीघ्र ही भस्म
करदेते हैं। तप से शुद्ध ब्राह्मण के यज्ञबलि को देवता ग्रहण करते
हैं और कामनाओं को पूर्ण करते हैं। तपोबल से ही प्रजापति ने
इस शास्त्र को रचाथा और ऋषियों ने वेद भी तप से पाया था।
सब प्राणियों का तप से उत्तम योनि में जन्म होता है यह देख
कर देवगण तप का माहात्म्य करते हैं। प्रतिदिन वेदाध्ययन,
पञ्चमहायज्ञों का अनुष्ठान, अपराध सहन ये महापातक के भी
पापों का शीघ्र नाश कर देते हैं। जैसे अग्नि तेज से ईंधन को
जला देता है वैसे वेदविशारद, ज्ञानरूपी अग्नि से सब पाप को
जला देता है ॥ २४१-२४७ ॥