मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
चौथा अध्याय । १२३
चौथा अध्याय । १२३
चाहिए। दिन में उत्तर दिशा और रात में दक्षिण दिशा को मुख
करके मल-मूत्र करना चाहिए। दिन हो या रात हो, छांया में,
अंधेरा में या जहां प्राण का भय हो, तब जिस दिशा में इच्छा हो
उसी तरफ़ मुख कर सकता है ॥ ४८-५१ ॥
प्रत्यग्निं प्रतिसूर्यं वा प्रतिसोमोदकद्विजान् ।
प्रतिगां प्रतिवातं च प्रज्ञा नश्यति मेहतः ॥ ५२ ॥
नाग्निं मुखेनोपधमेन्नग्नां नेक्षेत च स्त्रियम् ।
नामेध्यं प्रक्षिपेदग्नौ न च पादौ प्रतापयेत् ॥ ५३ ॥
अधस्तान्नोपद्ध्याच्च न चैनमभिलङ्घयेत् ।
न चैनं पादतः कुर्यान्न प्राणाबाधमाचरेत् ॥ ५४ ॥
जो गृहस्थ अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, जल, ब्राह्मण, गौ और वायु
के संमुख होकर मल-मूत्र करता है, उसकी बुद्धि बिगड़ जाती है।
अग्नि को मुख से फूँकना और नंगी स्त्री को देखना अनुचित है।
अग्नि में कोई अपवित्र चीज़ डालना और पैर के तलवा को उसमें
सेंकना न चाहिए। खाट के नीचे आग रखना, उसको उलांघ
कर जाना और पैर के नीचे दबाना न चाहिए। जिसमें प्राणबाधा
का भय हो ऐसा परिश्रम न करना चाहिए ॥ ५२-५४ ॥
नाश्नीयात्सन्धिवेलायां न गच्छेन्नापि संविशेत् ।
न चैव प्रलिखेद्भूमिं नात्मनोपहरेत् स्रजम् ॥ ५५ ॥
नाप्सु मूत्रं पुरीषं वा ष्ठीवनं वा समुत्सृजेत् ।
अमेध्यलिप्तमन्यद्वा लोहितं वा विषाणि वा ॥ ५६ ॥
नैकः स्वपेच्छून्यगेहे शयानं न प्रबोधयेत् ।
नोदक्ययाभिभाषेत यज्ञं गच्छेन्न चावृतः ॥ ५७ ॥
सायंकाल और प्रातःकाल भोजन, एक गाँव से दूसरे गाँव को
जाना और सोना न चाहिए। ज़मीन नख से लिखना और गले
१२४ मनुस्मृति।
में से खुदही अपनी माला निकालना न चाहिए। मूत्र, मल, थूक,
जिस वस्तु में अपवित्र कुछ लगा हो और ज़हर इन सब को जल
में न डालना चाहिए। सूने घर में अकेला सोना, अपने से बड़े
को उपदेश देना, रजस्वला स्त्री से बातचीत करना और बिना
निमन्त्रण यज्ञ में जाना यह सब अनुचित है॥ ५५-५७॥
अग्न्यगारे गवां गोष्ठे ब्राह्मणानां च सन्निधौ ।
स्वाध्याये भोजने चैव दक्षिणं पाणिमुद्धरेत् ॥ ५८ ॥
नावारयेद् गां धयन्तीं न चाचक्षीत कस्यचित्।
न दिवीन्द्रायुधं दृष्ट्वा कस्यचिद्दर्शयेद्बुधः ॥ ५६ ॥
नाधार्मिके वसेद्ग्रामे न व्याधिबहुले भृशम् ।
नैकः प्रपद्येताध्वानं न चिरं पर्वते वसेत् ॥ ६० ॥
न शूद्रराज्ये निवसेन्नाधार्मिकजनावृते ।
न पाखण्डिगणाक्रान्ते नोपसृष्टेऽन्त्यजैर्नृभिः ॥ ६१ ॥
अग्निस्थान, गोशाला, ब्राह्मण के पास, स्वाध्याय के समय और
भोजन के समय दाहना हाथ बाहर करलेना चाहिए। बच्चे को
दूध पिलाती गौ को देखकर उसको हटाना नहीं और न किसी
से कहना। और आकाश में इन्द्रधनुष् देखकर किसीको दिखाना
न चाहिए। जहां अधर्मी रहते हों ऐसे ग्राम में और जहां रोग फैला
हो, उसमें न रहना। अकेला दूरदेश की यात्रा न करे और पर्वत के
ऊपर बहुत दिनतक निवास न करना चाहिए शूद्रके राज्य में बसना
न चाहिए और अधर्मी, पाखण्डी तथा चाण्डाल सेवित ग्राम आदि
में न रहना चाहिए ॥ ५८-६१ ॥
न भुञ्जीतोद्धृतस्नेहं नातिसौहित्यमाचरेत् ।
