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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

ग्यारहवां अध्याय । ४०५

ग्यारहवां अध्याय । ४०५
तेषां सततमज्ञानां वृषलाग्न्युपसेविनाम् ।
पदा मस्तकमाक्रम्य दाता दुर्गाणि संतरेत् ॥ ४३ ॥
अकुर्वन् विहितं कर्म निन्दितं च समाचरन् ।
प्रसञ्जंश्चेन्द्रियार्थेषु प्रायश्चित्तीयते नरः ॥ ४४ ॥
अकामतः कृते पापे प्रायश्चित्तं विदुर्बुधाः ।
कामकारकृतेऽप्याहुरेके श्रुतिनिदर्शनात् ॥ ४५ ॥
अकामतः कृतं पापं वेदाभ्यासेन शुद्ध्यति ।
कामतस्तु कृतं मोहात्प्रायश्चित्तैः पृथग्विधैः ॥ ४६ ॥
अग्निहोत्री ब्राह्मण यदि जान-बूझकर दोनों काल हवन न करे
तो एक मास चान्द्रायण करे। क्योंकि अग्निहोत्र का होम लोप
करना पुत्रहत्या के समान है । जो ब्राह्मण शूद्र से धन लेकर
अग्निहोत्र की उपासना करते हैं वे शूद्र ऋत्विज् हैं और वेदपा-
ठियों में निंदित होते हैं । शूद्रधन से अग्निउपासना करनेवाले
मूर्ख ब्राह्मणों के मस्तक पर धनदाता-शूद्र पैर रखकर परलोक
में संकटों को तरजाता है। शास्त्रोक्त कर्मों को न करने और दूषित
कर्मों को करने से और विषयों में आसक्ति से मनुष्य प्रायश्चित्त
लायक होता है। अनजान में पाप करने पर विद्वानों ने प्रायश्चित्त
कहा है । कोई श्रुतिप्रमाण से जानकर पाप करने पर प्रायश्चित्त
का विधान कहा है। अज्ञान से किया पाप वेदाभ्यास से शुद्ध
होता है । और ज्ञान से किया पाप विविध प्रायश्चित्तों से शुद्ध
होता है ॥ ४१-४६ ॥
प्रायश्चित्तीयतां प्राप्य दैवात्पूर्वकृतेन वा ।
न संसर्गं व्रजेत्सद्भिः प्रायश्चित्तेऽकृते द्विजः ॥ ४७ ॥
इह दुश्चरितैः केचित्केचित्पूर्वकृतैस्तथा ।
प्राप्नुवन्ति दुरात्मानो नरा रूपविपर्ययम् ॥ ४८ ॥

४०६ मनुस्मृति ।
विविध-प्रायश्चित्त ।
दैववश अथवा पूर्वजन्म के पाप से द्विज प्रायश्चित्त योग्य
होकर बिना उसको किये सज्जनों के साथ संसर्ग न करे । कोई
यहां के कोई पूर्वजन्म के दुराचार से दुष्टात्मा मनुष्य, विविधरूप-
विकारों को पाते हैं ॥ ४७-४८ ॥
सुवर्णचौरः कौर्नख्यं सुरापः श्यावदन्तताम् ।
ब्रह्महा क्षयरोगित्वं दौश्चर्म्यं गुरुतल्पगः ॥ ४६ ॥
पिशुनः पौतिनासिक्यं सूचकः पूतिवक्रताम् ।
धान्यचौरोऽङ्गहीनत्वमातिरेक्यं तु मिश्रकः ॥ ५० ॥
अन्नहर्त्तामयावित्वं मौक्यं वागपहारकः ।
वस्त्रपहारकः श्वैत्र्यं पङ्गुतामश्वहारकः ॥ ५१ ॥
दीपहर्त्ता भवेदन्धः काणो निर्वापको भवेत् ।
हिंसया व्याधिभूयस्त्वमरोगित्वमहिंसया ॥ ५२ ॥
एवं कर्मविशेषेण जायन्ते सद्भिर्गर्हिताः ।
जडमूकन्धवधिरा विकृताकृतयस्तथा ॥ ५३ ॥
सोना का चोर बुरे नखोंवाला, शराबी काले दांतोंवाला, ब्रह्म-
हत्यारा, क्षयरोगी और गुरु स्त्री-गामी चर्मरोगी होता है । चुगल
की नाक सड़ती है, झूठे निंदक का मुख दुर्गन्धयुक्त होता है ।
अन्नचोर अङ्गहीन और अन्न में मिलावट करनेवाला अधिकाङ्ग
होता है । पक्वान्न चोर को मन्दाग्नि, विद्याचोर गूंगा, वस्त्रचोर
श्वेतकुष्ठी और घोड़े का चोर लूला होता है । दीप चुरानेवाला
अंधा, दीप बुझानेवाला काना, हिंसा से अधिक रोगी और
अहिंसा से नीरोग होता है । इस प्रकार अनेक पापकर्मों से मनुष्य
जड़बुद्धि, गूँगे, अंधे, बहिरे और कुरूप होजाते हैं ॥ ४६-५३ ॥
चरितव्यमतो नित्यं प्रायश्चित्तं विशुंद्धये ।