मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
ग्यारहवां अध्याय । ४२१
[हेडर]
ग्यारहवां अध्याय । ४२१
वासो दद्याद्धयं हत्वा पञ्च नीलान् वृषान् गजम् ।
अजमेषावनड्वाहं खरं हत्वैकहायनम् ॥ १३७ ॥
क्रव्यादांस्तु मृगान् हत्वा धेनुं दद्यात्पयस्विनीम् ।
अक्रव्यादान् वत्सतरीमुष्ट्रं हत्वा तु कृष्णलम् ॥ १३८ ॥
घोड़े की हत्या में वस्त्र, हाथी की हत्या में पांच नीले बैल, बकरा
और मेढ़ा के लिए सांड़ और गर्दभ के वध में एक वर्ष का बछड़ा
दान करे। मांसाहारी पशुओं की हत्या में दूध देनेवाली गौ, मांस
न खानेवाले पशुओं की हिंसा में बछड़ी और ऊंट की हिंसा में
रत्तीभर सोने का दान करना चाहिए ॥ १३७-१३८ ॥
जिनकार्मुकवस्तावीन् पृथग्दद्याद्विशुद्धये ।
चतुर्णामपि वर्णानां नारीर्हत्वाऽनवस्थिताः ॥ १३६ ॥
दानेन वधनिर्णैकं सर्पादीनामशक्नुवन् ।
एकैकशश्चरेत्कृच्छ्रं द्विजः पापापनुत्तये ॥ १४० ॥
अस्थिमतां तु सत्त्वानां सहस्रस्य प्रमापणे ।
पूर्णे चानस्यनस्थ्नां तु शूद्रहत्याव्रतं चरेत् ॥ १४१ ॥
किञ्चिदेव तु विप्राय दद्यादस्थिमतां वधे ।
अनस्थ्नां चैव हिंसायां प्राणायामेन शुद्ध्यति ॥ १४२॥
फलदानां तु वृक्षाणां छेदने जप्यमृक्शतम् ।
गुल्मवल्लीलतानां च पुष्पितानां च वीरुधाम् ॥ १४३ ॥
अन्नाद्यजानां सत्त्वानां रसजानां च सर्वशः ।
फलपुष्पोद्भवानां च घृतप्राशोविशोधनम् ॥ १४४ ॥
चारों वर्ण की व्यभिचारिणी स्त्रियों की हत्या होने पर क्रम से
मृगचर्म, धनुष, बकरा और मेढ़े का दान करे । पूर्व कहे हुए सर्प
४२२ मनुस्मृति।
आदि के प्रायश्चित्तों को न करसके तो एक एक कृच्छ्र व्रत करे।
हजार हड्डीवाले जीवों की हत्या और बिना हड्डीवाले गाड़ी भर
जीवों की हत्या में शूद्रहत्या का प्रायश्चित्त करे। अस्थि-हड्डी
वाले प्राणियों की हत्या में ब्राह्मण को कुछ दक्षिणा दे और अस्थि-
रहितों की हत्या में प्राणायाम से शुद्ध होता है। फल देनेवाले वृक्ष,
गुल्म, बेल, लता और फूलवाले पौधों को व्यर्थ काटने पर सौ
ऋचाओं का पाठ करे। सब भांति के अन्न, रस, फल-पुष्पादिमें पैदा
हुए जीवों के वध में 'घृत-प्राशन' शुद्ध करता है ॥ १३६-१४४॥
कृष्टजानामोषधीनां उत्पन्नानां स्वयं वने ।
वृथालम्भेऽनुगच्छेद्रां दिनमेकं पयोव्रतः ॥ १४५ ॥
एतैर्व्रतैरपोह्यं स्यादेनो हिंसासमुद्भवम् ।
ज्ञानाज्ञानकृतं कृत्स्नं शृणुतानाद्यभक्षणे ॥ १४६ ॥
खेत में या वन में स्वयं उत्पन्न औषधियों को व्यर्थ काटने पर
एक दिन दूध पीकर गौ के पीछे फिरे। जान या अनजान में हिंसा
से हुए सब पाप इन व्रतों से नष्ट होजाते हैं। अब अभक्ष्य-भक्षण
का प्रायश्चित्त सुनो ॥ १४५-१४६ ॥
अज्ञानाद्वारुणीं पीत्वा संस्कारेणैव शुध्यति ।
मतिपूर्वमनिर्देश्यं प्राणान्तिकमिति स्थितिः ॥ १४७॥
अपः सुराभाजनस्था मद्यभाण्डस्थितास्तथा ।
पञ्चरात्रं पिबेत्पीत्वा शंखपुष्पीसृतं पयः ॥ १४८ ॥
स्पृष्ट्वा दत्त्वा च मदिरां विधिवत्प्रतिगृह्य च।
शूद्रोच्छिष्टाश्च पीत्वापः कुशावारि पिबेत्त्र्यहम् ॥ १४६॥
ब्राह्मणस्तु सुरापस्य गन्धमाघ्राय सोमपः ।
प्राणानप्सु त्रिरायम्य घृतं प्राश्य विशुध्यति ॥ १५० ॥