मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
ग्यारहवां अध्याय । ४०३
ग्यारहवां अध्याय । ४०३
न ब्राह्मणोऽवेदयेत किञ्चिद्राजनि धर्मवित् ।
स्ववीर्येणैव ताञ्छिष्यान् मानवानपकारिणः ॥ ३१ ॥
स्ववीर्याद्राजवीर्याच्च स्ववीर्यं बलवत्तरम् ।
तस्मात्स्वेनैव वीर्येण निगृह्णीयादरीन् द्विजः ॥ ३२ ॥
मुख्य विधि की शक्ति होने पर भी जो पुरुष प्रतिनिधि से कर्म
करता है उस दुर्बुद्धि को उस धर्म का फल परलोक में नहीं मि-
लता । धर्मज्ञ ब्राह्मण अपने थोड़े नुकसान को राजा से न कहे ।
उन अपकारियों को अपने सामर्थ्य सेही दण्ड देवे । तपशक्ति
और राजशक्ति इनमें अपनी तपशक्ति अधिक प्रभावशाली है। इसलिए
द्विजों को अपनी ही शक्ति से शत्रु दमन करना चाहिए ॥ ३०-३२ ॥
श्रुतीरथर्वाङ्गिरसीः कुर्यादित्यविचारयन् ।
वाक्शस्त्रं वै ब्राह्मणस्य तेन हन्यादरीन् द्विजः ॥ ३३ ॥
क्षत्रियो बाहुवीर्येण तरेदापदमात्मनः ।
धनेन वैश्यशूद्रौ तु जपहोमैर्द्विजोत्तमः ॥ ३४ ॥
विधाता शासिता वक्ता मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ।
तस्मै नाकुशलं ब्रूयान्न शुष्कां गिरमीरयेत् ॥ ३५ ॥
न वै कन्या न युवतिर्नाल्पविद्यो न बालिशः ।
होता स्यादग्निहोत्रस्य नार्त्तो नासंस्कृतस्तथा ॥ ३६ ॥
नरके हि पतन्त्येते जुह्वतः स च यस्य तत् ।
तस्माद्वैतानकुशलो होता स्याद्वेदपारगः ॥ ३७ ॥
ब्राह्मण अथर्ववेद के आङ्गिरस मन्त्रों को पढ़कर अभिचार करे ।
मन्त्रोच्चारण ही ब्राह्मण का शस्त्र है । उसीसे द्विज शत्रुओं का
नाश करे । क्षत्रिय अपने भुजबल से, वैश्य और शूद्र धन से और
४०४ , मनुस्मृति ।
ब्राह्मण मन्त्र जप, हवन से आपत्ति को दूर भगावैं । ब्राह्मण विहित
कर्मों का अनुष्ठान करनेवाला, पुत्र-शिष्यों का शासन करनेवाला,
प्रायश्चित्तादि को बतानेवाला और सब का मित्र कहा गया है।
उसको कोई बुरी बात या रूखी बात न कहे। कन्या, युवती, थोड़ा
पढ़ा, मूर्ख, रोगी और यज्ञोपवीत-संस्काररहित पुरुष अग्निहोत्र
न करे। यदि ये सब होता किये जायँ तो खुद और जिसका अग्नि-
होत्र हो वह दोनों नरकगामी होते हैं । इस कारण श्रौतकर्म में
प्रवीण, वेदविशारद ही अग्निहोत्र का होता बन सकता है॥३३-३७॥
प्राजापत्यमदत्त्वाऽश्वमग्न्याधेयस्य दक्षिणाम् ।
अनाहिताग्निर्भवति ब्राह्मणो विभवे सति ॥ ३८ ॥
पुण्यान्यन्यानि कुर्वीत श्रद्दधानो जितेन्द्रियः ।
नत्वल्पदक्षिणैर्यज्ञैर्यजन्ते हि कथं च न ॥ ३६ ॥
इन्द्रियाणि यशः स्वर्गमायुः कीर्ति प्रजाः पशून् ।
हन्त्यल्पदक्षिणो यज्ञस्तस्मान्नाल्पधनो यजेत् ॥ ४० ॥
जो ब्राह्मण वैभव होने पर अग्न्याधान स्वीकार करके प्रजा-
पति देवतावाले अश्व का दान नहीं करता वह अग्न्याधान फल
को नहीं पाता। श्रद्धावान्, जितेन्द्रिय पुरुष, पुण्य के दूसरे कर्मों
को करे। पर न्यून दक्षिणा देकर कोई यज्ञ न करें अर्थात् विना
पूरी दक्षिणा यज्ञ न करना चाहिए। कम दक्षिणा देकर यज्ञ कराने
से यज्ञ इन्द्रियाँ, यश, स्वर्ग, आयु, कीर्ति, प्रजा और पशुओं का
नाश करती है। इस कारण थोड़े धनवाला यज्ञ न करे ॥३८-४०॥
अग्निहोत्र्यपविध्याग्नीन् ब्राह्मणः कामकारतः ।
चान्द्रायणं चरेन् मासं वीरहत्यासमं हि तत् ॥ ४१ ॥
ये शूद्रादधिगम्यार्थमग्निहोत्रमुपासते ।
ऋत्विजस्ते हि शूद्राणां ब्रह्मवादिषु गर्हिताः ॥ ४२ ॥