मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
ग्यारहवां अध्याय। ४४१
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ग्यारहवां अध्याय। ४४१
मास तक भीख मांगकर निर्वाह करे। द्विज, 'देवकृतस्य०'
इत्यादि शाकल होम के मन्त्रों से, एक वर्ष तक घी का होम करे
अथवा 'नम इन्द्रश्च०' इत्यादि मन्त्रका एक वर्षतक पाठ करे
तो महापाप से भी छूट जाता है। महापातकी एक वर्षतक भीख
मांगकर खाय, सावधानी से नित्य गौओं के पीछे फिरे। और
पवमान देवता के सूक्तों का पाठ करे तो शुद्ध होता है। तीन
पराक व्रतों से शुद्ध, जितेन्द्रिय होकर, वन में वेदसंहिता का
तीन बार पाठ करे तो सब पापों से छूटता है। तीन दिन उप-
वास करे, तीनों समय में स्नान करे और अघमर्षण-सूक्त का पाठ
करे तो सब पापों से छूट जाता है ॥ २५५-२६०॥
यथाश्वमेधः क्रतुराट् सर्वपापापनोदनम्।
तथाघमर्षणं सूक्तं सर्वपापापनोदनम् ॥ २६१ ॥
हत्वा लोकानपीमांस्त्रीनश्नन्नपि यतस्ततः ।
ऋग्वेदं धारयन् विप्रो नैनः प्राप्नोति किञ्चन ॥ २६२॥
ऋक्संहितां त्रिश्भ्यस्य यजुषां वा समाहितः ।
साम्नां वा सरहस्यानां सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २६३ ॥
यथा महाह्रदं प्राप्य क्षिप्तं लोष्ठं विनश्यति ।
तथा दुश्चरितं सर्वं वेदे त्रिवृति मज्जति ॥ २६४ ॥
ऋचो यजूंषि चान्यानि सामानि विविधानि च ।
एष ज्ञेयस्त्रिवृद्वेदो यो वेदैनं स वेदवित् ॥ २६५ ॥
आद्यं यत्त्र्यक्षरं ब्रह्म त्रयी यस्मिन् प्रतिष्ठिता ।
स गुह्योऽन्यस्त्रिवृद्वेदो यस्तं वेद स वेदवित् ॥ २६६ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रणीतायां स्मृतौ
एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
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४४२ मनुस्मृति ।
जैसे यज्ञों का राजा अश्वमेध सब पापों का नाशक है, वैसे
अघमर्षण-सूक्त सब पापों का नाशक है। ऋग्वेद को धारण करने
वाला ब्राह्मण चाहे तीनों लोकों का संहार करे या मनमाने
भोजन करे तो भी उसको पातक नहीं लगता। जो द्विज, साव-
धानी से, ऋक्संहिता या यजुःसंहिता अथवा सामसंहिता की
ब्राह्मण-उपनिषदों के सहित तीन बार आवृत्ति करे तो सब
पापों से मुक्त होजाता है। जैसे बड़ी नदी में डाला हुआ ढेला
गल जाता है वैसे सब पाप तीन आवृत्ति वेद में डूब जाते हैं।
ऋक्, यजु और साम वेद और विविध मन्त्रों को त्रिवृत् वेद
जानना चाहिए। जो इनको जानता है वही वेदवेत्ता है। सब वेदों में
प्रधान तीन अक्षर का-जिसमें तीनों वेद अन्तर्गत हैं, वह गोपनीय
प्रणव 'ओं' कार, दूसरा त्रिवृत् वेद है। जो उसके स्वरूप और
