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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

तीसरा अध्याय। ८३

तीसरा अध्याय। ८३
रखनेवाला स्त्री और अग्निहोत्री ब्राह्मण को अतिथि न मानना
चाहिए ॥ १००-१०३ ॥
उपासते ये गृहस्थाः परपाकमबुद्धयः ।
तेन ते प्रेत्य पशुतां व्रजन्त्यन्नादिदायिनाम् ॥ १०४ ॥
अप्रणोद्योऽतिथिः सायं सूर्योढो गृहमेधिना ।
काले प्राप्तस्त्याकाले वा नास्यानश्नन् गृहे वसेत् ॥१०५॥
न वै स्वयं तदश्नीयादतिथिं यन्न भोजयेत् ।
धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं वातिथिपूजनम् ॥ १०६॥
जो मूर्ख दूसरे के यहां खाने के लोभ से अतिथि बनता है,
वह मरकर अन्न देनेवाले का पशु होता है। जो गृहस्थ के घर
सूर्यास्त के बाद अतिथि आवे समय में या असमय में, तोभी
उसको भूखा न रक्खे। जो अतिथि को न खिलाया हो वह पदार्थ
खुद भी न खावे। अतिथि का सत्कार यश, आयु और स्वर्ग
देनेवाला है ॥ १०४-१०६ ॥
आसनावसथौ शय्यामनुव्रज्यामुपासनाम् ।
उत्तमेषूत्तमं कुर्याद्धीने हीनं समे समम् ॥ १०७॥
वैश्वदेवे तु निर्वृत्ते यद्यन्योऽतिथिराव्रजेत् ।
तस्याप्यन्नं यथाशक्ति प्रदद्यान्न बलिं हरेत् ॥ १०८ ॥
न भोजनार्थं स्वे विप्रः कुलगोत्रे निवेदयेत् ।
भोजनार्थं हि ते शंसन्वान्ताशीत्युच्यते बुधैः ॥१०९॥
न ब्राह्मणस्य त्वतिथिर्गृहे राजन्य उच्यते ।
वैश्यशूद्रौ सखा चैव ज्ञातयो गुरुरेव च ॥ ११० ॥
यदि त्वतिथिधर्मेण क्षत्रियो गृहमाव्रजेत् ।
भुक्तवत्स्वथ विप्रेषु कामं तमपि भोजयेत् ॥ १११ ॥

८४ मनुस्मृति ।
शासन, स्थान, शय्या, सेना और अरदली में जाना, इन सबका
उत्तम अतिथि उत्तम, मध्यम को मध्यम और साधारण से उसके
लायक बर्ताव करना चाहिए । वैश्वदेव के बाद जो कोई अतिथि
आपड़े तो उसको भी भोजन बनाकर खिलावे, पाक में से बलि न
देवे । विप्र को भोजनार्थ अपना कुल, गोत्र न बतलाना चाहिए ।
यदि बतलावे तो वह, वान्ताशी 'उगलन खानेवाला' कहा जाता
है । ब्राह्मण के घर क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अपना मित्र, जातीय पुरुष
और गुरु ये सब अतिथि नहीं माने जाते । अगर क्षत्रिय अतिथि
बनकर आवे तो ब्राह्मणभोजन के बाद उसको भी खूब खिला
देवे ॥ १०७-१११ ॥
वैश्यशूद्रावपि प्राप्तौ कुटुम्बेऽतिथिधर्मिणौ ।
भोजयेत्सह भृत्यैस्तावानृशंस्यं प्रयोजयन् ॥ ११२ ॥
इतरानपि सख्यादीन् संप्रीत्या गृहमागतान् ।
संस्कृत्यान्नं यथाशक्ति भोजयेत्सह भार्यया ॥ ११३ ॥
सुवासिनीः कुमारीश्च रोगिणो गर्भिणीस्तथा ।
अतिथिभ्योऽग्र एवैतान् भोजयेदविचारयन् ॥ ११४ ॥
गृहस्थ ब्राह्मण के घर वैश्य, शूद्र भी अतिथि रूप से आजाय
तो उनको भी नौकरों के साथ खिला देना चाहिए । और भी
मित्र-सम्बन्धी आदि प्रेम से अपने घर आवें तो स्त्री के साथ
उनको भी अच्छा भोजन देना चाहिए । नवीन विवाहवाली,
कन्या, रोगी और गर्भवती इनको अतिथि के पहिले ही बिना विचार
किये भोजन करा देना चाहिए ॥ ११२-११४ ॥
अदत्त्वा तु य एतेभ्यः पूर्वं भुङ्क्ते विचक्षणः ।
स भुञ्जानो न जानाति श्वगृध्रैर्जग्धिमात्मनः॥११५॥
भुक्तवत्स्वथ विप्रेषु स्वेषु भृत्येषु चैव हि ।
भुञ्जीयातां ततः पश्चादवशिष्टं तु दम्पती ॥ ११६ ॥