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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 568 of 649

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Page 568

४२८ :: मनुस्मृति ।
समागम से जो पाप द्विज करता है वह तीन वर्ष तक भिक्षा अन्न
खाकर गायत्री जप से दूर होता है । यह सब पाप करनेवाले चारों
वर्णं की शुद्धि कही है । अब पतितों के संसर्ग का प्रायश्चित्त
सुनो ॥ १७७-१८० ॥
संवत्सरेण पतति पतितेन सहाचरन् ।
याजनाध्यापनाद्यौनान्न तु यानासनाशनात् ॥ १८१ ॥
यो येन पतितेनैषां संसर्गं याति मानवः ।
स तस्यैव व्रतं कुर्यात्तत्संसर्गविशुद्धये ॥ १८२ ॥
पतितस्योदकं कार्यं सपिण्डैर्बान्धवैर्बहिः ।
निन्दितेऽहनि सायाह्ने ज्ञात्यृत्विग्गुरुसन्निधौ ॥ १८३ ॥
दासी घटमपां पूर्णं पर्यस्येत्प्रेतवत्पदा ।
अहोरात्रमुपासीरन् अशौचं बान्धवैः सह ॥ १८४ ॥
एक वर्ष तक पतितों के साथ एक सवारी वा आसन पर बैठने
से और एक पंक्ति में भोजन करने से उनको यज्ञकर्म कराने, वेद
पढ़ाने और विवाहसम्बन्ध करने से पतित होजाता है। जो मनुष्य
इन पतितों के साथ जो संसर्ग करता है वह उस संसर्ग की शुद्धि
के लिए वही व्रत करे। पतित प्रायश्चित्त न करे तो उसके स-
पिण्ड और ममेरे-फुफेरे भाई आदि निन्दित तिथिको सायंकाल
गाँव के बाहर जाति-पुरोहित-गुरुजनों के सामने जलदान करे।
दासी जल भरे पुराने घड़े को प्रेत के समान पैर से ठोकर देकर
फोड़ दे और सपिण्ड बान्धवों के साथ एक दिन-रात का
प्रायश्चित्त माने ॥ १८१-१८४ ॥
निवत्र्तेरंश्च तस्मात्तु संभाषणमहाशने ।
दायाद्यस्य प्रदानं च यात्रा चैव हि लौकिकी॥१८५॥