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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 582 of 649

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Page 582

४४२ मनुस्मृति ।
जैसे यज्ञों का राजा अश्वमेध सब पापों का नाशक है, वैसे
अघमर्षण-सूक्त सब पापों का नाशक है। ऋग्वेद को धारण करने
वाला ब्राह्मण चाहे तीनों लोकों का संहार करे या मनमाने
भोजन करे तो भी उसको पातक नहीं लगता। जो द्विज, साव-
धानी से, ऋक्संहिता या यजुःसंहिता अथवा सामसंहिता की
ब्राह्मण-उपनिषदों के सहित तीन बार आवृत्ति करे तो सब
पापों से मुक्त होजाता है। जैसे बड़ी नदी में डाला हुआ ढेला
गल जाता है वैसे सब पाप तीन आवृत्ति वेद में डूब जाते हैं।
ऋक्, यजु और साम वेद और विविध मन्त्रों को त्रिवृत् वेद
जानना चाहिए। जो इनको जानता है वही वेदवेत्ता है। सब वेदों में
प्रधान तीन अक्षर का-जिसमें तीनों वेद अन्तर्गत हैं, वह गोपनीय
प्रणव 'ओं' कार, दूसरा त्रिवृत् वेद है। जो उसके स्वरूप और
अर्थ को जानता है वह वेदविशारद है॥ २६१-२६६॥
: ग्यारहवां अध्याय पूरा हुआ।