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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

और दशावतार का संग्राहक यह श्लोक है—

' भूमिका । ६७
और दशावतार का संग्राहक यह श्लोक है—
' मत्स्यः कूर्मोऽथ वाराहो नरसिंहोऽथ वामनः ।
रामो रामश्च रामश्च बुद्धः कल्की च ते दश ॥ '
उक्त अवतारों से औपासनिक नाम-रूप-लिङ्ग का बोध
स्पष्टरूप से होता है । परन्तु वैदिक निघण्टु में ऐसे नाम नहीं
प्राप्त होते जिनसे चतुर्भुजादि आकार का परिचय हो; विष्णु
आदि नाम प्राप्त होकर भी पूर्वकाण्ड में अग्नि आदि अन्य
देवता के समान हविर्मात्र के भागी हैं; उत्तरकाण्ड में निरा-
कार हैं; ' अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ' इत्यादि स्थल में उपास-
नार्थ साकार होकर भी किसी नियत आकार के बोधक नहीं
हैं; जहां विष्णु आदि नाम नामान्तर के साथ पढ़े हैं—जैसे
' आग्नावैष्णवं—' इत्यादि—वहां पर भी अर्थान्तर के बोधक
हैं; और ' यथाभिमतध्यानाद्वा ' इत्यादि दार्शनिक लिङ्ग
भी नियत आकार के व्यवस्थापक नहीं हैं। ऐसी दशा में विष्णु
आदि पदार्थ के उपबृंहक इतिहास-पुराण ही शरण हैं; उनमें
जिस आकार का जो उपबृंहक प्रकरण है उसके अनुसार
आकार-प्रतिपादक नाम और सहपठित निराकार-प्रतिपादक
नाम, व्यावहारिक तथा पारमार्थिक दशा की सिद्धि के लिये
पर्यायरूप मानने चाहिये । अतएव अग्निपुराण आदि के
आधार से रचे नाम-लिङ्गानुशासनों ( कोषों ) में ब्रह्मादि
देवताओं के नाम एकत्र किये गये, जिनमें वैदिक सिद्धान्त-
सिद्ध भेदक और अभेदक ये दोनों नाम हैं । यह विषय आगे
स्पष्ट होगा ।

६८ मनुस्मृति ।
नाम-रूप-लिङ्ग की उपबृंहक श्रुतियां—
“अथ यो ह खलु वा वास्य राजसोंऽशोऽसौ स योऽयं
ब्रह्मा, अथ यो ह खलु वा वास्य तामसोंऽशोऽसौ स योऽयं
रुद्रः, अथ यो ह खलु वा वास्य सात्त्विकोंऽशोऽसौ स योऽयं
विष्णुः” इति मैत्रेयोपनिषत् ।
“उमासहायं परमेश्वरं प्रभुं
त्रिलोचनं नीलकण्ठं प्रशान्तम् ।
ध्यात्वा मुनिर्गच्छति भूतयोनिं
समस्तसाक्षिं तमसः परस्तात् ॥”
कैवल्योपनिषत् ।
“स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमां
हैमवतीं ताँह् होवाच किमेतद् यक्षमिति ।”
सामवेदीय-तलवकारोपनिषत् ।
“तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम् ॥
दुर्गां देवीं शरणमहं प्रपद्ये सुतरसितरसे नमः ॥”
नारायणोपनिषत् ।
इत्यादि ।
पदार्थ के उत्पत्ति-स्थिति-संहाररूप अवस्था भेद के अनु-
सार परमेश्वर के ब्रह्मा-विष्णु-रुद्ररूप अवस्था भेद वेद-दृष्टि
१ ‘त्र्यम्बकं यजामहे—’ (य० ३ । ६१) इत्यादि ।
२ ‘नीलग्रीवः—’ (य० १६ । ७) इत्यादि ।
३ ‘या ते रुद्र शिवा तनूः शिवा विश्वाह भेषजी ।
शिवा रुद्रस्य भेषजी तया नो मृड जीवसे ॥’
(य० १६ । ४६)
४ अन्य देवताओं के आकार के विषय में एवंविध मन्त्रलिङ्ग चारो वेद की
मन्त्रसंहिताओं में तथा तैत्तिरीयमन्त्रसंहिता में नहीं प्राप्त होते (एक बार तो
पढ़ देखिये)।

