मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पांचवां अध्याय। १८७
पांचवां अध्याय। १८७
गुणों से रहित हो तोभी उसकी सेवा देवता के समान करनी
चाहिए ॥ १५२-१५४ ॥
नास्ति स्त्रीणां पृथग्यज्ञो न व्रतं नाप्युपोषितम् ।
पतिं शुश्रूषते येन तेन स्वर्गे महीयते ॥ १५५ ॥
पाणिग्राहस्य साध्वी स्त्री जीवतो वा मृतस्य वा ।
पतिलोकमभीप्सन्ती नाचरेत् किञ्चिदप्रियम् ॥१५६॥
कामं तु क्षपयेद्देहं पुष्पमूलफलैः शुभैः ।
नतु नामापि गृह्णीयात् पत्यौ प्रेते परस्य तु ॥ १५७ ॥
आसीतामरणात्क्षान्ता नियता ब्रह्मचारिणी ।
यो धर्म एकपत्नीनां काङ्क्षन्ती तमनुत्तमम् ॥ १५८॥
स्त्रियों के लिए अलग यज्ञ, व्रत वा उपवास कुछ भी नहीं हैं,
उनके लिए पति की सेवा ही स्वर्ग देनेवाली है। जो पतिव्रता स्त्री
अपने पतिलोक की इच्छा करे, वह पति के जीवन में, या मरण में
उसके विरुद्ध कोई आचरण न करे । विधवा स्त्री को फूल, फल
खाकर शरीर क्षीण करना चाहिए। पति के मरने पर, व्यभिचार
के ख्याल से पर पुरुष का नाम भी न लेय । एक पति की सेवा
करनेवाली स्त्री, विधवा होने पर, अपनी मनकामनाओं को छोड़
देय, मरण तक ब्रह्मचर्य से रहे और पतिसेवा के फल की
इच्छा रक्खे ॥ १५५-१५८ ॥
अनेकानि सहस्राणि कुमारब्रह्मचारिणाम् ।
दिवं गतानि विप्राणामकृत्वा कुलसन्ततिम् ॥ १५९॥
मृते भर्तरि साध्वी स्त्री ब्रह्मचर्ये व्यवस्थिता ।
स्वर्गं गच्छत्यपुत्रापि यथा ते ब्रह्मचारिणः ॥ १६० ॥
अपत्यलोभाद्या तु स्त्री भर्तारमतिवर्तते ।
१८८ मनुस्मृति ।
सेह निन्दामवाप्नोति पतिलोकाच्च हीयते ॥ १६१ ॥
नान्योत्पन्ना प्रजास्तीह न चाप्यन्यपरिग्रहे ।
न द्वितीयश्च साध्वीनां क्वचिद्भर्त्तोपदिश्यते ॥ १६२ ॥
हज़ारों लाखों बालब्रह्मचारी, ब्राह्मण कुल की वृद्धि के लिए,
बिना सन्तान के ही स्वर्ग को प्राप्त भए हैं। पति की मृत्यु के बाद,
जो स्त्रियाँ ब्रह्मचर्य से रहती हैं, वे पुत्रहीन भी स्वर्ग को पाती हैं,
जैसे ब्रह्मचारियों को मिला है। परन्तु जो स्त्रियाँ पुत्र की लालसा से
व्यभिचार करती हैं, वे लोक में निन्दा पाकर, अन्त में पतिलोक से
भ्रष्ट होजाती हैं। पति के सिवा दूसरे से उत्पन्न सन्तान उस स्त्री
की सन्तान नहीं गिनी जाती। पतिव्रता स्त्रियों के लिए दूसरे पति
की व्यवस्था कहीं नहीं है। अर्थात् विवाहित पति ही उसको सब
सुख और स्वर्गलोक देने में समर्थ होता है ॥ १५६-१६२ ॥
पतिं हित्वापकृष्टं स्वमुत्कृष्टं या निषेवते ।
निन्द्यैव सा भवेल्लोके परपूर्वेति चोच्यते ॥ १६३ ॥
व्यभिचारात्तु भर्तुः स्त्री लोके प्राप्नोति निन्द्यताम् ।
शृगालयोनिं प्राप्नोति पापरोगैश्च पीड्यते ॥ १६४ ॥
पतिं या नाभिचरति मनोवाग्देहसंयता ।
सा भर्तृलोकमाप्नोति सद्भिःसाध्वीति चोच्यते ॥ १६५ ॥
अनेन नारी वृत्तेन मनोवाग्देहसंयता ।
इहाग्र्यां कीर्तिमाप्नोति पतिलोकं परत्र च ॥ १६६ ॥
जो स्त्री रूप, धन आदि से रहित अपने पति को छोड़कर दूसरे
पुरुष की सेवा करती है वह संसार में निन्दा पाती है और इसका
अमुक पति पहला है अमुक दूसरा है इस प्रकार लोग कहते हैं।
जो स्त्री पति को छोड़कर व्यभिचार करती है वह जगत् में निन्दा