नातिप्रगे नातिसायं न सायं प्रातराशितः ॥ ६२ ॥
न कुर्वीत वृथा चेष्टां न वार्यञ्जलिना पिवेत्।
नोत्सङ्गे भक्षयेद्भक्ष्यान्न जातु स्यात्कूतूहली ॥ ६३ ॥
न नृत्येदथवा गायेन्न वादित्राणि वादयेत् ।
नास्फोटयेन्न च श्वेडेन्न च रक्तो विरावयेत् ॥ ६४ ॥
जिस वस्तु से चिकनापन निकला हो उसको न खाना और
बहुत घबड़ाहट से भोजन न करना। बहुत सुबह और साम को
भी भोजन न करना, और जिसने सुबह भोजन कर लिया हो
वह साम को भोजन न करे। मुख, हाथ, पाँव से व्यर्थ चेष्टा न
करना। अञ्जुली से पानी पीना, गोद में अन्न रखकर खाना और
बिना मतलब दूसरे की बातों को जानने की आदत रखना, नाचना,
गाना, बजाना, किसी चीज़ को ठोंकना, ज्यादा हँसना, खुशी से
ज्यादा चिल्लाना-यह सब काम न करना चाहिए ॥ ६२-६४ ॥
न पादौ धावयेत्कांस्ये कदाचिदपि भाजने ।
न भिन्नभाण्डे भुञ्जीत न भावप्रतिदूषिते ॥ ६५ ॥
उपानहौ च वासश्च धृतमन्यैर्न धारयेत् ।
उपवीतमलङ्कारं स्रजं करकमेव च ॥ ६६ ॥
नाविनीतैर्व्रजेद्धुर्यैर्न च क्षुद्व्याधिपीडितैः ।
न भिन्नशृङ्गाक्षिकुरैर्न बालधिविरूपितैः ॥ ६७ ॥
विनीतैस्तु व्रजेन्नित्यमाशुगैर्लक्षणान्वितैः ।
वर्णरूपोपसंपन्नैः प्रतोदेनातुदन् भृशम् ॥ ६८ ॥
कांस के बर्तन में पैर धोना, फूटे पात्र व जिसमें संदेह हो, उस
में भोजन न करना । दूसरे के पहनेहुए जूता, कपड़ा, जनेऊ,
गहना, फूल की माला और कमण्डलु को धारण न करना । जो
बैल सीधा हो, भूखा न हो, सींग, आँख, खुर ठीक हो, पूंछ वगै-
रह कटजाने से खराब न दीखता हो। ऐसे बैल की सवारी में
बैठना चाहिए । जो सधगये हों, तेज हों, सुन्दर हों, उनकी
सवारी में बैठना और ज्यादा हाँकना व मारना न चाहिए ॥६५-६८॥
१२६ मनुस्मृति ।
बालातपः प्रेतधूमो वर्ज्यं भिन्नं तथासनम् ।
न छिन्द्यान्नखलोमानि दन्तैर्नोत्पाटयेन्नखान् ॥ ६९ ॥
न मृल्लोष्ठं च मृद्नीयान्न छिन्द्यात्करजैस्तृणम् ।
न कर्म निष्फलं कुर्यान्नायत्यामसुखोदयम् ॥ ७० ॥
लोष्ठमर्दी तृणच्छेदी नखखादी च यो नरः ।
स विनाशं व्रजत्याशु सूचकोऽशुचिरेव च ॥ ७१ ॥
न विगर्ह्य कथां कुर्याद्वहिर्माल्यं न धारयेत् ।
गवां च यानं पृष्ठेन सर्वथैव विगर्हितम् ॥ ७२ ॥
प्रातःकाल का धूप, चिताका धूम, और फटा आसन इनको
बचाना चाहिए । नख और बालों को उखाड़ना और दांतों से नख
का काटना अच्छा नहीं है । मिट्टीके टुकड़ों को हाथ से न तोड़े, नख
से तिनुका न तोड़े और जिसका नतीजा खराब हो ऐसा काम न
करे । जो मनुष्य ढेला तोड़ता है, तृण तोड़ता है, नख चबाता है,
चुगली खाता है और भीतर-बाहर से मलिन रहता है वह शीघ्र
नष्ट होजाता है । निन्दाकी कोई कथा न करें, वस्त्र के ऊपर फूल-
माला न पहने और गौ की पीठपर बैठकर कहीं न जावे ॥६९-७२॥
अद्वारेण च नातीयाद् ग्रामं वा वेश्म वा वृतम् ।
रात्रौ च वृक्षमूलानि दूरतः परिवर्जयेत् ॥ ७३ ॥
नाक्षैः क्रीडेत् कदाचित्तु स्वयं नोपानहौ हरेत् ।
शयनस्थो न भुञ्जीत न पाणिस्थं न चासने ॥ ७४ ॥
सर्वं च तिलसम्बद्धं नाद्यादस्तमिते रवौ ।
न च नग्नः शयीतेह न चोच्छिष्टः क्वचिद्व्रजेत् ॥ ७५ ॥
जो गाँव का रास्ता हो उसको छोड़कर किसी खराब गली से
उसमें न घुसना और जो घर बन्द हो उसमें सीढ़ी आदि लगाकर