भूमिका । ६६

`से उत्पन्न हुए; और जड़ तथा चेतन रूप से विभक्त स्थावर-
जङ्गमात्मक पदार्थ के भीतर ऊष्मा, बाहर प्रकाश की आवश्य-
कता के कारण अग्नीषोमात्मक सूर्य उत्पन्न हुए; पदार्थ और
उसकी अवस्था सिद्धि के लिये गणेश उत्पन्न हुए; पदार्थों के
यथायोग्य अवस्थान के निमित्त शक्ति उत्पन्न हुई । उक्त ब्रह्म-
कार्य-उत्पत्ति को शक्ति में अन्तर्भूत मान कर परमेश्वर की
विष्णु आदि पञ्चदेवतात्मक उपासना प्रवृत्त हुई, जिसका
विस्तार विष्णुपुराण, शिवपुराण, मार्कण्डेयपुराण, सूर्यपुराण
और गणेशपुराण में भली भांति किया है । किं बहुना; सारे
पुराण, उपपुराण और इतिहासों का उपसंहार इन्हीं विष्णु-
शिव-शक्ति-गणेश तथा सूर्य की विभूतियों में हुआ है। जैसे
पदार्थ के उत्पत्ति आदि तीन भाव-विकार से ब्रह्मा आदि
तीन देवता कहे हैं वैसे ही पदार्थ के ऊष्मा तथा प्रकाश के कारण
अन्य भाव-विकार से सूर्य, और नियमित भाव-विकार के
लाभार्थ गणेश कहे हैं । और भाव-विकार ही से वेदान्त-दर्शन
में परमेश्वर का तटस्थ-लक्षण किया है । शब्दार्थरूप जगत् में
यह अर्थ-सृष्टि की व्यवस्था है, एवं शब्द-सृष्टि की भी व्यवस्था
जाननी चाहिये ।


१ पदार्थ की अवस्था ।
२ "जायतेऽस्ति, विपरिणमते वर्धते,ऽपक्षीयते विनश्यति" वाष्र्यायणि ।
३ 'विनायकः कर्म विघ्न--' याज्ञवल्क्य ।
४ 'जन्माद्यस्य यतः' वेदव्यास ।
५ 'नित्यानन्दवपुर्निरन्तरगलत्पञ्चाशदर्णैः क्रमाद् व्याप्तं येन चराचरात्मकमिदं
शब्दार्थरूपं जगत् । शब्दब्रह्म यदूचिरे सुकृतिनश्चैतन्यमन्तर्गतं तद्वोऽव्यादनिशं
शशाङ्कसदृशं वाचामधीशं महः ॥' शारदातिलककार ।

७० मनुस्मृति ।
परमेश्वरैक्य । चित्त के अत्यन्त चञ्चल होने से परमेश्वर
की निराकारोपासना पूर्वकाल में भी दुर्घट थी, वर्तमान काल
में तो अत्यन्त दुर्घट क्या बल्कि असम्भव सी है । शिव महिमा
में कहा है—
‘ अतीत: पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयो-
: रतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ।
: स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य त्रिपयः
: पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥’
: अतएव मध्यमाधिकारी और मन्दाधिकारी के चित्तविश्रा-
: मार्थ पञ्चदेवात्मक साकारोपासना वेददृष्टि से कही है और
: उन पञ्चदेवताओं में श्रुति-स्मृति-इतिहास-पुराण के अनुसार
: भेद नहीं है, किन्तु अभेद ही है । इस विषय में पहिले कुछ
: श्रुतियां दिखलाई जाती हैं—
: ‘ इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहु-
: रथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् ।
: एकं सद् बहुधा विप्रा वदन्ति
: अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ॥’
: ( ऋ० सं० २ अ० ३ अं० २२ अनु० )
: ‘ तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः ।
: तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म ता आपः स प्रजापतिः ॥’
: ( य० सं० ३२ । १ )
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: १ ‘ चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथिवलवद्दृढम् ’ ( गीता ६ । ३४ )
: २-३ वर्तमान काल के उपासक मध्यम तथा मन्द नाम से चिढ़ेंगे क्योंकि उनके
: विचार में निराकारोपासना मौसी का घर है ।