मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
तीसरा अध्याय । ६६
तीसरा अध्याय । ६६
ऋषि के मत से क्षत्रिय, शूद्रकन्या में सन्तान पैदा करने से पतित
होता है। और भृगुऋषि के मत से, शूद्रकन्या से विवाह करनेवाले
वैश्य के पौत्र होजाने पर वह पतित होता है। ब्राह्मण, शूद्र स्त्री के
संयोग से पतित होता है और उससे सन्तान पैदा करने से
ब्राह्मणत्व से हीन होजाता है। शूद्रास्त्री की प्रधानता में देव,
पितर श्राद्ध में अन्न का ग्रहण नहीं करते। और वह पुरुष स्वर्गगामी
नहीं होता ॥ १६-१८ ॥
वृषलीफेनपीतस्य निःश्वासोपहतस्य च।
तस्यां चैव प्रसूतस्य निष्कृतिर्न विधीयते ॥ १९ ॥
चतुर्णामपि वर्णानां प्रेत्य चेह हिताहितान् ।
अष्टाविमान् समासेन स्त्रीविवाहान्निबोधत ॥ २० ॥
ब्राह्मो दैवतथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः ।
गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥ २१ ॥
यो यस्य धर्म्यो वर्णस्य गुणदोषौ च यस्य यौ ।
तत् सर्वं प्रवक्ष्यामि प्रसवे च गुणागुणान् ॥ २२ ॥
शूद्रा का अधर चुम्बन से और उसकी सांस लगने से, उस
पुरुष की और उसके सन्तान की पापशुद्धि का कोई उपाय नहीं
है। चारों वर्णों का लोक और परलोक में हित अहित करनेवाला,
आठ प्रकार का विवाह होता है-ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य,
आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच। जिस वर्णका जो विवाह
धर्मानुकूल है और जो गुण, दोष जिसमें है और उनसे पैदा सन्तानों
में जो हैं, उनको कहता हूं ॥ १६-२२ ॥
षडानुपूर्व्या विप्रस्य क्षत्रस्य चतुरोऽवरान् ।
विट्शूद्रयोस्तु तानेव विद्याद्धर्म्यान राक्षसान् ॥ २३ ॥
चतुरो ब्राह्मणस्याद्यान् प्रशस्तान् कवयो विदुः ।
राक्षसं क्षत्रियस्यैकमासुरं वैश्यशूद्रयोः ॥ २४ ॥
७० मनुस्मृति ।
पञ्चानां तु त्रयो धर्म्या द्वावधर्म्यौ स्मृताविह ।
पैशाचश्चासुरश्चैव न कर्तव्यौ कदाचन ॥ २५ ॥
पृथक् पृथग्वा मिश्रौ वा विवाहौ पूर्वचोदितौ ।
गान्धर्वो राक्षसश्चैव धर्म्यौ क्षत्रस्य तौ स्मृतौ ॥ २६ ॥
ब्राह्मण को क्रम से पहले के छः विवाह धर्म हैं अन्त के चार
क्षत्रिय वैश्य और शूद्र को धर्म हैं पर राक्षस विवाह किसी के लिए
अच्छा नहीं है। ब्राह्मण के लिए पहले चार विवाह श्रेष्ठ हैं। क्षत्रिय
के लिए एक राक्षस, वैश्य और शूद्र के लिए आसुर विवाह श्रेष्ठ
माना गया है। पांच विवाहों में तीन-प्रजापत्य, गान्धर्व और
राक्षस, धर्म कहा है। और दो-पैशाच और आसुर अधर्म हैं।
इस लिए इन दोनों को न करना चाहिए । पहले कहे विवाह
अलग अलग या मिले हुए गान्धर्व और राक्षस क्षत्रियों के धर्म-
सम्बन्धी हैं ॥ २३-२६ ॥
आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतिशीलवते स्वयम् ।
आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्मः प्रकीर्तितः ॥ २७ ॥
यज्ञे तु वितते सम्यगृत्विजे कर्म कुर्वते ।
अलङ्कृत्य सुतादानं दैवं धर्मं प्रचक्षते ॥ २८ ॥
एकं गोमिथुनं द्वे वा वरादादाय धर्मतः ।
कन्याप्रदानं विधिवदार्षो धर्मः स उच्यते ॥ २९ ॥
वेदज्ञ और सुशील वर को बुलाकर उसका पूजन सत्कार करके
कन्यादान को ब्राह्म विवाह कहते हैं। बड़े यज्ञ में ऋत्विक् ब्राह्मण
को, वस्त्र-आभूषण से सुशोभित कन्या का दान 'दैव विवाह'
कहाजाता है। एक एक या दो दो गौ, बैल यज्ञ के लिए, वर से
लेकर, जो कन्यादान होता है उसको आर्षविवाह कहते हैं ॥२७-२९॥
सहैव चरतां धर्ममिति वाचाऽनुभाष्य च ।
कन्याप्रदानमभ्यर्च्य प्राजापत्यो विधिः स्मृतः ॥३०॥