अर्थ को जानता है वह वेदविशारद है॥ २६१-२६६॥
: ग्यारहवां अध्याय पूरा हुआ।
अथ द्वादशोऽध्यायः।
चातुर्वर्ण्यस्य कृत्स्नोऽयमुक्तो धर्मस्त्वयानघ ।
कर्मणां फलनिर्वृत्तिं शंस नस्तत्त्वतः पराम् ॥ १ ॥
स तानुवाच धर्मात्मा महर्षीन् मानवो भृगुः ।
अस्य सर्वस्य शृणुत कर्मयोगस्य निर्णयम् ॥ २ ॥
शुभाशुभफलं कर्म मनोवाग्देहसम्भवम् ।
कर्मजा गतयो नृणामुत्तमाधममध्यमाः ॥ ३ ॥
तस्येह त्रिविधस्यापि त्र्यधिष्ठानस्य देहिनः ।
दशलक्षणयुक्तस्य मनो विद्यात्प्रवर्तकम् ॥ ४ ॥
परद्रव्येष्वभिध्यानं मनसानिष्टचिन्तनम् ।
वितथाभिनिवेशश्च त्रिविधं कर्म मानसम् ॥ ५ ॥
पारुष्यमनृतं चैव पैशुन्यं चापि सर्वशः ।
असंबद्धप्रलापश्च वाङ्मयं स्याच्चतुर्विधम् ॥ ६ ॥
अदत्तानामुपादानं हिंसा चैवाविधानतः ।
परदारोपसेवा च शारीरं त्रिविधं स्मृतम् ॥ ७ ॥
बारहवां अध्याय।
कर्मफल-निर्णय।
हे पापरहित ! यह चारों वर्णों का संपूर्ण धर्म तुमने कहा। अब
शुभाशुभ कर्मों के दूसरे जन्म में होनेवाले फलों को यथार्थरूप
से हम से कहिये। इस प्रकार महर्षियोंने भृगु से पूँछा। यह सुनकर
४४४ मनुस्मृति ।
मनुपुत्र-धर्मात्मा भृगुने ऋषियों से कहा, इस सम्पूर्ण कर्मयोग के
निर्णय को सुनो:-मन, वाणी और शरीर से होनेवाला कर्म शुभ,
अशुभ फल देता है और उसी कर्म के अनुसार मनुष्यों का उ-
त्तम-मध्यम और अधम योनि में जन्म होता है। उस देही के
उत्तम-मध्यम-अधम और मन-वाणी-शरीर के आश्रित फल देने
वाले तीन प्रकार के दश लक्षणयुक्त धर्म का मनप्रवर्तक-चलाने
वाला है। अन्याय से परधन हरने का विचार, दूसरे का अनभल
चाहना और परलोक में अश्रद्धा ये तीन प्रकार के मानस पाप-
कर्म हैं। कठोर वचन कहना, झूठ बोलना, सब भांति की चुगली
और व्यर्थ बकवाद करना ये चार वाणी के पापकर्म हैं । बिना
दी हुई वस्तु लेना, शास्त्रविरुद्ध हिंसा और परस्त्री-गमन ये तीन
शरीर के पापकर्म हैं ॥ १-७ ॥
मानसं मनसैवायमुपभुङ्क्ते शुभाशुभम् ।
वाचावाचाकृतं कर्म कायेनैव च कायिकम् ॥ ८ ॥
शरीरजैः कर्मदोषैर्याति स्थावरतां नरः ।
वाचिकैः पक्षिमृगतां मानसैरन्त्यजातिताम् ॥ ६ ॥
वाग्दण्डोऽथ मनोदण्डः कायदण्डस्तथैव च ।
यस्यैते निहिता बुद्धौ त्रिदण्डीति स उच्यते ॥ १० ॥
त्रिदण्डमेतान्निक्षिप्य सर्वभूतेषु मानवः ।
कामक्रोधौ तु संयम्य ततः सिद्धिं नियच्छति ॥ ११ ॥
योऽस्यात्मनः कारयिता तं क्षेत्रज्ञं प्रचक्षते ।
यः करोति तु कर्माणि स भूतात्मोच्यते बुधैः ॥ १२ ॥
जीवसंज्ञोऽन्तरात्मान्यः सहजः सर्वदेहिनाम् ।
येन वेदयते सर्वं सुखं दुःखं च जन्मसु ॥ १३ ॥